अंतिम संशोधित (Last Updated): September 30, 2026
संचारी भाव किसे कहते हैं? 33 संचारी भाव के नाम, प्रकार और उदाहरण
हिंदी काव्य शास्त्र और रस निष्पत्ति में संचारी भाव (व्यभिचारी भाव) का विशेष स्थान है। आचार्य भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में रसों के संदर्भ में संचारी भावों की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कुल 33 संचारी भावों का उल्लेख किया है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UGC NET/JRF, TGT, PGT, RAS और अन्य सिविल सेवा परीक्षाओं) की दृष्टि से संचारी भावों और उनके उदाहरणों का गहन अध्ययन करना अनिवार्य है।
📌 इस लेख में आप आगे क्या-क्या पढ़ने वाले हैं? (Quick Overview):
संचारी भाव की सबसे आसान और प्रामाणिक परिभाषा
आचार्य भरतमुनि का शास्त्रीय मत
सभी 33 संचारी भावों के नाम की डबल-कॉलम सूची
स्थाई भाव और संचारी भाव में मुख्य अंतर
सभी 33 संचारी भावों के दो-दो प्रामाणिक उदाहरण
अन्त में: प्रतियोगी परीक्षाओं (UGC NET/TGT,PGT,RPSC) के लिए खास शॉर्टकट टिप्स और महत्वपूर्ण FAQ
संचारी भाव (व्यभिचारी भाव) किसे कहते हैं?
वे भाव जो मन में थोड़े समय के लिए उत्पन्न होते हैं और फिर तुरंत विलुप्त (समाप्त) हो जाते हैं, उन्हें संचारी भाव या व्यभिचारी भाव कहते हैं। इन भावों की प्रकृति पानी के बुलबुलों की तरह होती है, जो जल में उठते हैं और क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं। चूँकि ये स्थायी भाव तक पहुँचने में विभिन्न प्रकार से सहयोग करते हैं, इसलिए इन्हें ‘व्यभिचारी’ (भली-भांति सब ओर संचार करने वाला) भी कहा जाता है। इनकी कुल संख्या 33 मानी गई है।

आचार्य भरतमुनि और अन्य आचार्यों के अनुसार संचारी भाव
भारतीय काव्य शास्त्र के आदिश्रष्टा आचार्य भरतमुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ नाट्यशास्त्र में रस की निष्पत्ति को समझाते हुए संचारी भावों की परिभाषा दी है। उनके अनुसार— “विभावानुभावव्यभिचारीसंयोगद्रसनिष्पत्तिः” अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से ही रस की निष्पत्ति होती है। आचार्य विश्वनाथ और मम्मट जैसे अन्य संस्कृत आचार्यों ने भी संचारी भावों को पानी की लहरों या बुलबुलों के समान बताया है जो स्थायी भाव को पुष्ट करने के लिए प्रगट होते हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाते हैं।
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33 संचारी भाव के नाम (सूची)
प्रतियोगी परीक्षाओं की बेहतरीन और सरल तैयारी के लिए यहाँ सभी 33 संचारी भावों के नाम सूचीबद्ध किए गए हैं:
| क्र.सं. | 33 संचारी भावों के नाम | क्र.सं. | 33 संचारी भावों के नाम |
| 1 | निर्वेद | 18 | ग्लानि |
| 2 | हर्ष | 19 | जड़ता |
| 3 | गर्व | 20 | मोह |
| 4 | उत्सुकता | 21 | दैन्य |
| 5 | चपलता | 22 | शंका |
| 6 | मद (नशा) | 23 | चिंता |
| 7 | उन्माद | 24 | विषाद |
| 8 | अपस्मार | 25 | आवेग |
| 9 | क्रीडा (लज्जा) | 26 | उग्रता |
| 10 | अवहित्था | 27 | असूया (ईर्ष्या) |
| 11 | आलस्य | 28 | स्मृति |
| 12 | श्रम | 29 | त्रास |
| 13 | व्याधि | 30 | वितर्क |
| 14 | मरण | 31 | मति |
| 15 | स्वप्न | 32 | धृति |
| 16 | निद्रा | 33 | अमर्ष |
| 17 | विबोध (जागना) | – | – |
स्थायी भाव और संचारी भाव में मुख्य अंतर
विद्यार्थियों के अक्सर पूछे जाने वाले संशय को दूर करने के लिए स्थायी भाव और संचारी भाव के बीच की मुख्य तुलना नीचे दी गई है:
| आधार | स्थायी भाव | संचारी भाव |
| संख्या | इनकी संख्या निश्चित (मुख्यतः 9 से 11) होती है। | इनकी कुल संख्या निश्चित रूप से 33 होती है। |
| अवधि | यह हृदय में आजीविका पर्यंत या लंबे समय तक छिपे रहते हैं। | ये पानी के बुलबुलों की तरह क्षणिक (थोड़े समय) के लिए आते हैं। |
| भूमिका | यह रस का मुख्य आधार या मूल भाव होता है। | यह स्थायी भाव को पुष्ट करने में सहयोगी या सहायक होते हैं। |
| संचरण | ये किसी एक रस के मूल में स्थिर रहते हैं। | ये एक ही समय में अलग-अलग रसों में संचरण कर सकते हैं। |
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33 संचारी भाव और उनके प्रामाणिक उदाहरण
💡 विशेष नोट: क्या आप जानते हैं कि परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक किन उदाहरणों से कटते हैं? नीचे दिए गए सभी 33 भावों के दो-दो प्रामाणिक उदाहरणों का गहराई से अध्ययन करें, क्योंकि अधिकांश प्रतियोगी परीक्षाओं में यही पंक्तियाँ ज्यों की त्यों पूछी जाती हैं।
1. निर्वेद
-
अर्थ: संसार के प्रति मोह-माया समाप्त होने पर हृदय में थोड़े समय के लिए वैराग्य या विरक्ति का उत्पन्न होना।
-
उदाहरण 1:
”हाय! दुर्भाग्य इन आँखों से विलोकत है। मैंने आर्यपति को गंवाते नेत्र अपने।”
-
उदाहरण 2:
”निस्सीमित इस जलराशि पर, चुपचाप बैठा हूँ अकेला। मिट गया संसार सारा, रह गया यह मन अकेला।”
2. हर्ष
-
अर्थ: मनचाहा काम पूरा होने या प्रिय वस्तु मिलने पर मन में होने वाली अत्यधिक प्रसन्नता।
-
उदाहरण 1:
विहंसि बुलाए बिलोकी उत।
-
उदाहरण 2:
”आज की आनन्द-बधाई से दिशाएँ गूँज उठीं। खिल उठा मानस हमारा और कलियाँ झूम उठीं।”
3. गर्व
-
अर्थ: अपनी योग्यता, बल या कुल पर अभिमान या अपने आपको श्रेष्ठ मानना।
-
उदाहरण 1:
”हे सारथे! है द्रोण क्या आवे स्वयं देवेन्द्र भी। वे भी न जीतेंगे समर में, आज क्या मुझसे कभी।।”
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उदाहरण 2:
”भुज बल भूमि भूप मैं कीनी, विपुल बार महिदेव दीनी।”
4. उत्सुकता
-
अर्थ: किसी प्रिय वस्तु, व्यक्ति या आगामी घटना को शीघ्र प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा।
-
उदाहरण 1:
”लोने हुँ साहस सहस कीने जनत हजार। लोन लोयन सिंधु तन, पैरि न पावत पार।।”
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उदाहरण 2:
”देखने को आज साजन की झलक, आँखें मेरी बेचैन हैं पल-पल।”
5. चपलता
-
अर्थ: चित्त की स्थिरता का अभाव, यानी मन का एक जगह टिक न पाना या चंचल होना।
-
उदाहरण 1:
सुदामा को देखते ही हरि दौड़े हरि तज आसन।
-
उदाहरण 2:
”चंचल नैनन की छबि ऐसी, बिन देखे चैन पड़े न कैंसी।”
6. मद (नशा)
-
अर्थ: यौवन, धन, बल या किसी मादक पदार्थ के सेवन से उत्पन्न होने वाला गर्व या नशा।
-
उदाहरण 1:
”मैं दिवानों का वेष लिए फिरता हूँ। मैं मादकता निशेष लिए फिरता हूँ।”
-
उदाहरण 2:
”रूप के मध् में डूबी यह जवानी, भूल बैठी अपनी ही कहानी।”
7. उन्माद
-
अर्थ: अत्यधिक प्रेम, शोक या मानसिक आघात के कारण पागलपन जैसी स्थिति का उत्पन्न होना।
-
उदाहरण 1:
”मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ। उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ।”
-
उदाहरण 2:
”सुधि-बुधि खो बैठी मैं ऐसी, खोजूँ हर डाली पर कैसी।”
8. अपस्मार
-
अर्थ: भय, आघात या रोग के कारण मूर्च्छा आना या मिर्गी जैसी सुध-बुध खो देने की स्थिति।
-
उदाहरण 1:
”होई अचेत परी धरनी। पटकै पदउर फेन तजै मुख ते।”
-
उदाहरण 2:
”देखकर भीषण वह नाद, अचेत हो गिरा तुरंत आघात।”
9. क्रीडा (लज्जा / संकोच)
-
अर्थ: मन में किसी बात को लेकर हिचकिचाहट या संकोच का अनुभव होना।
-
उदाहरण 1:
छूने में हिचक देखने में पलके आँखों पर झुकती है।
-
उदाहरण 2:
”लाज के मारे सिमट गई जब, बोल न पाई मुँह से तब।”
10. अवहित्था
-
अर्थ: अपने सच्चे आंतरिक भावों या प्रेम-क्रोध को दूसरों से छिपाने का प्रयास करना।
-
उदाहरण 1:
”पीछे निहारी निहारत नारिन। हार हिये के सुधारन लागे।”
-
उदाहरण 2:
”मुख फेर लिया उसने पर, दिल की धड़कन छिपाई न गई।”
11. आलस्य
-
अर्थ: शरीर और मन में भारीपन के कारण किसी भी कार्य को करने की इच्छा ना होना।
-
उदाहरण 1:
”अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम। दास मलूका कह गये सबके दाता राम।”
-
उदाहरण 2:
”पड़ी रही चादर ओढ़े जब, उठने की सुधि रही न तब।”
12. श्रम (थकान)
-
अर्थ: अधिक काम या चलने-फिरने से शरीर में उत्पन्न होने वाली शारीरिक थकान।
-
उदाहरण 1:
”छलछल थे संध्या के श्रमकण। आँसू से गिरने थे प्रतिक्षण।”
-
उदाहरण 2:
”पग-पग थक-कर चूर हुआ तन, विश्राम ढूँढता मेरा मन।”
13. व्याधि
-
अर्थ: किसी गंभीर शारीरिक रोग या बुखार के कारण मन में उत्पन्न संताप या बेचैनी।
-
उदाहरण 1:
”मानस मंदिर में सती पति की प्रतिमा थाप। जलती सी उस विरह में बनी आरती आप।”
-
उदाहरण 2:
”तप से ज्वर सा फैला तन में, शांति नहीं मिलती इस मन में।”
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14. मरण
-
अर्थ: अत्यधिक मूर्च्छा, चोट या पीड़ा के कारण कुछ क्षण के लिए प्राण छूटने जैसी स्थिति आना।
-
उदाहरण 1:
”मुझसे मिलने को कौन विकल? मैं होऊं किसके हित चंचल?”
-
उदाहरण 2:
”साँसें रुकती जाती हैं अब, प्राण छूटते लगते जब।”
15. स्वप्न
-
अर्थ: सोते समय या तंद्रा की अवस्था में मन में कल्पित घटनाओं का दृश्यों के रूप में दिखना।
-
उदाहरण 1:
लागी गई पलकै पल सों, पल लागत ही पल नें पिय आये।
-
उदाहरण 2:
”नींद में जो सपना आया, उसने मुझको गले लगाया।”
16. निद्रा
-
अर्थ: थकान या तमस के कारण इन्द्रियों का शिथिल होना और नींद आ जाना।
-
उदाहरण 1:
बीत गई रैन अब का जग सोबत है।
-
उदाहरण 2:
”पलकें भारी होने लगीं जब, सो गया जग सारा तब।”
17. विबोध (जागना)
-
अर्थ: नींद या अज्ञानता टूटने पर यथार्थ ज्ञान होने या जागृत होने की स्थिति।
-
उदाहरण 1:
”आँखे अधखुली अधखुली, खिरकी है खुली-खुली। अधरखुले आनन पै अघ खुली अलकें।”
-
उदाहरण 2:
”जाग उठा संसार सारा जब, ज्ञान का सूरज चमका तब।”
18. ग्लानि
-
अर्थ: अपने द्वारा किए गए किसी अनुचित कार्य पर मन में पश्चाताप या अपराध बोध होना।
-
उदाहरण 1:
”बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जाय जननि कहि काकू।”
-
उदाहरण 2:
”भूल जो मैंने थी की थी, आज आँखें मेरी रोती थीं।”
19. जड़ता
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अर्थ: आश्चर्य, भय या आघात के कारण शरीर का सुन्न हो जाना और हिलने-डुलने में असमर्थ होना।
-
उदाहरण 1:
पुत्र का वियोग आह! पाषाण बली पांचाली।
-
उदाहरण 2:
”देखकर अनहोनी वह दृश्य, सुन्न रह गया सारा शिष्य।”
20. मोह (लगाव)
-
अर्थ: संसार या परिजनों के प्रति अत्यधिक अंधी आसक्ति और लगाव का भाव।
-
उदाहरण 1:
”सुत बित नारि भवन परिवारा, होहिं जाहिं जग बारहिं बारा। अस बिचारि जियं जागु ताता, मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।”
-
उदाहरण 2:
”माया जाल फँसा ऐसा मन, छूट न पाए इसका बंधन।”
21. दैन्य (दीनता)
-
अर्थ: विपत्ति या हीनता के कारण मन में लाचारी और दीन-हीन स्थिति का अनुभव होना।
-
उदाहरण 1:
”मो सम कौन कुटिल खल कामी। जेहि तनु दियौ ताहि बिसरायौ।”
-
उदाहरण 2:
”दर-दर की ठोकर खाता हूँ, दीन-हीन बन झुक जाता हूँ।”
22. शंका
-
अर्थ: मन में किसी अनिष्ट होने का संदेह या डर बने रहना।
-
उदाहरण 1:
”हे मित्र! मेरा मन न जाने हो कहा म्यो व्यस्त है। इस समय पल पल में मुझे अपशकुन करता त्रस्त है।”
-
उदाहरण 2:
”जाने अनहोनी क्या होगी, मन में शंका यह जागोगी।”
23. चिंता
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अर्थ: मनचाही वस्तु या प्रियजन न मिलने पर मन में गहरी उधेड़बुन और विकलता रहना।
-
उदाहरण 1:
”राघौ! एक बार फिरि आवौं। ए बर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ।”
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उदाहरण 2:
”किस विध पार लगेंगी नौका, सोच-सोच घबराता मौका।”
24. विषाद
-
अर्थ: असफलता या हानि होने पर मन में उत्पन्न होने वाला गहरा खेद या दुख।
-
उदाहरण 1:
”धिक् जीवन! पाता ही आया सदा विरोध। जानकी आह! उद्धार हो न सका।”
-
उदाहरण 2:
”हार मिली जब जीवन भर में, डूब गया मन इस सागर में।”
25. आवेग
-
अर्थ: अचानक किसी घटना (सुखद या दुःखद) से मन का चंचल हो जाना और उत्तेजना आना।
-
उदाहरण 1:
”ये अश्रु राम के आते ही मन में विचार। उद्वेल हो उठा शक्ति खेल सागर अपार।”
-
उदाहरण 2:
”सनकी हवा चली जब ऐसी, भाग उठी हर धड़कन वैसी।”
26. उग्रता
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अर्थ: दूसरों के प्रति कठोरता, अनुशासनहीनता या क्रूरता का भाव प्रकट होना।
-
उदाहरण 1:
”सुनि दसकंधर बचन तन कुंभकरन बिलखान। जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्याण।”
-
उदाहरण 2:
”अब तो रणचण्डी जागेगी, दुश्मन की छाती पागेगी।”
27. असूया (ईर्ष्या)
-
अर्थ: किसी अन्य व्यक्ति की उन्नति, गुण या सुख को देखकर मन में जलन होना।
-
उदाहरण 1:
”कह कठोर हर को धनुख, कहें यह प्राकृत बाल। या को भंजन तो कियो, सखा संधारी काल।”
-
उदाहरण 2:
”उसकी जीत देख कर मन में, जलन उठी क्यों इस क्षण में।”
28. स्मृति
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अर्थ: पुरानी घटनाओं, प्रियजनों या बीती बातों का मन में अचानक याद आ जाना।
-
उदाहरण 1:
”देखने में आमूल नवल, तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जला देखती मुझे तू हँसी मंद।”
-
उदाहरण 2:
”बीते दिन जब याद आते हैं, नयन हमारे भर जाते हैं।”
29. त्रास
-
अर्थ: अचानक किसी भयानक दृश्य या परिस्थिति को देखकर घबरा जाना या भयभीत होना।
-
उदाहरण 1:
”तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संधारे। दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी।”
-
उदाहरण 2:
”भय से काँप उठा जब प्राची, भाग चले डर कर सब साथी।”
30. वितर्क
-
अर्थ: किसी बात को लेकर ऊहापोह करना, तर्क-वितर्क या संदेह की स्थिति में उलझना।
-
उदाहरण 1:
”लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर वासा।”
-
उदाहरण 2:
”यह सच है या झूठ कहानी, समझ न पाए ज्ञानी-ज्ञानी।”
31. मति
-
अर्थ: किसी विषय पर विचार करके सही निर्णय पर पहुँचने की बौद्धिक क्षमता।
-
उदाहरण 1:
राम कथा सुन्दर करतारि, विहंग संशय उड़ावन हारि।
-
उदाहरण 2:
”बुद्धि विवेक जगा जब मेरा, दूर हुआ संशय का घेरा।”
32. धृति
-
अर्थ: सभी इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हुए मन में संतोष और मानसिक शांति बनाए रखना।
-
उदाहरण 1:
”देखने में मांस का शरीर है तथापि यह। सह सकता चोट वज्र की भी हँस के।”
-
उदाहरण 2:
”धैर्य न छूटे मेरा इनसे, जीतूँगा मैं हर मुश्किल से।”
33. अमर्ष
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अर्थ: अपनी या अपनों की निंदा या अपमान होने पर मन में उठने वाला असहनीय क्षोभ व क्रोध।
-
उदाहरण 1:
”मेरे पथ के हे विरोधी, रोको न मुझे आज गतिरोधी।”
-
उदाहरण 2:
”अपमान सहन अब न होगा, रण में मेरा प्रलय होगा।”
प्रतियोगी परीक्षा (UGC NET / TGT / PGT) विशेष टिप्स
🎯 परीक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र टिप्स:
पहचान के नियम: परीक्षाओं में अक्सर पंक्तियाँ देकर पूछा जाता है कि इसमें कौन सा संचारी भाव है। जैसे— यदि पंक्ति में मूर्च्छा या फेन (झाग) आने का जिक्र हो, तो वह हमेशा ‘अपस्मार’ होगा।
शंका और त्रास में अंतर: जहाँ मन में किसी अनिष्ट की आशंका मात्र हो, वहाँ ‘शंका’ होती है, किंतु भयानक दृश्य सामने आने पर जो घबराहट होती है, वह ‘त्रास’ कहलाती है।
व्यभिचारी नाम: हमेशा याद रखें कि संचारी भावों को ही आचार्य भरतमुनि ने ‘व्यभिचारी भाव’ कहा है क्योंकि ये विभिन्न रसों में संचरण करने की क्षमता रखते हैं।
निष्कर्ष
हिंदी काव्य शास्त्र और रस निष्पत्ति की प्रक्रिया में संचारी भावों (व्यभिचारी भावों) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य है। जिस प्रकार समुद्र में उठने वाली लहरें और जल के बुलबुले पानी के अस्तित्व को और अधिक जीवंत बनाते हैं, ठीक उसी प्रकार ये 33 संचारी भाव स्थायी भाव को परिपक्व कर रस की पराकाष्ठा तक पहुँचाने में अपना अमूल्य योगदान देते हैं। इनका सूक्ष्म और गहन अध्ययन न केवल हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए आवश्यक है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने के लिए भी एक निर्णायक भूमिका निभाता है।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
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