काव्यशास्त्र

यमक अलंकार के उदाहरण, भेद, अर्थ एवं स्पष्टीकरण (Yamak Alankar in Hindi)

अंतिम संशोधित (Last Updated): September 11, 2026

यमक अलंकार के उदाहरण, अर्थ एवं स्पष्टीकरण (Yamak Alankar in Hindi)

हिंदी व्याकरण और काव्यशास्त्र के अंतर्गत शब्दालंकार का एक महत्वपूर्ण भेद ‘यमक अलंकार’ है। जब कविता या काव्य में एक ही शब्द बार-बार आए और हर बार उसका अर्थ भिन्न-भिन्न (अलग) हो, तब वहाँ यमक अलंकार (Yamak Alankar in Hindi) होता है। यदि आप प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UPTET, CTET, RPSC, TGT, PGT) या स्कूली कक्षाओं की तैयारी के लिए यमक अलंकार के 10 सर्वश्रेष्ठ उदाहरण, उनके अर्थ और स्पष्टीकरण की तलाश कर रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए बेहद मददगार है। यहाँ सरल भाषा में परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों को समझाया गया है।

एक नजर में (Quick Overview): इस लेख में आगे क्या पढ़ेंगे:

इस लेख में यमक अलंकार से जुड़े निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं को शामिल किया गया है:

  • यमक अलंकार की मूल परिभाषा और उसका अर्थ (जब एक शब्द बार-बार आए और हर बार अर्थ अलग हो)

  • यमक अलंकार के 10 प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण उदाहरण

  • प्रत्येक उदाहरण की काव्य पंक्ति, उसका सटीक अर्थ और स्पष्टीकरण (जैसे— काली घटा का घमंड घटा, कनक कनक ते सौ गुनी, तीन बेर खाती थी आदि)

  • प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यास के लिए चुनिंदा पंक्तियाँ

📌 यमक अलंकार के प्रमुख उदाहरण (Yamak Alankar Examples)

1. ‘काली घटा का घमंड घटा।’ (Kali Ghata Ka Ghamand Ghata)

  • काव्य पंक्ति:

    काली घटा का घमंड घटा।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: आकाश में छाई हुई काली घटा का गर्व अब कम हो गया है।

  • स्पष्टीकरण: पहले ‘घटा’ का तात्पर्य बादल तथा दूसरे ‘घटा’ का अर्थ कम होना है।

2. ‘तरणि के साथ ही तरल तरंग में तरणि डूबी थी हमारी ताल में।’ (Tarani aur Tarani Yamak)

  • काव्य पंक्ति:

    तरणि के साथ ही तरल तरंग में तरणि डूबी थी हमारी ताल में।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘तरणि’ शब्द की आवृत्ति से भिन्न अर्थ प्रकट होते हैं।

3. ‘कंद मूल भोग करे, कंद मूल भोग करे। तीन बेर खाती ते वे, तीन बेर खाती है।’ (Teen Ber Khati Hai)

  • काव्य पंक्ति:

    कंद मूल भोग करे, कंद मूल भोग करे।

    तीन बेर खाती ते वे, तीन बेर खाती है।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ पहले ‘तीन बेर’ का अर्थ तीन बार और दूसरे ‘तीन बेर’ का अर्थ तीन फल है।

4. ‘कनक-कनक तें सो गुनी मादकता अधिकाय।’ (Kanak Kanak Te Sau Guni)

  • काव्य पंक्ति:

    कनक-कनक तें सो गुनी मादकता अधिकाय।

    वा खाये बौराय जग, वा पाये बौराय।

  • स्पष्टीकरण: एक ‘कनक’ का अर्थ धतूरा और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ सोना है।

5. ‘सारंग ले सरंग चली, सारंग पुगो आय। सारंग ले सरंग धरयौ, सारंग सारंग माय।’ (Sarang Yamak Alankar)

  • काव्य पंक्ति:

    सारंग ले सरंग चली, सारंग पुगो आय।

    सारंग ले सरंग धरयौ, सारंग सारंग माय।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘सारंग’ शब्द अलग-अलग संदर्भों में भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।

6. ‘सुज्यो कहूँ तरु अर्क ते अर्क समान उदोतु।’ (Arak Yamak Alankar)

  • काव्य पंक्ति:

    सुज्यो कहूँ तरु अर्क ते अर्क समान उदोतु।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ पहले ‘अर्क’ का अर्थ वृक्ष (आक) तथा दूसरे ‘अर्क’ का अर्थ सूर्य है।

7. ‘तो पर वारो उरबसी सुन राधिके सुजान। तू मोहन के उरबसी हवै उरबसी समान।’ (Urbasi Yamak Alankar)

  • काव्य पंक्ति:

    तो पर वारो उरबसी सुन राधिके सुजान।

    तू मोहन के उरबसी हवै उरबसी समान।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘उरबसी’ शब्द के अर्थ हृदय में बसने और अप्सरा उर्वशी के रूप में भिन्न हैं।

8. ‘निबल के बल राम है।’ (Nibal Ke Bal Ram)

  • काव्य पंक्ति:

    निबल के बल राम है।

  • स्पष्टीकरण: यह संभग यमक या भागावृत्ति यमक का उदाहरण है।

9. ‘मोहन अब मत्त मांहि है, मोह न अब मन मांहि है।’ (Mohan aur Moh)

  • काव्य पंक्ति:

    मोहन अब मत्त मांहि है, मोह न अब मन मांहि है।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ शब्दों के अंश की आवृत्ति से यमक अलंकार बना है।

10. ‘माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। करका मनका डारि दे मनका मनका फेर।’ (Mala Pherat Jug Bhaya)

  • काव्य पंक्ति:

    माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।

    करका मनका डारि दे मनका मनका फेर।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ ‘मनका’ शब्द के अर्थ माला का दाना और मन का विचार अलग-अलग हैं।

11. ‘पच्छी परछिने ऐसे परे पर छीने वीर, तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के।’ (Pachhi Parchhine)

  • काव्य पंक्ति:

    पच्छी परछिने ऐसे परे पर छीने वीर,

    तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के।

  • स्पष्टीकरण: यहाँ शब्दों की पुनरावृत्ति से भिन्न अर्थ प्रकट होते हैं।

12. ‘फूल रहें हैं फूलकर फूल उपवन में।’ (Phool Rahe Hain Phoolkar)

  • काव्य पंक्ति:

    फूल रहें हैं फूलकर फूल उपवन में।

  • स्पष्टीकरण: यह भागावृत्ति यमक (संभग यमक) का सुंदर उदाहरण है।

निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहें तो, यमक अलंकार हिंदी काव्य सौंदर्य को बढ़ाने वाला एक ऐसा चमत्कारिक अलंकार है, जहाँ शब्दों की आवृत्ति तो होती है लेकिन उनके अर्थ हर बार अलग-अलग होते हैं। चाहे बात प्रसिद्ध बिहारी सतसई के दोहों की हो या महाकवि भूषण की कविताओं की, यमक अलंकार ने हमेशा हिंदी साहित्य की महिमा को बढ़ाया है। यदि आप प्रतियोगी परीक्षाओं में अलंकार से जुड़े प्रश्नों को बिना किसी गलती के हल करना चाहते हैं, तो इन प्रमुख उदाहरणों और उनके अर्थ के स्पष्टीकरण को अच्छी तरह समझ लेना आपके लिए बेहद फायदेमंद साबित होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs): यमक अलंकार से जुड़े सवाल

Q1. यमक अलंकार किसे कहते हैं?
जब किसी कविता या वाक्य में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए, और हर बार उसका अर्थ भिन्न (अलग) हो, तब वहाँ यमक अलंकार होता है (जैसे— कनक कनक ते सौ गुनी)।
Q2. यमक अलंकार और श्लेष अलंकार में क्या अंतर है?
यमक अलंकार में एक ही शब्द अलग-अलग अर्थों में एक से अधिक बार आता है, जबकि श्लेष अलंकार में शब्द एक ही बार आता है लेकिन प्रसंग के अनुसार उसके एक से अधिक अर्थ निकलते हैं।
Q3. यमक अलंकार के मुख्य कितने भेद होते हैं?
यमक अलंकार के मुख्य रूप से दो भेद माने जाते हैं— अभंग यमक (या परावृत्ति यमक) जहाँ पूरे पद की आवृत्ति हो, और सभग यमक (या संभग यमक) जहाँ मात्र शब्द के किसी अंश की आवृत्ति होती है।

उपमा अलंकार को विस्तार से पढ़ें .

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