हिंदी साहित्य के इतिहास में नाटक (और एकांकी) गद्य साहित्य की एक बेहद जीवंत, दृश्य और श्रव्य विधा है। इसे ‘दृश्य काव्य’ भी कहा जाता है, क्योंकि उपन्यास और कहानी की तरह इसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि रंगमंच पर अभिनेताओं द्वारा अभिनय के माध्यम से दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाता है। नाटक में साहित्य, संगीत, अभिनय और चित्रकला का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

हिंदी नाटक का विकास और उसका क्रम मुख्य रूप से इन चरणों में विभाजित है:

  1. भारतेंदु युग (नाटक का आरंभ):

    • आधुनिक हिंदी नाटक की शुरुआत भारतेंदु हरिश्चंद्र से मानी जाती है। उन्होंने स्वयं कई मौलिक और अनूदित नाटक लिखे (जैसे ‘भारत दुर्दशा’, ‘अंधेर नगरी’, ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’)।

    • इस काल के नाटकों में सामाजिक चेतना, देशभक्ति और सुधारवादी दृष्टिकोण की प्रधानता थी।

  2. प्रसाद युग (उत्कृष्टता का काल):

    • जयशंकर प्रसाद ने हिंदी नाटक को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव प्रदान किया। उनके नाटकों में इतिहास के माध्यम से राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति का दर्शन होता है।

    • ‘स्कंदगुप्त’, ‘चंद्रगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’, और ‘कामना’ जैसी कृतियाँ इसी काल की देन हैं, जो साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत उच्च कोटि की हैं।

  3. प्रसाद्योत्तर युग (यथार्थवादी और मनोवैज्ञानिक नाटक):

    • इस काल में जयशंकर प्रसाद की ऐतिहासिक धारा से हटकर सामाजिक समस्याओं, मनोवैज्ञानिक सत्यों और यथार्थवाद पर आधारित नाटक लिखे गए।

    • लक्ष्मीनारायण मिश्र, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, और डॉ. रामकुमार वर्मा (एकांकी के क्षेत्र में) ने इस विधा को और समृद्ध किया।

  4. समकालीन रंगमंच और नाटक:

    • स्वतंत्रता के बाद मोहन राकेश (‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’, ‘आधे-अधुरे’), और सुरेन्द्र वर्मा जैसे नाटककारों ने आधुनिक जीवन के तनाव, अकेलेपन, मानवीय रिश्तों के संकट और राजनीतिक विसंगतियों को रंगमंच पर उतारा।

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