हिंदी लेखक

मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय, रचनाएँ और नोट्स (Maithili Sharan Gupt Biography)

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जीवन परिचय और रचनाएँ हिंदी साहित्य नोट्स

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय, रचनाएँ और संपूर्ण साहित्यिक कृतित्व

हिंदी साहित्य जगत में जब भी राष्ट्रीय चेतना, उपेक्षित पात्रों को न्याय दिलाने और खड़ी बोली को परिमार्जित करने की बात आती है, तो राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का नाम सबसे पहले लिया जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UGC NET, TGT, PGT, RPSC और अन्य राज्य स्तरीय हिंदी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म कब और कहाँ हुआ था और उनके व्यक्तित्व से जुड़े कौन-से पहलू परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। यदि आप मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय pdf प्रारूप की तलाश में हैं या उनके संपूर्ण कृतित्व को गहराई से समझना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए एक बेहतरीन मार्गदर्शिका है। इसमें मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाएँ और उनका विस्तृत साहित्यिक परिचय सरल और प्रामाणिक भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

🎯 Quick Overview (संक्षिप्त परिचय)

  • साहित्यकार का नाम: मैथिलीशरण गुप्त

  • जन्म: सन् 1886 ई., चिरगांव, झाँसी (उत्तर प्रदेश)

  • निधन: 1964 ई.

  • वास्तविक नाम / बचपन का नाम: इनका वास्तविक नाम मिथिला अधिपति नंदिनी शरण तथा बचपन का नाम लाला मदन मोहन था।

  • प्रमुख उपाधियाँ: राष्ट्रकवि, प्रबंधशिरोमणि, दद्दा, स्वर्णलता, ऋषिकेश, मधुप, रसिकेन्दु।

  • प्रिय छंद: हरिगीतिका छंद (इन्होंने इसका प्रयोग सर्वप्रथम किया)।

UGC NET/JRF हिंदी (पेपर 2) कंप्लीट कॉम्बो नोट्स
📚 पढ़ने के साथ तैयारी भी
UGC NET/JRF हिंदी (पेपर 2) कंप्लीट कॉम्बो नोट्स
सभी 10 इकाइयाँ · PDF
नोट्स देखें →

1. मैथिलीशरण गुप्त का प्रारंभिक जीवन और साहित्यिक परिचय

इनका जन्म सन् 1886 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के चिरगाँव में हुआ था। साहित्य के प्रति उनका अनुराग और समर्पण अद्वितीय था। उनके संबंध में उनके स्वयं के ये शब्द अत्यंत प्रसिद्ध हैं:

“मैं पढ़ने के लिए पैदा नहीं हुआ। मैंने इसलिए जन्म लिया है कि लोग मुझे पढ़ें।”

हिंदी साहित्य में उनके अपूर्व योगदान को देखते हुए वर्ष 1936 में महात्मा गांधी ने उनकी प्रसिद्ध रचना ‘भारत-भारती’ से प्रभावित होकर इन्हें ‘राष्ट्रकवि’ घोषित किया था। वहीं, प्रसिद्ध आलोचक गणपति चंद्र गुप्त ने इन्हें ‘आधुनिक काल का तुलसीदास’ की उपाधि से विभूषित किया है।

लेखन की शुरुआत और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का प्रभाव

गुप्त जी की प्रारंभिक रचनाएँ (सन 1904 तक) कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली ‘वैश्योपकारक’ पत्रिका में छपती थीं। उनकी प्रथम रचना ‘हेमन्त’ नाम से सन् 1905 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसमें कुछ त्रुटियों में सुधार कर मैथिलीशरण गुप्त के ही नाम से इसे प्रकाशित करवाया था, इसलिए इसे उनकी स्वतंत्र मौलिक रचना नहीं माना जाता।

शुरुआत में जब आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें खड़ी बोली में लिखने के लिए प्रेरित किया, तब गुप्त जी ने उन्हें लिखा था:

“बड़े खेद का विषय है कि इस दास का स्वभाव खड़ी बोली से अरुचि उत्पन्न करता है।”

परंतु बाद में द्विवेदी जी के मार्गदर्शन से उन्होंने खड़ी बोली को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और उनकी प्रथम मौलिक रचना ‘रंग में भंग’ सन् 1909 में प्रकाश में आई।

2. महाकाव्य

इन्होंने हिंदी साहित्य को दो अत्यंत महत्वपूर्ण महाकाव्य दिए हैं:

  1. साकेत (1931 ई.) – 12 सर्ग: इसके 9वें सर्ग में राम की अपेक्षा उपेक्षित पात्र ‘उर्मिला’ के चरित्र का अद्भुत उद्घाटन किया गया है। इस रचना पर आर्य समाज का गहरा प्रभाव है। तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ के बाद राम के चरित्र पर लिखा गया यह दूसरा सबसे बड़ा महाकाव्य माना जाता है।

  2. जयभारत (1952 ई.) – 47 शीर्षक: यह महाकाव्य महाभारत के प्रसंगों को आधार बनाकर लिखा गया है। इसकी पूरी कथा युधिष्ठिर के इर्द-गिर्द घूमती है। डॉ. कमलकांत पाठक ने इसे ‘वृहत् काव्य’ की संज्ञा दी है।

3. निबंध काव्य

  • भारत-भारती (1912 ई.) : इसमें कुल 700 छंद तथा तीन खंड हैं — (1) अतीत खंड, (2) वर्तमान खंड, (3) भविष्य खंड। यह रचना राष्ट्रीय नवजागरण का एक सशक्त उद्बोधन है। यह उर्दू के प्रसिद्ध शायरों ‘मुसद्दे हाली’ एवं ‘मुसद्दे कैफी’ से प्रभावित मानी जाती है।

    • आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन: “गुप्त जी की ओर पहले पहल हिन्दी प्रेमियों का ध्यान खींचने वाली रचना ‘भारत भारती’ है।”

    • डॉ. नगेन्द्र का कथन: “भारत भारती की लोकप्रियता खड़ी बोली की विजय पताका सिद्ध हुई।”

  • हिन्दू (1927 ई.)

  • राजाप्रजा (1956 ई.)

  • विजयपर्व (1963 ई.): जब सन 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया, तब संसद में गुप्त जी ने इस रचना को गाकर सुनाया था। यह इनकी अंतिम रचना मानी जाती है।

4. खंड काव्य और अन्य विधाएँ

खंडकाव्य प्रकाशन वर्ष / विशेष विवरण
रंग में भंग 1909 ई. (गुप्त जी की प्रथम मौलिक रचना)
जयद्रथ वध 1910 ई.
शकुन्तला 1915 ई.
किसान 1916 ई.
यशोधरा 1923 ई.
पंचवटी 1925 ई. (इसमें लक्ष्मण और शूर्पणखा के बीच का संवाद/विवाद चित्रित है)
द्वापर 1936 ई.
नहुष 1940 ई.
काबा और कर्बला 1942 ई. (इसमें इमाम हुसैन की कुर्बानी का सजीव वर्णन है)
उर्मिला यह इनकी एक अप्रकाशित रचना है।

अन्य काव्य रूप व नाट्य रचनाएँ

  • मुक्तक काव्य: पद्य प्रबन्ध, मंगलघट, राष्ट्रवाणी, दर्दशा निवेदन, आस्वाद, गीतिकाव्य, अन्योक्ति पुष्पावली, स्वस्ति और संकेत।

  • खेद-संगीत, झंकार, विश्ववेदना, उच्छवास।

  • पद्य नाट्य: अनघ (1925 ई.), पृथ्वीपुत्र (1950 ई.)।

  • गद्य नाट्य: तिलोत्तम, चन्द्रहास, उद्धार (अप्रकाशित)।

5. गुप्त जी की प्रसिद्ध काव्य-पंक्तियाँ

“नीलाम्बर परिधान हरितपट पर सुन्दर है।”

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी। आँचल में है दूध आँखों में है पानी।।”

“चारूचंद्र की चंचल किरणें।”

“हम कौन थे और क्या हो गये, क्या होंगे अभी। (भारत – भारती)”

“सखी नील नभ सर से उतरा यह हंस अहा तरता तरता।”

📌 परीक्षार्थियों के लिए विशेष टिप्स (Exam Tips)

  • हरगीतिका छंद: परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि मैथिलीशरण गुप्त का सबसे प्रिय छंद कौन सा है और उन्होंने किस छंद का प्रयोग सर्वप्रथम किया? उत्तर है—हरिगीतिका छंद।

  • अंतिम रचना: ‘विजयपर्व’ (1963) को गुप्त जी की अंतिम रचना माना जाता है, जिसे उन्होंने 1962 के चीन आक्रमण के समय संसद में गाया था।

  • उपेक्षित पात्रों की वकालत: इन्होंने ‘साकेत’ में उर्मिला और ‘यशोधरा’ में यशोधरा जैसे उपेक्षित स्त्री पात्रों को उनके त्याग और संघर्ष के बल पर मुख्यधारा में ला खड़ा किया।

निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का संपूर्ण जीवन और साहित्य सृजन हिंदी कविता के द्विवेदी युग से लेकर छायावादोत्तर युग तक के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। उन्होंने अपनी ओजस्वी और संवेदनशील रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीयता, संस्कृति और नैतिकता की जो अलख जगाई, वह हमेशा हिंदी जगत का मार्गदर्शन करती रहेगी। प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इनका कृतित्व हर विद्यार्थी के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय है।

ये आर्टिकल भी  अभी पढ़ें

क्र.सं. अध्ययन श्रेणी (Category) श्रेणी विवरण (Category Overview) सभी लेख देखें
01 📖 हिंदी साहित्य का इतिहास आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल के सभी विस्तृत नोट्स। श्रेणी देखें →
02 🎭 भारतीय काव्यशास्त्र रस, छंद, अलंकार, शब्दशक्ति और प्रमुख आचार्यों के काव्य सिद्धांत। श्रेणी देखें →
03 💡 अलंकार एवं रस परिचय उदाहरण सहित शब्दालंकार, अर्थालंकार और नवरसों के सभी लेख। श्रेणी देखें →
04 ✍️ हिंदी व्याकरण संधि, समास, उपसर्ग, प्रत्यय और प्रतियोगी परीक्षाओं के व्याकरण नियम। श्रेणी देखें →

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्रकवि' की उपाधि किसने और कब दी थी?

उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त को वर्ष 1936 में महात्मा गांधी ने उनकी राष्ट्र-प्रेमी रचना ‘भारत-भारती’ से प्रभावित होकर ‘राष्ट्रकवि’ घोषित किया था।

Q2. मैथिलीशरण गुप्त की प्रथम मौलिक रचना कौन सी है?

उत्तर: गुप्त जी की प्रथम मौलिक रचना ‘रंग में भंग’ है, जो सन् 1909 ईस्वी में प्रकाशित हुई थी।

Q3. 'साकेत' महाकाव्य के किस सर्ग में उर्मिला का चरित्र चित्रण मुख्य रूप से मिलता है?

उत्तर: ‘साकेत’ महाकाव्य के 9वें सर्ग में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के वियोग और चरित्र का अत्यंत मार्मिक और विस्तृत उद्घाटन किया गया है।

Q4. मैथिलीशरण गुप्त की अंतिम रचना कौन सी मानी जाती है?

उत्तर: गुप्त जी की अंतिम रचना ‘विजयपर्व’ (1963 ई.) मानी जाती है, जिसे उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के संदर्भ में लिखा था और संसद में गाकर सुनाया था।

Q5. गणपति चंद्र गुप्त ने मैथिलीशरण गुप्त को क्या कहकर संबोधित किया है?

उत्तर: प्रसिद्ध इतिहासकार व आलोचक गणपति चंद्र गुप्त ने मैथिलीशरण गुप्त को ‘आधुनिक काल का तुलसीदास’ कहा है।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *