प्रगतिवाद (1938–1943 ई.) – इतिहास, विशेषताएँ एवं प्रमुख कवि (Pragativad in Hindi)
📝 प्रगतिवाद का परिचय और पृष्ठभूमि
हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद के समाप्त होने के बाद जिस वैचारिक और काव्यात्मक आंदोलन की शुरुआत हुई, उसे प्रगतिवाद (Pragativad) कहा जाता है। इस काल की समयावधि मुख्य रूप से 1938 से 1943 ई. तक मानी जाती है। सरल शब्दों में कहें तो, प्रगतिवाद और कुछ नहीं बल्कि मार्क्सवादी जीवन दर्शन (Marxist Philosophy) की ही काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।
इसकी नींव के पीछे एक लंबा इतिहास रहा है:
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अंतरराष्ट्रीय शुरुआत: साल 1935 ई. में ई.एम. फोस्टर के प्रयासों से पेरिस में ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ (Progressive Writers Association) की स्थापना हुई और यहीं इसकी पहली अंतरराष्ट्रीय बैठक हुई।
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भारत में पदार्पण: भारत में साल 1936 ई. में सज्जाद जहीर और मुल्कराज आनंद के प्रयासों से ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना की गई।
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ऐतिहासिक अधिवेशन: प्रगतिशील लेखक संघ का सबसे पहला अधिवेशन मुंशी प्रेमचंद की अध्यक्षता में लखनऊ में हुआ था। इस दौरान प्रेमचंद ने बहुत बड़ी बात कही थी कि “साहित्य का मुख्य उद्देश्य दबे-कुचले और शोषित वर्ग की मुक्ति होना चाहिए।”
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नामकरण और शुरुआत: प्रगतिवाद शब्द का सबसे पहले प्रयोग साल 1942 ई. में गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ ने अपने लेख ‘प्रगतिवाद; एक दृष्टि’ में किया था, जो ‘आगामी कल’ पत्रिका में छपा था। इसके अलावा, सुमित्रानंदन पंत की रचना ‘युगांत’ (1936 ई.) से ही छायावाद का अंत और प्रगतिवाद की आहट मानी जाती है, जिन्होंने प्रगतिवाद को ‘उपयोगितावाद’ नाम भी दिया था।
🔍 प्रगतिवाद की संपूर्ण विशेषताएँ /प्रवृत्तियाँ
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सामाजिक व वैज्ञानिक यथार्थवाद पर बल
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प्रगतिवादी साहित्य में कोरी कल्पना के स्थान पर समाज की वास्तविक सच्चाइयों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रमुखता से आधार बनाया गया है।
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कल्पना के स्थान पर यथार्थ पर बल
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यह धारा काल्पनिक दुनिया या सुंदर सपनों से हटकर सीधे तौर पर जीवन की कठोर और खुरदरी सच्चाइयों का चित्रण करती है।
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शोषण आधारित समाज को बदलकर वर्गहीन, शोषणविहीन समाज की स्थापना पर बल
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इसका मुख्य उद्देश्य पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त करके एक ऐसे समतामूलक समाज का निर्माण करना है जहाँ कोई किसी का शोषण न करे।
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सर्वहारा के अधिनायकत्व पर बल
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साहित्य में राजा-महाराजाओं या उच्च वर्ग के बजाय समाज के शोषित, पीड़ित और मेहनतकश मजदूर-किसान वर्ग (सर्वहारा) को मुख्य केंद्र माना गया है।
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जाति पाँति वर्ग भेद की निंदा
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समाज में फैली हुई ऊँच-नीच, जातिगत भेदभाव और असमानता की दीवारों का प्रगतिवादी कवियों ने पुरजोर विरोध किया है।
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धार्मिक, सामाजिक पाखंडों व आडंबरों का विरोध
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समाज में धर्म के नाम पर फैले ढोंग, अंधविश्वास और खोखली परंपराओं पर इस काव्य में तीखा प्रहार किया गया है।
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प्रगतिशील जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति पर बल
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यह धारा मनुष्य के भीतर नई सोच, वैज्ञानिक चेतना और प्रगतिशील विचारों को जगाने वाले जीवन मूल्यों को बढ़ावा देती है।
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शोषकों के प्रति व्यंग्य और आक्रोष का भाव
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समाज के ठेकेदारों, पूंजीपतियों और गरीबों का खून चूसने वाले वर्ग के प्रति कविताओं में भारी गुस्सा और तीखा व्यंग्य झलकता है।
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स्त्री मुक्ति का समर्थन
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पुरुष-प्रधान समाज में सदियों से दबी और उपेक्षित रही नारी जाति के अधिकारों, स्वतंत्रता और उनके सम्मान का जोरदार समर्थन किया गया है।
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धर्म और ईश्वर में अविश्वास
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प्रगतिवाद मुख्य रूप से मार्क्सवादी दर्शन पर आधारित है, इसलिए यह ईश्वर या भाग्य के भरोसे बैठने के बजाय मानवीय श्रम और कर्म को सर्वोपरि मानता है।
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प्रवृत्ति मार्ग पर बल
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जीवन से भागने (निवृत्ति) के बजाय जीवन की वास्तविक चुनौतियों का डटकर सामना करने और कर्मठ बनने (प्रवृत्ति) की प्रेरणा दी गई है।
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वस्तुनिष्ठ सत्ता पर बल
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इस धारा में भावनाओं की अतिरेकता के बजाय बाहरी जगत की वास्तविक परिस्थितियों और वस्तुनिष्ठ सत्यों को स्वीकार किया गया है।
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समतामूलक समाज की स्थापना पर बल
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समाज के हर व्यक्ति को उसके श्रम का उचित हक मिले और धन-दौलत का ऐसा बँटवारा हो जहाँ सब समान हों, इस पर जोर दिया गया है।
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कर्मवाद की प्रेरणा
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भाग्यवादी सोच और ईश्वर की मर्जी कहकर चुप बैठने की नीति का विरोध करते हुए यह साहित्य अपने पसीने और मेहनत पर भरोसा करने की सीख देता है।
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भाग्यवाद का विरोध
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“सब किस्मत का खेल है” इस धारणा को खारिज करते हुए प्रगतिवाद ने यह साबित किया कि मनुष्य अपनी तकदीर खुद अपने श्रम से लिखता है।
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भाव पक्ष पर बल
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यद्यपि शिल्प और कला का भी ध्यान रखा गया, फिर भी जनसाधारण के दुखों, संघर्षों और संवेदनाओं को उभारने वाले भाव पक्ष को सबसे ऊपर रखा गया है।
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✍️ प्रमुख प्रगतिवादी कवि एवं उनकी रचनाएँ (विशेष तथ्यों सहित)
1. नागार्जुन (1911–1998 ई.)
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जीवन परिचय: इनका जन्म 30 जून 1911 को सतलखा, दरभंगा (बिहार) में हुआ था। इनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। वे मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से लिखते थे और बौद्ध धर्म अपनाने के बाद ‘नागार्जुन’ कहलाए। ग्रामीण परिवेश से जुड़े होने के कारण लोग उन्हें प्यार से ‘बाबा’ या ‘ढक्कन’ भी कहते थे।
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उपाधियाँ व विशेषता: इन्हें प्रगतिवाद का श्लाका पुरुष, ‘आधुनिक युग का कबीर’, और जनता का चारण कवि कहा जाता है। आलोचक बच्चन सिंह ने इनकी कविताओं को ‘नुक्कड़ कविता’ कहा है, वहीं नामवर सिंह ने इन्हें कबीर के बाद सबसे बड़ा व्यंग्यकार माना है।
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प्रमुख काव्य संग्रह: युगधारा (1953), सतरंगे पांखों वाली (1959), प्यासी पथराई आँखें (1962), भस्मांकुर (1974 – खंडकाव्य), तालाब की मछलियाँ (1974), तुमने कहा था (1980), हजार-हजार बाँहों वाली (1981), पुरानी जूतियों का कोरस (1983), और अपने खेत में (1997)।
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चर्चित कविताएँ: बादल को घिरते देखा है, अकाल और उसके बाद, सिंदूर तिलकित भाल, दंतुरित मुस्कान, और हरिजन गाथा।
2. केदारनाथ अग्रवाल (1911–2000 ई.)
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जीवन परिचय: इनका जन्म 1 अप्रैल 1911 को बाँदा (उत्तर प्रदेश) के कमासिन ग्राम में हुआ था। ये प्रकृति के चितेरे कवि माने जाते हैं।
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उपाधि: इन्हें ‘केन का कवि’ कहा जाता है क्योंकि इनकी कविताओं में केन नदी और वहाँ के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। शुरुआती दौर में ये ‘बालेंदु’ उपनाम से लिखते थे।
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प्रमुख रचनाएँ: युग की गंगा (1947), नींद के बादल (1947), फूल नहीं रंग बोलते हैं (1965), पंख और पतवार (1979), हे मेरी तुम (1981), और अपूर्वा (1984)।
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चर्चित कविताएँ व पंक्तियाँ: ‘बसंती हवा’, ‘चंद्रगहना से लौटती बेर’, और इनकी बेहद प्रसिद्ध पंक्ति— “बाप बेटा बेचता है भूख से बेहाल होकर”।
3. त्रिलोचन (1917–2007 ई.)
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जीवन परिचय: इनका वास्तविक नाम वासुदेव सिंह था। त्रिलोचन जी हिंदी में सॉनेट (Sonnet) छंद को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। इन्हें शाब्दिक अनुशासन का कवि कहा जाता है।
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प्रमुख रचनाएँ: धरती (1945), दिगंत (1957), गुलाब और बुलबुल (1956), ताप के ताए हुए दिन (1980), उस जनपद का कवि हूँ (1981), और अमोला (1990)।
4. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ (1915–2002 ई.)
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जीवन परिचय: इनका जन्म उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इनकी कविताओं में ओज, विद्रोह और प्रेम का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। ये लंबे समय तक विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति भी रहे।
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प्रमुख रचनाएँ: हिलोल, जीवन के गान, प्रलय सृजन, एशिया जाग उठा, और मिट्टी की बारात। इनकी कृति ‘मिट्टी की बारात’ के लिए इन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।
5. रामविलास शर्मा (1912–2000 ई.)
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परिचय: ये प्रगतिवाद के प्रमुख आलोचक और निबंधकार के रूप में जाने जाते हैं। मार्क्सवादी दृष्टिकोण से हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने और मूल्यांकन करने में इनका नाम सबसे ऊपर आता है।
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प्रमुख रचनाएँ: रूपतरंग (1956), ऋतु संहार, और सदियों के सोये जाग उठे (1988)।
6. रांगेय राघव (1923–1962 ई.)
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परिचय: इनका मूल नाम तिरुमला नंबूरी वीरराघवाचार्य था। इन्होंने कविता के साथ-साथ उपन्यास और आलोचना के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व योगदान दिया।
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प्रमुख रचनाएँ: अजय खण्डहर (1944), मेधावी (1947), पाञ्चाली (1955), पिघलते पत्थर, और राह के दीपक।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहा जाए तो, प्रगतिवाद (Pragativad) हिंदी साहित्य का वह स्वर्णिम काल है जिसने साहित्य को जनसाधारण, मजदूरों, किसानों और शोषितों के हक की लड़ाई से जोड़ा। यह धारा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को बदलने का एक सशक्त माध्यम बनी, जो आज भी प्रतियोगी परीक्षाओं (UGC NET, TGT, PGT, RPSC) और हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए बेहद प्रेरणादायक और महत्वपूर्ण है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
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