आधुनिक काल, हिंदी साहित्य का इतिहास

द्विवेदी युग हिंदी साहित्य: महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रमुख रचनाकार (Dwivedi Yug in Hindi)

द्विवेदी युग हिंदी साहित्य और महावीर प्रसाद द्विवेदी

द्विवेदी युग (जागरण-सुधारकाल) हिंदी साहित्य: संपूर्ण इतिहास, प्रमुख कवि और रचनाएँ (Dwivedi Yug in Hindi)

हिंदी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल के अंतर्गत द्विवेदी युग (Dwivedi Yug) का समय 1900 से 1920 ई. तक का कालखंड माना जाता है। इस काल को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के योगदान के कारण ‘द्विवेदी युग’ और इसकी सुधारवादी एवं सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के कारण डॉ. नगेंद्र द्वारा ‘जागरण सुधार काल’ कहा गया है। यह वह महत्वपूर्ण युग था जिसने ब्रजभाषा के प्रभाव को पीछे छोड़ते हुए खड़ी बोली हिंदी को पद्य और गद्य दोनों की मुख्य और प्रतिष्ठित भाषा के रूप में स्थापित किया। इस विस्तृत लेख में हम द्विवेदी युग के नामकरण, महावीर प्रसाद द्विवेदी के योगदान, प्रमुख प्रवृत्तियों, और सभी प्रमुख कवियों व उनकी रचनाओं का संपूर्ण अध्ययन करेंगे।

1. द्विवेदी युग का नामकरण और विभिन्न विद्वानों के मत

द्विवेदी युग का नामकरण प्रसिद्ध निबंधकार, संपादक और साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर किया गया है। इस कालखंड को लेकर विभिन्न साहित्यकारों और इतिहासकारों ने अपने अलग-अलग दृष्टिकोण और नाम दिए हैं:

  • डॉ. नगेंद्र: इन्होंने इस काल को ‘जागरण सुधार काल’ की संज्ञा दी है, क्योंकि इस काल में समाज सुधार, राष्ट्रप्रेम और भाषा की शुद्धि पर विशेष बल दिया गया था।

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल: शुक्ल जी ने इसे ‘हिंदी काव्य की नई धारा’ के रूप में उल्लेखित किया है।

  • डॉ. गणपति चंद्र गुप्त: इन्होंने इसे ‘आदर्शवादी प्रबंध काव्य परंपरा’ कहा है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी के अथक प्रयासों से ही खड़ी बोली हिंदी काव्य की मुख्य भाषा बन गई। उन्होंने भाषा की शुद्धि तथा वर्तनी की एकरूपता पर सबसे अधिक बल दिया। खड़ी बोली को परिमार्जित और व्याकरण सम्मत बनाने के कारण ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने द्विवेदी जी को ‘खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थापक’ कहा है। कविता को शृंगारिकता से राष्ट्रीयता और रूढ़ि से स्वच्छता के पथ पर खड़ा करने का श्रेय भी मुख्य रूप से महावीर प्रसाद द्विवेदी को ही जाता है। इस काल में स्वराज्य की मांग पुरजोर थी, इसलिए कवियों ने देश की दुर्दशा के चित्रण के साथ-साथ देशवासियों को स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रेरणा दी और आत्मोत्सर्ग व बलिदान का मार्ग दिखाया।

2. द्विवेदी युग की प्रमुख विशेषताएँ और प्रवृत्तियाँ (Key Features)

द्विवेदी युगीन साहित्य की मुख्य प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं:

  • राष्ट्रीयता की भावना: इस काल के साहित्य में देशभक्ति, स्वदेश प्रेम और राष्ट्रीय जागरण की भावना सर्वोपरि थी।

  • इतिवृत्तात्मकता: द्विवेदी युगीन कविता की यह सबसे मुख्य विशेषता है, जिसमें कथात्मकता और वस्तु वर्णन की प्रधानता मिलती है।

  • राजभक्ति और देशभक्ति का द्वंद्व समाप्त: इस काल तक आते-आते केवल राजभक्ति के स्थान पर शुद्ध देशप्रेम को प्राथमिकता मिलने लगी।

  • नैतिकता एवं आदर्शवाद: साहित्य में उपदेशात्मकता, नैतिकता और उच्च आदर्शों की स्थापना पर जोर दिया गया।

  • प्रबंध काव्य की अधिकता: मुक्तकों के साथ-साथ इस काल में प्रबंध काव्यों की रचना को अधिक महत्व दिया गया।

  • प्रकृति के रम्य रूपों का चित्रण: प्रकृति को आलंबन और उद्दीपन रूप में चित्रित किया गया।

  • समाज सुधार और नारी उत्थान: बाल विवाह, पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध और स्त्री शिक्षा व नारी उत्थान के पक्ष में स्वर मुखर किए गए।

  • अनुवाद की प्रवृत्ति और पुनरुत्थान की गहरी चेतना: संस्कृत, अंग्रेजी और बांग्ला के ग्रंथों के अनुवाद की प्रवृत्ति इस युग में खूब फली-फूल।

3. सरस्वती पत्रिका और उसका ऐतिहासिक योगदान

द्विवेदी युग को दिशा देने में सरस्वती पत्रिका की भूमिका रीढ़ की हड्डी जैसी रही है:

  • इसकी शुरुआत 1900 ई. में इंडियन प्रेस, इलाहाबाद से हुई थी।

  • इसके संस्थापक चिंतामणि घोष थे और यह एक मासिक पत्रिका थी।

  • शुरुआती संपादक मंडल में श्यामसुंदर दास, राधाकृष्ण दास, जगन्नाथ दास रत्नाकर, किशोरीलाल गोस्वामी और कार्तिक प्रसाद खत्री शामिल थे।

  • आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सन 1903 से 1920 ई. तक इस पत्रिका का सफलतापूर्वक संपादन किया। 1980 में यह पत्रिका बंद हो गई थी, परंतु अक्टूबर 2020 से यह प्रयागराज से पुनः शुरू हुई जिसके संपादक डॉ. देवेंद्र शुक्ल हैं।

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सरस्वती पत्रिका को ’20वीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल का विश्वकोश’ कहा है।

4. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी: जीवन परिचय एवं कृतियाँ

  • जन्म: 1864 ई., रायबरेली में।

  • उपाधियाँ व मान्यताएँ: शुक्ल जी ने इन्हें ‘खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थापक’ और नगेंद्र जी ने ‘द्वितीय श्रेणी का कलाकार’ तथा ‘भाषा एवं व्याकरण के संशोधनकर्ता’ कहा है। इन्हें ‘सरस्वती कलम के कवि’ भी कहा जाता है। इनकी प्रथम कविता ‘हे कविते’ (1900) सरस्वती पत्रिका में छपी थी।

  • मौलिक रचनाएँ: काव्यकुब्ज, सुमन, काव्य मंजुषा, अबला विलाप, और कविता कलाप (संपादित)।

  • अनुदित रचनाएँ: विनय विनोद, बिहार वाटिका, गंगा लहरी, कुमारसंभव सार, ऋतुतरंगिणी।

  • प्रमुख निबंध व अन्य कार्य: संपत्तिशास्त्र (अर्थशास्त्र संबंधी पुस्तक), ‘साहित्य को ज्ञानराशि का संचित कोष’ कहा। इन्होंने बेकन के निबंधों का अनुवाद ‘बेकन विचारवली’ नाम से किया। शुक्ल जी ने इनके निबंधों को ‘बातों का संग्रह’ कहा है। इन्होंने 1908 में रविंद्र नाथ टैगोर का लेख ‘काव्य की उपेक्षिता’ पढ़कर ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ नामक लेख ‘भुजंगभूषण भट्टाचार्य’ छद्म नाम से लिखा था।

5. द्विवेदी युग के अन्य प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ

I. श्रीधर पाठक (1860 – 1928)

  • इन्हें प्रकृति का उपासक, स्वच्छंदतावाद का प्रवर्तक और प्रकृति का बड़ा कवि कहा जाता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें ‘हिंदी भाषा का जयदेव’ और नगेंद्र ने ‘खड़ी बोली के प्रथम समर्थ कवि’ माना है।

  • प्रमुख रचनाएँ: कश्मीर सुषमा (कश्मीरी प्राकृतिक सौंदर्य), गुणवंत हेमंत, स्वर्गीय वीणा, देहरादून, वनाष्टक, भारतगीत। इन्होंने गोल्ड स्मिथ के हरमिट का हिंदी अनुवाद ‘एकांतवासी योगी’ नाम से खड़ी बोली में किया। इसके अलावा ‘डेजर्ट विलेज’ का ‘उजड़ा ग्राम’ नाम से और ‘द ट्रेवलर’ का ‘शांत पथिक’ नाम से अनुवाद किया।

II. मैथिलीशरण गुप्त (1886 – 1964)

  • मूल नाम: मिथिलाधिपनोदिनीशरण।

  • इन्हें राष्ट्रकवि, द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि, ‘अतीत का हंस’, ‘आधुनिक युग के वैतालिकवादी’, ‘सामंजस्यवादी कवि’ और गणपति चंद्र गुप्त द्वारा ‘आधुनिक काल के तुलसीदास’ की उपाधि दी गई है।

  • प्रमुख रचनाएँ: रंग में भंग (1909), जयद्रथवध (1910), भारत-भारती (1912) – राष्ट्र चेतना की महान रचना। किसान (1917), पंचवटी (1925), झंकार (1929), विकटभट (1929), साकेत (1931) – महाकाव्य (इसमें 12 सर्ग हैं, नवां सर्ग उर्मिला के विरह वर्णन हेतु सबसे महत्वपूर्ण है, इसके लिए गुप्त जी को मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला)। यशोधरा (1932), द्वापर (1936), सिद्धराज (1936), काबा और कर्बला (1942), जय भारत (1952), विष्णुप्रिया (1957)।

III. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (1865 – 1947)

  • जन्म: निजामाबाद, आजमगढ़। इनके साहित्यिक गुरु बाबा सुमेर सिंह थे। इन्हें गणपति चंद्र गुप्त ने ‘आधुनिक सूरदास’ कहा है।

  • प्रमुख रचनाएँ:

    • प्रियप्रवास (1914): यह खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है, जिसमें 17 सर्ग हैं। इसका पहला नाम ‘ब्रजांगना विलाप’ था।

    • वैदेही वनवास (1940): वाल्मीकि रामायण पर आधारित खंडकाव्य (18 सर्ग)।

    • रसकलश (1935) – काव्यशास्त्रियों ग्रंथ। अन्य: चौखे चौपदे, चुभते चौपदे, पारिजात, बोलचाल।

IV. रामनरेश त्रिपाठी (1889 – 1962)

  • स्वच्छंदतावादी कवि।

  • खंडकाव्य: मिलन (1917), पथिक (1920), मानसी (1927), स्वप्न (1929)। इन्होंने कविता कौमुदी के 8 भाग प्रकाशित किए।

V. मुकुटधर पांडे (1895 – 1989)

  • प्रगीतकार।

  • रचनाएँ: पूजाफूल, कानन कुसुम, प्रेमबंधन, आँसू। इन्होंने ही जबलपुर से प्रकाशित ‘शारदा पत्रिका’ (1920) में सबसे पहले ‘छायावाद’ शब्द का प्रयोग किया था।

VI. गयाप्रसाद शुक्ल ‘स्नेही’ और अन्य कवि

  • गयाप्रसाद शुक्ल ‘स्नेही’ (1883): कवि सम्मेलनों के कवि, उक्ति वैचित्र्य प्रधान कवि। यह ‘त्रिशूल’ नाम से राष्ट्रभक्ति रचनाएँ लिखते थे और ‘सुकवि’ नामक पत्रिका निकाली।

  • प्रमुख कृतियाँ: राष्ट्रीय वीणा, त्रिशूल तरंग, कृषक क्रंदन, करुणा कादंबिनी।

  • राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’: ‘धाराधरधावन’ शीर्षक से कालिदास के ‘मेघदूत’ का पद्यबद्ध अनुवाद किया। रचनाएँ: मृत्युंजय, राम-रावण विरोध, स्वदेशी कुंडल।

  • रामचरित उपाध्याय: द्विवेदी युग के प्रमुख सूक्तिकार। रचनाएँ: राष्ट्रभारती, देवदूत, विचित्र विवाह।

  • जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ व सत्यनारायण कविरत्न: ये द्विवेदी काल के ऐसे कवि थे जिन्होंने ब्रजभाषा में ही अपनी कविताएँ जारी रखीं।

  • रत्नाकर जी की रचनाएँ: हिंडोला, गंगावतरण, उद्धव शतक, श्रृंगार लहरी।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि द्विवेदी युग (Dwivedi Yug) हिंदी साहित्य के आधुनिकीकरण का वह मजबूत स्तंभ है जिसने खड़ी बोली को व्याकरणिक अनुशासन, परिपक्वता और व्यापक शब्द-संपादकीय दृष्टि प्रदान की। महावीर प्रसाद द्विवेदी के नेतृत्व में ‘सरस्वती पत्रिका’ ने जिस वैचारिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जागरण की अलख जगाई, उसने आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और छायावादी काव्य के लिए एक सुदृढ़ आधारशिला का काम किया। यह काल केवल भाषा का सुधार-काल नहीं था, बल्कि यह जन-मानस के पुनरुत्थान का स्वर्णिम अध्याय था।

❓ द्विवेदी युग से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (FAQs):

Q1: द्विवेदी युग का समय कब से कब तक माना जाता है?
उत्तर: हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग की समयावधि मुख्य रूप से सन् 1900 ईस्वी से 1920 ईस्वी (या 1918 ई.) तक मानी जाती है। इस कालखंड ने भारतेंदु युग के बाद हिंदी गद्य और पद्य को एक नई परिपक्वता प्रदान की।

Q2: द्विवेदी युग के प्रवर्तक या जनक कौन थे?
उत्तर: द्विवेदी युग के मुख्य प्रवर्तक और प्रेरक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। उनके नाम पर ही इस काल का नाम ‘द्विवेदी युग’ पड़ा, जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से भाषा के व्याकरण और मानकीकरण को दिशा दी।

Q3: द्विवेदी युग की प्रमुख प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ) क्या थीं?
उत्तर: इस युग की मुख्य प्रवृत्तियों में इतिवृत्तात्मकता, राष्ट्रप्रेम की भावना, सामाजिक सुधार, उपदेशात्मकता और ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली हिंदी को काव्य का मुख्य माध्यम बनाना शामिल था।

Q4: द्विवेदी युग के प्रमुख लेखक और कवि कौन-कौन हैं?
उत्तर: इस युग के प्रमुख रचनाकारों में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, महावीर प्रसाद द्विवेदी, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, श्रीधर पाठक और बालमुकुंद गुप्त जैसे दिग्गज साहित्यकार शामिल हैं।

Q5: द्विवेदी युग में कौन सी प्रमुख पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं?
उत्तर: इस काल की सबसे प्रतिष्ठित और मार्गदर्शक पत्रिका ‘सरस्वती’ (प्रयाग से प्रकाशित) थी। इसके अलावा ‘सुदर्शन’, ‘मर्यादा’ और ‘प्रताप’ जैसी पत्रिकाओं ने भी हिंदी साहित्य के विकास में अहम भूमिका निभाई।

Q6: द्विवेदी युग की प्रमुख रचनाएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त का ‘साकेत’ और ‘भारत-भारती’, हरिऔध जी का ‘प्रियप्रवास’ और ‘वैदेही वनवास’, तथा श्रीधर पाठक की ‘गुणवंत हेमंत’ इस काल की अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय रचनाएँ हैं।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

Q1: द्विवेदी युग (Dwivedi Yug) का नामकरण किसके नाम पर किया गया है?
उत्तर: द्विवेदी युग का नामकरण आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर किया गया है।

Q2: डॉ. नगेंद्र ने द्विवेदी युग को क्या नाम दिया है?
उत्तर: डॉ. नगेंद्र ने द्विवेदी युग को ‘जागरण सुधार काल’ कहा है।

Q3: खड़ी बोली हिंदी का प्रथम महाकाव्य किसे माना जाता है?
उत्तर: अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘प्रियप्रवास’ (1914) को खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

Q4: ‘भारत भारती’ किसकी रचना है और इसका प्रकाशन कब हुआ?
उत्तर: ‘भारत भारती’ (1912) राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध राष्ट्रीय चेतना वाली रचना है।

Q5: सरस्वती पत्रिका का संपादन महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कब से कब तक किया?
उत्तर: महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सन 1903 से 1920 ई. तक ‘सरस्वती पत्रिका’ का संपादन किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *