काव्यशास्त्र

Ras Nishpatti in Hindi: रस निष्पत्ति का अर्थ, सिद्धांत, आचार्य और नियम

रस निष्पत्ति (Ras Nishpatti): सिद्धांत, प्रमुख आचार्य, दर्शन और व्याख्या [Complete Notes]

हिंदी साहित्य और संस्कृत काव्यशास्त्र में ‘रस निष्पत्ति’ (Ras Nishpatti) एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे – UPTET, CTET, REET, PGT/TGT, Assistant Professor और NET/JRF) में भरतमुनि के रस सूत्र और उसके व्याख्याकारों से संबंधित प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

इस लेख में हम रस निष्पत्ति का अर्थ, भरतमुनि का रस सूत्र, और चारों प्रमुख आचार्यों (भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्ट नायक, अभिनवगुप्त) के सिद्धांतों व दर्शन को विस्तार से समझेंगे।

📌 रस निष्पत्ति का अर्थ और परिभाषा

काव्य को पढ़कर या सुनकर तथा नाटक को देखकर सहृदय श्रोता, पाठक या सामाजिक (दर्शक) के चित्त में जो लोकोत्तर यानि इस लोक से हटकर आनंद उत्पन्न होता है, वही रस है।

  • रस सम्प्रदाय के प्रवर्तक: आचार्य भरतमुनि को माना जाता है।

📌 भरतमुनि का रस सूत्र (Ras Sutra of Bharat Muni)

भरतमुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ के छठे अध्याय में प्रसिद्ध रस सूत्र दिया है:

“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति”

अर्थ: विभाव, अनुभाव और संचारी भाव (व्यभिचारी भाव) के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

विशेष तथ्य:  रस सूत्र में कहीं भी ‘स्थायी भाव’ का उल्लेख नहीं है । भरत मुनि ने कुल 8 रस माने हैं।

🔹 रस सूत्र के प्रमुख शब्द:

  • संयोग का अर्थ: विभावादि का स्थायी भाव के साथ संसर्ग।

  • निष्पत्ति का अर्थ: उत्पन्न होना।

🔹 भरतमुनि के अनुसार नाटक के 4 संघटक तत्व:

  1. वस्तु

  2. अभिनय

  3. संगीत

  4. रस

भरतमुनि का उदाहरण: जिस प्रकार अनेक प्रकार के व्यंजनों, औषधियों एवं द्रव्य पदार्थों के मिश्रण से भोज्य रस की उत्पत्ति होती है, ठीक उसी प्रकार विभिन्न भावों के संयोग से स्थायी भाव भी नाट्य रस को प्राप्त हो जाता है।

📌 रस निष्पत्ति के 4 प्रमुख व्याख्याकार (Major Acharyas)

भरतमुनि के रस सूत्र की व्याख्या को लेकर चार प्रमुख आचार्यों के सिद्धांत व दर्शन सर्वमान्य हैं:

1️⃣ भट्ट लोल्लट (Bhatt Lollat) – उत्पत्तिवाद

  • सिद्धांत: उत्पत्तिवाद / आरोपवाद / उपचयवाद / प्रतीतवाद / चमत्कारवाद

  • दर्शन: मीमांसा दर्शन

  • रस की अवस्थिति: मूल पात्र (राम आदि) / अनुकार्य / नायक में
  • निष्पत्ति का अर्थ: उत्पत्ति

  • संयोग का अर्थ:

    • स्थायीभाव: उत्पाद्य – उत्पादक

    • संचारी भाव: पोष्य – पोषक

    • अनुभाव: गम्य – गामक

🔹 मुख्य बातें व विशेष बिंदु:

  1. भट्ट लोल्लट के अनुसार स्थायी भाव मुख्य रूप से अनुकार्य (रामादि) में निहित रहता है।

  2. अनुकर्ता (नट/अभिनेता) में रस की स्थिति गौण मात्रा में होती है।

  3. सामाजिक (दर्शक) में रस की उत्पत्ति नहीं होती।

  4. सामाजिक, अनुकर्ता नट में अनुकार्य का आरोप करके अपनी अभिनय कुशलता के कारण रस स्थिति को स्वीकार कर आनंद प्राप्त करता है।

  5. इन्होंने रस के वस्तुगत सौंदर्य को स्वीकार करके नाटक/काव्य के महत्व को स्थापित किया।

  6. भट्ट लोल्लट की व्याख्या भरतमुनि के रस सूत्र के सर्वाधिक निकट मानी जाती है।

  7. रस की व्यक्तिपरक व्याख्या का सूत्रपात यहीं से प्रारंभ होता है।

2️⃣ आचार्य शंकुक (Acharya Shankuka) – अनुमितिवाद

  • सिद्धांत: अनुमितिवाद

  • दर्शन: न्याय दर्शन

  • निष्पत्ति का अर्थ: अनुमिति (अनुमान)

  • संयोग का अर्थ: अनुमाप्य – अनुमापक

🔹 मुख्य बातें व विशेष बिंदु:

  1. शंकुक के अनुसार स्थायी भाव मुख्य रूप से अनुकार्य में निहित रहता है।

  2. अनुकर्ता नट आदि में केवल स्थायी भाव होगा, रस की स्थिति नहीं होगी।

  3. सामाजिक (दर्शक) में रस की उत्पत्ति गौण मात्रा में होगी।

  4. चित्र तुरंग न्याय: न्यायशास्त्र के समर्थक होने के कारण शंकुक ने ‘चित्र तुरंग न्याय’ का सहारा लिया (अर्थात जैसे घोड़े के चित्र को देखकर वास्तविक घोड़ा समझ लिया जाता है, वैसे ही नट को अनुकार्य मान लिया जाता है)।

  5. प्रेक्षक (दर्शक) अनुकर्ता नट को देखकर आनंद प्राप्त नहीं करता, बल्कि अनुकर्ता में अनुकार्य की अनुमानिक कल्पना करके आनंद पाता है।

  6. शंकुक ने पहली बार गौण रूप से सामाजिक/प्रेक्षक को महत्व प्रदान किया।

  7. इन्होंने रस को नाट्यगत भाव की प्रत्यक्ष अनुभूति न मानकर काल्पनिक अनुभूति माना है।

विशेष नोट: आचार्य महिमभट्ट ने शंकुक के अनुमितिवाद सिद्धांत का पूर्ण समर्थन किया है।

3️⃣ भट्ट नायक (Bhatt Nayak) – भुक्तिवाद

  • सिद्धांत: भुक्तिवाद या भोगवाद

  • दर्शन: सांख्य दर्शन

  • निष्पत्ति का अर्थ: भुक्ति

  • संयोग का अर्थ: भोज्य-भोजक संबंध (भोज्य – रस, भोजक – विभाव आदि)

🔹 मुख्य बातें व विशेष बिंदु:

  1. भट्ट नायक अनुसार स्थायी भाव मुख्य रूप से अनुकार्य में निहित रहता है।

  2. अनुकर्ता नट आदि में रस की स्थिति मुख्य रूप से होगी।

  3. सामाजिक में रस की उत्पत्ति मुख्य रूप से होगी।

  4. साधारणीकरण व्यापार: भट्टनायक के सिद्धांत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्होंने सर्वप्रथम साधारणीकरण व्यापार की परिकल्पना करके रस को सभी के लिए ग्राह्य बना दिया।

🔹 भट्टनायक द्वारा बताए गए काव्य के 3 व्यापार:

  1. अभिधा: शब्दार्थ का ज्ञान कराना।

  2. भावकत्व (काव्य रसों से संबंध):

    • यह साधारणीकरण के निकट का व्यापार है।

    • इसके द्वारा सहृदय व्यक्तिगत राग-द्वेष से मुक्त हो जाता है।

    • विभावादि का साधारणीकरण हो जाता है।

  3. भोजकत्व (सहृदय सामाजिक से संबंध):

    • रस का भोग या आस्वादन करने की प्रक्रिया।

    • इसके द्वारा सहृदय भावकत्व द्वारा सिद्ध रस का भोग करता है।

    • यह लौकिक/परोक्ष/अपरोक्ष अनुभव से भिन्न होता है।

    • सत्य के उद्रेक से चित्त आनंदमय हो जाता है और यह आनंद ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ होता है।

सार: भट्टनायक के अनुसार रस की न तो उत्पत्ति होती है और न अनुमिति, बल्कि रस का भोग (भुक्ति) होता है। भोजकत्व व्यापार में ‘वेदांतस्पर्शशून्य’ रस का भोग किया जाता है।

4️⃣ आचार्य अभिनवगुप्त (Acharya Abhinavagupta) – अभिव्यक्तिवाद

  • सिद्धांत: अभिव्यक्तिवाद

  • दर्शन: वेदांत / शैव दर्शन

  • निष्पत्ति का अर्थ: अभिव्यक्ति

  • संयोग का अर्थ: व्यंग्य-व्यंजक संबंध (व्यंग्य – रस, व्यंजक – विभाव आदि)

रस की अवस्थिति (रस कहाँ स्थित होता है?)

विद्वानों ने रस की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत दिए हैं

  • भट्ट लोलट: मूल पात्र (राम, सीता आदि / अनुकार्य) में मानते हैं ।
  • शंकुक: अनुकर्ता (नट-नटी /अनुकर्ता, अभिनय करने वाले) में मानते हैं ।

  • भट्ट नायक व अभिनव गुप्त: प्रेक्षक, पाठक, दर्शक या सहृदय (सामाजिक) के हृदय में मानते हैं ।

🔹 मुख्य बातें व विशेष बिंदु:

  1. भट्ट नायक के अनुसार स्थायी भाव मुख्य रूप से अनुकार्य में निहित रहता है।

  2. अनुकर्ता नट आदि में रस की स्थिति मुख्य रूप से होगी।

  3. सामाजिक में रस की उत्पत्ति मुख्य रूप से होगी।

  4. रस व्यंग्य है और विभावादि व्यंजक हैं।

  5. व्यंजना शक्ति की प्रशंसा: ध्वनियों की व्यंजना शक्ति ही रस की अभिव्यक्ति करती है।

  6. अभिनवगुप्त ने भट्टनायक के भुक्तिवाद का खंडन किया, परंतु उनके साधारणीकरण व्यापार को उत्साह के साथ स्वीकार किया।

  7. इन्होंने भोजकत्व और भावकत्व व्यापारों को अस्वीकार कर दिया।

  8. सर्वमान्य व्याख्याकार: आचार्य अभिनवगुप्त को रस सूत्र का सर्वमान्य व्याख्याकार माना जाता है।

  9. परवर्ती आचार्यों (मम्मट, विश्वनाथ आदि) ने अभिनवगुप्त के सिद्धांत का ही समर्थन किया।

  10. अभिनवगुप्त के अनुसार रस की प्राप्ति के लिए न तो उत्पत्ति की आवश्यकता है, न अनुमिति की और न भुक्ति की; रस की केवल अभिव्यक्ति होती है।

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📊 रस निष्पत्ति के चारों आचार्यों का तुलनात्मक चार्ट (Quick Summary Table)

आचार्य सिद्धांत दर्शन निष्पत्ति का अर्थ संयोग का अर्थ
भट्ट लोल्लट उत्पत्तिवाद / आरोपवाद मीमांसा उत्पत्ति उत्पाद्य-उत्पादक
आचार्य शंकुक अनुमितिवाद न्याय अनुमिति अनुमाप्य-अनुमापक
भट्ट नायक भुक्तिवाद / भोगवाद सांख्य भुक्ति भोज्य-भोजक
अभिनवगुप्त अभिव्यक्तिवाद वेदांत / शैव अभिव्यक्ति

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) – रस निष्पत्ति

Q1. भरतमुनि का प्रसिद्ध रस सूत्र क्या है?

  • उत्तर: भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में प्रसिद्ध रस सूत्र है— “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति”, अर्थात विभाव, अनुभाव और संचारी (व्यभिचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

Q2. रस निष्पत्ति के मुख्य 4 व्याख्याकार आचार्य कौन-कौन से हैं?

  • उत्तर: रस सूत्र के मुख्य चार व्याख्याकार आचार्य हैं—

    1. भट्ट लोल्लट (उत्पत्तिवाद)

    2. आचार्य शंकुक (अनुमितिवाद)

    3. भट्ट नायक (भुक्तिवाद)

    4. आचार्य अभिनवगुप्त (अभिव्यक्तिवाद)

Q3. ‘चित्र तुरंग न्याय’ का सिद्धांत किस आचार्य ने दिया था?

  • उत्तर: चित्र तुरंग न्याय का सिद्धांत न्यायशास्त्र के समर्थक आचार्य शंकुक ने अपने अनुमितिवाद सिद्धांत के अंतर्गत दिया था।

Q4. काव्यशास्त्र में साधारणीकरण (Sadharanikaran) का प्रवर्तक किसे माना जाता है?

  • उत्तर: साधारणीकरण व्यापार की परिकल्पना सर्वप्रथम भट्ट नायक ने की थी। उन्होंने ही रस को ब्रह्मानंद सहोदर मानकर सभी के लिए ग्राह्य बनाया।

Q5. रस सूत्र के सर्वमान्य व्याख्याकार कौन हैं?

  • उत्तर: आचार्य अभिनवगुप्त को रस सूत्र का सर्वमान्य व्याख्याकार माना जाता है। उनके ‘अभिव्यक्तिवाद’ सिद्धांत का समर्थन मम्मट और विश्वनाथ जैसे परवर्ती आचार्यों ने भी किया है।

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