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स्कंदगुप्त नाटक (जयशंकर प्रसाद): सारांश, पात्र, 47 कथन (किसने किससे कहा), गीत और MCQ

स्कंदगुप्त नाटक जयशंकर प्रसाद का सारांश, पात्र और 47 कथन – store.hindisahity.com

स्कंदगुप्त जयशंकर प्रसाद का सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक माना जाता है। इसका पूरा नाम ‘स्कंदगुप्त विक्रमादित्य’ है और यह 1928 में प्रकाशित हुआ। नाटक गुप्त साम्राज्य के उस दौर पर आधारित है, जब भीतर गृह-कलह और षड्यंत्र थे और बाहर से हूणों का आक्रमण। युवराज स्कंदगुप्त अधिकार से उदासीन होते हुए भी देश के लिए लड़ता है, हूणों को हराता है और अंत में देवसेना के प्रेम का भी त्याग कर देता है।

UGC NET/JRF, TGT, PGT, RPSC और विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं में स्कंदगुप्त से सबसे अधिक “यह कथन किसने किससे कहा” प्रकार के प्रश्न आते हैं। इसलिए इस लेख में नाटक के मूल पाठ से 47 महत्वपूर्ण कथन अंकवार, वक्ता और श्रोता के साथ दिए गए हैं। साथ में अंकवार सारांश, पात्र, चरित्र-चित्रण, गीत, उद्देश्य, नाट्य-शिल्प, 16 MCQ और FAQ भी हैं।

📌 संक्षेप में उत्तर
स्कंदगुप्त (स्कंदगुप्त विक्रमादित्य) — लेखक: जयशंकर प्रसाद | प्रकाशन: 1928 | अंक: 5 | दृश्य: 33 (7, 7, 6, 7, 6) | नायक: स्कंदगुप्त | नायिका: देवसेना | खलनायक-पक्ष: अनंतदेवी, भटार्क, प्रपंचबुद्धि | पहला वाक्य: “अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है!” | अंतिम गीत: “आह! वेदना मिली विदाई” (देवसेना)।

📖 इस लेख में क्या है

  1. स्कंदगुप्त नाटक : एक नज़र में
  2. जयशंकर प्रसाद और उनके नाटक
  3. ऐतिहासिक आधार
  4. स्कंदगुप्त का सारांश (अंकवार)
  5. नाटक के पात्र
  6. मुख्य पात्रों का चरित्र-चित्रण
  7. महत्वपूर्ण कथन: किसने किससे कहा (47 कथन)
  8. प्रमुख कथनों की व्याख्या
  9. नाटक में आए गीत
  10. उद्देश्य और राष्ट्रीय चेतना
  11. नाट्य-शिल्प और भाषा
  12. स्कंदगुप्त के प्रति आलोचकों के कथन
  13. परीक्षा के लिए याद रखने योग्य तथ्य
  14. स्कंदगुप्त के 16 MCQ
  15. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्कंदगुप्त नाटक : एक नज़र में

बिंदु विवरण
नाटक स्कंदगुप्त (पूरा नाम: स्कंदगुप्त विक्रमादित्य)
लेखक जयशंकर प्रसाद (1889–1937)
प्रकाशन 1928
प्रकार ऐतिहासिक नाटक
अंक और दृश्य 5 अंक; 33 दृश्य (अंकवार 7, 7, 6, 7, 6)
नायक स्कंदगुप्त (युवराज, बाद में सम्राट विक्रमादित्य)
नायिका देवसेना (मालव-नरेश बंधुवर्मा की बहन)
प्रतिपक्ष अनंतदेवी, पुरगुप्त, भटार्क, प्रपंचबुद्धि; बाहरी शत्रु हूण (खिंगिल)
पहला वाक्य “अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है!” (स्कंदगुप्त, स्वगत)
अंतिम गीत “आह! वेदना मिली विदाई” (देवसेना)
मुख्य स्वर राष्ट्रप्रेम, त्याग, कर्तव्य बनाम अधिकार, प्रेम और बलिदान
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जयशंकर प्रसाद और उनके नाटक

जयशंकर प्रसाद छायावाद के चार स्तंभों में से एक हैं और हिंदी नाटक के इतिहास में उनके नाम से पूरा एक युग (प्रसाद युग) जाना जाता है। उन्होंने भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण प्रसंगों को लेकर ऐसे नाटक लिखे, जिनसे पराधीन भारत में राष्ट्रीय चेतना जगे।

नाटक वर्ष
राज्यश्री 1915
विशाख 1921
अजातशत्रु 1922
जनमेजय का नागयज्ञ 1926
कामना 1927
स्कंदगुप्त 1928
एक घूँट (एकांकी) 1929
चंद्रगुप्त 1931
ध्रुवस्वामिनी 1933

प्रसाद के जीवन और रचनाओं के लिए जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएँ और जीवन परिचय और उनके दूसरे बड़े नाटक के लिए चंद्रगुप्त नाटक का सारांश और कथन पढ़ें।

स्कंदगुप्त नाटक का ऐतिहासिक आधार

  • स्कंदगुप्त गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम (महेंद्रादित्य) का पुत्र था। इतिहास में उसका शासन लगभग 455 से 467 ई. माना जाता है।
  • उसने हूणों के आक्रमण को रोका। भितरी स्तंभ-लेख में हूणों से संघर्ष का उल्लेख मिलता है।
  • जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार पर्णदत्त सौराष्ट्र का गोप्ता (शासक) था और उसके पुत्र चक्रपालित ने सुदर्शन झील के बाँध की मरम्मत कराई। नाटक में ये दोनों पात्र इसी इतिहास से लिए गए हैं।
  • स्कंदगुप्त ने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की; नाटक में भी इसकी सूचना मिलती है।
  • देवसेना, विजया, प्रपंचबुद्धि जैसे कई पात्र और प्रेम-प्रसंग प्रसाद की कल्पना हैं। मातृगुप्त को प्रसाद ने कवि कालिदास के रूप में दिखाया है।
स्कंदगुप्त नाटक इन्फोग्राफिक: राष्ट्र-पक्ष और षड्यंत्र-पक्ष के पात्र तथा पाँचों अंकों की मुख्य घटनाएँ

स्कंदगुप्त नाटक का सारांश (अंकवार)

प्रथम अंक : षड्यंत्र की शुरुआत

उज्जयिनी के स्कंधावार में युवराज स्कंदगुप्त अधिकार-सुख को “मादक और सारहीन” कहता है। वृद्ध सेनापति पर्णदत्त उसे अधिकारों के प्रति उदासीनता छोड़ने को कहता है, क्योंकि सम्राट कुमारगुप्त विलास में डूबे हैं और हूणों का खतरा बढ़ रहा है। मालव से दूत आता है कि महाराज विश्ववर्मा का देहांत हो गया है और नए राजा बंधुवर्मा शक-हूणों से घिरे हैं। स्कंद मालव की रक्षा का वचन देता है।

कुसुमपुर में कुमारगुप्त की सभा में सिंहल का राजकुमार कुमारदास (धातुसेन) व्यंग्य करता है। छोटी रानी अनंतदेवी अपने पुत्र पुरगुप्त को सिंहासन दिलाने के लिए भटार्क (नया महाबलाधिकृत) और बौद्ध कापालिक प्रपंचबुद्धि के साथ षड्यंत्र रचती है। सम्राट की मृत्यु को छिपाया जाता है। अंतःपुर के द्वार पर कुमारामात्य पृथ्वीसेन, महाप्रतिहार और दंडनायक पुरगुप्त को सम्राट मानने से इनकार करते हैं और आत्म-बलिदान कर देते हैं। अवंती के दुर्ग में बंधुवर्मा, जयमाला, भीमवर्मा और देवसेना हूणों से घिरे हैं; तभी स्कंदगुप्त पहुँचकर उन्हें बचाता है।

द्वितीय अंक : देवकी की रक्षा और बंधुवर्मा का त्याग

शिप्रा-तट पर देवसेना और विजया संगीत और प्रेम पर बात करती हैं। विजया स्कंद की ओर आकर्षित है। मठ में प्रपंचबुद्धि, भटार्क और शर्वनाग महादेवी देवकी (स्कंद की माता) की हत्या की योजना बनाते हैं। शर्वनाग पहले मना करता है, पर बाद में लालच और मदिरा में फँस जाता है। उसकी पत्नी रामा पति को रोकती है और देवकी की रक्षा करती है। ठीक समय पर स्कंदगुप्त पहुँचकर देवकी को बचाता है और अनंतदेवी को चेतावनी देकर छोड़ देता है।

अवंती-दुर्ग में बंधुवर्मा देश के हित में अपना मालव राज्य स्कंदगुप्त को सौंपने का निर्णय करता है। जयमाला पहले विरोध करती है, पर भीमवर्मा और देवसेना के समर्थन से बंधुवर्मा का त्याग पूरा होता है। अंक के अंत में राजसभा में शर्वनाग के अपराध का न्याय होता है; रामा के पुण्य के कारण स्कंद उसे प्राणदंड नहीं देता।

तृतीय अंक : श्मशान, बंधुवर्मा का बलिदान और कुभा का विश्वासघात

विजया को लगता है कि देवसेना ने उसका “स्वर्ग” छीन लिया। वह प्रपंचबुद्धि के साथ मिलकर देवसेना को श्मशान में बलि के लिए ले जाती है। ठीक समय पर मातृगुप्त प्रपंचबुद्धि का हाथ पकड़ लेता है और स्कंदगुप्त देवसेना को बचा लेता है। मगध में अनंतदेवी, पुरगुप्त, विजया और भटार्क फिर षड्यंत्र रचते हैं।

गांधार की घाटी के युद्ध में बंधुवर्मा वीरगति पाता है और मरते हुए कहता है कि भीम और देवसेना स्कंद की शरण हैं। कुभा नदी के रणक्षेत्र में स्कंद भटार्क को बाँध की रक्षा का काम देता है, पर भटार्क विश्वासघात करके बाँध तोड़ देता है। कुभा में बाढ़ आ जाती है और स्कंद की सेना बह जाती है।

चतुर्थ अंक : भटार्क का पश्चात्ताप और साम्राज्य की दुर्दशा

विजया अब भटार्क को अपना मानती है और अनंतदेवी से भिड़ जाती है। भटार्क के शिविर में उसकी माता कमला उसे देशद्रोही कहकर धिक्कारती है। शिविर में मौजूद महादेवी देवकी स्कंद के बारे में पूछती हैं; भटार्क के उत्तर से उन्हें लगता है कि स्कंद नहीं रहा और देवकी के प्राण निकल जाते हैं। भटार्क पश्चात्ताप में शस्त्र-त्याग करता है।

काश्मीर में मातृगुप्त अपनी पुरानी प्रेमिका मालिनी को वेश्या के रूप में पाता है। देश में ब्राह्मण-बौद्ध विवाद, अराजकता और भूख फैली है। विजया मातृगुप्त से उद्बोधन-गीत गाने को कहती है। अंत में कमला की कुटी में स्कंदगुप्त निराश अवस्था में मिलता है। कमला उसे कर्म के लिए उठने की प्रेरणा देती है। पर्णदत्त हूण से देवसेना की रक्षा करता है, और स्कंद को माता की मृत्यु का समाचार मिलता है।

पंचम अंक : त्याग, विजय और विदाई

कनिष्क-स्तूप के पास महादेवी की समाधि पर पर्णदत्त और देवसेना अनाथ सैनिकों के बच्चों के लिए भीख माँगते हैं। स्कंद देवसेना से प्रेम निवेदन करता है, पर देवसेना यह कहकर मना कर देती है कि मालव के त्याग का प्रतिदान लेकर वह मृत आत्मा का अपमान नहीं करेगी। तब स्कंद आजीवन कुमार (अविवाहित) रहने की प्रतिज्ञा करता है। विजया फिर स्कंद को धन और प्रेम का प्रलोभन देती है; ठुकराए जाने और भटार्क के धिक्कार के बाद वह छुरी से आत्महत्या कर लेती है। स्कंद भटार्क को आत्महत्या से रोककर देश-सेवा में लगाता है।

महाबोधि-विहार में धातुसेन अनंतदेवी और पुरगुप्त को बंदी बनाकर लाता है; स्कंद उन्हें क्षमा कर देता है। अंतिम युद्ध में हूण-सेनापति खिंगिल बंदी होता है और सम्राट को बचाते हुए वृद्ध पर्णदत्त की मृत्यु होती है। स्कंद रणभूमि में पुरगुप्त को रक्त का टीका लगाकर युवराज बनाता है और खिंगिल को यह कहकर छोड़ देता है कि वह सिंधु के इस पार कभी न आए। अंतिम दृश्य में देवसेना “आह! वेदना मिली विदाई” गाकर जीवन के सारे सुखों से विदा लेती है।

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स्कंदगुप्त नाटक के पात्र

पुरुष पात्र

पात्र परिचय
स्कंदगुप्त युवराज, बाद में सम्राट (विक्रमादित्य); नायक
कुमारगुप्त मगध का सम्राट, स्कंद का पिता
गोविंदगुप्त कुमारगुप्त का भाई
पर्णदत्त मगध का महानायक, वृद्ध सेनापति
चक्रपालित पर्णदत्त का पुत्र
बंधुवर्मा मालव का राजा
भीमवर्मा बंधुवर्मा का भाई
मातृगुप्त कवि (प्रसाद ने इसे कालिदास माना है)
प्रपंचबुद्धि बौद्ध कापालिक
शर्वनाग अंतर्वेद का विषयपति
कुमारदास (धातुसेन) सिंहल का राजकुमार
पुरगुप्त कुमारगुप्त का छोटा पुत्र
भटार्क नया महाबलाधिकृत
पृथ्वीसेन मंत्री, कुमारामात्य
खिंगिल हूण आक्रमणकारी
मुद्गल विदूषक
प्रख्यातकीर्ति लंका राजकुल का श्रमण, महाबोधि-विहार का स्थविर

स्त्री पात्र

पात्र परिचय
देवकी कुमारगुप्त की बड़ी रानी, स्कंद की माता
अनंतदेवी कुमारगुप्त की छोटी रानी, पुरगुप्त की माता
जयमाला बंधुवर्मा की पत्नी, मालव की रानी
देवसेना बंधुवर्मा की बहन; नायिका
विजया मालव के धनकुबेर की कन्या
कमला भटार्क की माता
रामा शर्वनाग की पत्नी
मालिनी मातृगुप्त की प्रेमिका

मुख्य पात्रों का चरित्र-चित्रण

स्कंदगुप्त : अधिकार से उदासीन, कर्तव्य का धनी

स्कंद नाटक के पहले ही वाक्य में अधिकार-सुख को सारहीन बताता है। वह सिंहासन के लिए झगड़ा नहीं चाहता, पर देश पर संकट आते ही सबसे आगे लड़ता है। वह क्षमाशील है: अनंतदेवी, भटार्क और पुरगुप्त सबको क्षमा करता है, और शर्वनाग को प्राणदंड नहीं देता। प्रेम में भी वह त्यागी है: देवसेना के इनकार के बाद आजीवन कुमार रहने का व्रत लेता है। उसमें दार्शनिक उदासी और वीरता दोनों हैं, इसलिए आलोचक उसे “धीरोदात्त” और अंतर्द्वंद्व वाला नायक मानते हैं।

देवसेना : त्याग और करुणा की मूर्ति

देवसेना संगीत-प्रेमी, भावुक और आत्मसम्मानी है। वह स्कंद से प्रेम करती है, पर प्रणय को “मूल्य देकर” नहीं लेना चाहती। श्मशान में बलि के समय भी वह अपने देवता युवराज की जय बोलती है। अंत में वह प्रतिदान ठुकराकर “आह! वेदना मिली विदाई” गाते हुए जीवन के सुखों से विदा लेती है। वह प्रसाद की सबसे करुण और उदात्त नायिकाओं में गिनी जाती है।

विजया : महत्वाकांक्षा और अस्थिरता

विजया धनी, रूपवती और महत्वाकांक्षी है। वह पहले स्कंद, फिर भटार्क, फिर पुरगुप्त के सिंहासन की ओर झुकती है। ईर्ष्या में वह देवसेना को बलि तक पहुँचा देती है, पर बाद में देश-सेवा की बातें भी करती है। अंत में अपमान सह न पाकर आत्महत्या कर लेती है। वह देवसेना का विरोधी (प्रतिनायिका जैसा) चरित्र है।

भटार्क : महत्वाकांक्षा से पश्चात्ताप तक

भटार्क वीर है, पर अनंतदेवी के प्रभाव में षड्यंत्रकारी बन जाता है। कुभा का बाँध तोड़ना उसका सबसे बड़ा विश्वासघात है। माता कमला की धिक्कार और देवकी की मृत्यु के बाद उसमें पश्चात्ताप जागता है और अंत में वह स्कंद का सहयोगी बनता है।

अनंतदेवी : षड्यंत्र की धुरी

अनंतदेवी अपने पुत्र पुरगुप्त को सम्राट बनाने के लिए हर साधन अपनाती है: सम्राट की मृत्यु छिपाना, देवकी की हत्या की योजना और विदेशी शत्रुओं से मेल। अंत में वह बंदी होती है और स्कंद उसे भी क्षमा कर देता है।

बंधुवर्मा, जयमाला और भीमवर्मा : त्याग का मालव-परिवार

बंधुवर्मा देश के लिए अपना राज्य स्कंद को सौंपता है और खुद “साधारण पदातिक” बनकर लड़ता है; अंत में वीरगति पाता है। जयमाला पहले संकोच करती है, पर बाद में सती का आदर्श निभाती है। भीमवर्मा भाई के निर्णय का साथ देता है।

पर्णदत्त, चक्रपालित, मातृगुप्त और अन्य

पर्णदत्त साम्राज्य का निष्ठावान वृद्ध सेनापति है, जो अंत में सम्राट की रक्षा करते हुए प्राण देता है। चक्रपालित स्पष्टवादी युवा वीर है। मातृगुप्त कवि है, जो देवसेना को बचाता है और राष्ट्रगीत गाता है। शर्वनाग की पत्नी रामा और भटार्क की माता कमला नाटक की नैतिक शक्ति हैं। मुद्गल विदूषक के रूप में हास्य लाता है, और प्रपंचबुद्धि धर्म के नाम पर हिंसा का प्रतीक है।

स्कंदगुप्त के महत्वपूर्ण कथन: किसने किससे कहा (47 कथन)

नीचे के सभी कथन नाटक के मूल पाठ से लिए गए हैं। लंबे कथनों का मुख्य अंश दिया गया है। “स्वगत” का अर्थ है कि पात्र अपने आप से कह रहा है। परीक्षा में ‘वक्ता’ और ‘श्रोता’ दोनों पूछे जाते हैं, इसलिए दोनों को साथ याद करें।

🧠 याद रखने की ट्रिक

स्कंद के कथन = विरक्ति और कर्तव्य (अधिकार-सुख, विडम्बना, कुमार-जीवन)। देवसेना के कथन = दर्शन, संगीत और त्याग (कसौटी, मूक शिक्षक, प्रतिदान)। कमला और रामा = नैतिक धिक्कार और प्रेरणा। पर्णदत्त = साम्राज्य की चिंता।

प्रथम अंक के कथन

कथन किसने → किससे प्रसंग
“अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है!” स्कंदगुप्त (स्वगत) नाटक का पहला वाक्य; उज्जयिनी का स्कंधावार
“आँधी आने के पहले आकाश जिस तरह स्तम्भित हो रहता है…” पर्णदत्त → स्कंदगुप्त साम्राज्य पर आने वाले संकट के लक्षण बताते हुए
“असावधान बालक! अपनी चंचलता को विष-वृक्ष का बीज न बना देना।” पर्णदत्त → चक्रपालित चक्रपालित की राजनीतिक बातों पर सावधान करते हुए
“मालव की रक्षा गुप्त-सेना का कर्त्तव्य है।” स्कंदगुप्त → मालव का दूत मालव पर संकट का समाचार सुनकर
“अब तो मैं सिंहल जाता हूँ–देश की पुकार है। … स्वप्नों का देश ‘भव्य भारत’ छोड़ता हूँ।” कुमारदास (धातुसेन) → मातृगुप्त विदा लेते समय
“काश्मीर! जन्मभूमि!! जिसकी धूलि में लोट कर खड़े होना सीखा…” मातृगुप्त (जन्मभूमि की याद में) पथ में, मुद्गल की उपस्थिति में
“कुमार! तुम्हारे दुर्बल और अत्याचारी हाथों में गुप्त-साम्राज्य का राजदंड टिकेगा नहीं।” पृथ्वीसेन → पुरगुप्त अंतःपुर के द्वार पर, पुरगुप्त को सम्राट मानने से इनकार
“…सब मेरी प्रतिहिंसा राक्षसी के लिये बलि हो!” भटार्क (स्वगत) पृथ्वीसेन आदि के आत्म-बलिदान के बाद
“अत्याचार के श्मशान में ही मङ्गल का, शिव का, सत्य सुन्दर संगीत का समारम्भ होता है।” जयमाला → देवसेना अवंती-दुर्ग पर हूणों के घेरे के समय
“रानी! तुम लोग आग की चिनगारियाँ हो, या स्त्री हो?” विजया → जयमाला संकट में भी गीत गाने की बात पर

द्वितीय अंक के कथन

कथन किसने → किससे प्रसंग
“पवित्रता की माप है मलिनता, सुख का आलोचक है दुःख, पुण्य की कसौटी है पाप।” देवसेना → विजया शिप्रा-तट के कुंज में
“विश्व के प्रत्येक कम्प में एक ताल है।” देवसेना → विजया संगीत की महिमा बताते हुए
“संपूर्ण संसार कर्म्मण्य वीरों की चित्र-शाला है।” चक्रपालित → स्कंदगुप्त स्कंद को कर्म के लिए उत्तेजित करते हुए
“ऐसा जीवन तो विडम्बना है, जिसके लिये दिन-रात लड़ना पड़े।” स्कंदगुप्त → चक्रपालित युद्ध और संघर्ष से विरक्ति
“…सम्राट कुमारगुप्त का आसन मेरे योग्य नहीं है। … पुरगुप्त को रहने दो।” स्कंदगुप्त → चक्रपालित सिंहासन के प्रश्न पर
“लाभ ही के लिये मनुष्य सब काम करता, तो पशु बना रहना ही उसके लिये पर्याप्त था।” शर्वनाग → भटार्क मठ में देवकी की हत्या का प्रस्ताव ठुकराते हुए
“शंका न करो, श्रद्धा करो; श्रद्धा का फल मिलेगा।” भटार्क → शर्वनाग शर्वनाग को षड्यंत्र में खींचते हुए
“मुझे अपना स्वामी अपने उसी मनुष्य-रूप में चाहिये।” रामा → शर्वनाग पति को पाप से रोकते हुए
“…संसार के सबसे पवित्र धर्म्म कृतज्ञता को भूल जाता है…” रामा → शर्वनाग देवकी के बंदीगृह में
“तू वीर है? अर्द्धरात्रि में निस्सहाय अबला महादेवी की हत्या के उद्देश से घुसनेवाला चोर!” स्कंदगुप्त → भटार्क देवकी को बचाते समय
“मैं स्त्री पर हाथ नहीं उठाता, परन्तु सावधान!” स्कंदगुप्त → अनंतदेवी अनंतदेवी को चेतावनी देकर छोड़ते हुए
“समष्टि में भी व्यष्टि रहता है। व्यक्तियों से ही जाति बनती है।” जयमाला → देवसेना राज्य सौंपने के निर्णय पर बहस
“बंधुवर्मा तो आज से आर्य्य-साम्राज्य-सेना का एक साधारण पदातिक…” बंधुवर्मा → जयमाला मालव राज्य स्कंद को सौंपते हुए

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तृतीय अंक के कथन

कथन किसने → किससे प्रसंग
“देवसेना मूल्य देकर प्रणय नहीं लिया चाहती है।” देवसेना → विजया विजया के आरोप का उत्तर
“इस साम्राज्य का बोझ किसके लिये? हृदय में अशान्ति, राज्य में अशान्ति, परिवार में अशान्ति!” स्कंदगुप्त (स्वगत) श्मशान में टहलते हुए
“संसार का मूक शिक्षक ‘श्मशान’ क्या डरने की वस्तु है?” देवसेना → विजया श्मशान में
“प्रियतम! मेरे देवता युवराज!! तुम्हारी जय हो!” देवसेना (बलि से पहले) प्रपंचबुद्धि के खड्ग के नीचे सिर झुकाते हुए
“साधु! तुम यथार्थ ही जननी जन्म-भूमि की संतान हो।” स्कंदगुप्त → मगध का सैनिक गांधार की घाटी के रणक्षेत्र में
“स्कंदगुप्त से कहना कि मालव-वीर ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की; भीम और देवसेना उनकी शरण हैं।” बंधुवर्मा (मरते हुए) गांधार के युद्ध में वीरगति के समय
“वीर मगध-सैनिकों! … गरुड़ध्वज का मान रहे, भले ही प्राण जायँ!” स्कंदगुप्त → मगध-सेना कुभा के रणक्षेत्र में

चतुर्थ अंक के कथन

कथन किसने → किससे प्रसंग
“मुझे तुझको पुत्र कहने में संकोच होता है…” कमला → भटार्क भटार्क के शिविर में
“बता भटार्क! वह आर्य्यावर्त्त का रत्न कहाँ है?” देवकी → भटार्क स्कंद के बारे में पूछते हुए
“मैं धर्म्म-लाभ करने के लिये भिक्षु हुआ हूँ, महास्थविर बनने के लिये नहीं।” प्रख्यातकीर्ति → धातुसेन नगर-प्रांत के पथ में
“एक बार वह उद्बोधन-गीत गा दो…” विजया → मातृगुप्त देश की दुर्दशा देखकर
“जो अपने कर्म्मों को ईश्वर का कर्म्म समझकर करता है, वही ईश्वर का अवतार है।” कमला → स्कंदगुप्त कमला की कुटी में, निराश स्कंद को प्रेरणा
“उठो स्कंद! आसुरी वृत्तियों का नाश करो, सोनेवालों को जगाओ, और रोनेवालों को हँसाओ।” कमला → स्कंदगुप्त उसी प्रसंग में

पंचम अंक के कथन

कथन किसने → किससे प्रसंग
“आवश्यकता ही संसार के व्यवहारों की दलाल है! परन्तु मनुष्यता भी कोई वस्तु है मुद्गल!” विजया → मुद्गल पथ में
“भीख दो बाबा! देश के बच्चे भूखे हैं, नंगे हैं, असहाय हैं…” पर्णदत्त → नागरिक कनिष्क-स्तूप के पास
“मालव ने जो देश के लिये उत्सर्ग किया है, उसका प्रतिदान लेकर मृत आत्मा का अपमान न करूँगी।” देवसेना → स्कंदगुप्त स्कंद के प्रेम-निवेदन पर
“आज से मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि, मैं कुमार-जीवन ही व्यतीत करूँगा।” स्कंदगुप्त → देवसेना महादेवी की समाधि के पास
“देवव्रत! तुम्हारी जय हो।” देवसेना → स्कंदगुप्त स्कंद की प्रतिज्ञा पर
“तुमसे यदि स्वर्ग भी मिले, तो मैं उससे दूर ही रहना चाहता हूँ।” स्कंदगुप्त → विजया विजया के प्रलोभन पर
“हिंस्र पशु कभी एकादशी का व्रत करेगा–कभी पिशाची शांति-पाठ पढ़ेगी!” भटार्क → विजया विजया को धिक्कारते हुए
“तुम वीर हो, इस समय देश को वीरों की आवश्यकता है। तुम्हारा यह प्रायश्चित्त नहीं।” स्कंदगुप्त → भटार्क भटार्क को आत्महत्या से रोकते हुए
“…मैं पुरगुप्त को युवराज बनाता हूँ। देखना, मेरे बाद जन्मभूमि की दुर्दशा न हो।” स्कंदगुप्त → भटार्क/पुरगुप्त अंतिम रणभूमि में
“हृदय की कोमल कल्पना! सो जा।” देवसेना (स्वगत) अंतिम दृश्य, उद्यान
“कष्ट, हृदय की कसौटी है, तपस्या अग्नि है।” देवसेना → स्कंदगुप्त अंतिम विदाई के समय

प्रमुख कथनों की व्याख्या

“अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है!”

संदर्भ-प्रसंग: नाटक का पहला वाक्य। उज्जयिनी के स्कंधावार में टहलते हुए युवराज स्कंदगुप्त स्वगत कहता है।
व्याख्या: सत्ता का सुख नशे जैसा है, पर भीतर से खोखला है। अधिकार की लालसा मनुष्य से “बेगार” कराती है। यह वाक्य स्कंद की दार्शनिक उदासीनता और पूरे नाटक के अधिकार-संघर्ष की भूमिका बाँध देता है।
विशेष: पहले ही वाक्य से नायक का चरित्र और नाटक का केंद्रीय द्वंद्व (अधिकार बनाम कर्तव्य) स्पष्ट होता है।

“पवित्रता की माप है मलिनता, सुख का आलोचक है दुःख, पुण्य की कसौटी है पाप।”

संदर्भ-प्रसंग: द्वितीय अंक, शिप्रा-तट का कुंज। देवसेना विजया से बात करते हुए।
व्याख्या: हर गुण अपने विरोधी से ही पहचाना जाता है। दुख के बिना सुख का और पाप के बिना पुण्य का मूल्य नहीं समझ आता।
विशेष: द्वंद्वात्मक दर्शन, सूक्ति-शैली और देवसेना की गंभीर चिंतनशीलता।

“लाभ ही के लिये मनुष्य सब काम करता, तो पशु बना रहना ही उसके लिये पर्याप्त था।”

संदर्भ-प्रसंग: द्वितीय अंक, मठ। शर्वनाग भटार्क से, जब उससे देवकी की हत्या में साथ माँगा जाता है।
व्याख्या: मनुष्य को पशु से अलग करने वाली चीज़ नैतिकता है, केवल लाभ नहीं। शर्वनाग यहाँ अभी पाप से बचना चाहता है।
विशेष: यह कथन बाद में शर्वनाग के पतन और रामा के संघर्ष की पृष्ठभूमि बनता है।

“मालव ने जो देश के लिये उत्सर्ग किया है, उसका प्रतिदान लेकर मृत आत्मा का अपमान न करूँगी।”

संदर्भ-प्रसंग: पंचम अंक, महादेवी की समाधि। स्कंद के प्रेम-निवेदन पर देवसेना का उत्तर।
व्याख्या: बंधुवर्मा ने देश के लिए राज्य और प्राण दिए। यदि देवसेना अब सम्राट से विवाह करे, तो लोग इसे उस बलिदान का “बदला” समझेंगे। इसलिए वह प्रेम होते हुए भी त्याग चुनती है।
विशेष: देवसेना के आत्मसम्मान और त्याग का शिखर; यहीं से स्कंद की “कुमार-जीवन” की प्रतिज्ञा निकलती है।

“जो अपने कर्म्मों को ईश्वर का कर्म्म समझकर करता है, वही ईश्वर का अवतार है।”

संदर्भ-प्रसंग: चतुर्थ अंक, कमला की कुटी। निराश स्कंदगुप्त से भटार्क की माता कमला।
व्याख्या: अवतार कोई अलौकिक शक्ति नहीं, बल्कि निष्काम कर्म करने वाला मनुष्य है। कमला स्कंद को राम-कृष्ण की तरह देश के उद्धार के लिए उठने को कहती है।
विशेष: गीता के निष्काम कर्म का प्रभाव और नाटक में राष्ट्रीय जागरण का संदेश।

“कष्ट, हृदय की कसौटी है, तपस्या अग्नि है।”

संदर्भ-प्रसंग: अंतिम दृश्य। देवसेना स्कंदगुप्त से विदा लेते हुए।
व्याख्या: कष्ट सहकर ही हृदय की सच्चाई परखी जाती है, जैसे सोना अग्नि में। देवसेना अपने त्याग को तपस्या मानती है।
विशेष: करुण और उदात्त अंत; इसके साथ ही “आह! वेदना मिली विदाई” गीत आता है।

स्कंदगुप्त नाटक में आए प्रमुख गीत

गीत की पहली पंक्ति किसने गाया अंक
न छेड़ना उस अतीत स्मृति से खिंचे हुए बीन-तार कोकिल नर्तकियाँ (कुमारगुप्त की सभा) प्रथम
संसृति के वे सुंदरतम क्षण यों ही भूल नहीं जाना मातृगुप्त प्रथम
भरा नैनों में मन में रूप किसी छलिया का अमल अनूप देवसेना प्रथम
सब जीवन बीता जाता है, धूप-छाँह के खेल-सदृश नेपथ्य से (श्मशान दृश्य) तृतीय
देश की दुर्दशा निहारोगे, डूबते को कभी उबारोगे देवसेना पंचम
अगरु-धूम की श्याम लहरियाँ उलझी हों इन अलकों से विजया (स्कंद को रिझाते हुए) पंचम
हिमालय के आँगन में उसे प्रथम किरणों का दे उपहार मातृगुप्त पंचम
आह! वेदना मिली विदाई देवसेना पंचम (अंतिम)

📝 परीक्षा के लिए

“हिमालय के आँगन में…” भारत-गौरव का प्रसिद्ध गीत है, जिसे रणक्षेत्र में मातृगुप्त गाता है। चंद्रगुप्त नाटक के “अरुण यह मधुमय देश हमारा” (कार्नेलिया) और “हिमाद्रि तुंग शृंग से” (अलका) से इसे न मिलाएँ।

स्कंदगुप्त का उद्देश्य और राष्ट्रीय चेतना

राष्ट्रप्रेम

हूणों के विरुद्ध संघर्ष के बहाने पराधीन भारत में राष्ट्रीय एकता का संदेश।

अधिकार बनाम कर्तव्य

स्कंद सत्ता नहीं, कर्तव्य के लिए लड़ता है।

गृह-कलह का दुष्परिणाम

अनंतदेवी-भटार्क का षड्यंत्र दिखाता है कि आंतरिक फूट बाहरी शत्रु को रास्ता देती है।

त्याग और बलिदान

बंधुवर्मा, पर्णदत्त, देवसेना और स्कंद सबका त्याग।

धर्म के नाम पर हिंसा

प्रपंचबुद्धि और ब्राह्मण-बौद्ध विवाद के माध्यम से धार्मिक कट्टरता की आलोचना।

नारी-गौरव

देवसेना, रामा, कमला और जयमाला नैतिक शक्ति की प्रतीक।

नाट्य-शिल्प, भाषा और आलोचना

  • भारतीय और पाश्चात्य शैली का समन्वय: अंक-दृश्य विभाजन, अंतर्द्वंद्व और संघर्ष पाश्चात्य ढंग का है, जबकि आदर्श, रस और नायक की उदात्तता भारतीय परंपरा की।
  • अंत का स्वरूप: नायक को विजय मिलती है पर प्रेम में वियोग रहता है। इसलिए इसे पूर्ण सुखांत या दुःखांत न कहकर कुछ आलोचक ‘प्रसादांत’ कहते हैं।
  • भाषा: तत्सम-प्रधान, काव्यात्मक और सूक्ति-बहुल हिंदी; लंबे स्वगत कथन।
  • गीत-योजना: गीत भावों को गहराते हैं, पर कई आलोचक इन्हें मंचन में बाधक भी मानते हैं।
  • मंचन की कठिनाई: पात्रों और दृश्यों की अधिकता, लंबे संवाद और युद्ध-दृश्यों के कारण इसे रंगमंच पर उतारना कठिन माना गया।
  • विदूषक: मुद्गल संस्कृत नाट्य-परंपरा का विदूषक है।

स्कंदगुप्त नाटक के प्रति आलोचकों के कथन

परीक्षाओं में अब पात्रों के कथनों के साथ यह भी पूछा जाता है कि नाटक के बारे में कोई मत किस आलोचक का है। नीचे वे मत दिए गए हैं जो परीक्षा-सामग्री और संदर्भ-ग्रंथों में आलोचकों के नाम के साथ मिलते हैं। जिन मतों का शब्दशः पाठ उपलब्ध नहीं है, उनका केवल आशय दिया गया है।

🖋️ आचार्य रामचंद्र शुक्ल

“प्रसाद के नाटकों में स्कंदगुप्त श्रेष्ठ है।”

परीक्षा-प्रश्नों में यह कथन शुक्ल जी का बताया जाता है।

🖋️ डॉ. दशरथ ओझा (हिंदी नाटक : उद्भव और विकास)

“स्कंदगुप्त नाटक के वस्तु-विन्यास में प्रसाद की प्रतिभा सजीव हो उठी है और उनकी नाट्यकला ने अपना अपूर्व कौशल दिखाया है।”

आशय: कथानक के गठन की दृष्टि से यह प्रसाद का सबसे सधा हुआ नाटक है।

🖋️ डॉ. दशरथ ओझा (हिंदी नाटक : उद्भव और विकास)

“इस नाटक में भारतीय और यूरोपीय दोनों नाट्यकलाओं का सहज समन्वय है।”

आशय: रस, आदर्श और उदात्त नायक भारतीय परंपरा से; संघर्ष, अंतर्द्वंद्व और अंक-दृश्य योजना पाश्चात्य ढंग से।

🖋️ डॉ. जयनाथ नलिन (हिंदी नाटककार)

आशय: स्कंदगुप्त के कुछ दृश्य-परिवर्तनों में रंगमंच की दृष्टि से असुविधा है।

उदाहरण के रूप में प्रथम अंक में स्कंधावार से राजसभा वाले दृश्य पर, और चतुर्थ अंक में भटार्क के शिविर से काश्मीर के न्यायालय वाले दृश्य पर जाना गिनाया गया है।

🖋️ डॉ. हरीन्द्र

आशय: स्कंदगुप्त की अभिनेयता पर लगाए गए आक्षेप उचित नहीं हैं।

उनका तर्क है कि पाँच अंकों की योजना शेक्सपियर और संस्कृत नाटकों में भी मिलती है, और इस नाटक की शक्ति उसके नाटकीय कार्य-व्यापार में है।

🖋️ स्वयं जयशंकर प्रसाद

आशय: उनके नाटक परिष्कृत बुद्धि और रुचि वाले दर्शकों के लिए हैं; रंगमंच को नाटक के अनुसार बदलना चाहिए।

दृश्य-परिवर्तन की कठिनाई के समाधान के रूप में उन्होंने घूमने वाले (परिक्रामी) रंगमंच का सुझाव दिया।

📝 सामान्य आलोचनात्मक निष्कर्ष (परीक्षा के लिए)

  • अधिकांश आलोचक स्कंदगुप्त को प्रसाद का सबसे प्रौढ़ और श्रेष्ठ ऐतिहासिक नाटक मानते हैं।
  • शास्त्रीय दृष्टि (कथानक, चरित्र, रस) से इसे उत्तम माना गया है।
  • सबसे बड़ी आपत्ति अभिनेयता को लेकर है: पात्रों और दृश्यों की अधिकता, लंबे स्वगत, गीतों की संख्या और युद्ध-दृश्य।
  • राष्ट्रीय चेतना, त्याग और कर्तव्य-भावना को इसकी सबसे बड़ी शक्ति माना गया है।

“प्रसाद के नाटकों में स्कंदगुप्त श्रेष्ठ है।” — परीक्षा-प्रश्नों में यह कथन किसका माना गया है?

(A) डॉ. रामविलास शर्मा
(B) डॉ. गुलाबराय
(C) डॉ. गोपालराय
(D) आचार्य रामचंद्र शुक्ल

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (D) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
परीक्षा-सामग्री में यह मत शुक्ल जी के नाम से मिलता है।

“इस नाटक में भारतीय और यूरोपीय दोनों नाट्यकलाओं का सहज समन्वय है।” — स्कंदगुप्त के बारे में यह मत किसका है?

(A) डॉ. नगेंद्र
(B) डॉ. दशरथ ओझा
(C) डॉ. जयनाथ नलिन
(D) डॉ. बच्चन सिंह

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) डॉ. दशरथ ओझा
यह मत उनकी पुस्तक ‘हिंदी नाटक : उद्भव और विकास’ से है।

स्कंदगुप्त के दृश्य-परिवर्तन में रंगमंचीय असुविधा का उल्लेख किस आलोचक ने ‘हिंदी नाटककार’ में किया?

(A) डॉ. जयनाथ नलिन
(B) डॉ. हरीन्द्र
(C) डॉ. दशरथ ओझा
(D) आचार्य नंददुलारे वाजपेयी

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (A) डॉ. जयनाथ नलिन
डॉ. हरीन्द्र ने इसके विपरीत अभिनेयता पर लगे आक्षेपों का खंडन किया।

परीक्षा के लिए याद रखने योग्य तथ्य

  • पूरा नाम: स्कंदगुप्त विक्रमादित्य; प्रकाशन 1928।
  • 5 अंक; 33 दृश्य (अंकवार 7, 7, 6, 7, 6); कुछ स्रोतों में गीतों की संख्या 17 बताई गई है।
  • पहला वाक्य: “अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है!” (स्कंदगुप्त)।
  • अंतिम गीत: “आह! वेदना मिली विदाई” (देवसेना)।
  • मातृगुप्त को प्रसाद ने कालिदास माना है; धातुसेन = कुमारदास (सिंहल का राजकुमार)।
  • अनंतदेवी कुमारगुप्त की छोटी रानी और पुरगुप्त की माता है; देवकी बड़ी रानी और स्कंद की माता।
  • भटार्क की माता कमला, शर्वनाग की पत्नी रामा, मातृगुप्त की प्रेमिका मालिनी।
  • कुभा नदी का बाँध भटार्क तोड़ता है; स्कंद की सेना बह जाती है।
  • बंधुवर्मा अपना मालव राज्य स्कंद को सौंपता है और गांधार के युद्ध में वीरगति पाता है।
  • देवसेना को श्मशान में बलि से मातृगुप्त बचाता है (प्रपंचबुद्धि का हाथ पकड़कर)।
  • विजया अंत में छुरी से आत्महत्या करती है।
  • पर्णदत्त अंतिम युद्ध में सम्राट को बचाते हुए मरता है।
  • स्कंद आजीवन कुमार रहने का व्रत लेता है और पुरगुप्त को युवराज बनाता है।
  • हूण सेनापति खिंगिल बंदी होकर छोड़ दिया जाता है।

स्कंदगुप्त नाटक के 16 महत्वपूर्ण MCQ

पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक करें। अधिकांश प्रश्न कथन-आधारित हैं।

1“अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है!” — यह कथन किसका है?

(A) पर्णदत्त
(B) स्कंदगुप्त
(C) बंधुवर्मा
(D) कुमारगुप्त

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) स्कंदगुप्त
यह नाटक का पहला वाक्य है, जिसे स्कंद उज्जयिनी के स्कंधावार में स्वगत कहता है।

2“पवित्रता की माप है मलिनता, सुख का आलोचक है दुःख, पुण्य की कसौटी है पाप।” — किसने किससे कहा?

(A) जयमाला ने देवसेना से
(B) देवसेना ने विजया से
(C) विजया ने देवसेना से
(D) कमला ने भटार्क से

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) देवसेना ने विजया से
द्वितीय अंक, शिप्रा-तट के कुंज में।

3“जो अपने कर्म्मों को ईश्वर का कर्म्म समझकर करता है, वही ईश्वर का अवतार है।” — वक्ता और श्रोता हैं:

(A) देवकी → स्कंदगुप्त
(B) कमला → स्कंदगुप्त
(C) कमला → भटार्क
(D) पर्णदत्त → चक्रपालित

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) कमला → स्कंदगुप्त
चतुर्थ अंक, कमला की कुटी में भटार्क की माता निराश स्कंद को कर्म की प्रेरणा देती है।

4सूची I (कथन) को सूची II (वक्ता) से सुमेलित कीजिए:

सूची I सूची II
A. मुझे तुझको पुत्र कहने में संकोच होता है I. देवसेना
B. मुझे अपना स्वामी अपने उसी मनुष्य-रूप में चाहिये II. पृथ्वीसेन
C. देवसेना मूल्य देकर प्रणय नहीं लिया चाहती है III. कमला
D. तुम्हारे दुर्बल और अत्याचारी हाथों में… राजदंड टिकेगा नहीं IV. रामा

 

(1) A-III, B-IV, C-I, D-II
(2) A-IV, B-III, C-I, D-II
(3) A-III, B-IV, C-II, D-I
(4) A-I, B-II, C-III, D-IV

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (1) A-III, B-IV, C-I, D-II
कमला → भटार्क, रामा → शर्वनाग, देवसेना → विजया, पृथ्वीसेन → पुरगुप्त।

5“लाभ ही के लिये मनुष्य सब काम करता, तो पशु बना रहना ही उसके लिये पर्याप्त था।” — यह किसने कहा?

(A) प्रपंचबुद्धि
(B) भटार्क
(C) शर्वनाग
(D) मातृगुप्त

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) शर्वनाग
मठ में भटार्क द्वारा देवकी की हत्या में साथ माँगने पर शर्वनाग का उत्तर।

6“आज से मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं कुमार-जीवन ही व्यतीत करूँगा।” — स्कंदगुप्त यह किससे कहता है?

(A) विजया
(B) देवसेना
(C) देवकी
(D) पर्णदत्त

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) देवसेना
देवसेना के प्रेम-अस्वीकार के बाद, महादेवी की समाधि के पास।

7स्कंदगुप्त नाटक के अनुसार कुभा नदी का बाँध किसने तोड़ा?

(A) खिंगिल
(B) पुरगुप्त
(C) भटार्क
(D) प्रपंचबुद्धि

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) भटार्क
विश्वासघाती भटार्क ने बाँध तोड़ा, जिससे स्कंद की सेना बह गई।

8श्मशान में देवसेना को प्रपंचबुद्धि की बलि से किसने बचाया?

(A) भीमवर्मा
(B) चक्रपालित
(C) मातृगुप्त
(D) शर्वनाग

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) मातृगुप्त
मातृगुप्त ने पीछे से आकर प्रपंचबुद्धि का हाथ पकड़ लिया।

9निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
(A) स्कंदगुप्त 1928 में प्रकाशित हुआ।
(B) नाटक में 5 अंक हैं।
(C) अंतिम गीत “आह! वेदना मिली विदाई” विजया गाती है।
(D) मातृगुप्त को प्रसाद ने कालिदास माना है।

(1) केवल A और B
(2) केवल A, B और D
(3) केवल B, C और D
(4) A, B, C और D सभी

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (2) केवल A, B और D
C गलत है; अंतिम गीत देवसेना गाती है।

10घटनाओं को सही क्रम में लगाइए:
(A) कुभा का बाँध टूटना
(B) देवकी की रक्षा
(C) स्कंद की कुमार-व्रत की प्रतिज्ञा
(D) बंधुवर्मा द्वारा राज्य सौंपना

(1) B-D-A-C
(2) D-B-A-C
(3) B-A-D-C
(4) D-A-B-C

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (1) B-D-A-C
देवकी की रक्षा और राज्य सौंपना (द्वितीय अंक) → कुभा (तृतीय) → प्रतिज्ञा (पंचम)।

11अभिकथन (A): देवसेना स्कंद का प्रेम-निवेदन अस्वीकार कर देती है।
कारण (R): वह मालव के बलिदान का प्रतिदान लेकर मृत आत्मा का अपमान नहीं करना चाहती।

(1) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
(2) A और R दोनों सही हैं, पर R, A की सही व्याख्या नहीं है
(3) A सही है, R गलत है
(4) A गलत है, R सही है

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (1)
देवसेना स्वयं यही कारण बताती है।

12कथन I: अनंतदेवी कुमारगुप्त की बड़ी रानी है।
कथन II: पुरगुप्त अनंतदेवी का पुत्र है।

(1) दोनों सही
(2) कथन I सही, कथन II गलत
(3) कथन I गलत, कथन II सही
(4) दोनों गलत

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (3) कथन I गलत, कथन II सही
बड़ी रानी देवकी (स्कंद की माता) है; अनंतदेवी छोटी रानी और पुरगुप्त की माता है।

13“हिमालय के आँगन में उसे प्रथम किरणों का दे उपहार” — यह गीत नाटक में कौन गाता है?

(A) देवसेना
(B) मातृगुप्त
(C) विजया
(D) जयमाला

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) मातृगुप्त
पंचम अंक में रणक्षेत्र में मातृगुप्त यह गीत गाता है।

14“हिंस्र पशु कभी एकादशी का व्रत करेगा–कभी पिशाची शांति-पाठ पढ़ेगी!” — किसने किससे कहा?

(A) स्कंद → अनंतदेवी
(B) भटार्क → विजया
(C) कमला → विजया
(D) पर्णदत्त → भटार्क

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) भटार्क → विजया
पंचम अंक; इसके बाद विजया आत्महत्या कर लेती है।

15“संसार का मूक शिक्षक ‘श्मशान’ क्या डरने की वस्तु है?” — यह कथन किसका है?

(A) प्रपंचबुद्धि
(B) विजया
(C) देवसेना
(D) स्कंदगुप्त

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) देवसेना
श्मशान में विजया के प्रश्न पर देवसेना का उत्तर।

16अंत में स्कंदगुप्त किसे युवराज बनाता है?

(A) भीमवर्मा
(B) चक्रपालित
(C) पुरगुप्त
(D) धातुसेन

👉 उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) पुरगुप्त
रणभूमि में रक्त का टीका लगाकर, भटार्क की प्रतिज्ञा पूरी करते हुए।

स्कंदगुप्त नाटक पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

❓ स्कंदगुप्त नाटक के लेखक कौन हैं?

स्कंदगुप्त के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं।

❓ स्कंदगुप्त नाटक कब प्रकाशित हुआ?

स्कंदगुप्त (स्कंदगुप्त विक्रमादित्य) 1928 में प्रकाशित हुआ।

❓ स्कंदगुप्त नाटक में कितने अंक हैं?

इसमें 5 अंक और कुल 33 दृश्य हैं (अंकवार 7, 7, 6, 7, 6)।

❓ स्कंदगुप्त नाटक की नायिका कौन है?

नायिका देवसेना है, जो मालव-नरेश बंधुवर्मा की बहन है।

❓ स्कंदगुप्त नाटक का पहला वाक्य क्या है?

पहला वाक्य है: “अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है!” जिसे स्कंदगुप्त कहता है।

❓ स्कंदगुप्त नाटक का अंत कैसे होता है?

स्कंद हूणों को हराकर पुरगुप्त को युवराज बनाता है और आजीवन कुमार रहने का व्रत लेता है। देवसेना “आह! वेदना मिली विदाई” गाकर जीवन के सुखों से विदा लेती है।

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केवल कृष्ण घोड़ेला — Keval Krishan Ghorela
लेखक परिचय: केवल कृष्ण घोड़ेला
एम.ए., बी.एड. (नेट हिंदी), कॉलेज व्याख्याता, श्रीगंगानगर (राजस्थान); हिंदी साहित्य चैनल के संचालक
🌐 hindisahity.com | 🌐 store.hindisahity.com
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