हिंदी साहित्य: नयी कविता और साठोत्तरी कविता का संपूर्ण इतिहास एवं प्रमुख रचनाकार (विस्तृत नोट्स)
हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रयोगवाद के बाद का काल ‘नई कविता’ और ‘साठोत्तरी कविता’ के नाम से जाना जाता है। आधुनिक हिंदी कविता की इस यात्रा ने वैचारिक स्वतंत्रता, नए प्रयोग, सामाजिक यथार्थ और मनुष्य की व्यक्तिगत अस्मिता को केंद्र में रखा। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, कॉलेज लेक्चरर और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से नई कविता का उद्भव, उसके प्रमुख काव्यांदोलन, साठोत्तरी कविता की प्रवृत्तियाँ तथा इस काल के प्रमुख रचनाकारों एवं उनकी कृतियों का विस्तृत अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
📌 1. नई कविता (1952–1960 ई.)
प्रयोगवाद का विकसित रूप ही ‘नई कविता’ माना जाता है। हिंदी साहित्य में ‘नई कविता’ शब्द का प्रयोग सबसे पहले अज्ञेय द्वारा किया गया था।
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घोषणा और पत्रिका: सन् 1952 ई. में पटना रेडियो से नई कविता की औपचारिक घोषणा की गई थी। नई कविता आंदोलन को वास्तविक और ठोस रूप जगदीश गुप्त की संपादित पत्रिका ‘नई कविता’ ने प्रदान किया।
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विद्वानों के मत: रामविलास शर्मा का मानना है कि “नई कविता प्रयोगवाद का छद्म रूप है।”
नई कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ / विशेषताएँ:
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समष्टि चेतना की प्रधानता: इसमें केवल व्यक्तिवादी संकुचित दायरा न रहकर सामाजिक समष्टि चेतना का समावेश हुआ।
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चिंतन युक्त सहजता: बौद्धिक जटिलता के स्थान पर सहज किंतु गंभीर चिंतन को अपनाया गया।
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आत्मन्वेषण: मनुष्य स्वयं की पहचान और अपने आंतरिक सत्य की खोज करता है।
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प्रयोग की अनिवार्यता नहीं: प्रयोगवाद की तरह यहाँ प्रयोग को साध्य न मानकर साधन माना गया, यानी प्रयोग की अनिवार्यता समाप्त हो गई।
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कला व भाव पक्ष दोनों का संतुलन: इसमें भाव और शिल्प दोनों को समान महत्व दिया गया।
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विषय वैविध्या और जनोन्मुखता: कविता जनसाधारण के जीवन के करीब आई और इसके विषयों में भारी विविधता देखने को मिली।

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नोट्स देखें →🔄 2. नई कविता के दौर के प्रमुख काव्यांदोलन और उनके प्रवर्तक
नई कविता के बाद हिंदी कविता में अनेक लघु काव्यांदोलन चले, जिनके प्रवर्तक निम्नलिखित हैं:
| काव्यांदोलन | प्रवर्तक |
| अकविता | श्याम परमार |
| बीट पीढ़ी | राजकमल चौधरी |
| अस्वीकृत कविता | श्रीराम शुक्ल |
| आज की कविता | हरीश मदानी |
| प्रतिबद्धधाम कविता | डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव |
| सहज कविता | डॉ. रवीन्द्र भ्रमर |
| ताजी कविता | लक्ष्मीकांत वर्मा |
| समकालीन कविता | डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय |
| युयुत्सुवादी कविता | शलभ श्रीराम |
| कैप्सूलसूत्र कविता | डॉ. ओंकारनाथ त्रिपाठी |
| अगीत कविता | रंगनाथ मिश्र |
| विचार कविता | नरेश मेहता |
| सनातन सूर्यवादी कविता | वीरेन्द्र जैन |
✍️ 3. नई कविता और समकालीन काल के प्रमुख हस्ताक्षर एवं उनकी रचनाएँ
1. कुंवर नारायण (जन्म – 1927)
कुंवर नारायण की कविता में प्रबंधात्मकता, माइथोलॉजिकल (पौराणिक/मिथकीय) चेतना और आधुनिक बोध का सुंदर समन्वय मिलता है।
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प्रमुख रचनाएँ:
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चक्रव्यूह (1956)
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परिवेश हम तुम (1961)
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अपने सामने (1979)
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कोई दूसरा नहीं (1993) — इस कृति पर इन्हें 1995 का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ.
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आत्मजयी (1965) — यह इनका एक प्रसिद्ध खंडकाव्य है, जो कठोपनिषद के यम-नचिकेता संवाद पर आधारित है. इसमें बाजश्रवा (पुरानी पीढ़ी) और नचिकेता (आधुनिक पीढ़ी) के माध्यम से गहरे दार्शनिक प्रश्न उठाए गए हैं.
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2. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (जन्म – 1927)
इन्हें हिंदी कविता में ‘नई कविता के प्रमुख व्यंग्यकार’ और ग्रामीण संवेदनाओं के कवि के रूप में जाना जाता है.
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प्रमुख रचनाएँ:
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काठ की घंटियाँ (1959)
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बाँस का पुल (1963)
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एक सूनी नाव (1966)
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गर्म हवाएँ (1969)
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जंगल का दर्द (1976)
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खूँटियों पर टंगे लोग (1982) — इस महत्वपूर्ण कृति पर इन्हें 1983 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला.
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कुआँनो नदी
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3. केदारनाथ सिंह (जन्म – 1934)
अशोक वाजपेयी ने इन्हें ‘हिंदी कविता का अजातशत्रु’ कहा है. ये अपनी विशिष्ट बिम्ब योजना के लिए विख्यात हैं.
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प्रमुख रचनाएँ:
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अभी बिल्कुल अभी (1960)
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जमीन पक रही है (1980)
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यहाँ से देखो
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अकाल में सारस (1988) — इस पर इन्हें 1989 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला.
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उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ
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बाघ (1996) — इनकी एक अत्यंत चर्चित लंबी कविता है.
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अनागत, टॉलस्टॉय और साइकिल, मतदान केंद्र पर झपकी (मरणोपरांत).
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चर्चित कविताएँ: बनारस, बसंत, कब्रिस्तान में पंचायत, मेरे समय के शब्द.
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4. धूमिल (1936–1975)
मूल नाम सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ था. ये जनपक्ष के आक्रामक और तेवर वाले कवि माने जाते हैं।
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प्रमुख रचनाएँ:
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ंसद से सड़क तक (1972)
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कल सुनना मुझे (1977) — इस पर इन्हें 1979 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला.
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सुदामा पांडेय का प्रजातंत्र (1984)
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चर्चित कविताएँ: किस्सा जनतंत्र, रोटी और संसद, मोचीराम, पटकथा.
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5. श्रीकांत वर्मा (जन्म – 1931)
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प्रमुख रचनाएँ: दिनारम्भ, मायादर्पण, जलसाघर, मँगध (साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1987), गरुड़ किसने देखा है, झाड़ी.
6. लीलाधर जगूड़ी (जन्म – 1940)
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प्रमुख रचनाएँ: शंखमुखी शिखरों पर (1964), नाटक जारी है (1972), इस व्यवस्था में, इस यात्रा में, रात अभी भी मौजूद हैं, बची हुई पृथ्वी, अनुभव के आकाश में चाँद (साहित्य अकादमी पुरस्कृत), घबराए हुए शब्द, जितने लोग उतने प्रेम.
7. अशोक वाजपेयी / कैलाश वाजपेयी
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कैलाश वाजपेयी की रचनाएँ: हवा में हस्ताक्षर (साहित्य अकादमी पु.), संक्रांत, महास्वप्न का मध्यांतर, शहर अभी भी संभावना है, एक पतंग अनंत में, कहीं नहीं वहीं, तत्पुरुष, घास में दुब का आकाश.
8. चंद्रकांत देवताले
डॉ. बच्चन सिंह ने इन्हें ‘पीड़ा के कवि’ कहा है.
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प्रमुख रचनाएँ: हड्डियों में छिपा ज्वर (1973), दीवार पर खून से (1975), लकड़बग्घा हंस रहा है (1980), रोशनी मैदान की तरफ (1982), भूखंड तप रहा है, पत्थर की बैंच, उजड़ में संग्रहालय (2003), पत्थर फेंक रहा हूँ (2010, साहित्य अकादमी पुरस्कार).
9. राजेश जोशी
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प्रमुख रचनाएँ: एक दिन बोलेंगे पेड़, दो पंक्तियों के बीच (साहित्य अकादमी पु.), आलोक धन्वा, दुनिया रोज बनती है, भागी हुई लड़की, ब्रूनो की लड़की, जनता का आदमी.
10. मंगलेश डबराल
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प्रमुख रचनाएँ: पहाड़ पर लालटेन, हम जो देखते हैं (साहित्य अकादमी), आवाज की एक जगह है.
11. दुष्यंत कुमार
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प्रमुख रचनाएँ: एक कंठ विषपायी, सूर्य का स्वागत, आवाजों के घेरे में, साये में धूप (1975), शंभुनाथ-मन्वन्तर, दर्द जहाँ नीला है.
12. अन्य महत्वपूर्ण रचनाकार और उनकी कृतियाँ:
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अरुण कमल: नए इलाके में (साहित्य अकादमी), अपनी केवल धार.
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ज्ञानेंद्रपति: संश्यात्मा (साहित्य अकादमी), भिन्नसार, गंगातट.
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वीरेन डंगवाल: दुष्चक्र में सृष्टा (साहित्य अकादमी), इसी दुनिया मे.
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रामदरश मिश्र: दिन एक नदी बन गया, जुलूस कहा जा रहा है, कंधे पर सूरज, आग की हँसी (साहित्य अकादमी).
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नंद चतुर्वेदी: गा हमारी जिंदगी कुछ गा, यह एक समय मामूली नहीं, ईमानदार दुनिया के लिए, उत्सव का निर्मम समय, शब्द संसार की यायावरी (साहित्य अकादमी).
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विनोदकुमार शुक्ल: वह आदमी नया, गर्म कोट.
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सौमित्र मोहन: लुकमान अली तथा अन्य कविताएँ.
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जगदीश गुप्त: हिंबद्ध, नाव के पाँव.
🏭 4. साठोत्तरी कविता (1960–1975 ई.)
सत्तर के दशक के आसपास और साठ के बाद जन्मी कविता को ‘साठोत्तरी कविता’ कहा जाता है। इस कालखंड की कविताओं में मोहभंग, यथार्थ का आक्रामक चित्रण और व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष दिखाई देता है।
साठोत्तरी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ:
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अस्वीकार का दर्शन स्वीकार: स्थापित रूढ़ियों, परंपराओं और पुराने मूल्यों को सिरे से नकारना।
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यौन विकृतियों का चित्रण: मनुष्य की कुंठाओं और जटिल मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक संबंधों का बेबाक अंकन।
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बेलाग कथन और सपाटबयानी: बातों को घुमाने के बजाय सीधे और तीखे रूप में कहना।
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मोहभंग की पीड़ा की अभिव्यक्ति: स्वतंत्रता के बाद देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था से उपजे मोहभंग का गहरा अहसास।
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संगीतात्मकता नहीं: लयात्मकता या पारंपरिक संगीत के स्थान पर गद्यधर्मी तेवर की प्रधानता।
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नैतिक आदर्शों में अविश्वास: प्राचीन मूल्य मान्यताओं और धार्मिक-नैतिक आदर्शों के प्रति अनास्था.
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स्त्रियों के प्रति आक्रोश और व्यंग्य: समाज में व्याप्त पाखंड पर कड़ा प्रहार।
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राजनीतिक भ्रष्टाचार का उजागर: व्यवस्था की विडंबनाओं और राजनीतिक गिरावट को पुरजोर तरीके से सामने लाना.
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