हिंदी कविता

रोटी और संसद कविता: सार, मूल पंक्तियाँ और संपूर्ण व्याख्या

रोटी और संसद कविता धूमिल व्याख्या और सारांश

अंतिम संशोधित (Last Updated): October 13, 2026

‘रोटी और संसद’ कविता का सारांश, मूल पंक्तियाँ और संपूर्ण व्याख्या (Roti aur Sansad Summary and Analysis)

हिंदी कविता के इतिहास में अपनी तीखी तेवर वाली और जनपक्षधर काव्य-शैली के लिए प्रसिद्ध सुप्रसिद्ध कवि सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ की लघु रचना ‘रोटी और संसद’ उनकी संवेदनशीलता और पैनी राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह कविता उनके चर्चित काव्य-संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ की सबसे छोटी किंतु सबसे अधिक मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक रचनाओं में गिनी जाती है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UGC NET/JRF, TGT, PGT) की दृष्टि से इस कविता का गहन अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Quick Overview (संक्षिप्त परिचय)

  • कविता का नाम: रोटी और संसद

  • रचयिता: सुदामा पांडेय ‘धूमिल’

  • काव्य-संग्रह: कल सुनना मुझे

  • मुख्य विषय: गरीबी, सामाजिक विषमता, श्रम का शोषण और सत्ता/संसद की उदासीनता

  • प्रमुख पात्र: रोटी बेलने वाला (मेहनतकश), रोटी खाने वाला (आम जन) और रोटी से खेलने वाला (शोषक वर्ग/तीसरा आदमी)

‘रोटी और संसद’ कविता की मूल पंक्तियाँ

एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है

वह सिर्फ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूँ

यह तीसरा आदमी कौन है?

मेरे देश की संसद मौन है।

📌 कविता की विस्तृत व्याख्या एवं विश्लेषण

रोटी बेलने वाला व्यक्ति (मेहनतकश वर्ग)

एक आदमी रोटी बेलता है

कवि धूमिल जी समाज के सबसे निचले, परिश्रमी और मेहनतकश वर्ग का यथार्थवादी चित्रण करते हुए कहते हैं कि एक आदमी ‘रोटी बेलता है’, जिसका सीधा अर्थ है कि वह अपने पेट की आग बुझाने और जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कठिन परिश्रम और श्रम करता है। यह समाज का वह वर्ग है जो उत्पादन और श्रम की धुरी है।

रोटी खाने वाला व्यक्ति (साधारण जन)

एक आदमी रोटी खाता है

इस पंक्ति में कवि उस वर्ग की ओर संकेत करता है जो मेहनत की कमाई का उपभोग करता है अथवा एक आम नागरिक के रूप में जीवन व्यतीत करता है। यहाँ रोटी जीने के अधिकार और बुनियादी जीविका का प्रतीक है।

तीसरा आदमी और उसका स्वरूप (शोषक वर्ग)

एक तीसरा आदमी भी है / जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है / वह सिर्फ रोटी से खेलता है

कविता का सबसे महत्वपूर्ण, वैचारिक और तीखा मोड़ इस ‘तीसरे आदमी’ पर आकर टिकता है। कवि कहते हैं कि समाज में एक ऐसा तीसरा वर्ग या व्यक्ति भी सक्रिय है, जो न तो खुद पसीना बहाकर मेहनत करता है और न ही वास्तविक रूप में उसे किसी श्रम की जरूरत होती है, बल्कि वह सिर्फ ‘रोटी से खेलता है’। यह तीसरा आदमी देश का सत्ताधारी वर्ग, भ्रष्ट पूँजीपति, दलाल या अफसरशाही का प्रतीक है, जो आम जनता की रोजी-रोटी, अधिकारों और उनकी गाढ़ी कमाई के साथ अपनी सनक के अनुसार खिलवाड़ करता है।

संसद की मौन स्थिति (व्यवस्था की विफलता)

मैं पूछता हूँ / यह तीसरा आदमी कौन है? / मेरे देश की संसद मौन है।

जब कवि व्यवस्था से सीधा और कड़ा सवाल पूछता है कि “यह तीसरा आदमी कौन है?”—जो बिना मेहनत किए सब कुछ नियंत्रित कर रहा है, तब इस देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था यानी संसद और न्याय प्रणाली कोई उत्तर नहीं देती और पूरी तरह मौन रहती है। यह मौन इस बात का प्रतीक है कि लोकतंत्र के रखवाले और सत्ता के गलियारों में बैठे लोग इस खुले शोषण के प्रति या तो संलिप्त हैं या फिर पूरी तरह बेबस और उदासीन हो चुके हैं।

💡 परीक्षार्थियों के लिए विशेष परीक्षा उपयोगी टिप्स (Exam Tips)

  • व्यंग्य शैली: धूमिल की यह कविता सीधी भाषा में एक गहरा राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य प्रस्तुत करती है।

  • प्रतीक विधान: यहाँ ‘रोटी’ केवल खाने की वस्तु नहीं, बल्कि ‘जीविका’, ‘अधिकार’ और ‘मानवीय गरिमा’ का प्रतीक है।

  • संसद की भूमिका: संसद का मौन रहना लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता और पूंजीवादी ताकतों के आगे उनकी लाचारी को उजागर करता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि ‘रोटी और संसद’ कविता महज कुछ पंक्तियों की रचना नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विसंगति का एक जीवंत दस्तावेज है। धूमिल ने अपनी इस कविता के माध्यम से श्रम के शोषण और सत्ता के पाखंड पर जो चोट की है, वह आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है।

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## FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. 'रोटी और संसद' कविता के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: ‘रोटी और संसद’ कविता के रचयिता हिंदी केप्रसिद्ध जनवादी और प्रगतिशील कवि सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ हैं।

Q2. यह कविता धूमिल के किस काव्य-संग्रह में संकलित है?
उत्तर: यह कविता धूमिल जी के प्रसिद्ध और चर्चित काव्य-संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ में संकलित है।

Q3. कविता में 'तीसरा आदमी' किसे कहा गया है?
उत्तर: कविता में ‘तीसरा आदमी’ देश के शोषक वर्ग, भ्रष्ट पूँजीपतियों, सत्ताधारियों और अफसरशाही को कहा गया है जो बिना श्रम किए आम जनता की रोजी-रोटी और अधिकारों से खिलवाड़ करते हैं।

Q4. कविता के अंत में संसद के मौन रहने का क्या आशय है?
उत्तर: संसद के मौन रहने का आशय यह है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ और व्यवस्था गरीबों के शोषण के आगे या तो उदासीन हैं या फिर पूँजीवादी ताकतों के दबाव में पूरी तरह असहाय हो चुकी हैं।

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