अंतिम संशोधित (Last Updated): October 14, 2026
वर्ण विचार: हिंदी व्याकरण में वर्णमाला, स्वर, व्यंजन, भेद, उच्चारण स्थान और संपूर्ण विश्लेषण
भाषा मनुष्य के भावों, विचारों और अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त और जीवंत माध्यम है। विचारों के आदान-प्रदान की इस अद्भुत प्रक्रिया की नीव ध्वनियों और वर्णों पर टिकी होती है। जब हम मुख से कुछ बोलते हैं, तो हवा की तरंगों से ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं और जब इन्हीं मौखिक ध्वनियों को लिखित लिपि-चिह्नों में ढाल दिया जाता है, तब वे ‘वर्ण’ का रूप ले लेती हैं। हिंदी व्याकरण में ‘वर्ण विचार’ वह मूल एवं आधारभूत खंड है, जिसके अंतर्गत भाषा की सबसे छोटी इकाइयों—वर्ण, ध्वनि, अक्षर, स्वर, व्यंजन, तथा उनके उच्चारण-स्थान, प्रयत्न और शब्दकोशगत क्रम का वैज्ञानिक व सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), राज्य लोक सेवा आयोग (UPPSC, BPSC, MPPSC आदि), शिक्षक पात्रता परीक्षा (CTET, UPTET, STET, TGT, PGT, RPSC) तथा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे SSC और हिंदी भाषी राज्यों की अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं) के पाठ्यक्रम में ‘वर्ण विचार’ से संबंधित प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से भाषा की इस मूल संरचना का स्पष्ट और प्रामाणिक ज्ञान होना हर परीक्षार्थी के लिए अत्यंत आवश्यक है।
हिंदी व्याकरण के अंतर्गत ‘वर्ण विचार’ वह मूल अध्याय है जिसके बिना किसी भी भाषा की संरचना, उसकी शुद्ध वर्तनी, उच्चारण और उसके वैज्ञानिक स्वरूप को नहीं समझा जा सकता। संस्कृत व्याकरण में जहाँ वर्णों को ‘अक्ष्’ या ‘अच्’ (स्वर) तथा ‘हल्’ (व्यंजन) कहा गया है, वहीं हिंदी में इसे वर्णमाला के रूप में व्यवस्थित किया गया है।
वर्ण विचार और वर्णमाला (Varn Vichar in Hindi)
भाषा की सबसे छोटी इकाई, जिसके और खंड या टुकड़े न किए जा सकें, वर्ण या अक्षर कहलाती है। जब हम बोलते हैं, तो मुख के विभिन्न अंगों (कंठ, तालु, मूर्धा, दाँत, ओठ, नासिका आदि) की सहायता से ध्वनियों का उच्चारण करते हैं। हिंदी वर्णमाला में मूल रूप से स्वर और व्यंजन सम्मिलित हैं:
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स्वर: स्वतंत्र रूप से उच्चरित होने वाली ध्वनियाँ स्वर कहलाती हैं। हिंदी में कुल 11 मूल स्वर हैं—अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। स्वरों के उच्चारण में श्वास वायु बिना किसी बाधा के बाहर निकलती है।
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व्यंजन: जो वर्ण स्वरों की सहायता के बिना नहीं बोले जा सकते, वे व्यंजन कहलाते हैं। व्यंजनों की संख्या 33 है (क वर्ग से प वर्ग तक तथा अंतस्थ और ऊष्म व्यंजन)। शुद्ध व्यंजनों को लिखने के लिए उनके नीचे हल चिह्न (्) लगाया जाता है।
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वर्णों का उच्चारण स्थान:
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कंठ्य: अ, आ, क वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ), ह और विसर्ग।
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तालव्य: इ, ई, च वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ), य और श।
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मूर्धन्य: ऋ, ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण), र और ष्।
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दंत्य: त वर्ग (त, थ, द, ध, न), ल और स।
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ओष्ठ्य: उ, ऊ, प वर्ग (प, फ, ब, भ, म)।
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वर्ण, ध्वनि और अक्षर की अवधारणा
ध्वनि: भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि है।
वर्ण: ध्वनि के लिखित रूप को ‘वर्ण’ कहा जाता है। वर्ण भाषा की वह लघुतम मूल इकाई है जिसके और अधिक टुकड़े या खंड नहीं किए जा सकते।
प्रमुख वैयाकरणों के अनुसार वर्ण की परिभाषाएँ इस प्रकार हैं:
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किशोरीदास वाजपेयी के अनुसार: “वर्ण वह छोटी-से-छोटी ध्वनि है, जो कान का विषय है और जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते।”
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आचार्य किशोरीदास वाजपेयी एवं अन्य वैयाकरणों के मत के अनुसार, वर्ण वह मूल ध्वनि है जिसका स्वतंत्र अस्तित्व होता है और जो मौखिक भाषा को लिखित रूप प्रदान करती है।
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पं. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार: “वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं जिसके खंड न हो सकें।” (यथा- अ, इ, क्, ख् आदि)
वर्ण, अक्षर और ध्वनि में अंतर
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ध्वनि: यह भाषा का मौखिक रूप है जो हमारे मुँह से उच्चरित होती है (जैसे- अ, आ आदि)।
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वर्ण: ध्वनि के लिखित रूप या लिपि चिह्न को ‘वर्ण’ कहते हैं। वर्ण भाषा के मौखिक और लिखित दोनों रूपों के प्रतीक हैं।
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अक्षर: किसी एक ध्वनि या ध्वनि-समूह की उच्चरित न्यूनतम इकाई को अक्षर कहते हैं। वह छोटी-से-छोटी इकाई अक्षर है जिसका उच्चारण वायु के एक झटके से होता है; जैसे- राम, आम, कल, कमल, विद्यालय आदि।
वर्णमाला और वर्णों का संपूर्ण वर्गीकरण
हिंदी भाषा में वर्णों के सुव्यवस्थित, क्रमिक और व्यवस्थित समूह को ‘वर्णमाला’ कहा जाता है। आचार्य कामता प्रसाद गुरु के अनुसार, किसी भी भाषा के समस्त वर्णों के समुदाय को उसकी वर्णमाला कहते हैं। मानक देवनागरी वर्णमाला में मूल रूप से स्वर और व्यंजन दोनों का समावेश होता है, जिन्हें उनके उच्चारण स्थान और प्रयत्नों के आधार पर क्रमित किया गया है।
केंद्रीय हिंदी समिति और मानक व्याकरण के अनुसार कुल वर्ण
केंद्रीय हिन्दी समिति और आधुनिक वैयाकरणों तथा केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा हिंदी वर्णमाला में किए गए संशोधनों के पश्चात मानक वर्णों की कुल संख्या 53 हो गई है। इसमें पारंपरिक वर्णों के साथ-साथ विशिष्ट वर्णों को भी शामिल किया गया है, जिसका विस्तृत और क्रमबद्ध विवरण नीचे दिया गया है:
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स्वर वर्ण (11): अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ
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स्पर्श / वर्गीय व्यंजन (25): क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग और प वर्ग के अंतर्गत आने वाले कुल 25 वर्ण (क से म तक)
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अन्तःस्थ व्यंजन (4): य, र, ल, व
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ऊष्म / संघर्षी व्यंजन (4): श, ष, स, ह
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संयुक्त व्यंजन (4): क्ष, त्र, ज्ञ, श्र (दो अलग-अलग व्यंजनों के मेल से बनने वाले वर्ण)
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द्विगुण / उत्क्षिप्त / ताड़नजात व्यंजन (2): ड़, ढ़
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अयोगवाह (2): अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः)
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विशिष्ट व्यंजन (1): ळ (केंद्रीय हिंदी समिति द्वारा आधिकारिक रूप से शामिल मूर्धन्य विशिष्ट व्यंजन)
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कुल वर्ण = 53 मानक वर्ण
स्वर (Vowels)
जिन ध्वनियों के उच्चारण के समय फेफड़ों से निकलने वाली वायु बिना किसी रुकावट या घर्षण के मुख से बाहर आती है, उन्हें ‘स्वर’ कहते हैं। स्वर स्वतंत्र ध्वनियाँ हैं, जिनके उच्चारण में किसी अन्य वर्ण या ध्वनि की सहायता की आवश्यकता नहीं होती। हिंदी में मूल स्वर वर्णों की संख्या 11 (ग्यारह) है।
स्वरों का वर्गीकरण
स्वरों को विभिन्न व्याकरणिक आधारों पर निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है:
(क) उच्चारण समय (मात्रा काल) के आधार पर भेद
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ह्रस्व स्वर (मूल स्वर): जिन स्वरों के उच्चारण में सबसे कम समय (अर्थात एक मात्रा का समय) लगता है, उन्हें ह्रस्व या मूल स्वर कहते हैं। इनकी संख्या 4 है: अ, इ, उ, ऋ। इन्हें एकमात्रिक या लघु स्वर भी कहा जाता है।
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दीर्घ स्वर: जिन स्वरों के बोलने में ह्रस्व स्वर से अधिक (दुगुना या दो मात्राओं का) समय लगता है, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। इनकी संख्या 7 है: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। ये केवल ह्रस्व के बड़े रूप नहीं बल्कि स्वतंत्र दीर्घ ध्वनियाँ हैं। इन्हें द्विमात्रिक या गुरु स्वर भी कहते हैं।
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प्लुत स्वर: जिस स्वर के उच्चारण में ह्रस्व से तिगुना समय लगे, उसे प्लुत स्वर कहते हैं। इसका कोई निश्चित लिपि चिह्न नहीं होता, बल्कि इसके आगे हिंदी का ‘तीन’ (३) का अंक लिखा जाता है (जैसे—ओ३म्)। हिंदी में इसका सामान्य बोलचाल या लेखन में प्रयोग नहीं होता, यह मुख्यतः वैदिक संस्कृत में प्रयुक्त होता है। ‘प्लुत’ का शाब्दिक अर्थ ‘उछलता हुआ’ होता है।
(ख) ओष्ठाकृति (होंठों की स्थिति) के आधार पर भेद
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अवृत्ताकार (अवृतमुखी) स्वर: जिन स्वरों के उच्चारण में होंठ वृत्त (गोल) आकार न बनाकर फैले या चपटे रहते हैं; जैसे—अ, आ, इ, ई, ए, ऐ।
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वृत्ताकार (वर्तुलाकार) स्वर: जिन स्वरों के उच्चारण में होंठ गोल हो जाते हैं; जैसे—उ, ऊ, ओ, औ तथा आगत ध्वनि (ऑ)।
(ग) जिह्वा की स्थिति के आधार पर भेद
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अग्र स्वर: जिन स्वरों का उच्चारण जिह्वा के अग्र (आगे वाले) भाग से होता है; जैसे—इ, ई, ए, ऐ।
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मध्य स्वर: जिह्वा के मध्य (बीच के) भाग से उच्चरित होने वाला एकमात्र स्वर अ है।
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पश्च स्वर: जिह्वा के पिछले हिस्से से उच्चरित होने वाले स्वर; जैसे—आ, उ, ऊ, ओ, औ और आगत स्वर (ऑ)। (नोट: कुछ वैयाकरणों के अनुसार ‘आ’ को मध्य या पश्च दोनों संदर्भों में रखा जाता है, परंतु मानक रूप से यह पश्च स्वर के अंतर्गत आता है)।
(घ) मुखाकृति (मुँह खुलने की स्थिति) के आधार पर भेद
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विवृत (Open): जिन स्वरों के उच्चारण में मुख सबसे अधिक खुलता है; जैसे—आ।
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संवृत (Close): जिन स्वरों के उच्चारण में मुख सबसे कम (संकुचित) खुलता है; जैसे—इ, ई, उ, ऊ।
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अर्ध विवृत (Half-Open): विवृत से थोड़ा कम और अर्ध-संवृत से अधिक मुख खुलने पर उच्चरित स्वर; जैसे—अ, ऐ, औ तथा (ऑ)।
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अर्ध संवृत (Half-Close): संवृत से थोड़ा अधिक मुख खुलने पर उच्चरित स्वर; जैसे—ए, ओ।
विशेष तथ्य (‘ऋ’ के संबंध में): कुछ वैयाकरण और विद्वान ‘ऋ’ को पूर्ण स्वर नहीं मानते क्योंकि आधुनिक हिंदी में इसका उच्चारण ‘रि’ जैसा होता है। किंतु मानक वर्णमाला, गणना और लिखित रूप में (तथा तत्सम शब्दों जैसे—ऋण, कृष्ण, मृग आदि में स्वतंत्र रूप तथा मात्रा के रूप में प्रयोग होने के कारण) इसे स्वरों में ही सम्मिलित किया जाता है।
व्यंजन का वर्गीकरण
जिन वर्णों या ध्वनियों के उच्चारण में फेफड़ों से आने वाली वायु मुख के किसी अवयव (जैसे कंठ, तालु, मूर्धा, दाँत, ओष्ठ) से स्पर्श करती हुई या घर्षण के साथ रुकावट से बाहर निकलती है, उन्हें ‘व्यंजन’ कहते हैं। व्यंजनों का उच्चारण बिना स्वरों की सहायता के संभव नहीं है। हिंदी में मूल व्यंजनों की संख्या 33 है।
किशोरीदास वाजपेयी और अन्य वैयाकरणों के अनुसार व्यंजनों की मुख्य श्रेणियाँ निम्नलिखित हैं:
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स्पर्श (वर्गीय) व्यंजन (25 वर्ण): ‘क’ से ‘म’ तक के सभी वर्ण इसके अंतर्गत आते हैं। ये पाँच वर्गों (क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग और प वर्ग) में विभाजित हैं। मुख के विभिन्न अंगों से स्पर्श होने के कारण इन्हें ‘स्पृष्ट व्यंजन’ भी कहा जाता है।
स्पर्श व्यंजन
| वर्ग का नाम | उच्चारण स्थान | वर्ग के अंतर्गत आने वाले 25 वर्ण |
| क वर्ग | कंठ (गले से) |
क, ख, ग, घ, ङ |
| च वर्ग | तालु (तालू से) |
च, छ, ज, झ, ञ |
| ट वर्ग | मूर्धा (मुर्धा/मसूड़े से) |
ट, ठ, ड, ढ, ण |
| त वर्ग | दन्त (दाँतों से) |
त, थ, द, ध, न |
| प वर्ग | ओष्ठ (होंठों से) |
प, फ, ब, भ, म |
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अन्तःस्थ व्यंजन (4 वर्ण): य, र, ल, व। इनका उच्चारण स्वर और व्यंजनों के मध्य का होता है, इसलिए इन्हें ‘ईषत् स्पृष्ट’ भी कहते हैं।
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ऊष्म व्यंजन (4 वर्ण): श, ष, स, ह। इनके उच्चारण में वायु आपस में रगड़ खाकर ऊष्मा (गर्मी) पैदा करती है, इसलिए इन्हें ‘ईषत् विवृत’ या संघर्षी व्यंजन भी कहा जाता है।
अयोगवाह, द्विगुण और आगत ध्वनियाँ
1. अयोगवाह (अनुस्वार और विसर्ग)
हिंदी व्याकरण की मानक पुस्तकों और वैयाकरणों के अनुसार, अनुस्वार ($\dot{}$) और विसर्ग ($\colon$) को परंपरागत रूप से स्वरों के साथ रखा जाता है, किंतु ये न तो पूर्णतः स्वर हैं और न ही व्यंजन।
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शास्त्रीय परिभाषा: संस्कृत वैयाकरणों ने इन्हें ‘अयोगवाह’ नाम दिया है। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी और डॉ. हरदेव बाहरी के अनुसार— “ये स्वर नहीं हैं और न ही व्यंजनों की तरह स्वरों से पूर्व आते हैं, बल्कि ये योग न होने पर भी साथ रहते हैं।” अर्थात, इनका वर्णमाला में स्वतंत्र योग न होते हुए भी ये स्वरों के सहारे अर्थ वहन करते हैं। इनकी संख्या 2 है:
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अनुस्वार ($\dot{}$): यह स्वर के बाद आने वाली नासिक्य ध्वनि है, जिसका उच्चारण नाक से होता है (जैसे—अंग, कंस, गंगा)।
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विसर्ग ($\colon$): इसका उच्चारण कंठ से ‘ह’ की तरह होता है और यह भी स्वर के बाद प्रयुक्त होता है (जैसे—प्रातः, स्वतः, दुःख)।
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2. द्विगुण / उत्क्षिप्त / ताड़नजात व्यंजन (ड्, ढ्)
मानक हिंदी व्याकरण और डॉ. हरदेव बाहरी के अनुसार, हिंदी के अपने स्वतंत्र रूप से विकसित हुए नवीन व्यंजन ‘ड़’ और ‘ढ़’ हैं:
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उत् उच्चारण प्रक्रिया: इन वर्णों के उच्चारण के समय जिह्वा की नोक ऊपर उठकर मूर्धा को छूती है और झटके से नीचे गिरती है। इसी झटके के कारण इन्हें ‘उत्क्षिप्त’ (ऊपर फेंका हुआ), ‘ताड़नजात’ या ‘द्विस्पृष्ट’ व्यंजन कहा जाता है।
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व्याकरणिक नियम: इन दोनों वर्णों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये कभी भी किसी शब्द के आरंभ में प्रयुक्त नहीं होते। ये हमेशा शब्द के मध्य या अंत में ही आते हैं (जैसे—लड़का, पढ़ना, पेड़, सड़क)।
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(नोट: यदि इनके नीचे नुक्ता न हो—अर्थात ‘ड’ और ‘ढ’ लिखा जाए—तो वे ट वर्ग के मूर्धन्य स्पर्श व्यंजन कहलाते हैं, जिनका प्रयोग शब्द के प्रारंभ में भी हो सकता है जैसे—डमरू, ढोलक)।
3. आगत (गृहीत) ध्वनियाँ
विदेशी भाषाओं (विशेषकर अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी) के लंबे संपर्क, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और प्रभाव के कारण हिंदी में कुछ नई ध्वनियाँ आ गईं, जिन्हें मानक व्याकरण में आगत या गृहीत ध्वनियाँ माना गया है:
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अरबी-फ़ारसी मूल की ध्वनियाँ (नुक्तायुक्त): हिंदी में विदेशी शब्दों के मूल और शुद्ध उच्चारण को बनाए रखने के लिए वर्णों के नीचे एक बिंदु (नुक्ता) का प्रयोग किया जाता है। प्रमुख आगत व्यंजन निम्नलिखित हैं:
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क़ (जैसे—क़िला, क़ानून)
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ख़ (जैसे—ख़ास, ख़रीद)
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ग़ (जैसे—ग़रीब, ग़लत)
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ज़ (जैसे—ज़मीन, ज़रा)
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फ़ (जैसे—फ़रवरी, फ़ौज)
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अंग्रेजी प्रभाव से आई स्वर ध्वनि (‘ऑ’): अंग्रेजी भाषा के शब्दों को हिंदी में ज्यों का त्यों और सही रूप में लिखने के लिए ‘ओ’ और ‘आ’ के मध्य की एक ध्वनि ‘ऑ’ को अपनाया गया है। मानक व्याकरण और डॉ. हरदेव बाहरी के अनुसार यह आगत स्वर ध्वनि है (जैसे—डॉक्टर, ऑफिस, बॉल, कॉफी)।
प्रयत्न और उच्चारण स्थान के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से व्यंजनों का आंतरिक वर्गीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे दो मुख्य आधारों पर समझा जा सकता है:
(क) श्वास (प्राण) की मात्रा के आधार पर भेद
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अल्पप्राण: जिन व्यंजनों के उच्चारण में श्वास वायु की मात्रा कम लगती है।
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अंतर्गत: प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा और पाँचवा वर्ण (1, 3, 5), सभी अन्तःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व) तथा सभी स्वर अल्पप्राण होते हैं।
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महाप्राण: जिन व्यंजनों के उच्चारण में श्वास वायु की मात्रा अधिक लगती है और हाहाकार जैसी ध्वनि निकलती है।
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अंतर्गत: प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा वर्ण (2, 4) तथा सभी ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह) महाप्राण होते हैं।
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(ख) स्वरतंत्री में कंपन के आधार पर भेद
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अघोष वर्ण: जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में कंपन नहीं होता।
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अंतर्गत: प्रत्येक वर्ग का पहला और दूसरा वर्ण (1, 2) तथा तीनों श, ष, स अघोष होते हैं।
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सघोष (घोष) वर्ण: जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में कंपन होता है।
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अंतर्गत: प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवा वर्ण (3, 4, 5), सभी अन्तःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व), ‘ह’ तथा सभी स्वर सघोष होते हैं।
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वर्णों के उच्चारण स्थान (Pronunciation Places)
मुख के विभिन्न अंगों (कंठ, तालु, मुर्धा, दन्त, ओष्ठ आदि) के स्पर्श से वर्णों का उच्चारण होता है। मानक तालिका नीचे दी गई है:
| क्रम | उच्चारण स्थान | वर्ण / ध्वनियाँ | व्याकरणिक नाम |
| 1. | कंठ (गले से) | अ, आ, क वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ), ह, विसर्ग (ः) |
कंठ्य वर्ण |
| 2. | तालु (तालव्य) | इ, ई, च वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ), य, श |
तालव्य वर्ण |
| 3. | मूर्धा (मुँह की छत का मध्य भाग) | ऋ, ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण), र, ष, ड़, ढ़ |
मूर्धन्य वर्ण |
| 4. | दंत (दाँतों के स्पर्श से) | त वर्ग (त, थ, द, ध, न), ल, स |
दंत्य वर्ण |
| 5. | ओष्ठ (दोनों होंठों से) | उ, ऊ, प वर्ग (प, फ, ब, भ, म) |
ओष्ठ्य वर्ण |
| 6. | दंतोष्ठ (दाँत + ओष्ठ) | व, फ़ |
दंतोष्ठ्य वर्ण |
| 7. | कंठ-तालु | ए, ऐ |
कंठ-तालव्य वर्ण |
| 8. | कंठ-ओष्ठ | ओ, औ |
कंठोष्ठ्य वर्ण |
| 9. | नासिका (नाक से) | ङ, ञ, ण, न, म, अनुस्वार (ं) |
नासिक्य वर्ण |
शब्दकोश क्रम (Dictionary Order)
हिंदी शब्दकोश में शब्दों को ढूँढने का एक निश्चित वैज्ञानिक और क्रमिक नियम होता है। अंग्रेजी शब्दकोश की भाँति हिंदी शब्दकोश में वर्णों का क्रम पूरी तरह से देवनागरी वर्णमाला और संयुक्त अक्षरों की बनावट पर आधारित होता है।
1. शब्दकोश में वर्णों का मूल क्रम
हिंदी शब्दकोश में वर्णों का क्रम सामान्यतः इस प्रकार चलता है:
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अनुस्वार और चंद्रबिंदु वाले वर्ण सबसे पहले आते हैं, उसके बाद सादा स्वर वर्ण (अ, आ, इ…) आते हैं।
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स्वरों के पश्चात व्यंजनों का क्रम क वर्ग से शुरू होकर म तक (स्पर्श व्यंजन), फिर अन्तःस्थ (य, र, ल, व) और अंत में ऊष्म व्यंजनों (श, ष, स, ह) के रूप में आगे बढ़ता है।
2. संयुक्त व्यंजनों का शब्दकोश नियम
मानक व्याकरण और वैयाकरणों (विशेषकर डॉ. हरदेव बाहरी और कामता प्रसाद गुरु) के अनुसार, संयुक्त व्यंजनों का शब्दकोश में कोई स्वतंत्र पृथक वर्णमाला के रूप में अलग स्थान नहीं होता, बल्कि वे अपने घटक (निर्माता) व्यंजनों के तुरंत बाद उस वर्ण के अंतर्गत गिने और खोजे जाते हैं। इनका क्रम इस प्रकार निर्धारित होता है:
क्ष का क्रम (‘क’ वर्ग के अंतर्गत)
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नियम: ‘क्ष’ संयुक्त व्यंजन क् + ष के मेल से बनता है। इसलिए शब्दकोश में ‘क्ष’ से शुरू होने वाले शब्द ‘क’ वर्ग के अंतर्गत ‘क’, ‘का’, ‘कि’ के बाद और ‘ख’ से ठीक पहले खोजे जाते हैं।
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उदाहरण:
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क्षमा
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क्षेत्र
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त्र का क्रम (‘त’ वर्ग के अंतर्गत)
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नियम: ‘त्र’ संयुक्त व्यंजन त् + र से मिलकर बनता है। अतः शब्दकोश में इसका स्थान ‘त’ वर्ग के अंतर्गत ‘त’ और ‘थ’ के बीच (या ‘त’ से बने वर्णों के तुरंत पश्चात) निर्धारित होता है।
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उदाहरण:
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त्रिशूल
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त्रुटि
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ज्ञ का क्रम (‘च’ वर्ग के अंतर्गत)
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नियम: ‘ज्ञ’ का निर्माण ज् + ञ के योग से होता है। हिंदी उच्चारण और शब्दकोश परंपरा के अनुसार इसे ‘ग’ के साथ न रखकर ‘च’ वर्ग के अंतर्गत ‘ज’ वर्ण के ठीक बाद (ज् + ज / ज्ञ के क्रम में) रखा जाता है।
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उदाहरण:
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ज्ञान
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ज्ञाानी
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श्र का क्रम (‘श’ के अंतर्गत)
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नियम: ‘श्र’ संयुक्त व्यंजन श् + र से बनता है। इसलिए शब्दकोश में इसका क्रम ‘श’ वर्ण और उससे बने शब्दों के तुरंत बाद आता है।
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उदाहरण:
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श्रम
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श्रद्धा
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निष्कर्ष
संक्षेप में कहा जा सकता है कि वर्ण विचार हिंदी भाषा की संरचना, उसकी वैज्ञानिकता और उसके मानकीकरण का मुख्य आधारस्तंभ है। ध्वनियों के मौखिक रूप से शुरू होकर वर्णों की सुव्यवस्थित ‘वर्णमाला’, स्वरों के विविध वर्गीकरण, स्पर्श व अंतःस्थ व्यंजनों के आंतरिक भेद (अल्पप्राण-महाप्राण, घोष-अघोष), तथा शब्दकोश में उनके वैज्ञानिक क्रम का यह पूरा अध्ययन भाषा को अनुशासन प्रदान करता है। व्याकरण के इन नियमों और वैयाकरणों के सिद्धांतों का सही ज्ञान न केवल हिंदी भाषा के सौंदर्य और उसकी वर्तनी को शुद्ध बनाता है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं और व्यावहारिक लेखन की दृष्टि से भी इसे अत्यंत उपयोगी और महत्वपूर्ण बनाता है।
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## FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)