हिंदी साहित्य का इतिहास (भाग-3): नाथ साहित्य और प्रमुख कवि
हिंदी साहित्य के आदिकाल में सिद्ध साहित्य के बाद नाथ साहित्य का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। बौद्ध धर्म की विकृतियों के विरोध में और समाज को एक सुदृढ़ नैतिक आधार देने के लिए नाथपंथ का उदय हुआ। आइए नाथ साहित्य, इसकी विशेषताओं और प्रमुख कवियों का विस्तार से अध्ययन करें।
1. नाथ साहित्य: सामान्य परिचय एवं विशेषताएँ
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समय: 10वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी तक।
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स्थान: मध्य देश का पश्चिमोत्तर भाग (सर्वाधिक नाथ साहित्य पंजाब और राजस्थान में लिखा गया)।
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नाथ शब्द का अर्थ: मुक्ति करने वाला, संरक्षक।
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नाथ मत के प्रवर्तक: गोरखनाथ। (नाथ संप्रदाय को ‘अवधूत मत’ या ‘सिद्ध मत’ भी कहते हैं)।
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विशेष तथ्य:
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हिंदी साहित्य में सर्वाधिक गद्य साहित्य नाथ साहित्य में ही मिलता है और इसके प्रथम गद्यकार गोरखनाथ माने जाते हैं।
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यह वाममार्गी भोग-प्रधान साधना का प्रतिक्रियात्मक रूप था।
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मत्स्येंद्रनाथ / मछंदरनाथ नारी साहचर्य में फंस गए थे, तब गोरखनाथ ने उनका उद्धार किया था।
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नाथपंथ में गोरखनाथ को ‘शिव’ के रूप में माना जाता है।
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इन्होंने हठयोग का प्रवर्तन किया, जिसमें ‘ह’ का अर्थ सूर्य और ‘ठ’ का अर्थ चन्द्र है।
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इनका मुख्य सिद्धांत था— ‘जोई जोई पिंडे सोई ब्रह्मांडे’ अर्थात् जो शरीर में है, वही ब्रह्मांड में है।
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साहित्य में नाथों की कुल संख्या 09 मानी गई है।
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नाथ साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ
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यह नारी साहचर्य का विरोधी था।
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नाथमत का प्रभाव आगे चलकर संतमत पर बहुत अधिक पड़ा।
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इनके कानों में बड़े-बड़े कुण्डल होते थे, इसलिए इन्हें ‘कनफटे’ भी कहा जाता है।
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नाथ ईश्वरवादी हैं, जबकि सिद्ध अनश्वरवादी थे। ये ईश्वर को शून्य तथा अलख निरंजन मानते हैं।
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इसमें शिव-शक्ति की उपासना, षट्चक्र बेधन, सामाजिक समानता और गुरु के प्रति तीव्र आस्था पर बल दिया गया है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार 9 नाथ:
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नागार्जुन
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जड़भरत
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हरिश्चंद्र
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सत्यनाथ
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भीमनाथ
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गोरखनाथ
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चर्पटनाथ
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जलघरनाथ
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मलयार्जुन
(नोट: रामचंद्र शुक्ल के अनुसार सिद्ध और नाथ दोनों में कॉमन/शामिल रहने वाले मुख्य कवि हैं— 1. गोरखनाथ, 2. जलघरनाथ, 3. चर्पटीया, 4. नागार्जुन)
ट्रिक :
चारों कवियों के नाम आसानी से याद रखे जा सकते हैं:
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ज – जलघरनाथ
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च – चर्पटीया (चर्पटनाथ)
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ना – नागार्जुन
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गो – गोरखनाथ
2. प्रमुख नाथ कवि एवं उनकी रचनाएँ
1. मत्स्येंद्रनाथ
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अन्य नाम / गुरु: गुरु बालनाथ (जलंधरनाथ), यह अंतिम सिद्ध और प्रथम नाथ तथा सिद्ध-नाथ के बीच संक्रमण रेखा पर स्थित कवि माने जाते हैं।
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प्रमुख रचनाएँ:
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ज्ञान कारिका
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कौलज्ञाननिर्णय
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2. गोरखनाथ
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समय: 13वीं शताब्दी।
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विशेषताएँ:
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रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इन्हें सिद्ध और नाथ दोनों में गिना गया है। षट्चक्र वाला योगमार्ग इन्होंने ही चलाया था।
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इनकी रचनाओं में गुरु महिमा, इन्द्रिय निग्रह, वैराग्य, कुण्डलिनी जागरण, शून्य समाधि आदि का वर्णन मिलता है।
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इनके ग्रंथों की संख्या 28, रामचंद्र शुक्ल ने 10, और मिश्रबंधु ने भी 10 मानी है, जबकि पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने इनके ग्रंथों की संख्या 40 बताई है।
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पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने सन 1930 ई. में ‘गोरखबानी’ का संपादन किया था।
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हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इनकी रचनाओं का प्रकाशन ‘बाणिया’ शीर्षक से नागरी प्रचारिणी सभा से करवाया था।
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प्रमुख रचनाएँ: सबदी (सर्वाधिक प्रामाणिक), प्राणसांंगली, शिष्य दर्शन, आत्मबोध, कफिरबोध, और संस्कृत में रचना— अभ्रोध शतक।
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हजारीप्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध कथन:
“इनकी सबसे बड़ी कमजोरी इनका रूखापन एवं गृहस्थ के प्रति अनादर भाव है। इससे नाथ साहित्य शुष्क केवल नीरस बन गया है।”
“गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेता है।”
“शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली एवं महिमामंडित व्यक्ति दूसरा नहीं हुआ।”
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प्रसिद्ध पंक्तियाँ:
जोई सोई पिंड…
नौ लाख पातरी आगे नाचे पीछे सहज अखाड़ा।
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