काव्यशास्त्र

अनुप्रास अलंकार (Anuprash Alankar): परिभाषा, 5 भेद और सभी उदाहरण

Anuprash Alankar Definition, Bhed and Examples - अनुप्रास अलंकार की परिभाषा और भेद

अनुप्रास अलंकार (Anuprash Alankar): परिभाषा, भेद और संपूर्ण उदाहरण

हिंदी व्याकरण और काव्य शास्त्र में अलंकारों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यदि आप स्कूल की परीक्षाओं, बोर्ड परीक्षाओं या किसी भी प्रतियोगी परीक्षा (जैसे टीजीटी-पीजीटी, नेट-जेआरएफ आदि) की तैयारी कर रहे हैं, तो अनुप्रास अलंकार (Anuprash Alankar) को गहराई से समझना आपके लिए बेहद आवश्यक है। इस लेख में हमने अनुप्रास अलंकार के अर्थ, उसके पाँचों भेदों और सभी महत्वपूर्ण उदाहरणों को बिल्कुल सरल और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया है।

1. अनुप्रास शब्द का अर्थ और परिभाषा

  • शाब्दिक अर्थ: ‘अनुप्रास’ शब्द ‘अनु + प्र + आस’ के योग से बना है।

    • यहाँ ‘अनु’ का अर्थ होता है— ‘बार-बार’

    • ‘प्र’ का अर्थ होता है— ‘प्रकर्षता’ अथवा ‘अधिकता’

    • ‘आस’ का अर्थ होता है— ‘बैठना / आना / रखना’

  • परिभाषा: जब किसी पद (काव्य) में वर्णनीय रस की अनुकूलता के अनुसार एक या अनेक वर्ण बार-बार समीपता से आते हैं या रखे जाते हैं, तो वहाँ अनुप्रास अलंकार माना जाता है।

  • अनुप्रास अलंकार के उदाहरण:

    1. “भगवान भक्तों की भयंकर भूरी भीती भगाइये।”—प्रस्तुत पद में प्रयुक्त शब्दों के प्रारम्भ में ‘भ’ वर्ण का बार-बार प्रयोग हुआ है, अतएव यहाँ अनुप्रास अलंकार माना जाता है।

    2. “चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही थीं जल थल में।”—प्रस्तुत पद में ‘च’ वर्ण का बार-बार प्रयोग होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।

    3. “निर्ममता निरीह पुरुषों में निस्संदेह निरखती हो।” — प्रस्तुत पद में ‘न’ वर्ण का बार-बार प्रयोग होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।

2. अनुप्रास अलंकार के मुख्य पाँच भेद

काव्य शास्त्र के अनुसार अनुप्रास अलंकार के मुख्यतः पाँच प्रकार माने जाते हैं:

  1. छेकानुप्रास

  2. वृत्यानुप्रास

  3. श्रुत्यानुप्रास

  4. लाटानुप्रास

  5. अंत्यानुप्रास

आइए इन सभी भेदों को नए उदाहरणों सहित विस्तार से समझें:

(1) छेकानुप्रास अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ एक या अनेक अक्षरों की आवृत्ति केवल एक बार हो, वहाँ छेकानुप्रास अलंकार होता है। (तथा जब किसी पद में किसी वर्ण का दो बार प्रयोग होता है).

  • छेकानुप्रास अलंकार के उदाहरण:

    1. “मार-मार कर दुष्ट दलों को भार भूमि का हरते हैं।”

      • विश्लेषण: इस चरण में ‘म’, ‘द’ तथा ‘भ’ व्यंजनों की आवृत्ति केवल एक ही बार हुई है।

    2. “कानन कठिन भयंकर भारी। घोर घाम हिम बार-बयारी।” (यहाँ ‘क’, ‘भ’, ‘घ’ एवं ‘ब’ वर्णों का एक निश्चित क्रमानुसार दो-दो बार प्रयोग हुआ है).

    3. “मोहनी मूरत साँवरी सूरत, नैना बने बिसार।”

(2) वृत्यानुप्रास अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ एक या अनेक व्यंजनों की कई बार आवृत्ति हो, वहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार होता है।

  • वृत्यानुप्रास अलंकार के उदाहरण:

    1. “कासी परकासी पुनवासी चन्द्रिका-सी जाके, वासी अविनाशी अघनासी ऐसी कासी है।” —हरिश्चंद्र

      • विश्लेषण: इसमें ‘क’, ‘स’, ‘प’ तथा ‘न’ व्यंजनों की आवृत्ति कई बार हुई है।

    2. “चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही थीं जल थल में।”

    3. “भगवान भक्तों की भयंकर भूरी भीती भगाइये।”

(3) श्रुत्यानुप्रास अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ एक स्थान (‘तालु-कंठ’ आदि) से बोले जाने वाले वर्णों की समानता पाई जाए, वहाँ श्रुत्यानुप्रास अलंकार होता है। यह अनुप्रास सहृदय काव्यरसियों को सुनने में अत्यंत प्रिय लगता है।

  • श्रुत्यानुप्रास अलंकार के उदाहरण:

    1. “सत्य सनेह शील सुखसागर।” —तुलसी

    2. “गुरु पद रज मृदु मंजुल व्यंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।” —तुलसी

    3. “तुलसीदास सीदत निस दिन देखत तुम्हारी निठुराई।”

    4. “दिनांत था वे दिननाथ डूबते, सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे।”

उपसर्ग : परिभाषा, भेद, उदाहरण और संपूर्ण व्याकरण

(4) लाटानुप्रास अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ शब्द और अर्थ एक ही रहें, परन्तु अन्वय करने से भेद हो जाए, वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है। (‘लाट देश’ यानी आधुनिक दक्षिण गुजरात के लोगों को अधिक प्रिय होने के कारण इसे लाटानुप्रास कहा जाता है).

  • लाटानुप्रास अलंकार के उदाहरण:

    1. “पराधीन जो जन नहीं, स्वर्ग, नरक ता हेतु। पराधीन जो जन नहीं, स्वर्ग नरक ता हेतु।।”

    2. “पूत कपूत तो क्यों धन संचै। पूत सपूत तो क्यों धन संचै।।”

    3. “हे उत्तरा के धन! रहो तुम उत्तरा के पास में।” (यहाँ ‘उत्तरा’ पद दो बार आया है; अर्थ वही है पर अन्वय भिन्न है).

(5) अंत्यानुप्रास अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ चरण या पद के अंत में स्वर या व्यंजन एक जैसे आएँ, वहाँ अंत्यानुप्रास अलंकार होता है। (प्रायः प्रत्येक तुकांत काव्य में यह पाया जाता है).

  • अंत्यानुप्रास अलंकार के उदाहरण:

    1. “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।”

    2. “गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।”

निष्कर्ष (Conclusion)

उम्मीद है कि अनुप्रास अलंकार (Anuprash Alankar) से जुड़ा यह विस्तृत और संशोधित लेख आपको अच्छी तरह समझ आ गया होगा। हिंदी व्याकरण में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए इसके सभी भेदों और नए उदाहरणों का अभ्यास करना बहुत जरूरी है। यदि इस टॉपिक से संबंधित आपका कोई भी सवाल हो, तो आप पूछ सकते हैं!

अनुप्रास अलंकार का शाब्दिक अर्थ क्या है और इसकी परिभाषा क्या है?
‘अनुप्रास’ शब्द ‘अनु + प्र + आस’ के योग से बना है, जिसमें ‘अनु’ का अर्थ ‘बार-बार’, ‘प्र’ का अर्थ ‘प्रकर्षता’ (अधिकता) और ‘आस’ का अर्थ ‘बैठना या रखना’ होता है। जब किसी पद (काव्य) में वर्णनीय रस की अनुकूलता के अनुसार एक या अनेक वर्ण बार-बार समीपता से आते हैं, तो वहाँ अनुप्रास अलंकार माना जाता है।

छेकानुप्रास और वृत्यानुप्रास अलंकार में क्या अंतर है?
छेकानुप्रास अलंकार: जहाँ एक या अनेक अक्षरों (वर्णों) की आवृत्ति केवल एक बार होती है (अर्थात किसी वर्ण का दो बार निश्चित क्रम में प्रयोग होता है), वहाँ छेकानुप्रास होता है (जैसे— “मार-मार कर दुष्ट दलों को…”)। वृत्यानुप्रास अलंकार: जहाँ एक या अनेक व्यंजनों की कई बार (दो से अधिक बार) आवृत्ति होती है, वहाँ वृत्यानुप्रास होता है (जैसे— “चारु चन्द्र की चंचल किरणें…”)।

श्रुत्यानुप्रास अलंकार किसे कहते हैं? इसका एक उदाहरण दीजिए।
जब किसी पद में एक ही उच्चारण स्थान (जैसे ‘तालु-कंठ’ आदि) से बोले जाने वाले वर्णों की समानता या बार-बार आवृत्ति पाई जाती है, तो वह श्रुत्यानुप्रास अलंकार कहलाता है। यह सहृदय काव्यरसियों को सुनने में अत्यंत प्रिय लगता है (जैसे— “सत्य सनेह शील सुखसागर”)।

लाटानुप्रास और अंत्यानुप्रास अलंकार को कैसे पहचानें?
लाटानुप्रास अलंकार: इसमें शब्द और अर्थ दोनों एक ही रहते हैं, परंतु अन्य पदों के साथ अन्वय (संबंध) करने पर तात्पर्य या अर्थ में भेद उत्पन्न हो जाता है (जैसे— “पराधीन जो जन नहीं, स्वर्ग, नरक ता हेतु…”)। अंत्यानुप्रास अलंकार: जब किसी छंद के चरणों या पदों के अंत में स्वर या व्यंजन एक जैसे (तुकांत) आते हैं, तो वहाँ अंत्यानुप्रास अलंकार होता है (जैसे— “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी…”)।

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