अंतिम संशोधित (Last Updated): October 3, 2026
अलंकार की परिभाषा, अर्थ, भेद और विद्वानों के मत | Alankar ki Paribhasha
हिंदी व्याकरण और काव्यशास्त्र में अलंकार की परिभाषा (Alankar ki Paribhasha) का विशेष महत्व है। किसी भी कविता, गद्य या काव्य रचना की सुंदरता को बढ़ाने वाले मुख्य तत्वों को अलंकार कहा जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UGC NET, TGT, PGT, RPSC 1st Grade / 2nd Grade और अन्य हिंदी साहित्य से जुड़ी परीक्षाओं में अलंकार से संबंधित प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
इस लेख में हम अलंकार के शाब्दिक अर्थ, विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं, उनके स्पष्टीकरण और परीक्षाओं में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण बिंदुओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
Quick Overview (मुख्य बिंदु)
-
विषय: अलंकार की परिभाषा, अर्थ एवं विद्वानों के मत
-
उपयोगिता: TGT, PGT, NET/JRF, RPSC, सहायक आचार्य परीक्षा
-
प्रमुख संप्रदाय: अलंकार संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भामह हैं।
📌 अलंकार का शाब्दिक अर्थ एवं व्युत्पत्ति
-
‘अलंकार’ शब्द ‘अलम्’ तथा ‘कार’ के योग से बना है, जिसमें ‘अलम्’ का अर्थ ‘शोभा’ तथा ‘कार’ का अर्थ ‘करने वाला’ होता है।
-
“अलंकरोति इति अलंकारः।”
-
अर्थात्: जो काव्य की शोभा बढ़ाए वही अलंकार है।
-
-
“अलंक्रियते अनेन इति अलंकारः।”
-
अर्थात्: जिसके द्वारा अलंकृत (सुंदर) किया जाए, वहीं अलंकार है।
-
अलंकार के भेद
काव्य की शोभा को बढ़ाने वाले इन तत्वों (अलंकारों) को मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया जाता है:
-
शब्दालंकार
-
अर्थालंकार
-
उभयालंकार
| क्रम | अलंकार का मुख्य भेद | उप-भेद / प्रकार | मुख्य विशेषता व पहचान |
| 1. | शब्दालंकार |
• यमक अलंकार
• श्लेष अलंकार
• वक्रोक्ति अलंकार
• पुनरुक्ति प्रकाश आदि |
जहाँ शब्दों के माध्यम से काव्य में सौंदर्य या चमत्कार उत्पन्न होता है। यदि शब्द का पर्यायवाची रख दिया जाए तो अलंकार नष्ट हो जाता है। |
| 2. | अर्थालंकार |
• उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा
• भ्रांतिमान, संदेह, अन्योक्ति
• अतिशयोक्ति, विरोधाभास
• मानवीकरण, व्यतिरेक आदि |
जहाँ अर्थ के माध्यम से काव्य में चमत्कार या सौंदर्य प्रकट होता है। इसमें शब्द बदलने पर भी अलंकार बना रहता है। |
| 3. | उभयालंकार |
• तद्गुण अलंकार
• अतद्गुण अलंकार
• मीलित अलंकार
• उन्मीलित अलंकार |
जहाँ शब्द और अर्थ दोनों के माध्यम से एकसाथ काव्य की शोभा बढ़ाई जाती है। |
💡 विभिन्न विद्वानों के अनुसार अलंकार की परिभाषा और स्पष्टीकरण
हिंदी साहित्य के विभिन्न आचार्यों और विचारकों ने अलंकार को अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित किया है। परीक्षा की दृष्टि से सभी प्रमुख परिभाषाएँ नीचे दी गई हैं:
1. आचार्य रामचंद्र शुक्ल
-
परिभाषा:
“भावों का उत्कर्ष दिखाने और वस्तुओं के रूप, गुण, क्रिया का अधिक तीव्रता के साथ अनुभव कराने में सहायक उक्ति को अलंकार कहते हैं।”
-
स्पष्टीकरण: काव्य में जब किसी भाव को बहुत प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया जाए या किसी वस्तु के रूप, रंग और उसके गुणों को इस प्रकार दर्शाया जाए कि वह पाठक के मन पर सीधा प्रभाव डाले, तो उस सहायक उक्ति या कथन को अलंकार कहा जाता है।
2. आचार्य भामह
-
परिभाषा:
“वक्राभिधेय शब्दोक्तिरिष्टा वाचामलंकृति।”
-
स्पष्टीकरण व अर्थ: आचार्य भामह के अनुसार, जब किसी बात को सामान्य या सीधी भाषा में न कहकर कुछ अलग, अनोखे और वक्र (वैचित्र्यपूर्ण) ढंग से कहा जाए, जिससे शब्द और अर्थ में सुंदरता उत्पन्न हो, उसे अलंकार कहते हैं। इसमें उक्ति का चमत्कार मुख्य होता है।
-
परिभाषा:
“न कांतमपि निर्भूष विभाति वनिता मुखम्।”
-
स्पष्टीकरण व अर्थ: आचार्य भामह ने इस प्रसिद्ध पंक्ति के माध्यम से अलंकार की अनिवार्यता को समझाया है। उनका कहना है कि जिस प्रकार कोई स्त्री अत्यधिक सुंदर होने पर भी बिना आभूषणों (गहनों) के उतनी आकर्षक और शोभायमान नहीं लगती, ठीक उसी प्रकार सुंदर से सुंदर काव्य या कविता भी बिना अलंकारों के अपनी पूरी शोभा को प्राप्त नहीं कर सकती है।
3. आचार्य दंडी
-
परिभाषा:
“काव्य शोभा करान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते।”
-
स्पष्टीकरण: आचार्य दंडी का मानना है कि जो धर्म या तत्त्व कविता (काव्य) की शोभा को बढ़ाते हैं, उन्हें ही अलंकार कहा जाता है। यानी काव्य को सुंदर बनाने वाले साधन ही अलंकार हैं।
4. सुमित्रानंदन पंत
-
परिभाषा:
“अलंकार केवल वाणी की सजावट के लिए नहीं हैं, वे भाव की अभिव्यक्ति के विशेष द्वार हैं। भाषा की पुष्टि के लिए, राग की परिपूर्णता के लिए आवश्यक उपादान हैं। वस्तुतः काव्य शरीर को सजाने के लिए अलंकार गहनों का प्रयोग अपेक्षित है।”
-
स्पष्टीकरण: छायावादी कवि पंत जी के अनुसार, अलंकार केवल शब्दों को सजाने का दिखावा नहीं हैं, बल्कि ये मन के भावों को सही तरीके से व्यक्त करने के मुख्य साधन हैं। जिस तरह शरीर की सुंदरता बढ़ाने के लिए गहने जरूरी हैं, वैसे ही काव्य की पूर्णता के लिए अलंकार आवश्यक हैं।
5. आचार्य विश्वनाथ
-
परिभाषा:
“शब्दार्थयोर स्थिरा ये धर्मा शोभातिशायिनः
रसादीनुपकुर्वतो अलंकारास्ते अंगादिवत”
-
स्पष्टीकरण:
इस परिभाषा को आसान शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है:
-
शब्द और अर्थ का शरीर: आचार्य विश्वनाथ के अनुसार, शब्द और अर्थ मिलकर काव्य (कविता) का शरीर बनाते हैं।
-
अस्थिर धर्म (बाहरी आभूषण): अलंकार इन शब्द और अर्थ के ‘अस्थिर’ (यानी बाहरी और बदलने वाले) धर्म हैं। यह ठीक उसी प्रकार हैं जैसे मनुष्य के शरीर पर अलग से आभूषण या गहने पहने जाते हैं।
-
रस का उपकार (मुख्य कार्य): जिस प्रकार आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाते हैं। इनका मुख्य काम काव्य की असली आत्मा यानी ‘रस’ को और अधिक मजबूत करना या उसमें मदद पहुँचाना होता है।
-
6. आचार्य वामन
-
परिभाषा:
“काव्य शोभायाः कर्ता धर्माः गुणाः। तिरतिशयहेतस्त्वलंकाराः।”
-
स्पष्टीकरण: आचार्य वामन ने स्पष्ट किया है कि जो तत्त्व काव्य में सुंदरता लाते हैं वे ‘गुण’ कहलाते हैं, और उन गुणों में भी जो विशेषता या अधिकता पैदा करते हैं, उन्हें ‘अलंकार’ कहा जाता है। अलंकार गुणों को और अधिक निखारने का साधन हैं।
7. आचार्य जयदेव
-
परिभाषा:
“अंगीकरोति यः काव्यं शब्दार्थानलंकृति।
असौ न मन्यते कस्माद् उष्णमनलंकृति।”
-
स्पष्टीकरण: आचार्य जयदेव का तर्क है कि जो व्यक्ति बिना अलंकारों वाले शब्द और अर्थ को ही असली काव्य मान लेता है, उसे अग्नि की गर्मी न होने की बात भी मान लेनी चाहिए। जिस प्रकार बिना गर्मी के अग्नि की कल्पना नहीं हो सकती, वैसे ही अलंकारों के बिना किसी अच्छी कविता या काव्य की रचना संभव ही नहीं है।
8. अग्निपुराणकार
-
परिभाषा:
“अलंकार रहिता विधवेव सरस्वती।”
-
स्पष्टीकरण: इस परिभाषा का सीधा अर्थ यह है कि जिस प्रकार किसी विधवा स्त्री का जीवन आभूषणों और श्रृंगार के बिना सूना और फीका लगता है, उसी प्रकार अलंकारों के बिना रचित कविता या वाणी भी विधवा के समान शोभाहीन प्रतीत होती है।
9. डॉ. रामकुमार वर्मा
-
परिभाषा:
“अलंकारों के प्रयोग से भाषा और भावों की नग्नता दूर होकर उनमें सौंदर्य और सुषमा की सृष्टि होती है।”
-
स्पष्टीकरण: डॉ. रामकुमार वर्मा का कहना है कि जब हम साधारण या फीकी भाषा में बात करते हैं तो उसमें आकर्षण नहीं होता। अलंकारों के इस्तेमाल से भाषा का वह रूखापन और सादगी दूर हो जाती है और उसमें एक विशेष प्रकार की सुंदरता और चमक पैदा हो जाती है।
10. अरस्तू
-
परिभाषा:
“भाषा को लोक सामान्य के स्तर से ऊपर उठाने वाले धर्म अलंकार कहलाते हैं।”
-
स्पष्टीकरण: पाश्चात्य विद्वान अरस्तू के अनुसार, जब हम आम बोलचाल की साधारण भाषा को छोड़कर कुछ ऐसे विशेष शब्दों और तरीकों का प्रयोग करते हैं जो भाषा को आम स्तर से उठाकर बहुत उच्च और सुंदर श्रेणी में ले जाते हैं, तो वे ही अलंकार कहलाते हैं।
🎯 परीक्षार्थियों के लिए विशेष परीक्षा उपयोगी टिप्स (Exam Tips)
-
📌 मुख्य बिंदु: अलंकार केवल काव्य के सौंदर्य को बढ़ाने का साधन हैं, वे साध्य नहीं हैं।
-
💡 महत्वपूर्ण तथ्य: अलंकार और अलंकार्य दोनों भिन्न-भिन्न होते हैं।
-
आचार्य भामह ने सभी अलंकारों का मूल आधार ‘वक्रोक्ति’ को माना है, जबकि आचार्य दंडी सभी अलंकारों का आधार ‘अतिशयोक्ति’ को मानते हैं।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहा जा सकता है कि अलंकार की परिभाषा केवल शब्दों के चमत्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह काव्य के आंतरिक भावों और सौंदर्य को जागृत करने का एक सशक्त माध्यम है। संस्कृत आचार्यों से लेकर आधुनिक युग के विचारकों तक, सभी ने इसे काव्य की आत्मा और सुंदरता का मुख्य आधार माना है। विद्यार्थियों के लिए अलंकार का गहन अध्ययन काव्यशास्त्र को समझने की पहली सीढ़ी है।
## FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)