हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद: संपूर्ण इतिहास, प्रवृत्तियाँ और प्रमुख कवि (Prayogvad in Hindi Sahitya)
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के इतिहास में जब प्रगतिवाद की अतिशय ‘सपाटबयानी’ और सीधे जीवन समस्याओं के चित्रण की एकरसता अपनी सीमा पर थी, तब कविता को लीक से हटकर नए बोध, नए प्रतीकों और आधुनिक मनुष्य के गहरे अकेलेपन से जोड़ने वाला जो ऐतिहासिक आंदोलन शुरू हुआ—उसी का नाम ‘प्रयोगवाद’ है।
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. नगेंद्र के अनुसार, “हिंदी साहित्य में ‘प्रयोगवाद’ नाम उन कविताओं के लिए रूढ़ हो गया है, जो कुछ नए भाव बोधों, संवेदनाओं तथा उन्हें प्रेक्षित करने वाले शिल्पगत चमत्कारों को लेकर शुरू-शुरू में ‘तार-सप्तक’ के माध्यम से सन् 1943 ई. में प्रकाशन जगत में आई और जो प्रगतिशील कविताओं के साथ विकसित होती गयीं तथा जिनका पर्यंवासन (समापन) नयी कविता में हो गया।”
1. प्रयोगवाद का नामकरण, उद्भव और पृष्ठभूमि
1943 ई. में प्रगतिवाद की एकरसता के विपरीत नए प्रयोगों का आंदोलन चला और प्रयोगवाद का सूत्रपात हुआ। इसका समय सामान्यतः 1943 से 1951 ई. तक माना जाता है।
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नामकरण: ‘तार-सप्तक’ के कवियों ने इस काव्यधारा की कविताओं के लिए ‘प्रयोगवाद’ शब्द का प्रयोग नहीं करके ‘प्रयोगशील’ अथवा ‘प्रयोग’ शब्दों का ही प्रयोग किया था। इस काव्यधारा की कविताओं को ‘प्रयोगवाद’ नाम सर्वप्रथम आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने अपने एक निबंध ‘प्रयोगवादी रचनाएँ’ में प्रदान किया था। (हालाँकि बाद में नंददुलारे वाजपेयी ने इसे ‘बैठे ठाले लोगों का धंधा’ कहकर भी पुकारा था।)
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विद्वानों के मत:
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अज्ञेय इस काव्यधारा के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने ‘दूसरा सप्तक’ (1951 ई.) की भूमिका में स्पष्ट किया था कि “प्रयोग अपने आप में इष्ट नहीं, वह तो साधन है, सत्य को जानने का दोहरा साधन है।”
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लक्ष्मीकांत वर्मा के अनुसार, “प्रयोगवाद ज्ञान से अज्ञान की ओर बढ़ने की बौद्धिक जागरूकता है।”
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डॉ. बच्चन सिंह के अनुसार, “प्रयोगवाद का मूलाधार ‘वैयक्तिकृता’ या ‘व्यक्तिवाद’ (प्राइवेसी) है।”
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डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने ‘प्रयोगवाद एवं नयी कविता’ दोनों काव्य आंदोलनों को संयुक्त रूप से “अतिथार्थवादी काव्य परम्परा” नाम दिया है।
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अन्य प्रभाव: हिंदी का प्रयोगवादी आंदोलन मूलतः पश्चिम (अंग्रेजी) के ‘न्यू सिगनेचर’ आंदोलन (जो 1932 ई. में ब्रिटेन में प्रकाशित हुआ था) से प्रभावित नजर आता है। साथ ही, अस्तित्ववाद ने प्रयोगवाद को सर्वाधिक प्रभावित किया है।
2. प्रयोगवाद की प्रमुख विशेषताएँ और प्रवृत्तियाँ
प्रयोगवादी काव्यधारा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
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घोर वैयक्तिकृता (व्यक्ति-स्वातंत्र्य): प्रयोगवादी कविता में व्यक्ति और उसकी निजी अनुभूतियों को सर्वोपरि स्थान मिला है।
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अतिशय बौद्धिकता: प्रयोगवादी कवि यथार्थवादी होते हैं; वे भावुकता के स्थान पर ठोस बौद्धिकता को स्वीकार करते हैं।
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कुंठा और निराशा का चित्रण: मध्यमवर्गीय व्यक्ति के जीवन की पीड़ा, कुंठा, निराशा और अकेलेपन का यथार्थ चित्रण इसमें मिलता है।
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प्रयोगधर्मिता: भाषा, शिल्प, छंद, अलंकार, प्रतीक, बिंब, उपमान आदि की दृष्टि से इन कवियों ने नित्य नए-नए प्रयोग किए हैं।
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नवीन प्रतीक एवं बिंब विधान: पारंपरिक और घिसे-पिटे उपमानों को नकार कर नए और मौलिक प्रतीकों का प्रयोग किया गया।
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क्षणवाद और साहस व जोखिम: जीवन के छोटे-छोटे क्षणों के सत्यों को जीना और काव्य में उतारना इसका प्रमुख अंग रहा है।
3. चारों ‘तार सप्तक’ और उनके प्रमुख कवि
प्रयोगवाद की दिशा तय करने में चार सप्तकों का ऐतिहासिक योगदान रहा है:
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तार सप्तक (1943): सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, प्रभाकर माचवे, भारत भूषण अग्रवाल, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा, गजानन माधव मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन।
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दूसरा सप्तक (1951): शकुंतला माथुर, भवानी प्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, शमशेर बहादुर सिंह, हरिनारायण व्यास, रघुवीर सहाय।
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तीसरा सप्तक (1959): सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मदन वात्स्यायन, विजयदेव नारायण साही, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, कीर्ति चौधरी।
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चतुर्थ सप्तक (1979): राजेंद्र किशोर, श्री राम वर्मा, सुमन राजे, नंदकिशोर आचार्य, स्वदेश भारती, राजकुमार अंबुज, अवधेश कुमार।
4. प्रमुख प्रयोगवादी कवि और उनकी रचनाएँ
(1) सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
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उपाधियाँ व परिचय: प्रयोगवाद और नई कविता के श्लाका पुरुष, प्रथम मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार, शब्दों के अनुसंधानकर्ता, बौद्धिकता के कवि, निजता की सुरक्षा के कवि, कठिन गद्य के प्रेत और व्यष्टि चेतना के कवि।
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प्रमुख काव्य-संग्रह: भग्नदूत (1933), चिंता (1942), इत्यलम् (1946 – चार खंडों में विभक्त: बन्दी का स्वप्न, हिय हारिल, वचना के दुर्ग, मिट्टी की इहा), हरी घास पर क्षण भर (1949), बावारा अहेरी (1954), इंद्रधनुष रौंदे हुए (1957), अरी ओ करुणा प्रभाময়ी (1959), आँगन के पार द्वार (1961 – साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त), कितनी नावों में कितनी बार (1967), सागर मुद्रा (1970), पहले मैं सन्नाटा बुनता था (1974), महावृक्ष के नीचे (1977), नदी की बाँक पर छाया (1981), ऐसा भी कोई घर देखा है (1986)।
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प्रसिद्ध कविताएँ: असाध्य वीणा, कतकी पूनो, यह दीप अकेला, जितना तुम्हारा सच, नदी की द्वीप, कलगी बाजरे की, सो रहा है सौंप, शब्द और सत्य।
(2) गिरिजाकुमार माथुर
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परिचय: रोमानी मिज के कवि। बच्चन सिंह ने इन्हें ‘रंगों के कवि’ कहा है।
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काव्य-संग्रह: मंजीर (1941), नाश और निर्माण (1946), धूप के धान (1955), शिला पंख चमकीले (1961), भीतरी नदी की यात्रा (1975), मैं वक्त के हूँ सामने (साहित्य अकादमी पु. – 1991), पृथ्वीकल्प, कल्पांतर, अभी कुछ।
(3) गजानन माधव मुक्तिबोध
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परिचय: फेंटेसी के कवि, भयानक खबरों के कवि, आत्मकेंद्रित कवि, ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान के कवि। बच्चन सिंह ने इन्हें ‘प्रगतिवाद-प्रयोगवाद का रासायनिक समिश्रण’ कहा है।
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काव्य-संग्रह: चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964 – जिसमें ब्रह्मराक्षस (मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी का प्रतीक) और अंधेरे में जैसी प्रसिद्ध लंबी कविताएँ संकलित हैं)। अंधेरे कविता के बारे में शमशेर बहादुर ने इसे ‘दहकता इस्पाती दस्तावेज’ और रामविलास शर्मा ने ‘आरक्षित जीवन की कविता’ कहा है।
(4) शमशेर बहादुर सिंह
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परिचय: ‘कवियों के कवि’ (अज्ञेय द्वारा प्रदत्त), हिंदी-उर्दू के दोआब, प्रेम और सौंदर्य प्रकृति के कवि।
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काव्य-संग्रह: सुकून की तलाश में, कुछ कविताएँ, इतने अपने पास, चुका भी हूँ नहीं मैं (साहित्य अकादमी पुरस्कार)।
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विशेषता: प्रयोगवादी कवि होने के साथ-साथ इन्होंने प्रगतिवादी कविताएँ भी लिखी हैं। विष्णु खरे ने इन्हें ‘शमशेर की शमशेरियत’ कहा है।
(5) भवानी प्रसाद मिश्र
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परिचय: सहजता के कवि, ‘कविता के गाँधी’ (उदय प्रकाश द्वारा कहा गया)।
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रचनाएँ: गीत फरोश, अनाम तुम आते हो, त्रिकाल संध्या, बुनी हुई रस्सी (साहित्य अकादमी पुरस्कार), खुश्बू के शिलालेख, कालजयी।
(6) नरेश मेहता
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रचनाएँ: मेरा समर्पित एकांत, वनपाखी सुनो, संशय की एक रात, महाप्रस्थान, शबरी, अरण्य (साहित्य अकादमी पुरस्कार – 1988), और संपूर्ण साहित्य पर ज्ञानपीठ पुरस्कार (1992)।
(7) रघुवीर सहाय
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रचनाएँ: सीढ़ियों पर धूप में (1960), आत्महत्या के विरुद्ध (1967 – प्रसिद्धि का आधार), हँसो हँसो जल्दी हँसो (1975), लोग भूल जाएंगे (1982 – साहित्य अकादमी पुरस्कार), रामदास की हत्या, अधिनायक।
(8) धर्मवीर भारती
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परिचय: व्यक्ति स्वतंत्रता के कवि, रोमांटिक मनोभाव के कवि। ‘धर्मयुग’ साप्ताहिक पत्रिका के संपादक रहे।
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प्रमुख रचनाएँ: ठंडा लोहा (1952), अंधा युग (1954 – प्रबंध काव्य/गीतिनाट्य जो महाभारत के 18 दिन की संध्या से श्री कृष्ण के देहावसान तक और युद्ध की व्यर्थता पर आधारित है), कनुप्रिया (1959), सात गीत वर्ष (1959).
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5. निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहा जा सकता है कि ‘प्रयोगवाद’ हिंदी कविता के इतिहास में एक ऐसा क्रांतिकारी पड़ाव है जिसने कविता को पारंपरिक जकड़बंदियों और रूढ़ियों से मुक्त कर आधुनिक मानव की आंतरिक चेतना, बौद्धिक संघर्ष और यथार्थ धरातल से जोड़ दिया। भले ही इसकी शुरुआती दौर में आलोचना हुई हो, किंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसी प्रयोगवाद की उर्वर भूमि से आगे चलकर ‘नई कविता’ जैसे महान आंदोलनों का मार्ग प्रशस्त हुआ, जिसने आधुनिक हिंदी साहित्य को वैश्विक पटल पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई।
❓ प्रयोगवाद से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न (AEO FAQs):