अंतिम संशोधित (Last Updated): October 12, 2026
किताब में पढ़ा गया नाटक कई बार सूखा लगता है, पर वही नाटक मंच पर आते ही जीवित हो उठता है: पात्र चलते-फिरते हैं, संवाद गूँजते हैं और दर्शक हँसते-रोते हैं। यह असर कुछ ख़ास घटकों से पैदा होता है, जिन्हें नाटक के तत्त्व(Natak ke Tatva) कहा जाता है। B.A., M.A., UGC NET, TGT-PGT और कॉलेज लेक्चरर जैसी परीक्षाओं में “नाटक के तत्त्वों का वर्णन कीजिए” सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले प्रश्नों में से एक है। इस लेख में यही विषय भारतीय और पाश्चात्य, दोनों दृष्टियों से, आसान भाषा और हिंदी नाटकों के उदाहरणों के साथ समझाया गया है।
नाटक के तत्त्व: एक नज़र में
| तत्त्व | सरल अर्थ | एक पंक्ति में पहचान |
|---|---|---|
| कथावस्तु | नाटक की कहानी | क्या हो रहा है? |
| पात्र और चरित्र-चित्रण | कहानी के लोग और उनका स्वभाव | किसके साथ हो रहा है? |
| संवाद | पात्रों की आपसी बातचीत | कहानी कैसे आगे बढ़ रही है? |
| देशकाल-वातावरण | समय, स्थान और माहौल | कब और कहाँ हो रहा है? |
| भाषा-शैली | शब्दों का चुनाव और कहने का ढंग | किस तरह कहा जा रहा है? |
| उद्देश्य | नाटककार का संदेश या प्रभाव | क्यों लिखा गया? |
| अभिनेयता | मंच पर खेले जाने की क्षमता | क्या इसे मंच पर दिखाया जा सकता है? |
नाटक किसे कहते हैं?
नाटक वह साहित्यिक रचना है, जिसे पढ़ने के साथ-साथ मंच पर अभिनय के ज़रिए देखा भी जा सके। इसीलिए भारतीय काव्यशास्त्र में काव्य के दो भेद किए गए हैं: श्रव्य काव्य (जिसे सुना या पढ़ा जाए) और दृश्य काव्य (जिसे देखा जाए)। नाटक दृश्य काव्य है। कहानी और उपन्यास में लेखक ख़ुद बोलकर बहुत कुछ समझा देता है, जबकि नाटक में सब कुछ पात्रों के कार्य और संवाद से ही दिखाना पड़ता है।
भरतमुनि (नाट्यशास्त्र) ने नाट्य को लोक-जीवन का अनुकरण कहा है:
नानाभावोपसम्पन्नं नानावस्थान्तरात्मकम्।
लोकवृत्तानुकरणं नाट्यमेतन्मया कृतम्॥
अर्थ: अनेक भावों से भरा हुआ और जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं को दिखाने वाला, लोक के आचरण का अनुकरण ही नाट्य है।
आचार्य धनंजय (दशरूपक) ने इसे और छोटा करके कहा: “अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्”, यानी किसी अवस्था का अनुकरण ही नाट्य है।
अरस्तू (पोएटिक्स) के अनुसार त्रासदी किसी गंभीर, पूर्ण और निश्चित विस्तार वाले कार्य का अनुकरण है, जो करुणा और भय जगाकर इन भावों का विरेचन करती है।
• अनुकरण: किसी चीज़ की नकल करके उसे फिर से प्रस्तुत करना। नाटक में अभिनेता असल जीवन के लोगों की नकल करके कहानी दिखाता है।
• रूपक: संस्कृत में दृश्य काव्य का सामान्य नाम। इसके दस भेद माने गए हैं, और “नाटक” उनमें से सबसे प्रमुख भेद है। रूपक इसलिए कहा गया, क्योंकि अभिनेता पर पात्र का “रूप” आरोपित किया जाता है।
• विरेचन (Catharsis): अरस्तू का शब्द। दुखद दृश्य देखकर दर्शक के मन में दबे भय और करुणा के भाव बाहर निकल जाते हैं और मन हल्का हो जाता है।
नाटक के तत्त्व: तीन दृष्टियाँ
परीक्षा में अच्छे अंक तभी मिलते हैं, जब उत्तर में तीनों मत आएँ। पहले संक्षेप में तीनों को देख लेते हैं, फिर हर तत्त्व को विस्तार से समझेंगे।
1. भारतीय दृष्टि: वस्तु, नेता और रस
संस्कृत नाट्यशास्त्र में नाटक को अलग-अलग रूपकों से पहचानने के लिए तीन आधार बताए गए हैं। धनंजय ने दशरूपक में लिखा है:
वस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः।
अर्थ: वस्तु (कथा), नेता (नायक) और रस, यही तीन रूपकों में भेद करने वाले तत्त्व हैं।
इनके अलावा भारतीय परंपरा में अभिनय और वृत्ति को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
2. पाश्चात्य दृष्टि: अरस्तू के छह तत्त्व
अरस्तू ने अपने ग्रंथ पोएटिक्स में त्रासदी के छह तत्त्व बताए हैं:
| अरस्तू का शब्द (यूनानी) | हिंदी नाम | सरल अर्थ |
|---|---|---|
| Mythos | कथानक | घटनाओं की व्यवस्था |
| Ethos | चरित्र | पात्रों का नैतिक स्वभाव |
| Dianoia | विचार | पात्रों के तर्क और विचार |
| Lexis | पदावली | भाषा और शब्द-रचना |
| Melos | गीत | संगीत और गायन |
| Opsis | दृश्य-विधान | मंच-सज्जा और दृश्य |
अरस्तू ने कथानक को त्रासदी की आत्मा कहा है और उसे चरित्र से भी ऊपर रखा है।
3. आधुनिक हिंदी आलोचना: सात तत्त्व
हिंदी के आलोचकों ने दोनों परंपराओं को मिलाकर नाटक के सात तत्त्व स्वीकार किए हैं: कथावस्तु, पात्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य और अभिनेयता। कुछ पुस्तकों में अभिनेयता को अलग न मानकर छह तत्त्व ही गिनाए जाते हैं। परीक्षा में सात तत्त्व लिखना अधिक सुरक्षित है, क्योंकि अभिनेयता ही नाटक को कहानी और उपन्यास से अलग करती है।
नाटक के तत्त्वों का विस्तार से वर्णन
1. कथावस्तु (Plot)
कथावस्तु नाटक की कहानी है, यानी वे घटनाएँ जो मंच पर क्रम से घटती हैं। अच्छी कथावस्तु में घटनाएँ एक-दूसरे से कारण-कार्य के धागे से जुड़ी होती हैं और दर्शक की जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है।
स्रोत के आधार पर कथावस्तु के तीन भेद:
- प्रख्यात: इतिहास या पुराण से ली गई कथा। जैसे जयशंकर प्रसाद का स्कंदगुप्त और चंद्रगुप्त।
- उत्पाद्य: नाटककार की कल्पना से बनी कथा। जैसे मोहन राकेश का आधे-अधूरे।
- मिश्र: इतिहास और कल्पना का मेल। जैसे आषाढ़ का एक दिन, जिसमें कालिदास ऐतिहासिक कवि हैं, पर मल्लिका की कथा कल्पित है।
महत्व के आधार पर दो भेद:
- आधिकारिक कथा: नायक से जुड़ी मुख्य कथा।
- प्रासंगिक कथा: मुख्य कथा की सहायता करने वाली उपकथा। यह दो तरह की होती है: पताका (जो दूर तक साथ चले) और प्रकरी (जो थोड़ी देर चलकर समाप्त हो जाए)।
प्रस्तुति के आधार पर दो भेद: दृश्य (जो मंच पर दिखाया जाए) और सूच्य (जो मंच पर न दिखाकर केवल सूचना के रूप में बताया जाए)।
कथावस्तु का विकास: भारतीय मत
भारतीय आचार्यों ने कथा के विकास को तीन पंचकों में बाँटा है। हर संधि एक कार्यावस्था और एक अर्थप्रकृति के मेल से बनती है:
| कार्यावस्था (नायक का प्रयास) | अर्थप्रकृति (कथा के घटक) | संधि (दोनों का मेल) |
|---|---|---|
| आरंभ | बीज | मुख संधि |
| यत्न | बिंदु | प्रतिमुख संधि |
| प्राप्त्याशा | पताका | गर्भ संधि |
| नियताप्ति | प्रकरी | विमर्श (अवमर्श) संधि |
| फलागम | कार्य | निर्वहण संधि |
कथावस्तु का विकास: पाश्चात्य मत
पाश्चात्य नाट्यशास्त्र में कथानक की पाँच अवस्थाएँ मानी जाती हैं: आरंभ (प्रस्तावना) → विकास → चरम सीमा → उतार (निगति) → अंत (परिणति)।
• बीज: कथा का वह छोटा-सा आरंभिक संकेत, जिससे आगे पूरी कथा फैलती है, जैसे बीज से पेड़।
• बिंदु: जब कथा बीच में रुकती-सी लगे, तब उसे फिर से जोड़ने वाली घटना, जैसे तेल की बूँद पानी में फैलती है।
• प्राप्त्याशा: फल मिलने की आशा, पर साथ में बाधा का डर भी। नियताप्ति: बाधाएँ हटने पर फल मिलना लगभग निश्चित हो जाना। फलागम: फल की प्राप्ति।
• अर्थोपक्षेपक: सूच्य कथा बताने के पाँच साधन: विष्कंभक, प्रवेशक, चूलिका, अंकावतार और अंकमुख। इनके द्वारा वे घटनाएँ बताई जाती हैं, जिन्हें मंच पर दिखाना संभव या उचित न हो।
2. पात्र और चरित्र-चित्रण (Characters)
पात्र वे व्यक्ति हैं, जिनके माध्यम से कथा आगे बढ़ती है। नाटक में लेखक ख़ुद किसी पात्र के बारे में कुछ नहीं कह सकता, इसलिए चरित्र पात्र के कार्यों, संवादों, दूसरे पात्रों की टिप्पणियों और स्वगत कथनों से ही उभरता है। यही नाटक के चरित्र-चित्रण की सबसे बड़ी चुनौती है।
भारतीय परंपरा के प्रमुख पात्र:
- नायक: मुख्य पात्र, जिसे फल की प्राप्ति होती है। नायक के चार भेद माने गए हैं: धीरोदात्त, धीरललित, धीरप्रशांत और धीरोद्धत। विस्तार से पढ़ें: नायक कितने प्रकार के होते हैं।
- नायिका: नायक की प्रेयसी या पत्नी, जो प्रायः कथा के केंद्र में रहती है।
- प्रतिनायक: नायक का विरोधी, जैसे रामकथा में रावण।
- विदूषक: नायक का हँसमुख मित्र, जो हास्य पैदा करता है। संस्कृत नाटकों में यह लगभग अनिवार्य पात्र था।
आधुनिक नाटक में बदलाव: अब नायक राजा या देवता नहीं, बल्कि साधारण मनुष्य होता है। मोहन राकेश के आधे-अधूरे का महेंद्रनाथ एक असफल, टूटा हुआ मध्यवर्गीय पुरुष है। आधुनिक नाटक में पात्र आदर्श से अधिक यथार्थ होते हैं और उनके मन का द्वंद्व दिखाया जाता है।
अच्छे चरित्र-चित्रण के गुण: स्वाभाविकता, सजीवता, पात्रों में विविधता, और कथा के साथ चरित्र का विकास।
3. संवाद या कथोपकथन (Dialogue)
संवाद को नाटक की रीढ़ कहा जाता है। उपन्यास में लेखक वर्णन कर सकता है, पर नाटक में कथा, चरित्र, वातावरण और उद्देश्य, सब कुछ संवादों के ज़रिए ही सामने आता है।
अच्छे संवाद के गुण:
- संक्षिप्त: लंबे भाषण दर्शक को थका देते हैं।
- पात्रानुकूल: राजा, किसान और बच्चा एक जैसी भाषा नहीं बोलते।
- गतिशील: हर संवाद कथा को आगे बढ़ाए।
- स्वाभाविक और प्रभावशाली: सुनते ही दर्शक के मन पर असर करे।
भारतीय नाट्यशास्त्र में संवाद के भेद:
| भेद | किसके लिए | सरल अर्थ |
|---|---|---|
| सर्वश्राव्य (प्रकाश) | सभी के लिए | मंच पर सभी पात्र सुनते हैं। |
| अश्राव्य (स्वगत) | किसी के लिए नहीं | पात्र अपने आप से बोलता है। दर्शक सुनते हैं, पर मंच के पात्र नहीं। |
| नियतश्राव्य: जनांतिक | कुछ चुने पात्रों के लिए | हाथ की ओट करके कुछ पात्रों से कही गई बात, जिसे बाकी पात्र न सुनें। |
| नियतश्राव्य: अपवारित | केवल एक पात्र के लिए | मुँह फेरकर किसी एक पात्र से कही गई गुप्त बात। |
| आकाशभाषित | अदृश्य व्यक्ति से | पात्र आकाश की ओर देखकर ऐसे बात करता है, मानो कोई अदृश्य व्यक्ति उससे कुछ पूछ रहा हो। |
4. देशकाल और वातावरण (Setting)
देशकाल का अर्थ है वह स्थान (देश) और समय (काल), जिसमें नाटक की कथा घटित होती है। वातावरण उस युग की रीति-रिवाज, वेशभूषा, बोलचाल और सामाजिक परिस्थितियों से बनता है। ऐतिहासिक नाटक में अगर गुप्तकाल का राजा आधुनिक मुहावरे बोलने लगे, तो नाटक का प्रभाव टूट जाता है। प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक प्राचीन भारत के वातावरण को सजीव करने के लिए प्रसिद्ध हैं।
संकलनत्रय (Three Unities): पाश्चात्य नाट्यशास्त्र में देशकाल से जुड़ा एक प्रसिद्ध सिद्धांत है, जिसमें तीन एकताओं की बात की जाती है:
- कार्य की एकता: कथा एक ही मुख्य कार्य पर केंद्रित हो।
- समय की एकता: कथा सीमित समय (लगभग एक दिन) में पूरी हो।
- स्थान की एकता: कथा एक ही स्थान पर घटित हो।
संकलनत्रय को प्रायः अरस्तू के नाम से जोड़ा जाता है, पर अरस्तू ने मुख्य रूप से कार्य की एकता पर ही ज़ोर दिया था। समय की ओर उन्होंने केवल हल्का-सा संकेत किया (त्रासदी “सूर्य की एक परिक्रमा” के भीतर पूरी होने का प्रयास करती है)। स्थान की एकता बाद में पुनर्जागरण काल के इतालवी और फ़्रांसीसी आलोचकों ने जोड़ी। भारतीय नाट्य-परंपरा ने संकलनत्रय को कभी अनिवार्य नहीं माना। अभिज्ञान शाकुंतलम् की कथा में वर्षों का अंतराल है।
5. भाषा-शैली (Language and Style)
नाटक की भाषा सरल, स्वाभाविक और पात्रों के अनुकूल होनी चाहिए, क्योंकि दर्शक को मंच से एक बार सुनकर ही बात समझनी होती है। संस्कृत नाटकों में उच्च वर्ग के पुरुष पात्र संस्कृत बोलते थे, जबकि स्त्रियाँ और सामान्य पात्र प्राकृत बोलते थे। यह भाषा को पात्रानुकूल बनाने का ही एक तरीका था।
हिंदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र के अंधेर नगरी की भाषा सरल और व्यंग्य से भरी है। प्रसाद की भाषा तत्सम-प्रधान, काव्यात्मक और कहीं-कहीं कठिन है। मोहन राकेश ने बोलचाल की सहज भाषा और छोटे, सांकेतिक वाक्यों से नाटक की भाषा को नई दिशा दी। शैली नाटककार के व्यक्तित्व की पहचान होती है: कोई व्यंग्य से कहता है, कोई काव्य से और कोई सीधे यथार्थ से।
6. उद्देश्य (Purpose)
हर नाटक किसी न किसी उद्देश्य से लिखा जाता है, चाहे वह मनोरंजन हो, कोई संदेश हो या समाज की किसी समस्या पर चोट।
- भारतीय मत: नाटक का अंतिम लक्ष्य रस-निष्पत्ति है, यानी दर्शक के मन में आनंद जगाना। इसलिए संस्कृत नाटक प्रायः सुखांत होते हैं, जिनका अंत फलागम पर होता है। मंच पर वध, युद्ध, मृत्यु और शयन जैसे दृश्य दिखाना वर्जित माना गया। रस को समझने के लिए पढ़ें: रस निष्पत्ति सिद्धांत।
- पाश्चात्य मत: अरस्तू के अनुसार त्रासदी का उद्देश्य करुणा और भय के माध्यम से विरेचन करना है। इसलिए यूनानी नाटक प्रायः दुखांत होते थे।
- आधुनिक हिंदी नाटक: यहाँ उद्देश्य प्रायः सामाजिक, राजनीतिक या मनोवैज्ञानिक होता है। अच्छे नाटक में उद्देश्य उपदेश बनकर ऊपर नहीं तैरता, बल्कि कथा के भीतर घुला-मिला रहता है।
7. अभिनेयता या रंगमंचीयता (Stageability)
अभिनेयता का अर्थ है नाटक का मंच पर सफलतापूर्वक खेले जा सकने का गुण। यही तत्त्व नाटक को कहानी और उपन्यास से अलग करता है। एक नाटक पढ़ने में कितना भी सुंदर हो, अगर उसे मंच पर नहीं खेला जा सकता, तो वह अधूरा माना जाता है।
अभिनेयता के लिए ज़रूरी बातें: दृश्य कम और व्यवस्थित हों, मंच-सज्जा संभव हो, संवाद छोटे हों, नाटक की अवधि सीमित हो, और रंग-निर्देश स्पष्ट हों।
भरतमुनि के अनुसार अभिनय के चार प्रकार:
- आंगिक: शरीर के अंगों (हाथ, आँख, चेहरा) से किया गया अभिनय।
- वाचिक: वाणी और संवाद से किया गया अभिनय।
- आहार्य: वेशभूषा, मेकअप और मंच-सज्जा से किया गया अभिनय।
- सात्त्विक: आँसू, रोमांच, कंपन जैसे भीतरी भावों का प्रदर्शन।
उदाहरण: जयशंकर प्रसाद के नाटकों पर अक्सर यह आरोप लगाया गया कि उनमें दृश्य बहुत अधिक हैं, स्वगत कथन लंबे हैं और भाषा कठिन है, इसलिए उनका मंचन कठिन है। उनका ध्रुवस्वामिनी अपेक्षाकृत छोटा और अधिक मंचीय माना जाता है। मोहन राकेश के नाटक मंच की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर लिखे गए, इसलिए वे बार-बार सफलतापूर्वक खेले गए।
भारतीय परंपरा में गीत-संगीत और नृत्य नाटक के अभिन्न अंग रहे हैं, और अरस्तू ने भी “गीत” को त्रासदी का एक तत्त्व माना। इसलिए कुछ आलोचक गीत-संगीत को नाटक का आठवाँ तत्त्व भी मानते हैं। उत्तर लिखते समय इसका एक पंक्ति में उल्लेख कर दें, तो उत्तर और पूरा लगता है।
भारतीय और पाश्चात्य दृष्टि में अंतर
| आधार | भारतीय दृष्टि | पाश्चात्य दृष्टि |
|---|---|---|
| मूल तत्त्व | वस्तु, नेता, रस | कथानक, चरित्र, विचार, पदावली, गीत, दृश्य-विधान |
| सबसे महत्वपूर्ण | रस | कथानक |
| उद्देश्य | रस-निष्पत्ति, आनंद | विरेचन |
| अंत | प्रायः सुखांत (फलागम) | त्रासदी में दुखांत |
| कथा-विकास | पाँच कार्यावस्थाएँ, पाँच अर्थप्रकृतियाँ, पाँच संधियाँ | आरंभ, विकास, चरम सीमा, उतार, अंत |
| संकलनत्रय | अनिवार्य नहीं | बाद के आलोचकों ने ज़रूरी माना |
| मंच पर वर्जित | वध, युद्ध, मृत्यु जैसे दृश्य | ऐसा कठोर निषेध नहीं |
एक नाटक पर तत्त्वों को परखें: आषाढ़ का एक दिन
तत्त्वों को सबसे अच्छी तरह तब समझा जा सकता है, जब उन्हें किसी नाटक पर लागू करके देखें। मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन (1958) इसके लिए आदर्श उदाहरण है:
- कथावस्तु: गाँव के कवि कालिदास और मल्लिका का प्रेम, कालिदास का उज्जयिनी जाना, सत्ता और यश पाना, और वर्षों बाद टूटे मन से लौटना। यह मिश्र कथावस्तु है।
- पात्र: कालिदास, मल्लिका, अंबिका, विलोम, प्रियंगुमंजरी आदि। मल्लिका का त्याग और कालिदास का द्वंद्व नाटक के केंद्र में है।
- संवाद: छोटे, सांकेतिक और भावपूर्ण। कई जगह मौन भी संवाद का काम करता है।
- देशकाल: तीनों अंक मल्लिका के घर में घटित होते हैं, और आषाढ़ की वर्षा पूरे नाटक का भाव-वातावरण बनाती है।
- भाषा-शैली: सहज, काव्यात्मक, फिर भी बोलचाल के निकट।
- उद्देश्य: कलाकार की रचनात्मकता और सत्ता के आकर्षण के बीच का द्वंद्व।
- अभिनेयता: एक ही मंच-सज्जा पर पूरा नाटक खेला जा सकता है, इसलिए यह हिंदी के सबसे अधिक मंचित नाटकों में गिना जाता है।
नाटक, एकांकी और उपन्यास के तत्त्वों में अंतर
| आधार | नाटक | एकांकी | उपन्यास |
|---|---|---|---|
| अंक | प्रायः अनेक अंक | एक ही अंक | अंक नहीं, अध्याय |
| कथा | विस्तृत, उपकथाएँ भी | एक घटना पर केंद्रित | सबसे विस्तृत |
| लेखक की उपस्थिति | नहीं, केवल संवाद और रंग-निर्देश | नहीं | लेखक वर्णन कर सकता है |
| विशिष्ट तत्त्व | अभिनेयता | अभिनेयता, संक्षिप्तता | वर्णन, कथोपकथन |
विस्तार से पढ़ें: एकांकी के तत्त्व | नाटक और एकांकी में अंतर | नाटक और गीति-नाटक में अंतर | उपन्यास के तत्त्व
परीक्षा में “नाटक के तत्त्व” का उत्तर कैसे लिखें?
- भूमिका: नाटक की परिभाषा, भरतमुनि या धनंजय के कथन के साथ।
- भारतीय मत: “वस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः” लिखकर तीन तत्त्व।
- पाश्चात्य मत: अरस्तू के छह तत्त्व, और कथानक को “त्रासदी की आत्मा” कहे जाने का उल्लेख।
- मुख्य भाग: सात तत्त्व, हर एक के साथ किसी हिंदी नाटक का उदाहरण।
- निष्कर्ष: अभिनेयता को नाटक का विशिष्ट तत्त्व बताते हुए समापन।
- शब्द-सीमा: 5 अंक के लिए तत्त्वों के नाम और एक-एक पंक्ति। 10–15 अंक के लिए ऊपर का पूरा ढाँचा, संस्कृत सूत्र और उदाहरणों के साथ।
याद रखने की आसान ट्रिक
कथावस्तु, पात्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य, अभिनेयता🧠 पाँच कार्यावस्थाएँ: “आ-य-प्रा-नि-फ”: आरंभ, यत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति, फलागम
🧠 पाँच अर्थप्रकृतियाँ: “बीबी पप्र का”: बीज, बिंदु, पताका, प्रकरी, कार्य
🧠 पाँच संधियाँ: “मुप्र गवि नि”: मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहण
परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न (NET/JRF स्तर)
(अ) भरतमुनि
(ब) धनंजय
(स) विश्वनाथ
(द) आनंदवर्धन
✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
सही उत्तर: (ब) धनंजय। यह दशरूपक का सूत्र है, जिसमें वस्तु, नेता और रस को रूपकों में भेद करने वाला तत्त्व माना गया है।
(अ) चरित्र
(ब) विचार
(स) कथानक
(द) दृश्य-विधान
✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
सही उत्तर: (स) कथानक। अरस्तू ने कथानक को त्रासदी की आत्मा कहा है।
(अ) आरंभ, प्राप्त्याशा, यत्न, नियताप्ति, फलागम
(ब) आरंभ, यत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति, फलागम
(स) यत्न, आरंभ, नियताप्ति, प्राप्त्याशा, फलागम
(द) आरंभ, यत्न, नियताप्ति, प्राप्त्याशा, फलागम
✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
सही उत्तर: (ब)। ट्रिक याद रखें: “आ-य-प्रा-नि-फ”।
सूची-I (संधि): (A) मुख (B) प्रतिमुख (C) गर्भ (D) निर्वहण
सूची-II (अर्थप्रकृति): (i) पताका (ii) बीज (iii) कार्य (iv) बिंदु
(अ) A-ii, B-iv, C-i, D-iii
(ब) A-iv, B-ii, C-iii, D-i
(स) A-ii, B-i, C-iv, D-iii
(द) A-i, B-iv, C-ii, D-iii
✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
सही उत्तर: (अ) A-ii, B-iv, C-i, D-iii। मुख संधि में बीज, प्रतिमुख में बिंदु, गर्भ में पताका और निर्वहण में कार्य जुड़ता है।
(अ) स्वगत
(ब) अपवारित
(स) जनांतिक
(द) आकाशभाषित
✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
सही उत्तर: (स) जनांतिक। अपवारित में मुँह फेरकर केवल एक पात्र से गुप्त बात कही जाती है।
(अ) स्थान की एकता
(ब) समय की एकता
(स) कार्य की एकता
(द) तीनों पर बराबर
✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
सही उत्तर: (स) कार्य की एकता। स्थान की एकता बाद के पुनर्जागरणकालीन आलोचकों ने जोड़ी।
(अ) आंगिक
(ब) वाचिक
(स) आहार्य
(द) सात्त्विक
✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
सही उत्तर: (स) आहार्य।
(अ) उज्जयिनी का राजमहल
(ब) मल्लिका का घर
(स) कश्मीर का दरबार
(द) गाँव का मंदिर
✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
सही उत्तर: (ब) मल्लिका का घर। एक ही स्थान होने से इस नाटक की अभिनेयता बढ़ जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
❓ नाटक के कितने तत्त्व होते हैं?
आधुनिक हिंदी आलोचना में नाटक के सात तत्त्व माने जाते हैं: कथावस्तु, पात्र और चरित्र-चित्रण, संवाद, देशकाल-वातावरण, भाषा-शैली, उद्देश्य और अभिनेयता। भारतीय आचार्य धनंजय ने तीन (वस्तु, नेता, रस) और अरस्तू ने त्रासदी के छह तत्त्व माने हैं।
❓ नाटक का सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व कौन-सा है?
भारतीय दृष्टि से रस सबसे महत्वपूर्ण है, जबकि अरस्तू ने कथानक को त्रासदी की आत्मा कहा है। आधुनिक दृष्टि से अभिनेयता नाटक का सबसे विशिष्ट तत्त्व है, क्योंकि यही उसे कहानी और उपन्यास से अलग करती है।
❓ भारतीय नाट्यशास्त्र में नाटक के तत्त्व कौन-से हैं?
धनंजय के दशरूपक के अनुसार वस्तु (कथा), नेता (नायक) और रस नाटक के तीन मूल तत्त्व हैं। इनके अतिरिक्त अभिनय और वृत्ति को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
❓ अरस्तू के अनुसार त्रासदी के छह तत्त्व कौन-से हैं?
कथानक, चरित्र, विचार, पदावली, गीत और दृश्य-विधान। इनमें कथानक को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
❓ संवाद को नाटक की रीढ़ क्यों कहा जाता है?
क्योंकि नाटक में लेखक स्वयं वर्णन नहीं कर सकता। कथा का विकास, चरित्र की पहचान, वातावरण और उद्देश्य, सब कुछ पात्रों के संवादों से ही सामने आता है।
❓ अभिनेयता से क्या तात्पर्य है?
अभिनेयता का अर्थ है नाटक का मंच पर सफलतापूर्वक खेले जा सकने का गुण। इसके लिए सीमित दृश्य, छोटे संवाद, संभव मंच-सज्जा और स्पष्ट रंग-निर्देश ज़रूरी हैं।
❓ नाटक और एकांकी के तत्त्वों में क्या अंतर है?
दोनों के तत्त्व लगभग समान हैं, पर एकांकी में एक ही अंक होता है और कथा एक घटना पर केंद्रित रहती है। नाटक में अनेक अंक, विस्तृत कथा और उपकथाएँ हो सकती हैं।
त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)
- नाटक दृश्य काव्य है; संस्कृत में इसे रूपक का प्रमुख भेद माना गया।
- भरतमुनि: नाट्य “लोकवृत्तानुकरण” है; धनंजय: “अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्”।
- भारतीय मत में तीन तत्त्व: वस्तु, नेता, रस (“वस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः”)।
- अरस्तू के छह तत्त्व: कथानक, चरित्र, विचार, पदावली, गीत, दृश्य-विधान; कथानक त्रासदी की आत्मा।
- आधुनिक सात तत्त्व: कथावस्तु, पात्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य, अभिनेयता।
- कथावस्तु: प्रख्यात, उत्पाद्य, मिश्र; आधिकारिक और प्रासंगिक (पताका, प्रकरी)।
- पाँच कार्यावस्थाएँ, पाँच अर्थप्रकृतियाँ और पाँच संधियाँ।
- संवाद के भेद: सर्वश्राव्य, स्वगत, जनांतिक, अपवारित, आकाशभाषित।
- संकलनत्रय: कार्य, समय, स्थान की एकता; अरस्तू का ज़ोर केवल कार्य की एकता पर।
- अभिनय के चार प्रकार: आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्त्विक।
- भारतीय नाटक का लक्ष्य रस-निष्पत्ति; पाश्चात्य त्रासदी का लक्ष्य विरेचन।
- अभिनेयता नाटक का सबसे विशिष्ट तत्त्व है।
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