शब्द शक्ति: परिभाषा, व्याख्या, प्रकार और उदाहरण
शब्द शक्ति क्या है
साधारण शब्दों में कहें तो ‘शब्द शक्ति’ का मतलब है—शब्द के भीतर छिपी हुई वह ताकत, जो हमें उसका असली अर्थ समझाती है।
जैसे ही हम कोई शब्द सुनते या पढ़ते हैं, हमारे दिमाग में उसका कोई-न-कोई अर्थ आता है। यह अर्थ हमें कैसे समझ आया? जिस माध्यम या ताकत के जरिए वह अर्थ हमारे दिल-दिमाग तक पहुँचा, वही ‘शब्द शक्ति’ है।
इसे एक छोटे से उदाहरण से समझें:
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अगर मैं कहूँ— “मेरा घर पास ही है।” (यहाँ आपको सीधा अर्थ समझ आ गया कि घर नजदीक है।)
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अगर मैं कहूँ— “पंजाब शेर है।” (यहाँ पंजाब का अर्थ कोई राज्य नहीं, बल्कि ‘वीर व्यक्ति’ है।)
शब्द तो वही है, लेकिन उसका अर्थ परिस्थिति के अनुसार बदल गया। यही अर्थ निकालने और समझाने का जो तरीका या ‘व्यापार’ है, वही शब्द शक्ति है।
संक्षेप में:
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शब्द = एक शरीर की तरह है।
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अर्थ = उसकी आत्मा की तरह है।
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शब्द शक्ति = वह माध्यम है जो शब्द और उसके अर्थ को आपस में जोड़ती है।
हिंदी काव्यशास्त्र में, किसी शब्द के अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति को ‘शब्द शक्ति’ कहते हैं। आचार्य मम्मट ने इसे ‘व्यापार’ कहा है, जबकि पंडित विश्वनाथ ने ‘शक्ति’। शब्द की शक्ति असीम है; श्रोता तक अभीष्ट अर्थ पहुँचाना ही इसका मुख्य कार्य है।
शब्द ,अर्थ और शब्दशक्ति में संबंध
| शब्द | अर्थ | शब्द शक्ति |
| 1. वाचक | वाच्यार्थ/अभिधेयार्थ | अभिधा शब्द शक्ति |
| 2. लक्षक | लक्ष्यार्थ | लक्षणा शब्द शक्ति |
| 3. व्यंजक | व्यंग्यार्थ | व्यंजना शब्द शक्ति |
शब्द शक्ति के मुख्य प्रकार
मुख्य रूप से शब्द शक्तियाँ तीन प्रकार की होती हैं:
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अभिधा
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लक्षणा
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व्यंजना
नोट: कुमारिल भट्ट ने ‘तात्पर्य’ को चौथी शब्द शक्ति माना है।
अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्तियों का तुलनात्मक अध्ययन
| शब्द शक्ति | मुख्य अर्थ / परिभाषा | वाचक शब्द / आधार | उदाहरण |
| अभिधा | शब्द का सीधा, मुख्य या सामान्य अर्थ प्रकट करने वाली शक्ति। | मुख्य अर्थ (वाच्यार्थ) का सीधा बोध। | “राम पुस्तक पढ़ रहा है।” |
| लक्षणा | जहाँ मुख्य अर्थ में बाधा आने पर रूढ़ि या प्रयोजन के कारण दूसरा (लक्षण) अर्थ लिया जाए। | मुख्य अर्थ से जुड़ा हुआ लक्षित अर्थ। | “मोहन गधा है।” (मूर्ख के अर्थ में) |
| व्यंजना | जहाँ अभिधा और लक्षणा के शांत हो जाने पर एक नया और विशेष (गर्भित) अर्थ प्रकट हो। | प्रसंग या वक्ता के भाव पर निर्भर। | “संध्या हो गई है।” (अलग-अलग लोग अपने अनुसार अर्थ निकालते हैं) |
1. अभिधा शब्द शक्ति
साक्षात सांकेतिक अर्थ (मुख्यार्थ/वाच्यार्थ) को प्रकट करने वाली शक्ति अभिधा है। इसे ‘प्रथमा’ या ‘अग्रिमा’ शक्ति भी कहते हैं।
अभिधा शब्द शक्ति के उदाहरण:
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रमेश घर जा रहा है।
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घोड़ा घास चर रहा है।
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मोहन पुस्तक पढ़ रहा है।
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गुलाब का फूल बहुत सुंदर है।
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राजा दशरथ अयोध्या के राजा थे।
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वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने इलाहाबाद के पथ पर।
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कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, या खाये बौराय जग, वा पाये बौराय ॥
शब्दों के प्रकार (अभिधा):
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रूढ़/मूल शब्द: घोड़ा, घड़ा, मुँह, झंडा, लता, मेज, कुर्सी।
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यौगिक शब्द: शारीरिक, बुढ़ापा, रमेश, पाठशाला, भलाई, पानीघर।
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योगरूढ़ शब्द: पंकज (कमल), गिरिधर, नीलकंठ, चतुर्भुज, चंद्रमौलि।
उपसर्ग : परिभाषा, भेद, उदाहरण और संपूर्ण व्याकरण
2. लक्षणा शब्द शक्ति
जब मुख्य अर्थ में बाधा हो और किसी रूढ़ि या प्रयोजन के आधार पर अन्य अर्थ (लक्ष्यार्थ) ग्रहण किया जाए, तो वहाँ लक्षणा शब्द शक्ति होती है।
लक्षणा शब्द शक्ति के भेद
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I. रूढ़ि लक्षणा (मुहावरे, लोकोक्तियाँ)
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II. प्रयोजनवती लक्षणा
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गौणी लक्षणा (गुण सादृश्य)
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सारोपा गौणी (रूपक अलंकार)
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साध्यवसाना गौणी
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शुद्धा लक्षणा (अन्य सादृश्य)
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उपादान शुद्धा
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लक्षण शुद्धा (लक्षणा लक्षणा)
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लक्षणा शब्द शक्ति के भेद एवं उदाहरण:
(I) रूढ़ा लक्षणा (रूढ़ि के आधार पर) के उदाहरण
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पंजाब शेर है। (वीरता या विशेषता से संबंधित)
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पुलिस को देख चोर नौ दो ग्यारह हो गया। (भागने या छिपने से संबंधित)
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वह हवा से बातें कर रहा है। (गति या तेजी से संबंधित)
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उसने तो मेरी नाक कटा दी। (मान-सम्मान या प्रतिष्ठा से संबंधित)
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मुँह पर ताला लगा लो। (चुप रहने या नियंत्रण से संबंधित)
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(II) प्रयोजनवती लक्षणा (प्रयोजन के आधार पर) के उदाहरण
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उसका आश्रम गंगा में है। (स्थान या सामिप्य का प्रयोजन)
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वह तो निरी गाय है। (स्वभाव या सरलता का प्रयोजन)
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मोहन गधा है। (गुण या बुद्धिमत्ता की कमी का प्रयोजन)
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अब सिंह अखाड़े में उतरा। (शौर्य या वीरता का प्रयोजन)
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शुद्धा लक्षणा – गुण सादृश्य के अतिरिक्त जितने भी संबंध होते हैं जैसे समीपता, साहचर्य, आधार-आधेय संबंध, अंगाअंगिभाव संबंध आदि पर आधारित लक्षणा को शुद्धा लक्षणा शब्द शक्ति कहते हैं।
शुद्धा लक्षणा शब्द शक्ति के भेद (2):
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उपादान शुद्धा लक्षणा
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लक्षण शुद्धा लक्षणा
(1) उपादान शुद्धा लक्षणा (अर्थ-लेना)
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इसमें मुख्यार्थ अपने अन्वय की सिद्धि के लिए अपना अर्थ न छोड़ते हुए दूसरे अर्थ को भी खींचकर ले लेता है।
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अर्थात् – जब लक्ष्यार्थ के साथ मुख्यार्थ बना रहता है वहाँ उपादान शुद्धा लक्षणा होती है।
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इसे ‘अजहत स्वार्था’ भी कहते हैं। (जिसने अपना अर्थ नहीं छोड़ा है) – (त. उपादान – अजहत)
उपादान शुद्धा लक्षणा शब्द शक्ति के उदाहरण:
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हाथ-पैर बचाते हुए काम करो। (शरीर के अंगों के माध्यम से सावधानी का निर्देश)
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कौओं से दही की रक्षा करो। (सीधे अर्थ के साथ-साथ अन्य दही भक्षकों का बोध)
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दो बन्दूकोंने सारा गाँव लूट लिया। (साधन/हथियार के माध्यम से कर्ता का बोध)
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दो लाठियों ने सारा गाँव खाली कर दिया। (साधन/हथियार के माध्यम से समूह का बोध)
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लाल पगड़ी आ रही है। (पहनावे के माध्यम से व्यक्ति विशेष का बोध)
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मैं हूँ बहन किन्तु भाई नहीं है। राखी सजी है पर कलाई नहीं है। (वस्तुओं के माध्यम से एक मार्मिक स्थिति का बोध)
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लक्षण शुद्धा लक्षणा शब्द शक्ति (केवल लक्षणा के आधार पर) –
जहाँ लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ शामिल न हो, केवल लक्षणा के आधार पर हो।
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इसे ‘जहत स्वार्था’ कहते हैं (‘जहत’ का अर्थ – छोड़ दिया है)।
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नोट: जिनमें अपना अर्थ छोड़ दिया है।
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अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य ध्वनि में यह लक्षणा होती है। (Trick तिल) (लक्षण लक्षणा)
लक्षण शुद्धा लक्षणा शब्द शक्ति के उदाहरण :
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गंगा पर गाँव है। (स्थान या तट से संबंधित)
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पेट में आग लगी है। (शारीरिक स्थिति से संबंधित)
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बालक शेर है। (साहस और वीरता से संबंधित)
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रमेश तो निरी गाय है। (स्वभाव से संबंधित)
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कोकिल कंठी गा रही है। (कला या संगीत से संबंधित)
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राजस्थान जाग उठा। (सामाजिक या प्रांतीय चेतना से संबंधित)
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उसने मन को बाँध लिया। (मानसिक संयम से संबंधित)
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दो घरों में लड़ाई है। (पारिवारिक या आपसी विवाद से संबंधित)
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मानस पढ़ो। (ग्रंथ या अध्ययन से संबंधित)
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रस के अंग (अवयव) की परिभाषा, भेद और उदाहरण
3. व्यंजना शब्द शक्ति
जब अभिधा और लक्षणा दोनों अर्थ बताने में असमर्थ हों और जिस शक्ति से ‘व्यंग्यार्थ’ (प्रतीयमान अर्थ) की प्राप्ति हो, उसे व्यंजना कहते हैं।
शाब्दी व्यंजना के उदाहरण:
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रहीमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै मोती, मानुष, चून।
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चिरजीवो जोरी जुरै, क्यों न सनेह गंभीर। को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के वीर।
आर्थी व्यंजना के उदाहरण:
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रजनीगंधा खिल गई।
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मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू, तुम्हहीं उचित तप, मोह कहूँ भोगू।
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चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।
परीक्षोपयोगी उदाहरण :
1. लक्षणा शब्द शक्ति और उसके भेद (उदाहरण सहित)
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सामान्य लक्षणा:
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उषा सुनहले तीर बरसाती, जय लक्ष्मी-सी उद्यत हुई, उधर पराजित काल रात्रि भी जल में अंतर्निहित हुई।
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इस खंडहर में बिजली-सी उन्मत्त जवानी दौड़ी होगी।
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हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में।
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चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जलथल में।
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खुले पलक, फैली सुवर्ण छवि, जगी सुरभि, डोले मधु बाल।
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रे! दो दिन का यौवन।
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बाँधा था विधु को किसने इन काली जंजीरों से।
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बनन में बागन में बिखरियो बसंत है।
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बाड़ै बड़वागि ते बड़ी है आगि पेट की।
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रूढ़ि लक्षणा / रूढ़ा लक्षणा:
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बैंचने के लिए कलेजे को है, कलेजा निकाल कर देते।
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अरे तुम इतने हुए अधीर, हार बैठे जीवन का दावा।
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प्रयोजनवती लक्षणा:
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इसे ‘सवंघ्या लक्षणा’ भी कहते हैं क्योंकि इसमें व्यंग्य अनिवार्य रहता है।
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गौणी लक्षणा / सारोपा:
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माखन हो मन, दूध सौं यौवन है दधि ते अधिक उर ईठी। (सारोपा)
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शुद्धा लक्षणा:
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विपुल कटक लखि लंक महँ सहज भये अति क्रुद्ध।
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मानव ऐसी भी क्या विसक्ति जीवन के प्रति! आत्मा का अपमान प्रेत की छाया से रति।
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2. व्यंजना शब्द शक्ति और उसके भेद (उदाहरण सहित)
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शाब्दी व्यंजना:
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कोटि मनोज लजावन हारे; सुमुखि कहहिं को आहि तुम्हारे। सुनि सनेहमय मंजुल बानी सकुचि सीय मन महँ मुसकानी।
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‘हरि के चढ़ते ही उड़े सब द्विजों एकै साथा’।
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फलि सकल कामना लूट्यौ अगनित चैन। आजु अन्चयि हरि रूप सखि भए प्रफुल्लित नैन ॥ (लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना)
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आयो बंसत नहीं घर कंति, लगी अब अंत की होन इलाजै। बैठी रही हम हूँ हिय हारि, कहौ लगी टारिऐ हाधन साजै ॥ (लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना)
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आर्थी व्यंजना:
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मनहु उमगि अंग-अंग छवि छलके।
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निरखि सेज रंग भरी लगी उससे लेन (आर्थी व्यंजना)
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‘दृग लखि हैं मधुचंद्रिका, सुनि कल धुनि बान। रहि है मेरे प्रान तन, पीतम करै पयानम्’।
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आप तो जलेबी की तरह सीधे हो। (आर्थी व्यंजना)
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अध्यापक ने ऐसा पढ़ाया कि लड़का सर्वथा सुधर गया। (आर्थी व्यंजना)
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3. काव्यशास्त्र से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य और परिभाषाएँ (आचार्यों के मत)
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शब्द शक्ति सीमा और क्रम:
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भाषा के लक्षक एवं व्यंजक बल की सीमा अपरिमित है।
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अभिधा पहली शब्द शक्ति है, लक्षणा दूसरी जबकि व्यंजना तीसरी है।
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लक्षणा शब्द शक्ति के 80 भेद आचार्य विश्वनाथ ने स्वीकार किए।
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मुख्यार्थ और वाच्यार्थ:
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वाच्यार्थ के भेद: (I) अवयवार्थ (II) समुदायार्थ।
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साक्षात् सांकेतिक (गुण, जाति, द्रव्य, क्रियावाचक) अर्थ का बोध कराने वाले व्यापार को अभिधा व्यापार या अभिधा शब्द शक्ति कहते हैं – मम्मट।
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साक्षात् सांकेतिक अर्थ (मुख्यार्थ, अभिधेयार्थ, वाच्यार्थ) को प्रकट करने वाली शब्द शक्ति अभिधा शब्द शक्ति है – पं० रामदहिन मिश्र।
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मुख्यार्थ बाधे तद्योगे रूढितोथ प्रयोजनात्। अन्योडर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणाारोपिता क्रिधा॥ – मम्मट
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व्यंग्य का महत्व:
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‘व्यंग्य जीव है कविता में शब्द अर्थ की गति अंग। सोई उत्तम काव्य है, वर्णै व्यंग्य प्रसंग।’ – प्रतापसाही
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‘व्यंग्य जीव ताको कहै शब्द अर्थ है देह। गुण में भूषण मूषणै दूषण-दूषण हेह।’ – कुलपति मिश्र
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संस्कृत काव्यशास्त्र में शब्द शक्तियों का सर्वप्रथम एकत्र, व्यवस्थित, विशद संग्रहात्मक आचार्य मम्मट ने किया।
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निष्कर्ष
काव्य में शब्द शक्ति का ज्ञान पाठक को कविता के गहरे अर्थों तक पहुँचाने में मदद करता है। उत्तम काव्य वही है जहाँ व्यंग्यार्थ प्रधान हो।
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