काव्यशास्त्र

श्लेष अलंकार के 10 प्रसिद्ध उदाहरण, अर्थ एवं स्पष्टीकरण (Shlesha Alankar)

अंतिम संशोधित (Last Updated): August 27, 2026

श्लेष अलंकार के 10 प्रसिद्ध उदाहरण, अर्थ एवं स्पष्टीकरण (Shlesha Alankar in Hindi)

हिंदी काव्यशास्त्र और व्याकरण में ‘श्लेष’ का शाब्दिक अर्थ ‘चिपकना’ होता है। जब किसी काव्य में कोई शब्द एक ही बार प्रयोग हो, लेकिन उसके प्रसंग या संदर्भ के अनुसार एक से अधिक (अनेक) अर्थ चिपके हुए हों (निकलते हों), तब वहाँ ‘श्लेष अलंकार’ होता है। इसके मुख्य रूप से दो भेद होते हैं—अभंग श्लेष (जहाँ शब्द के टुकड़े किए बिना अर्थ निकले) और सभंग श्लेष (जहाँ शब्द को तोड़ने पर अर्थ स्पष्ट हो)। यूजीसी नेट (UGC NET), जेआरएफ (JRF), पीजीटी (PGT), और टीजीटी (TGT) जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में श्लेष अलंकार के इन प्रसिद्ध उदाहरणों से जुड़े प्रश्न बहुतायत में पूछे जाते हैं। इस लेख में हमने परीक्षाओं की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण 10 उदाहरणों को उनके संपूर्ण अर्थ और स्पष्टीकरण के साथ संकलित किया है।

📌 श्लेष अलंकार के 10 महत्वपूर्ण उदाहरण(shlesh alankar ke udaharan)

1. ‘रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून। पानी गये न उबरै, मोती मानुष चून।’

  • काव्य पंक्ति:

    रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून।

    पानी गये न उबरै, मोती मानुष चून।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: रहीम दास जी कहते हैं कि मनुष्य को हमेशा अपना ‘पानी’ (इज्जत, विनम्रता और चमक) बनाए रखना चाहिए, क्योंकि बिना पानी के सब सूना है। पानी के बिना मोती (चमक), मनुष्य (सम्मान) और चून/आटा (जल) का कोई अस्तित्व नहीं रहता।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘पानी’ शब्द एक ही बार आया है, लेकिन इसके तीन अलग-अलग अर्थ निकलते हैं—मोती के संदर्भ में ‘चमक’, मनुष्य के संदर्भ में ‘इज्जत/सम्मान’, और आटे/चून के संदर्भ में ‘जल’। यह अभंग श्लेष का अत्यंत प्रसिद्ध उदाहरण है।

2. ‘सुबरन को खोजत फिरै, कवि व्यभिचारी चोर।’

  • काव्य पंक्ति:

    सुबरन को खोजत फिरै, कवि व्यभिचारी चोर।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: सुंदर वर्ण या स्वर्ण को पाने के लिए कवि, व्यभिचारी (विषय-विकारी व्यक्ति) और चोर तीनों अलग-अलग खोज करते हैं।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘सुबरन’ शब्द में श्लेष है—कवि के संदर्भ में इसका अर्थ ‘अच्छे शब्द (सुवर्ण)’ है, व्यभिचारी के संदर्भ में ‘सुंदर रूप-रंग (गोरा रंग)’ है, और चोर के संदर्भ में ‘स्वर्ण या सोना’ है।

3. ‘को घटि ये वृषभानुजा वे हलधर के बीर।’

  • काव्य पंक्ति:

    चिरजीवैं जोरि जुरै, क्यों न सनेह गम्भीर।

    को घटि ये वृषभानुजा वे हलधर के बीर।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: राधा और कृष्ण की यह जोड़ी चिरंजीवी हो, इनके बीच इतना गंभीर स्नेह क्यों न हो! इनमें से एक वृषभानु की पुत्री हैं और दूसरे हलधर (बलराम) के भाई हैं।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘वृषभानुजा’ और ‘हलधर’ शब्दों में सभंग श्लेष है। ‘वृषभानुजा’ के दो अर्थ हैं—वृषभानु की पुत्री (राधा) और वृष (वृषभ राशि या बैल) + भानुजा (सूर्य की पुत्री यानी यमुना)। इसी प्रकार ‘हलधर’ का अर्थ बलराम और बैल (वृष) दोनों होता है।

4. ‘मधुबन की छाती को देखो, सूखी कितनी इसकी कलियाँ।’

  • काव्य पंक्ति:

    मधुबन की छाती को देखो,

    सूखी कितनी इसकी कलियाँ।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: इस संसार रूपी मधुबन की दशा को देखिए कि इसकी कितनी ही कलियाँ बिना खिले ही सूख चुकी हैं।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘कलियाँ’ शब्द में श्लेष है—पहला अर्थ पौधों के फूल खिलने से पहले की अवस्था (कली) है, और दूसरा अर्थ यौवन से पहले की अवस्था यानी कम उम्र की अवस्था (बालिकाएँ/युवतियाँ) है।

5. ‘रहीमन जो गति दीप की कुल कपूत गति सोय। बारे उजियारे करे बधे अंधेरा होय।’

  • काव्य पंक्ति:

    रहिमन जो गति दीप की कुल कपूत गति सोय।

    बारे उजियारे करे बधे अंधेरा होय।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: दीपक और कुल के कपूत (कुपुत्र) की गति एक जैसी होती है। दोनों ही शुरुआत में उजाला (प्रसन्नता/यश) करते हैं, लेकिन बड़े होने पर (या बुझने पर) अंधेरा (अयश/कालिमा) फैला देते हैं।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘बारे’ शब्द के दो अर्थ हैं—दीपक के संदर्भ में ‘जलाने पर’ और बालक के संदर्भ में ‘बचपन में’। इसी तरह ‘बधे’ शब्द का अर्थ दीपक के संदर्भ में ‘बढ़ने पर (लौ बड़ी होने पर)’ और पुत्र के संदर्भ में ‘बड़ा होने पर’ होता है।

6. ‘नवजीवन दो घनश्याम हमें।’

  • काव्य पंक्ति:

    तपती धरती की प्यास बुझाने,

    नवजीवन दो घनश्याम हमें।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: हे घनश्याम! हमें नया जीवन और जल प्रदान कीजिए।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘घनश्याम’ शब्द में श्लेष है—इसके दो अर्थ हैं, पहला ‘काला बादल’ (जो वर्षा करके जीवन देता है) और दूसरा ‘भगवान श्रीकृष्ण’। इसी प्रकार ‘जीवन’ का अर्थ जल और प्राण दोनों से है।

7. ‘चरण धरत चिंता करत, चितवत चारहु ओर।’

  • काव्य पंक्ति:

    चरण धरत चिंता करत, चितवत चारहु ओर।

    सुबरन को खोजत फिरै, कवि व्यभिचारी चोर।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: कदम रखते ही जो चिंता करने लगते हैं और चारों ओर ताकते हैं, वे कवि, व्यभिचारी और चोर हैं जो सुबरन को खोजते हैं।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘चरण धरत’ श्लेष्ट है—कवि के संदर्भ में इसका अर्थ ‘चरण/शब्द रखना (पद्य रचना करना)’ है, और चोर/व्यभिचारी के संदर्भ में ‘पैर रखना’ है।

8. ‘जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं, यह जानत सब कोय। मँड़ए तर की गाँठ में, गाँठ गाँठ रस होय।’

  • काव्य पंक्ति:

    जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं, यह जानत सब कोय।

    मँड़ए तर की गाँठ में, गाँठ गाँठ रस होय।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: सामान्यतः जहाँ गांठ (द्वेष या ईर्ष्या) होती है वहाँ प्रेम का रस नहीं होता, परंतु गन्ने (मढ़येतर) की हर गांठ में रस भरा होता है।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘गाँठ’ और ‘रस’ शब्दों में श्लेष है—’गाँठ’ का एक अर्थ मन का द्वेष (मनमुटाव) है और दूसरा अर्थ गन्ने की पोर/गाँठ है। इसी तरह ‘रस’ का अर्थ प्रेम-आनंद और गन्ने का मीठा रस है।

9. ‘बलिहारी नृप कूप की गुण बिन हूँ बूँद न देइ।’

  • काव्य पंक्ति:

    बलिहारी नृप कूप की,

    गुण बिन हूँ बूँद न देइ।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: राजा और कुएँ दोनों पर बलिहारी जाइए, क्योंकि बिना गुण (विशेषता/रस्सी) के वे एक बूँद भी नहीं देते।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘गुण’ शब्द में श्लेष है—राजा के संदर्भ में ‘गुण’ का अर्थ अच्छे गुण, योग्यता या शिष्टाचार है, और कुएँ के संदर्भ में ‘गुण’ का अर्थ खींचने वाली ‘रस्सी’ (जिसमें गुण या बल होता है) है।

10. ‘अजरामरता अयोध्या नगरी किसे प्रिय नहीं लगती।’

  • काव्य पंक्ति:

    अजरामरता अयोध्या नगरी किसे प्रिय नहीं लगती।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: अजर-अमर करने वाली या राजा अज व राम से जुड़ी अयोध्या नगरी किसे अच्छी नहीं लगती?

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘अजरामरता’ शब्द में श्लेष है—पहला अर्थ ‘अजर और अमर होने का भाव (मुक्ति)’ है, और दूसरा अर्थ ‘अज (राजा अज) और राम (दशरथ पुत्र) से संबंधित अमरता’ है।

📌 निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जाए तो, ‘श्लेष अलंकार’ भाषा की एक ऐसी जादुई कला है जहाँ एक ही शब्द के गर्भ में कई अर्थ छिपे होते हैं। यह काव्य की संक्षिप्तता और उसके वैचारिक सौंदर्य को बहुत अधिक समृद्ध कर देता है। जब पाठक श्लेष्ट शब्दों के अलग-अलग संदर्भों को समझता है, तो काव्य का असली आनंद प्राप्त होता है। उम्मीद है कि इन 10 प्रमुख उदाहरणों और उनके स्पष्टीकरण से आपको श्लेष अलंकार (अभंग और सभंग) को समझने में पूरी मदद मिली होगी।

उपमा अलंकार को विस्तार से पढ़ें .

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