चंद्रगुप्त नाटक जयशंकर प्रसाद का प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक है। यह 1931 में प्रकाशित हुआ। इसमें चार अंक और कुल 44 दृश्य हैं। नाटक में सिकंदर के आक्रमण, नंद वंश के पतन और मौर्य साम्राज्य के उदय की कथा है। इसके केंद्र में चंद्रगुप्त जैसा नायक होते हुए भी सबसे प्रभावशाली पात्र चाणक्य है, जिसकी नीति पूरे नाटक को चलाती है।
UGC NET/JRF, TGT, PGT, RPSC और विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में इस नाटक से पात्र, कथन, गीत और आलोचकों के मत पर लगातार प्रश्न आते हैं। इस लेख में आपको एक जगह चंद्रगुप्त नाटक का सारांश, पात्र, अंकवार कथा, महत्वपूर्ण कथन, गीत, ऐतिहासिक आधार, आलोचकों की राय और अभ्यास प्रश्न मिलेंगे। अंत में कथन-आधारित और तर्क-आधारित प्रश्न भी हैं, जिनके उत्तर बटन के पीछे छिपे हैं।
चंद्रगुप्त — लेखक: जयशंकर प्रसाद | प्रकाशन: 1931 | अंक: 4 | दृश्य: 44 (11, 10, 9, 14) | गीत: 13 | नायक: चंद्रगुप्त (केंद्रीय प्रभाव: चाणक्य) | अंगी रस: वीर | विशेषता: राष्ट्रीय चेतना, कूटनीति और ऐतिहासिक यथार्थ।
📖 इस लेख में क्या है
- चंद्रगुप्त नाटक : एक नज़र में
- जयशंकर प्रसाद और उनके नाटक
- रचना-पृष्ठभूमि और कल्याणी-परिणय
- ऐतिहासिक आधार
- चंद्रगुप्त नाटक का सारांश (अंकवार)
- नाटक के प्रमुख पात्र
- मुख्य पात्रों का चरित्र-चित्रण
- महत्वपूर्ण कथन
- नाटक में आए गीत
- उद्देश्य और राष्ट्रीय चेतना
- विद्वानों और आलोचकों की राय
- नाटकीय तत्व, भाषा और रंगमंच
- चंद्रगुप्त नाटक की समीक्षा
- परीक्षा के लिए याद रखने योग्य तथ्य
- FAQ और तर्क-आधारित अभ्यास प्रश्न
चंद्रगुप्त नाटक : एक नज़र में
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| नाटक | चंद्रगुप्त |
| लेखक | जयशंकर प्रसाद |
| प्रकाशन वर्ष | 1931 ई. |
| विधा | ऐतिहासिक नाटक |
| अंक और दृश्य | 4 अंक; दृश्य क्रमशः 11, 10, 9 और 14 — कुल 44 |
| गीत | कुल 13 |
| नायक | चंद्रगुप्त; केंद्रीय सूत्रधार चाणक्य |
| प्रमुख पात्र | लगभग 26 महत्वपूर्ण पात्र: 18 पुरुष और 8 स्त्री |
| कथा-क्षेत्र | तक्षशिला, गांधार, सिंधु-तट, विपाशा-तट और मगध (पाटलिपुत्र) |
| अंगी रस | वीर |
| प्रथम मंचन | काशी, 1933 ई. |
| पूर्व रूप | कल्याणी-परिणय (1912 ई.), जिसका परिवर्द्धित रूप चंद्रगुप्त माना जाता है |
जयशंकर प्रसाद और उनके नाटक
जयशंकर प्रसाद (1889–1937) काशी के कवि, नाटककार, कहानीकार और उपन्यासकार थे और छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। उनकी प्रथम छायावादी रचना “प्रथम प्रभात” (1918) को आलोचक “झरना” संग्रह में संकलित मानते हैं और “झरना” से छायावाद का वास्तविक आरंभ माना जाता है। उनका “करुणालय” (1912) हिंदी का पहला गीति-नाट्य माना जाता है।
प्रसाद के नाटकों का क्रम परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है। इसे इस तरह याद रखें:
| नाटक | वर्ष | टिप्पणी |
|---|---|---|
| सज्जन | 1910 | आरंभिक नाटक |
| कल्याणी-परिणय | 1912 | चंद्रगुप्त का पूर्व रूप |
| करुणालय | 1912 | हिंदी का पहला गीति-नाट्य |
| प्रायश्चित्त | 1913 | |
| राज्यश्री | 1915 | ऐतिहासिक |
| विशाख | 1921 | भूमिका में लेखक का इतिहास-दृष्टिकोण |
| अजातशत्रु | 1922 | ऐतिहासिक |
| जनमेजय का नागयज्ञ | 1926 | पौराणिक-ऐतिहासिक |
| कामना | 1927 | प्रतीकात्मक |
| स्कंदगुप्त | 1928 | ऐतिहासिक, गुप्त-काल |
| एक घूँट | 1930 | एकांकी-शैली का नाटक |
| चंद्रगुप्त | 1931 | ऐतिहासिक, मौर्य-काल |
| ध्रुवस्वामिनी | 1933 | ऐतिहासिक, गुप्त-काल |
कालक्रम से स्कंदगुप्त (1928) पहले है, चंद्रगुप्त (1931) उसके बाद और ध्रुवस्वामिनी (1933) सबसे अंत में। ये तीनों ऐतिहासिक नाटक भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग — मौर्य और गुप्त काल — की कथा पर आधारित हैं। नाटक विधा को विस्तार से समझने के लिए हमारा हिंदी एकांकी का उद्भव और विकास वाला लेख भी पढ़ें।
रचना-पृष्ठभूमि और कल्याणी-परिणय
- पूर्व रूप: प्रसाद ने इस कथा पर पहले एक छोटा नाटक “कल्याणी-परिणय” (1912 ई.) लिखा था, जो “नागरी प्रचारिणी पत्रिका” में छपा। चंद्रगुप्त को उसी का परिवर्द्धित रूप माना जाता है।
- प्रकाशन: चंद्रगुप्त का प्रकाशन 1931 में हुआ। यह प्रसाद के उत्कृष्ट ऐतिहासिक नाटकों में गिना जाता है, भले ही रचना-काल की दृष्टि से इसे स्कंदगुप्त से बाद का नाटक माना जाए।
- अनुवाद से जुड़ा संदर्भ: द्विजेंद्रलाल राय का बंगला नाटक “चंद्रगुप्त” हिंदी में 1917 में अनूदित हुआ। कहा जाता है कि इससे प्रेरित होकर प्रसाद ने अपने नाटक का नाम “चंद्रगुप्त” रखा।
- इससे पहले की रचना: ज्योतिरिंद्रनाथ ठाकुर का बंगला नाटक “पुरुविक्रम” 1875 में प्रकाशित हो चुका था। इसलिए चंद्रगुप्त-कथा हिंदी में सर्वथा अछूती नहीं थी।
- प्रथम मंचन: काशी में 1933 ई.। आलोचक अक्सर इस नाटक की रंगमंचीयता पर बात करते हैं।
- तुलना: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसकी तुलना विशाखदत्त के “मुद्राराक्षस” से की है। कुछ विद्वान इसे “महाकाव्यात्मक नाटक” भी कहते हैं।
ऐतिहासिक आधार
नाटक की कथा सिकंदर के भारत-आक्रमण (लगभग 327 ई.पू.) से लेकर सिल्यूकस की पराजय तक की घटनाओं को केंद्र में रखकर बुनी गई है। इसमें तीन घटनाएँ विशेष रूप से ऐतिहासिक मानी जाती हैं:
- अलक्षेंद्र (सिकंदर) का आक्रमण
- नंद-कुल की पराजय
- सिल्यूकस का पराभव
प्रसाद की विशेषता यह है कि उन्होंने इतिहास की इन रेखाओं के बीच अपनी कल्पना से कथा और पात्र रचे हैं। अलका, कल्याणी, मालविका और कार्नेलिया की प्रेम-कथाएँ, सुवासिनी और राक्षस का प्रसंग और चाणक्य का मनोविज्ञान उसी का हिस्सा हैं। आलोचकों के अनुसार इस नाटक में अन्य ऐतिहासिक नाटकों की तुलना में ऐतिहासिकता का निर्वाह अधिक हुआ है। कथा तक्षशिला, गांधार, सिंधु-तट और मगध तक फैली है।
नाटक की पहली पंक्तियाँ चाणक्य के कथन से शुरू होती हैं कि कुलपति ने उसे गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने की आज्ञा दे दी है। इसका आरंभ तक्षशिला के गुरुकुल से होता है।
चंद्रगुप्त नाटक का सारांश (अंकवार)
प्रथम अंक (11 दृश्य) : तक्षशिला से मगध तक
नाटक का प्रथम दृश्य तक्षशिला के गुरुकुल में आरंभ होता है। चाणक्य अपनी शिक्षा पूरी करके वहाँ अध्यापन कर रहा है। सिंहरण और चाणक्य के बीच बातचीत में उन षड्यंत्रों का संकेत मिलता है, जो भारत के विरुद्ध हो रहे हैं। यूनान का सम्राट सिकंदर भारत पर आक्रमण की तैयारी में है और गांधार का राजकुमार आंभीक धन के लोभ में उससे मिल जाता है। चाणक्य तक्षशिला के गुरुकुल का आचार्य है। सिंहरण और चंद्रगुप्त उसी के स्नातक हैं।
चाणक्य अपने गुरुकुल के स्नातकों को लेकर मगध के राजा नंद के पास जाता है, क्योंकि वह चाहता है कि नंद बौद्ध धर्म के समर्थकों के कारण सिकंदर के विरुद्ध संगठित हो। पर भरी सभा में चाणक्य का अपमान होता है। नंद उसकी शिखा पकड़कर घसीटवाता है और बंदी बना लेता है। चाणक्य प्रतिज्ञा करता है कि वह नंद-वंश का सर्वनाश करेगा। चंद्रगुप्त उसे कारागार से छुड़ाता है। इसी अंक में पर्वतेश्वर को भी नंद अपमानित करता है। चाणक्य पर्वतेश्वर के पास सहायता माँगने जाता है, पर पर्वतेश्वर उसे राज्य से निकाल देता है। तपोवन में दाण्ड्यायन सिकंदर के सामने चंद्रगुप्त के सम्राट होने की भविष्यवाणी करता है।
द्वितीय अंक (10 दृश्य) : सिंधु-तट और सिकंदर
द्वितीय अंक का आरंभ सिंधु-तट पर यूनानी शिविर के पास कार्नेलिया से होता है। वह सिल्यूकस की पुत्री है और भारत की शोभा-सुंदरता का वर्णन करती है। सिकंदर का क्षत्रप फिलिप्स कार्नेलिया के साथ जबरदस्ती करना चाहता है, जिससे चंद्रगुप्त उसकी रक्षा करता है। कार्नेलिया चंद्रगुप्त से प्रभावित होती है और उसके मन में प्रेम जन्म लेता है।
चाणक्य के कहने पर सिंहरण, चंद्रगुप्त और अलका नटों का रूप धारण करके सिकंदर के शिविर में जाते हैं। मगध की राजकुमारी कल्याणी भी पुरुष-वेश में सिकंदर के साथ युद्ध करती है। पर्वतेश्वर सिकंदर से युद्ध में हार जाता है, पर उसकी वीरता से प्रभावित होकर सिकंदर उससे मैत्री कर लेता है। अलका का भाई आंभीक देशद्रोही के रूप में इस अंक में दिखाई देता है। मालविका का प्रणय भी चंद्रगुप्त पर परवान चढ़ता दिखाया गया है, पर चाणक्य उसे सावधान करता है।
तृतीय अंक (9 दृश्य) : विपाशा-तट और मालव युद्ध
इस अंक का आरंभ विपाशा-तट के शिविर में राक्षस के टहलने से होता है। यहाँ चाणक्य की कूटनीति पर राक्षस की टिप्पणी और भारत-भूमि के गौरव का वर्णन मिलता है। सिकंदर शुरू में मगध पर आक्रमण की योजना बनाता है, पर बाद में उसे बदल देता है। भारत से लौटते समय उसे मालव गणराज्य से युद्ध करना पड़ता है। इस युद्ध में चंद्रगुप्त और सिंहरण सामूहिक रूप से सिकंदर का मुकाबला करते हैं और सिकंदर घायल हो जाता है। सिंहरण उसे प्राणदान देता है और अंत में सिकंदर लौट जाता है।
पर्वतेश्वर अलका को रानी बनाना चाहता है, पर अलका इस शर्त पर राजी नहीं है कि वह सिकंदर के साथ युद्ध में नहीं रहेगा। पर्वतेश्वर वचन देता है, फिर भी सिकंदर की सहायता करता है, जिसके कारण अलका वहाँ से भाग जाती है। चाणक्य की बुद्धि से चंद्रगुप्त शक्तिशाली होता जाता है और मगध में नंद के विरुद्ध असंतोष बढ़ता है।
चतुर्थ अंक (14 दृश्य) : मगध की राजनीति और चाणक्य का संन्यास
चतुर्थ अंक का आरंभ मगध के राजकीय उपवन में कल्याणी से होता है। नंद की हत्या के बाद चंद्रगुप्त मगध का सम्राट बनता है। सुवासिनी, मालविका और कल्याणी के प्रसंग इसी अंक में आते हैं। राक्षस और सुवासिनी का प्रेम-प्रसंग भी इसी अंक में विकसित होता है। सिल्यूकस फिर आक्रमण करता है, पर हार जाता है। चाणक्य कार्नेलिया का विवाह चंद्रगुप्त से कराता है और स्वयं राजनीति से हटकर संन्यास की राह पर निकल जाता है। यह अंक चाणक्य की नीति और महत्वाकांक्षा पर विचार का भी अंक है।
विदेशी आक्रमण का प्रतिरोध → नंद-वंश का पतन → चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक → सिल्यूकस की पराजय → कार्नेलिया-विवाह → चाणक्य का राजनीति से संन्यास।
नाटक के प्रमुख पात्र
पुस्तकों में चंद्रगुप्त के पात्रों की कुल संख्या अलग-अलग मिलती है। इसलिए परीक्षा के लिए “महत्वपूर्ण पात्र 26: 18 पुरुष और 8 स्त्री” वाला विभाजन अधिक चलता है। संख्या के सवाल पर अपनी पाठ्य-पुस्तक का मत देखना न भूलें।
पुरुष पात्र
| पात्र | परिचय |
|---|---|
| चाणक्य (विष्णुगुप्त) | मौर्य साम्राज्य का संस्थापक; तक्षशिला के गुरुकुल का आचार्य; नीति का सूत्रधार |
| चंद्रगुप्त | मौर्य सम्राट; नायक |
| नंद | मगध का सम्राट |
| राक्षस | मगध का अमात्य; सुवासिनी का प्रेमी |
| वररुचि (कात्यायन) | मगध का अमात्य |
| शकटार | मगध का भूतपूर्व मंत्री; सुवासिनी का पिता |
| आंभीक | गांधार का राजकुमार; अलका का भाई |
| सिंहरण | मालव गणमुख्य का कुमार; चाणक्य-शिष्य |
| पर्वतेश्वर | पंजाब का राजा (पोरस) |
| सिकंदर | यूनान का आक्रमणकारी सम्राट |
| फिलिप्स | सिकंदर का क्षत्रप |
| एनीसाक्रीटीज | सिकंदर का सहचर |
| सिल्यूकस | सिकंदर का सेनापति; कार्नेलिया का पिता |
| दाण्ड्यायन | तपस्वी, जो सिकंदर के सामने भविष्यवाणी करता है |
| देवबल, नागदत्त, गणमुख्य | मालव गणतंत्र के पदाधिकारी |
| मौर्य सेनापति | चंद्रगुप्त का पिता |
| साइबर्टियस | यवन-दूत |
| गांधार-नरेश | आंभीक का पिता |
| धनदत्त और चंदन | पाटलिपुत्र का सार्थवाह और उसका पार्श्वचर |
| आजीवक | साधु |
स्त्री पात्र
| पात्र | परिचय |
|---|---|
| अलका | तक्षशिला की राजकुमारी; राष्ट्रभक्त |
| सुवासिनी | शकटार की कन्या; नंद की नर्तकी; राक्षस की प्रणयिनी |
| कल्याणी | मगध की राजकुमारी |
| मालविका | सिंधु देश की कुमारी |
| कार्नेलिया | सिल्यूकस की कन्या; भारतीय संस्कृति से प्रभावित यूनानी पात्र |
| नीला, लीला | कल्याणी की सखियाँ |
| एलिस | कार्नेलिया की सहेली |
| मौर्य-पत्नी | चंद्रगुप्त की माता |
| मणिमाला, माधवी | धनदत्त और चंदन की पत्नियाँ |
मुख्य पात्रों का चरित्र-चित्रण
चाणक्य : नीति का केंद्र
चाणक्य नाटक की धुरी है। वह एक ओर कठोर कूटनीतिज्ञ है और दूसरी ओर विरक्त ब्राह्मण। उसकी प्रतिज्ञा नंद-वंश के नाश की है, पर उसका लक्ष्य एक सुदृढ़ अखंड आर्यावर्त है। विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे आलोचकों ने उसके व्यक्तित्व में इसी अंतर्द्वंद्व और शील-वैचित्र्य की बात कही है। वह सत्ता का भोग नहीं करता। सम्राट बनाकर स्वयं कर्मक्षेत्र से हट जाता है। यही कारण है कि कुछ आलोचक उसे नायक मानते हैं, जबकि कुछ इस आधार पर असहमत हैं कि वह फल का भोक्ता नहीं है।
चंद्रगुप्त : आत्मसम्मान का नायक
चंद्रगुप्त का चरित्र आत्मसम्मान और कर्मठता का चरित्र है। वह मानता है कि नीति और शिक्षा का सार आत्मसम्मान के लिए मर-मिटना है। रामचंद्र शुक्ल की आलोचना यह है कि चंद्रगुप्त चाणक्य के प्रयत्न का फल पाने वाला पात्र अधिक दिखता है, स्वयं प्रयत्न करने वाला कम। दूसरी ओर दशरथ ओझा और गुलाबराय जैसे विद्वान नाटक के राष्ट्रीय स्वर को ही इसकी बड़ी उपलब्धि मानते हैं।
सिंहरण और अलका : राष्ट्रभक्ति के प्रतीक
सिंहरण वीर, तेजस्वी और राष्ट्रप्रेमी युवक है, जो मालवों के लिए अस्त्रशास्त्र को अर्थशास्त्र से अधिक आवश्यक मानता है। अलका तक्षशिला की राजकुमारी है। वह अपने भाई आंभीक के देशद्रोह के विरुद्ध खड़ी होती है और पराधीनता को सबसे बड़ी विडंबना मानती है। चौथे अंक में उसका प्रयाण-गीत “हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती” राष्ट्रीय भावना का प्रमुख गीत माना जाता है।
कार्नेलिया : भारत की प्रशंसक विदेशी पात्र
कार्नेलिया सिल्यूकस की कन्या होकर भी भारतीय संस्कृति से अभिभूत है। उसका गीत “अरुण यह मधुमय देश हमारा” हिंदी की सबसे प्रसिद्ध कविताओं में गिना जाता है। उसके मुख से भारत को “मानवता की जन्मभूमि” कहलवाकर प्रसाद ने भारत-गौरव का भाव और गहरा किया है।
राक्षस, सुवासिनी, कल्याणी और मालविका
राक्षस नंद का मंत्री है और अपने स्वामी के प्रति निष्ठावान, पर सुवासिनी के प्रेम में बँधा हुआ। सुवासिनी विवश परिस्थितियों में भी अपने स्त्रीत्व की गरिमा बचाए रखती है। कल्याणी मगध की राजकुमारी है, जो पुरुष-वेश में युद्ध करती है। मालविका सिंधु देश की कुमारी है, जिसके गीत और प्रेम-प्रसंग चतुर्थ अंक में हैं। ये चारों पात्र राजनीति के बीच प्रेम और कोमल भावनाओं का पक्ष प्रस्तुत करते हैं।
चंद्रगुप्त नाटक के महत्वपूर्ण कथन
“किसने किससे कहा” वाले प्रश्न इस नाटक में सबसे ज़्यादा आते हैं। कथन भावार्थ के रूप में दिए गए हैं। जहाँ उद्धरण चिह्न हैं, वहाँ पाठ के शब्द उसी रूप में प्रचलित हैं।
प्रथम अंक से
| कथन / भाव | वक्ता | संदर्भ |
|---|---|---|
| मालवों को अर्थशास्त्र की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी अस्त्रशास्त्र की | सिंहरण | चाणक्य से |
| नीति और शिक्षा का अर्थ यही है कि आत्मसम्मान के लिए मर-मिटना ही दिव्य जीवन है | चंद्रगुप्त | चाणक्य से |
| “यह शिखा नंदकुल की काल-सर्पिणी है” — जब तक नंदकुल निःशेष न होगा, यह बंधन में नहीं होगी | चाणक्य | नंद की सभा के अपमान के बाद |
| ब्राह्मण न किसी के राज्य में रहता है, न किसी के अन्न से पलता है; वह स्वराज्य में विचरता है | चाणक्य | ब्राह्मणत्व की परिभाषा |
| पहले मैं भाषा ठीक करने से पहले मनुष्यों को ठीक करना चाहता हूँ | चाणक्य | वररुचि से बहस में |
| विजय-तृष्णा का अंत पराभव में होता है; राजसत्ता सुव्यवस्था से बड़ी हो सकती है, केवल विजयों से नहीं | दाण्ड्यायन | सिकंदर से |
| सुवासिनी एक लालसा है, एक प्यास है; उसे पाने के लिए सौ बार मरूँगा | राक्षस | सुवासिनी के प्रति |
द्वितीय और तृतीय अंक से
| कथन / भाव | वक्ता | संदर्भ |
|---|---|---|
| तुम्हारा उत्कृष्ट प्रेम बड़ा भयानक होगा, उससे तो डरना चाहिए | कार्नेलिया | द्वितीय अंक |
| वीरता भी एक सुंदर कला है, उस पर मुग्ध होना आश्चर्य की बात नहीं | पर्वतेश्वर | सिकंदर से, द्वितीय अंक |
| “अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है, यह भारत मानवता की जन्मभूमि है” | कार्नेलिया | तृतीय अंक |
| ब्राह्मण राज्य करना नहीं जानता; वह राजाओं का नियमन करना और राजा बनाना जानता है | चाणक्य | तृतीय अंक |
| अवसर पर एक क्षण का विलंब असफलता का प्रवर्तक हो जाता है | चाणक्य | तृतीय अंक |
| शत्रु की उचित प्रशंसा करना मनुष्य का धर्म है | राक्षस | तृतीय अंक |
| राजदंड पति और पुत्र के मोहजाल से सर्वथा स्वतंत्र है | नंद | तृतीय अंक |
| नियति सम्राटों से भी प्रबल है | शकटार | तृतीय अंक |
| व्यक्तिगत स्वतंत्रता वहीं तक दी जा सकती है जहाँ दूसरे की स्वतंत्रता में बाधा न पड़े | चाणक्य | तृतीय अंक |
चतुर्थ अंक से
| कथन / भाव | वक्ता | संदर्भ |
|---|---|---|
| “महत्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीपी में रहता है” | चाणक्य | चंद्रगुप्त से; नाटक का सबसे प्रसिद्ध कथन |
| वही शरीर, वही रूप, वही हृदय है, पर छिन गया अधिकार और ऐश्वर्य | कल्याणी | चतुर्थ अंक |
| जीविका के लिए मैंने चाहे कुछ भी किया हो, पर स्त्रीत्व नहीं बेचा | सुवासिनी | चतुर्थ अंक |
| “जीवन एक प्रश्न है और मरण है उसका अटल उत्तर” | मालविका | चतुर्थ अंक |
| जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना | चंद्रगुप्त | चतुर्थ अंक |
| “राज्य किसी का नहीं है, वह सुशासन का है” | अलका | चतुर्थ अंक |
| मनुष्य साधारणतः पशु है; विचारशील होने से मनुष्य और निःस्वार्थ कर्म से देवता बन सकता है | सिंहरण | चतुर्थ अंक |
| “प्रेम में स्मृति का ही सुख है” | सुवासिनी | चतुर्थ अंक |
| महत्वाकांक्षा के दाँव पर मनुष्यता सदैव हारी है | कार्नेलिया | चतुर्थ अंक |
| मुझे चंद्रगुप्त को मेघमुक्त देखकर इस रंगमंच से हट जाना है | चाणक्य | संन्यास से पहले |
कुछ पुस्तकों में एक ही कथन के शब्द और वक्ता थोड़े अलग मिलते हैं (जैसे “आर्य कृतघ्न नहीं होते” / “भारतीय कृतघ्न नहीं होते”)। परीक्षा के लिए अपनी पाठ्य-पुस्तक और नाटक के मूल पाठ का शब्द-रूप ही अंतिम मानें।
चंद्रगुप्त नाटक में आए गीत
चंद्रगुप्त में कुल 13 गीत माने जाते हैं। नाटक में गीत केवल सजावट नहीं हैं। वे पात्रों की मनःस्थिति, प्रेम और राष्ट्रप्रेम को व्यक्त करते हैं। गीतों का यह वर्गीकरण परीक्षा के लिए उपयोगी है:
| गीत की प्रथम पंक्ति | गायिका / गायक | अंक |
|---|---|---|
| “तुम कनक किरन के अंतराल में लुक-छिपकर चलते हो क्यों…” | सुवासिनी | प्रथम |
| “निकल मत बाहर दुर्बल आह…” | राक्षस के प्रसंग में | प्रथम |
| “अरुण यह मधुमय देश हमारा…” | कार्नेलिया | द्वितीय |
| “प्रथम यौवन मदिरा से मत्त…” | अलका | द्वितीय |
| “सकल हो जीवन की सब साध…” | अलका | द्वितीय |
| “आज यह यौवन के माधवी कुंज में कोकिल बोल रहा है…” | सुवासिनी | तृतीय |
| “सुधा-सीकर से नहला दो…” | कल्याणी | चतुर्थ |
| “कैसी कड़ी रूप की ज्वाला…” | नेपथ्य से | चतुर्थ |
| “मधुप कब तक कली का है मात्र…”, “बज रही है बंसी आठों याम की…”, “ओ मेरे जीवन की स्मृति…” | मालविका | चतुर्थ |
| “हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती…” | अलका (प्रयाण-गीत, समवेत स्वर) | चतुर्थ |
| “सखे! वह प्रेममयी रजनी…” | सुवासिनी | चतुर्थ |
कुछ स्रोत गीतों को सामूहिक गीत, एकांत गीत, नेपथ्य गीत, प्रयाण गीत और परिस्थितिजन्य गीत में बाँटते हैं। विषय की दृष्टि से अधिकतर गीत प्रेम और सौंदर्य के हैं, जबकि राष्ट्रीय गीत कम हैं, पर उनका प्रभाव सबसे गहरा है। इनमें कार्नेलिया का “अरुण यह मधुमय देश हमारा” और अलका का “हिमाद्रि तुंग शृंग से” सबसे प्रसिद्ध हैं। गीतों की संख्या का अंकवार ब्योरा अलग-अलग पुस्तकों में भिन्न मिलता है। इसलिए कुल संख्या 13 ही याद रखें।
उद्देश्य और राष्ट्रीय चेतना
- राष्ट्रीय एकता: मालव, मागध, गांधार और पंजाब की अलग पहचानों से ऊपर उठाकर “आर्यावर्त” की भावना जगाना।
- विदेशी आक्रमण का प्रतिरोध: सिकंदर और सिल्यूकस के आक्रमण के बहाने तत्कालीन परतंत्रता के विरुद्ध चेतना जगाना।
- भारत-गौरव: विदेशी पात्रों कार्नेलिया और सिकंदर के मुँह से भारत की महानता का वर्णन।
- कूटनीति और नीति: राजनीति और नैतिकता के द्वंद्व पर विचार, जिसका केंद्र चाणक्य है।
- प्रेम बनाम कर्तव्य: अलका, कल्याणी, मालविका और कार्नेलिया के माध्यम से कर्तव्य और प्रेम का संतुलन।
प्रसाद ने विशाख की भूमिका में अपना इतिहास-दृष्टिकोण स्पष्ट किया है। वे भारतीय इतिहास के उन अप्रकाशित अंशों को सामने लाना चाहते थे, जिन्होंने हमारी वर्तमान स्थिति को बनाने में बहुत कुछ किया है। बाबू गुलाबराय के अनुसार चंद्रगुप्त में तत्कालीन इतिहास को राष्ट्रीयता के ढाँचे में ढालने का सफल प्रयास हुआ है। दशरथ ओझा इसे प्रसाद की प्रवृत्ति और उद्देश्य का चरम उत्कर्ष मानते हैं।
विद्वानों और आलोचकों की राय
हिंदी आलोचना की व्यापक समझ के लिए हमारा हिंदी आलोचना और प्रमुख आलोचक वाला लेख भी देखें। चंद्रगुप्त नाटक पर प्रमुख मत ये हैं:
| विद्वान | मत |
|---|---|
| रत्नशंकर प्रसाद (प्रसाद के पुत्र) | प्रसाद केवल कवि और नाटककार नहीं, इतिहास के मौलिक अन्वेषक भी थे। चंद्रगुप्त मौर्य पर विषद ऐतिहासिक विवेचन हिंदी में सबसे पहले प्रसाद ने किया। भाषा, भाव और चरित्र-चित्रण में यह उनके श्रेष्ठ नाटकों में है। |
| रामचंद्र शुक्ल | तुलना मुद्राराक्षस से। उनके अनुसार चंद्रगुप्त प्रयत्न के फल का भोक्ता है; चाणक्य का व्यक्तित्व सामने आता है। साथ ही उन्हें लगा कि पात्रों की आयु और काल-क्रम पर पर्याप्त ध्यान नहीं गया। |
| डॉ. शांतिस्वरूप गुप्त | चाणक्य अखंड सार्वभौम भारत का स्वप्न देखता है। नाटक का फल उसी की ओर उन्मुख है, इसलिए चाणक्य ही इस नाटक का नायक है। |
| जगन्नाथ प्रसाद शर्मा | चाणक्य फल का भोक्ता नहीं बनता, कर्मक्षेत्र छोड़कर चला जाता है, इसलिए वह नायक नहीं हो सकता। |
| दशरथ ओझा | प्रसाद ने राष्ट्रप्रेम और विश्वप्रेम का सच्चा सामंजस्य किया है। चंद्रगुप्त में प्रसाद की प्रवृत्ति और उद्देश्य का चरम उत्कर्ष है। |
| बाबू गुलाबराय | तत्कालीन इतिहास को राष्ट्रीयता के ढाँचे में ढालने का सफल प्रयास। |
| विश्वनाथ त्रिपाठी | चाणक्य में राजनीतिक चालों का सूत्रधार और विरक्त ब्राह्मण, दोनों हैं; इससे उसमें अंतर्द्वंद्व और शील-वैचित्र्य आता है। |
| किशोरीलाल गोस्वामी | नाटक की प्रशंसा करने वाले आलोचकों में गिने जाते हैं। |
चाणक्य को नायक मानें या नहीं, इस पर आलोचकों में सीधा मतभेद है। एक पक्ष चंद्रगुप्त को नायक मानता है, दूसरा चाणक्य को। परीक्षा में “चंद्रगुप्त का नायक कौन?” पूछे जाने पर पहले अपनी पाठ्य-पुस्तक का मत लिखें और दूसरे पक्ष को एक पंक्ति में जोड़ दें।
नाटकीय तत्व, भाषा और रंगमंच
- कथावस्तु: इतिहास और कल्पना का मेल। कथा चार अंकों में तेज़ी से आगे बढ़ती है और चाणक्य की योजनाओं के सहारे कसी रहती है।
- चरित्र-योजना: राजनीतिक पात्र, प्रेम-पात्र और विदेशी पात्र तीन धाराओं में बँटे हैं। कुल 26 महत्वपूर्ण पात्र हैं।
- संवाद: गंभीर, काव्यात्मक और सूक्तिपरक। चाणक्य और सिंहरण के संवाद इसके प्रमाण हैं।
- स्वगत कथन और गीत: पात्रों की आंतरिक मनःस्थिति दिखाने के प्रमुख साधन।
- रस: अंगी रस वीर है। शृंगार और करुण रस सहायक रूप में आते हैं।
- भाषा: संस्कृतनिष्ठ, पर नाटकीय प्रभाव और भावात्मकता से भरी हुई। भाषा-शैली की यही काव्यात्मकता आगे चलकर रंगमंच पर बहस का विषय बनी।
- रंगमंच: पुरानी आलोचनाओं में नाटक को अभिनय की दृष्टि से लंबा और कठिन बताया गया था। बाद में रंगमंच पर इसके मंचन से यह धारणा बदली। प्रथम मंचन 1933 में काशी में हुआ।
चंद्रगुप्त नाटक की समीक्षा : शक्ति और सीमाएँ
चंद्रगुप्त नाटक की सबसे बड़ी शक्ति उसका राष्ट्रीय स्वर है। जब यह नाटक लिखा गया, भारत परतंत्र था। ऐसे समय में सिकंदर के सामने खड़े होते मालव, तक्षशिला की अलका का देशप्रेम और कार्नेलिया के मुँह से भारत की प्रशंसा पाठक को सीधे अपने समय से जोड़ देती है। प्रसाद ने इतिहास को केवल अतीत की कथा नहीं रहने दिया, उसे वर्तमान की चेतावनी और प्रेरणा बना दिया। इसी कारण इसे राष्ट्रीय नाटक कहा जाता है।
दूसरी शक्ति चरित्र-सृष्टि है। चाणक्य जैसा पात्र हिंदी नाटक में बहुत कम मिलता है, जो एक साथ कठोर और कोमल, क्रोधी और विरक्त, चालाक और आदर्शवादी है। उसके साथ अलका, सिंहरण, कार्नेलिया, राक्षस और सुवासिनी जैसे पात्र नाटक को केवल राजनीतिक कथा नहीं रहने देते। प्रेम, त्याग और कर्तव्य की कई परतें इसमें जुड़ती चलती हैं।
तीसरी बात संवादों और गीतों की है। नाटक के संवाद सूक्ति की तरह याद रह जाते हैं और गीत पात्रों की भावना को स्वर देते हैं। “अरुण यह मधुमय देश हमारा” और “हिमाद्रि तुंग शृंग से” आज भी विद्यालयों, मंचों और समारोहों में गाए जाते हैं। यह बताता है कि गीतों का प्रभाव नाटक की सीमा से बाहर तक पहुँचा है।
अब सीमाओं की बात। आलोचकों ने कई बार कहा है कि नाटक में पात्र और घटनाएँ बहुत हैं, इसलिए कथा कहीं-कहीं बिखरती है। भाषा कई स्थानों पर इतनी संस्कृतनिष्ठ और काव्यात्मक है कि मंच पर बोलने में कठिन लगती है। कुछ विद्वानों का मत है कि पात्रों के बीच काल-क्रम की संगति पर पूरा ध्यान नहीं दिया गया। नायक के प्रश्न पर भी स्थायी असहमति है। इन सबके बावजूद नाटक की ऐतिहासिक दृष्टि, राष्ट्रीय भावना और चाणक्य की कल्पना इसे प्रसाद की श्रेष्ठ रचनाओं में स्थान दिलाती है।
विद्यार्थी के लिए एक व्यावहारिक सुझाव यह है कि इस नाटक को तीन चरणों में पढ़ें। पहले अंकवार कथा और पात्रों की सूची याद करें। फिर कथन और गीत वक्ता के साथ लिखकर दोहराएँ। अंत में आलोचकों के मत को ऐसे लिखें कि कौन-सा विद्वान किस बात का समर्थन करता है और किससे असहमत है। परीक्षा में तथ्यात्मक प्रश्न के साथ-साथ यही मत-भेद वाले प्रश्न भी अंक दिलाते हैं।
नाटक से मिलने वाली सीख
- व्यक्तिगत अपमान को राष्ट्रहित के संकल्प में बदलने की शक्ति, जैसा चाणक्य करता है।
- देश की रक्षा के लिए छोटे-छोटे राज्यों और गणों का मतभेद भुलाकर एक होना।
- सत्ता पाने से कठिन उसे नैतिकता के साथ चलाना है, और सच्चा नेतृत्व अवसर आने पर हट जाना भी जानता है।
- संस्कृति की ताकत वह है, जो विदेशी को भी अपना प्रशंसक बना ले।
परीक्षा के लिए याद रखने योग्य तथ्य
- चंद्रगुप्त नाटक का प्रकाशन 1931 में हुआ।
- चार अंक; दृश्य क्रमशः 11, 10, 9 और 14 — कुल 44।
- कुल 13 गीत।
- पूर्व रूप: कल्याणी-परिणय (1912), नागरी प्रचारिणी पत्रिका में प्रकाशित।
- चाणक्य का दूसरा नाम विष्णुगुप्त है।
- कार्नेलिया सिल्यूकस की पुत्री है; अलका तक्षशिला की राजकुमारी; कल्याणी मगध की राजकुमारी; मालविका सिंधु देश की कुमारी।
- सुवासिनी शकटार की कन्या है और राक्षस की प्रणयिनी।
- सिंहरण मालव गणमुख्य का कुमार है; आंभीक तक्षशिला (गांधार) का राजकुमार।
- तुलना: रामचंद्र शुक्ल ने मुद्राराक्षस से की।
- “महत्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीपी में रहता है” — चाणक्य।
- “अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है, यह भारत मानवता की जन्मभूमि है” — कार्नेलिया।
- “अरुण यह मधुमय देश हमारा” — कार्नेलिया का गीत (द्वितीय अंक)।
- “हिमाद्रि तुंग शृंग से” — अलका का प्रयाण-गीत (चतुर्थ अंक)।
- प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक: स्कंदगुप्त (1928), चंद्रगुप्त (1931), ध्रुवस्वामिनी (1933)।
- प्रथम मंचन: काशी, 1933 ई.।
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चंद्रगुप्त नाटक पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
कथन आधारित और तर्क आधारित अभ्यास प्रश्न
नीचे के प्रश्न NET/JRF, TGT, PGT और RPSC के प्रश्न-पैटर्न पर बनाए गए हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “✅ उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।
प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चंद्रगुप्त नाटक का प्रकाशन 1931 में हुआ।
2. इसमें चार अंक हैं।
3. इसके कुल दृश्य 44 हैं।
कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों को सत्य (T) या असत्य (F) के आधार पर पहचानिए:
कथन I: चंद्रगुप्त का प्रथम दृश्य तक्षशिला के गुरुकुल में आरंभ होता है।
कथन II: चंद्रगुप्त का प्रथम मंचन 1933 में काशी में हुआ।
कथन III: सिंहरण मगध का सेनापति है।
- I-T, II-T, III-F
- I-T, II-F, III-T
- I-F, II-T, III-T
- I-T, II-T, III-T
प्रश्न 3. कथन (A): चंद्रगुप्त नाटक में कार्नेलिया के माध्यम से भारत-गौरव का भाव गहरा होता है।
कारण (R): कार्नेलिया विदेशी होते हुए भी भारत को “मानवता की जन्मभूमि” कहती है।
सही विकल्प चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, पर R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, R गलत है
- A गलत है, R सही है
प्रश्न 4. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन असत्य है/हैं?
1. चंद्रगुप्त में कुल 13 गीत माने जाते हैं।
2. चंद्रगुप्त के पूर्व रूप का नाम “कल्याणी-परिणय” है।
3. चंद्रगुप्त की तुलना जयशंकर प्रसाद ने स्वयं “मुद्राराक्षस” से की है।
- केवल 1
- केवल 2
- केवल 3
- 1 और 2
प्रश्न 5. सुमेलित कीजिए:
(A) अलका (1) मगध की राजकुमारी
(B) कल्याणी (2) तक्षशिला की राजकुमारी
(C) मालविका (3) सिल्यूकस की पुत्री
(D) कार्नेलिया (4) सिंधु देश की कुमारी
- A-2, B-1, C-4, D-3
- A-1, B-2, C-4, D-3
- A-2, B-1, C-3, D-4
- A-4, B-1, C-2, D-3
प्रश्न 6. “अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है, यह भारत मानवता की जन्मभूमि है” — यह कथन किसका है?
- कार्नेलिया
- अलका
- सुवासिनी
- मालविका
प्रश्न 7. “आत्मसम्मान के लिए मर-मिटना ही दिव्य जीवन है” — यह भाव किस पात्र का है?
- चाणक्य
- चंद्रगुप्त
- राक्षस
- आंभीक
प्रश्न 8. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है?
- “अरुण यह मधुमय देश हमारा” — कार्नेलिया
- “हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती” — अलका
- “सखे! वह प्रेममयी रजनी” — सुवासिनी
- “सुधा-सीकर से नहला दो” — राक्षस
प्रश्न 9. चाणक्य को चंद्रगुप्त नाटक का नायक मानने वाले आलोचक कौन हैं?
- डॉ. शांतिस्वरूप गुप्त
- जगन्नाथ प्रसाद शर्मा
- बाबू गुलाबराय
- दशरथ ओझा
प्रश्न 10. जयशंकर प्रसाद के निम्नलिखित नाटकों का सही कालक्रम चुनिए:
- स्कंदगुप्त — चंद्रगुप्त — ध्रुवस्वामिनी
- चंद्रगुप्त — स्कंदगुप्त — ध्रुवस्वामिनी
- ध्रुवस्वामिनी — स्कंदगुप्त — चंद्रगुप्त
- स्कंदगुप्त — ध्रुवस्वामिनी — चंद्रगुप्त
प्रश्न 11. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कल्याणी-परिणय चंद्रगुप्त का पूर्व रूप माना जाता है।
2. नाटक की घटनाएँ सिकंदर के आक्रमण से सिल्यूकस की पराजय तक फैली हैं।
3. “करुणालय” को हिंदी का पहला गीति-नाट्य माना जाता है।
सही विकल्प चुनिए:
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
प्रश्न 12. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
- चाणक्य का दूसरा नाम विष्णुगुप्त है
- आंभीक तक्षशिला का राजकुमार है
- सुवासिनी शकटार की कन्या है
- सिंहरण पर्वतेश्वर का पुत्र है
परीक्षा की तैयारी के लिए अगला कदम
चंद्रगुप्त जैसे नाटक पर पकड़ तभी बनती है, जब आप उसे हिंदी नाटक के पूरे विकास-क्रम के साथ पढ़ें। नाटक, एकांकी, उपन्यास और निबंध जैसी विधाओं के लिए हिंदी गद्य विधा का संग्रह देखें। आधुनिक काल की संपूर्ण तैयारी के लिए नीचे का बटन देखें।
संदर्भ और स्रोत: मुख्यांश — चन्द्रगुप्त नाटक; अभिव्यक्ति — चंद्रगुप्त नाटक प्रश्नोत्तरी; Hindi Best Notes — चन्द्रगुप्त नाटक; डॉ. प्रशांत कुमार प्रभाकर, “वस्तुनिष्ठ हिंदी नाटक” (प्रभात प्रकाशन)। सामग्री का संयोजन और भाषा हमारी अपनी है।
एम.ए., बी.एड. (नेट हिंदी), कॉलेज व्याख्याता, श्रीगंगानगर (राजस्थान)
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