हिंदी साहित्य का इतिहास (भाग-5): जैन साहित्य एवं प्रमुख कवि
हिंदी साहित्य के आदिकाल के अंतर्गत जैन साहित्य का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। आचार्य, रास, फागु एवं चरित काव्य के रूप में रचे गए इस साहित्य ने हिंदी काव्य परंपरा को एक नई नैतिक और दार्शनिक दिशा दी। आइए जैन साहित्य, इसकी विशेषताओं और प्रमुख जैन कवियों का विस्तार से अध्ययन करें।
1. जैन साहित्य: सामान्य परिचय एवं विशेषताएँ
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नामकरण व रूप: जैन साहित्य आचार, रास, फागु एवं चरित काव्य के नाम से जाने जाते हैं। इनमें घटनाओं के स्थान पर उपदेशात्मकता को प्रधानता दी गई है।
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‘रास’ शब्द का अर्थ: रास शब्द का संस्कृत में अर्थ ‘क्रीड़ा’ है जिसका संबंध गायन से भी है। जैन श्रावक ताल देकर गाते थे, अतः यह साहित्य ‘रास साहित्य’ कहलाया।
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कथाएँ व क्षेत्र: इनमें जैन अवतारों एवं वैष्णव अवतारों की कथाएँ हैं। जैन मत के प्रभाव में अधिकतर काव्य गुजरात, राजस्थान और दक्षिण में रचे गए।
जैन साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ:
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आध्यात्मिक चिंतन की प्रधानता और रहस्यवादी विचारधारा का समावेश
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बाह्य उपासना, पूजापाठ, रूढ़ियों व परंपराओं का विरोध
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आत्मानुभूति और जैन धर्म की प्रतिष्ठा
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गीति तत्वों की प्रधानता, प्रेम के विविध रूपों का अंकन, संस्कृति एवं समाज का चित्रण
2. जैन साहित्य के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ
1. स्वयंभू
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समय: 738 ई. के आसपास (आठवीं शताब्दी)।
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उपाधियाँ: अपभ्रंश का महाकवि, अपभ्रंश का वाल्मीकि (भयाणी द्वारा), प्रथम महान कवि (राहुल सांकृत्यायन द्वारा), कौशल प्रदेश के जैन (बच्चन सिंह द्वारा)।
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प्रमुख रचनाएँ:
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रिट्ठणेमिणरण चरिउ (नेमिनाथ चरित / कृष्ण चरित्र का वर्णन)
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स्वयंभू छंद
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णयकुमार चरिउ
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पउमचरिउ (इसे पवित्र चरित्र भी कहते हैं, यह प्रथम जैन रामायण है जिसमें रामकथा का वर्णन है, सीता की अग्निपरीक्षा व जैन धर्म में दीक्षा का प्रसंग है। यह अपभ्रंश का प्रथम कड़वक्बद्ध काव्य और एक अपूर्ण ग्रंथ है, जिसे उनके पुत्र त्रिभुवन स्वयंभू ने पूरा किया। इसमें 12000 श्लोक, 5 काण्ड और 90 संधियाँ हैं)।
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2. पुष्पंदत
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समय: 10वीं शताब्दी।
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उपाधियाँ: अभिमानमेरू, काव्य रत्नाकर, कविसुलतिलक, सरस्वती निलय, स्वयं। अपभ्रंश का व्यास/वेदव्यास (डॉ. भयाणी), अपभ्रंश का माघ (डॉ. भोलाशंकर व्यास), भाषा की जड़ व अपभ्रंश का भवभूति (शिवसिंह सेंगर)।
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प्रमुख रचनाएँ: जसहर चरिउ / यशोधर चरित्र, णयकुमार चरिउ (व्यक्तिगत जीवन), और महापुराण (इसमें 63 महापुरुषों के जीवन चरित्र के साथ रामकथा भी शामिल है, राम की माता का नाम ‘सुबला’ मिलता है)।
3. कवि देवसेन
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समय: 10वीं शताब्दी।
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प्रमुख रचना: श्रावकाचार (रचना काल – 933 ई.)। इसमें 250 दोहों में श्रावक धर्म का उल्लेख है और यह ग्रंथ के रूप में हिंदी की प्रथम रचना मानी जाती है।
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अन्य रचनाएँ: नयचक्र, दर्शनसार, भावसार, लघुनयचक्र, दब्व सहाय प्यास / द्रव्य स्वभाव प्रकाश-माईल धवल (देवसेन के शिष्य)।
4. शालिभद्र सूरि
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प्रमुख रचना: भरतेश्वर बाहुबली रास (रचना काल – 1184 ई.)। इसे मुनि जिनविजय ने ‘रास परंपरा का प्रथम ग्रंथ’ और डॉ. गणपति चंद्र गुप्त ने ‘हिंदी का प्रथम रास ग्रंथ’ माना है। इसमें अयोध्या के भरत एवं बाहुबली का वर्णन है।
5. धनपाल
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समय: 10वीं शताब्दी (डॉ. मुंज द्वारा ‘सरस्वती’ की उपाधि प्राप्त)।
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रचना: तिलक मंजरी (गद्य काव्य) और भवियतकहा / भविष्यतकहा (इसमें वणिकपुत्र की कथा है, विंटरनिट्ज महोदय ने इसे रोमांटिक महाकाव्य कहा है)।
6. हेमचंद्र (चांगदेव)
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समय: 12वीं शताब्दी।
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उपाधियाँ: प्राकृत का पाणिनी, कलिकाल सर्वज्ञ (गुजरात के सिद्धराज जयसिंह के आश्रय में रहे)।
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रचनाएँ: कुमारपालचरित, सिद्धहेमशब्दानुशासन (संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश का व्याकरण)।
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प्रसिद्ध दोहा:
भल्ला हुअ जुगारिया बहिणि महारा कन्तु।
लज्जेज् सुवयसि जइ भग्गा घरु एन्तु।।
7. अन्य प्रमुख जैन ग्रंथ व रचनाकार:
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जिनदत सूरि: उपदेशरासायन रास (12वीं सदी, इसे अपभ्रंश का रास ग्रंथ माना जाता है, जिसमें 16 मात्राओं का अलिल्लह छंद और नृत्य शैली का प्रयोग है)।
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सोमप्रभ सूरि: कुमारपाल प्रतिबोध (संस्कृत, प्राकृत)।
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मेरुतुंग: प्रबंध चिंतामणि (1304 ई., इसमें राजाओं की कथाएँ संग्रहित हैं)।
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आसगु कवि: चन्दनबाला रास (समय- 1200 ई. जालौर में, यह 35 छंदों का खंडकाव्य है जिसकी नायिका चन्दनबाला हैं)।
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रेवंतगिरि रास: समय- 1231 ई., इसमें नेमीनाथ की प्रतिमा व रेवंतगिरि तीर्थ का वर्णन है।
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जिनधर्मसूरि: स्थूलिभद्र्रास (1209 ई., इसमें स्थूलिभद्र व कोशा नामक वेश्या की घटना है)।
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सुमति गुणी: नेमीनाथ रास (1213 ई., 58 छंदों में नेमीनाथ का चरित्र चित्रण, भाषा अपभ्रंश राजस्थानी)।
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उद्योतन सूरी: कुवलयमाला।
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रामसिंह: पाहुुुड दोहा।
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मुनि कनकामर: करकण्ड चरिउ।
निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य के आदिकाल की पृष्ठभूमि को सुदृढ़ करने में जैन साहित्य का योगदान अत्यंत अतुलनीय और ऐतिहासिक रहा है। आचार्य स्वयंभू, पुष्पदंत, हेमचंद्राचार्य और देवसेन जैसे महान जैन संतों और विद्वानों ने अपनी प्राकृत और अपभ्रंश रचनाओं के माध्यम से न केवल धर्म, नीति और वैराग्य का संदेश दिया, बल्कि हिंदी गद्य और पद्य की उस मजबूत नींव को रखा जिस पर आज संपूर्ण हिंदी साहित्य की भव्य इमारत खड़ी है। ‘श्रावकाचार’ से लेकर विभिन्न रास ग्रंथों तक का यह साहित्यिक सफर भारतीय संस्कृति और भाषा के विकास का एक जीवंत दस्तावेज है।
❓ जैन साहित्य से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (FAQs):
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