चानन भेल विसम सर रे भूसन भेल भारी, व्याख्या एवं अर्थ | Vidyapati Pad Vyakhya in Hindi
विद्यापति का शृंगार-प्रधान (भ्रमर-वर्णन) पद
मूल पद:
“चानन भेल विसम सर रे भूसन भेल भारी।
सपनहूँ हरि नहिं आएल रे गोकुल गिरधारी।।”
(और)
“हरि बिनु हृदय दग्ध भेल रे झामरु भेल सारी।
जाहु-जाहु तोहें उधौ हे तोंहे मधुपुर जाहे।।
चन्द्रबदनि नहिं जीवत रे बध लागत काहे।
भनइ विद्यापति तन-मन रे सुन गुनमति नारी।
आज आऑत हरि गोकुल रे पथ चलु झंझारी।।”
प्रसंग:
यह पद ‘विद्यापति-पदावली’ से लिया गया है। यह वियोग-शृंगार का पद है, जिसमें नायिका उद्धव से कहती है कि हे उद्धव! प्रियतम (कृष्ण) के वियोग में चन्दन का सुगंधित लेप मुझे तीक्ष्ण बाण के समान पीड़ादायक लग रहा है और आभूषण बोझ प्रतीत हो रहे हैं। गिरधारी कृष्ण जब से गोकुल से गए हैं, तब से वह स्वप्न में भी नहीं आए हैं।
सप्रसंग व्याख्या:
कवि विद्यापति वर्णन करते हैं कि कृष्ण के वियोग में तड़प रही गोकुल की गोपिका (नायिका) उद्धव से कहती है— हे उद्धव! कृष्ण के बिना मेरा हृदय जलकर राख (दग्ध) हो गया है और वियोग की अग्नि के ताप से मेरी साड़ी भी मैली (झामरु) हो गई है। हे उद्धव! तुम यहाँ से जाओ, चले जाओ! तुम मथुरा चले जाओ! तुम इस चंद्रमुखी (गोपिका) को जीवित नहीं रहने दोगे क्या? यदि यह मर गई तो तुम्हें ब्रह्महत्या या जीव हत्या का पाप लगेगा।
कवि विद्यापति जी कहते हैं कि हे गुणशील स्त्री! तू मन से तल्लीन होकर सुन! आज भगवान श्रीकृष्ण गोकुल आ रहे हैं। इसलिए हे सखियों! तुम सब शीघ्र ही जाकर मार्ग साफ करो और उनके स्वागत की तैयारी करो।
विशेष / काव्यगत सौंदर्य:
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वियोग-शृंगार का वर्णन: यहाँ गोपी (नायिका) के माध्यम से प्रगाढ़ वियोग-शृंगार और प्रेम की तड़प का सुंदर अंकन हुआ है।
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उद्धव-संदेश प्रसंग: कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद और उद्धव के आगमन के समय की मनःस्थिति को दर्शाया गया है।
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रस: यहाँ वियोग-शृंगार रस है।
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भाषा: पदावली की भाषा मैथिली है।
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