अंतिम संशोधित (Last Updated): September 30, 2026
कुण्डलिया छंद क्या है? (परिचय एवं महत्व)
हिंदी व्याकरण और काव्यशास्त्र में छंदों का विशेष महत्व है। यदि आप प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UGC NET, TGT, PGT, RPSC) या स्कूल/कॉलेज की कक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो कुण्डलिया छंद (Kundaliya Chhand in Hindi) का अध्ययन करना आपके लिए बेहद जरूरी है। हिंदी साहित्य में कुण्डलिया छंद की परिभाषा क्या है, कुण्डलिया छंद का उदाहरण मात्रा सहित कैसे समझा जाता है, तथा कुण्डलिया छंद के 10 उदाहरण व इसके अंतर्गत आने वाले नियम क्या हैं—इन सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं पर इस लेख में चर्चा की गई है। दोहा और रोला के मेल से बनने वाले इस अद्भुत छंद के प्रसिद्ध उदाहरण, कुण्डलिया छंद में कितने चरण होते हैं और कुण्डलिया छंद में कितनी मात्राएँ होती हैं जैसे तमाम सवालों के जवाब आइए सरल भाषा में समझते हैं।
मुख्य बिंदु (Key Highlights):
-
कुण्डलिया छंद किसे कहते हैं और इसकी परिभाषा
-
कुण्डलिया छंद के लक्षण और महत्वपूर्ण नियम
-
परीक्षाओं में आने वाले प्रसिद्ध उदाहरण
-
कुण्डलिया छंद को चुटकियों में पहचानने की शानदार ट्रिक
- परीक्षा में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कुण्डलिया छंद की परिभाषा (Kundaliya Chhand ki Paribhasha)
कुण्डलिया छंद एक विषम मात्रिक छंद है। यह दो अलग-अलग छंदों—दोहा और रोला के योग से मिलकर बनता है। इसमें कुल 6 चरण होते हैं। इस छंद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिस शब्द या वाक्यांश से इस छंद की शुरुआत होती है, ठीक उसी शब्द या वाक्यांश पर इस छंद की समाप्ति भी होती है।
कुण्डलिया छन्द का परिचय एवं स्वरूप (Kundaliya Chhand Detail)
कुण्डलिया हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय विषम मात्रिक छन्द है। यह दो छंदों के योग से मिलकर बनता है:
-
दोहा (प्रथम दो चरण)
-
रोला (अंतिम चार चरण)
इस प्रकार कुण्डलिया छन्द में कुल 6 चरण (lines) होते हैं।
हिंदी साहित्य का एक साथ निचोड़ यहाँ पढ़ें
कुण्डलिया छंद की बनावट:
-
प्रथम 2 चरण: दोहा छंद के होते हैं (जहाँ पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं)।
-
अंतिम 4 चरण: रोला छंद के होते हैं (जिसके प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ होती हैं)।
कुण्डलिया छंद की मुख्य विशेषताएँ/नियम
कुण्डलिया छंद को भली-भांति समझने और परीक्षा में पहचानने के लिए इसके निम्नलिखित प्रमुख नियमों को ध्यान में रखना आवश्यक है:
-
यह एक विषम मात्रिक संयुक्त छंद है।
-
इसमें कुल चरणों की संख्या 6 होती है।
-
यह दोहा (2 चरण) और रोला (4 चरण) के मेल से बनता है।
-
विशेष क्रम (चक्राकार नियम): इस छंद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिस शब्द (या अक्षर) से यह छन्द आरंभ होता है, ठीक उसी शब्द (या अक्षर) पर यह समाप्त भी होता है। इसके अलावा, दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण बनता है।
-
छंद के आरंभ का शब्द और अंत का शब्द बिल्कुल एक ही होता है (यह इसकी सबसे पक्की पहचान है)।
कॉलरिज का कल्पना सिद्धांत: स्वरूप, भेद
क्रोचे का अभिव्यंजनावाद: सिद्धांत, स्वरूप
लौंजाइनस का उदात्त सिद्धांत: स्वरूप, स्रोत, बाधक तत्त्व
कुण्डलिया छंद के प्रमुख उदाहरण (Kundaliya Chhand Examples)
यहाँ कुण्डलिया छंद के कुछ सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक उदाहरण दिए गए हैं, जो परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं:
उदाहरण 1: (लाठी में गुन बहुत है…)
लाठी में गुन बहुत है, सदा राखिए साथ।
गहरे नद नाला जहाँ, तहाँ बचावै अंग।।
तहाँ बचावै अंग, झपट कुत्ता को मारै।
दुस्मन दावा गीर, होय ता हू को झारै।।
कहि गिरधर कविराय, सुनहु हे मेरे बाटी।
सब हथियारन छोड़, हाथ में लीजै लाठी।।
-
स्पष्टीकरण: इस प्रसिद्ध उदाहरण में कवि गिरधर जी लाठी के गुणों का वर्णन कर रहे हैं। इसकी शुरुआत ‘लाठी’ शब्द से हुई है और इसका समापन भी ‘लाठी’ शब्द पर ही हुआ है। इसमें शुरुआत के 2 चरण दोहा और बाद के 4 चरण रोला के हैं।
उदाहरण 2: (बीती ताहि बिसारि दे…)
बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेय।
जो बनि आवे सहज में, ताहि में चित देय।।
ताहि में चित देय, बात जो ही बिनि आवे।
दुरजन हँसे न कोय, चित्त में खेद न पावे।।
कहि गिरधर कविराय, यहै कर मन पर दीती।
आगे की सुधि लेय, समूझी बीती सी बीती।।स्पष्टीकरण: इस प्रसिद्ध उदाहरण में कवि गिरधर जी मनुष्य को बीती हुई बातों को भुलाकर भविष्य की सुध लेने की नीति सिखा रहे हैं। इस छंद की शुरुआत ‘बीती’ शब्द से हुई है और इसका समापन भी ‘बीती’ शब्द पर ही होता है। इसमें प्रथम दो चरण दोहा छंद के तथा अंतिम चार चरण रोला छंद के हैं, जो कुण्डलिया छंद के नियमों को पूर्णतः स्पष्ट करते हैं।
उदाहरण 3: गिरधर कविराय का प्रसिद्ध कुण्डलिया
बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।
काम बिगारे आपनो, जग में होत हँसाय ॥
जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै।
खान-पान सन्मान राग-रंग कछु न भावै ॥
कह गिरधर कविराय, दुःख कछु टरत न टारे।
खटकत है जीय माँहि, किया जो बिना विचारे ॥
-
स्पष्टीकरण: यह प्रसिद्ध कुण्डलिया छन्द ‘गिरधर कविराय’ द्वारा रचित है। इसमें आप देख सकते हैं कि यह छंद ‘बिना विचारे’ शब्द से शुरू होता है और इसकी अंतिम पंक्ति का अंत भी ‘बिना विचारे’ शब्द पर ही होता है, जो कुण्डलिया की मुख्य पहचान है।
उदाहरण 4: नीति और उपदेशपरक कुण्डलिया
साईं तिनकी मित्रता, बुरे कुचाली लोग।
पड़त छाँह गंभीर गति, चहुँ दिसि व्यापै रोग ॥
चहुँ दिसि व्यापै रोग, नैन भरि आँसू आवै।
उत्तम ब्यौहार बिसार, नीच संगति मन भावै ॥
कह ‘गिरधर कविराय’, सुनो री प्रगट कसाई।
इनकी प्रीति मसान, बुरो है संग कुसाई ॥
कुण्डलिया छंद के पहचान की शानदार टिप्स (Tips to Identify Kundaliya Chhand)
यदि प्रतियोगी परीक्षा में आपके सामने कोई पद्यांश आ जाए और आपको यह पहचानना हो कि यह कुण्डलिया छंद है या नहीं, तो आप इन आसान ट्रिक्स का उपयोग कर सकते हैं:
-
चरणों की गिनती करें: सबसे पहले देखें कि क्या उस पद में कुल 6 पंक्तियाँ (चरण) दी गई हैं। यदि हाँ, तो वह कुण्डलिया या छप्पय हो सकता है।
-
शुरुआत और अंत का शब्द मिलाएँ: चेक करें कि जिस शब्द से कविता शुरू हुई है, क्या वही शब्द या उसका जोड़ा अंत में आ रहा है? (जैसे ‘लाठी’ से शुरू और ‘लाठी’ पर खत्म)। यदि ऐसा है, तो वह 100% कुण्डलिया छंद ही है।
-
दोहा-रोला का मेल देखें: शुरुआती दो पंक्तियों में दोहा (13-11 मात्राओं का यति क्रम) और अगली चार पंक्तियों में रोला (24 मात्राएँ) का प्रवाह दिखाई देगा।

5. FAQs (परीक्षा में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
6. निष्कर्ष (Conclusion)
हिंदी व्याकरण और काव्यशास्त्र की दृष्टि से कुण्डलिया छंद एक बेहद महत्वपूर्ण और सुंदर छंद है। दोहा और रोला जैसी दो अलग-अलग काव्य विधाओं का यह अनूठा संयोजन न केवल भाषा के सौंदर्य को बढ़ाता है, बल्कि कम शब्दों में गहरी बात या नीति की शिक्षा देने का भी कार्य करता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी चक्राकार संरचना है, जहाँ से बात शुरू होती है वहीं आकर समाप्त होती है। यदि आप प्रतियोगी परीक्षाओं में शत-प्रतिशत सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, तो इसके लक्षणों और मात्रा-संयोजन का नियमित अभ्यास करना आपके लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध होगा।
कवित्त छंद की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण
उपमा अलंकार को विस्तार से पढ़ें