हिंदी साहित्य का इतिहास (भाग-6): आदिकालीन लौकिक साहित्य, अमीर खुसरो और विद्यापति
हिंदी साहित्य के आदिकाल में धार्मिक, रास और रासो ग्रंथों के अतिरिक्त कुछ ऐसा साहित्य भी रचा गया, जो सीधे जनजीवन, लोक-संस्कृति, शृंगार और विनोद से जुड़ा हुआ था। इसे आदिकालीन लौकिक साहित्य कहा जाता है। इस लेख में हम इसी लौकिक साहित्य, इसके प्रमुख ग्रंथों और अमीर खुसरो व विद्यापति जैसे महान कवियों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
1. आदिकालीन लौकिक साहित्य: परिचय एवं प्रमुख ग्रंथ
इस साहित्य में धर्म, नीति या दर्शन का उपदेश देने के स्थान पर लोक-जीवन के सुख-दुख, प्रेम, सौंदर्य और विनोद को मुख्य आधार बनाया गया है। इसके अंतर्गत रचे गए प्रमुख ग्रंथ निम्नलिखित हैं:
I. ढोला मारू रा दुहा
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समय व रचनाकार: 11वीं शताब्दी में रचित इस ग्रंथ के रचनाकार कवि कल्लोल हैं, बाद में 16वीं शताब्दी में कुशललाभ ने इसमें कुछ चौपाइयाँ जोड़ीं।
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भाषा व रस: इसकी भाषा राजस्थानी / डिंगल है और इसमें वियोग शृंगार रस की प्रधानता है।
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नायक-नायिका: इसके नायक कच्छवाशा वंश के राजा नल के पुत्र, नरवर के राजकुमार ढोला तथा नायिका पूगलराज्य के पिंगल की पुत्री मारवणी हैं। विवाह के समय ढोला की आयु 3 वर्ष व मारवणी की आयु डेढ़ वर्ष थी।
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प्रसिद्ध पंक्ति: “सोरठियो दूहो भलो, भलि मरवण री बात। जोवन छाई धण भली, तारां छाई रात।।” (इसमें सहनायिका मालवा की राजकुमारी मालवनी हैं)। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें ‘हेमचंद्र-बिहारी के बीच की कड़ी’ माना है।
II. राहुलवेल
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रचनाकार व समय: रोडा कवि, 10वीं शताब्दी।
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विशेषताएँ: यह हिंदी साहित्य की प्रथम शिलांकित कृति और प्राचीनतम चंपू (गद्य-पद्य मिश्रित) काव्य है। इसकी नायिका ‘राहुल’ नामक नायिका है।
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महत्व: हिंदी में नखशिख वर्णन का आरंभ इसी रचना से माना जाता है (डॉ. बच्चन सिंह के अनुसार इसमें ‘हुणी’ नामक नायिका का नखशिख वर्णन मिलता है)। इसमें सात बोलियों के शब्द प्राप्त होते हैं, जिनमें राजस्थानी प्रधान है।
III. संदेशरासक (अब्दुल रहमान)
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समय: 12वीं-13वीं शताब्दी (इन्हें ‘अहमाण’ नाम भी दिया गया है)।
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विशेषता: यह एक खंडकाव्य है तथा शृंगार काव्य परंपरा की प्रथम रचना एवं प्रथम धार्मिक/सेक्युलर ‘दूतावक’ है। इसमें विक्रमपुर की एक वियोगिनी के विरह की कथा है। ये भारतीय भाषा में रचित प्रथम विदेशी/इस्लामी कवि हैं।
IV. अन्य महत्वपूर्ण लौकिक ग्रंथ
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उक्त व्यक्ति प्रकरण: बारहवीं शताब्दी, रचयिता – पं. दामोदर शर्मा। यह एक व्याकरण ग्रंथ है जो राजकुमारों को देशी भाषा की शिक्षा देने हेतु रचा गया था।
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वर्ण रत्नाकर: रचयिता – ज्योतिरीश्वर ठाकुर (14वीं शताब्दी)। यह मैथिल भाषा में रचित है, जिसे ‘मैथिली का विश्व कोष’ और ‘हिंदी का पहला शब्दकोश’ कहा जाता है। अवहट्ठ शब्द सबसे पहले इसी में मिले।
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जयचंद प्रकाश: रचयिता – भट्ट केदार (जयचंद के प्रताप व शौर्य का वर्णन)।
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जयमयंकजसचंद्रिका: रचयिता – मधुकर कवि।
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वसंत विलास: रचयिता अज्ञात (केशवलाल हर्षदराय ध्रुव ने 1451 ई. में इसका प्रथम संपादन किया)। यह 84 दोहों में वसंत व स्त्रियों का विलास प्रस्तुत करने वाला फागु काव्य है।
2. अमीर खुसरो
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जीवन परिचय: मूल नाम यमिनुद्दीन अब्दुल हसन, जन्म 1253 ई. एटा में। इनके गुरु निजामुद्दीन औलिया थे। इन्होंने सात सुल्तानों का समय देखा था और ये संगीतज्ञ (तबला, सितार वादक) व मनोरंजन/रसिकता के कवि थे।
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उपाधियाँ व योगदान:
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निजामुद्दीन औलिया ने इन्हें ‘तुर्क-उल्लाह’ की उपाधि दी थी।
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इन्हें खड़ी बोली का आदि कवि, ‘हिन्द का तोता’ (तूती-ए-हिंद) कहा जाता है।
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डॉ. रामकुमार वर्मा इन्हें ‘अवधि का प्रथम कवि’ और ईश्वरी प्रसाद ‘मध्यकालीन कवियों में राजकुमार’ मानते हैं।
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इन्होंने कव्वाली गायन की शुरुआत की तथा पहेलियाँ, मुकरियाँ, दो सुखने, ढकोसले आदि रचे। ‘खालिकबारी’ इनकी प्रसिद्ध रचना है।
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प्रसिद्ध पंक्ति: गुरु की मृत्यु पर इन्होंने कहा था— “गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस, चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देस।”
3. विद्यापति
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परिचय: जन्म 1380 ई., दरभंगा जिला (बिहार)। ये तिरहुत के राजा शिवसिंह के यहाँ थे।
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इन्हें युग संधि के कवि, वयसंधि के कवि, मैथिल कोकिल, अभिनव जयदेव आदि उपाधियाँ