विरोधाभास अलंकार के प्रसिद्ध उदाहरण, अर्थ एवं परिभाषा (Virodhabhas Alankar ke Udaharan)
हिंदी काव्यशास्त्र और व्याकरण में जब वास्तविक विरोध न होकर विरोध का आभास हो, अर्थात कार्य और कारण में विरोध उत्पन्न होता हुआ प्रतीत हो, तो उसे ‘विरोधाभास अलंकार’ (Virodhabhas Alankar) कहते हैं। यूजीसी नेट, जेआरएफ, और स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं में इस अलंकार से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। इस लेख में हमने आपकी पाठ्य सामग्री से लिए गए सबसे महत्वपूर्ण और परीक्षा-उपयोगी 10 उदाहरणों को इसी पैटर्न पर संकलित किया है।
📌 विरोधाभास अलंकार के महत्वपूर्ण उदाहरण (Virodhabhas Alankar Examples)
1. ‘या अनुरागी चित्त की, गति समझे नहिं कोइ। ज्यों-ज्यों बूढ़े श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होइ।।’
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काव्य पंक्ति:
या अनुरागी चित्त की, गति समझे नहिं कोइ।
ज्यों-ज्यों बूढ़े श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होइ।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: प्रेमी मन की गति को कोई नहीं समझ सकता। जैसे-जैसे यह प्रेम रूपी श्याम (काले) रंग में डूबता जाता है, वैसे-वैसे यह काला होने के बजाय और अधिक उज्जवल (पवित्र) होता जाता है।
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स्पष्टीकरण: सामान्यतः काले रंग में डूबने पर वस्तु काली होनी चाहिए, किंतु यहाँ श्याम (कृष्ण/भक्ति) के रंग में डूबने से मन के उज्जवल होने की बात कही गई है, जहाँ वास्तविक विरोध न होकर केवल विरोध का आभास है, अतः यह विरोधाभास अलंकार है।
2. ‘सुलगी अनुराग की आग वहाँ, जल से परिपूर्ण तड़ाग जहाँ।’
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काव्य पंक्ति:
सुलगी अनुराग की आग वहाँ, जल से परिपूर्ण तड़ाग जहाँ।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: जिस स्थान पर प्रेम रूपी आग सुलग रही है (अर्थात जहाँ तीव्र वियोग या प्रेम की उष्णता है), वहीं दूसरी ओर जल से भरा हुआ तालाब भी स्थित है।
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स्पष्टीकरण: एक ही स्थान पर ‘आग’ (गर्मी/जलन) का सुलझना और ‘जल से परिपूर्ण तड़ाग’ (ठंडक) का होना परस्पर विरोधी प्रतीत होता है, इसलिए यहाँ विरोधाभास अलंकार है।
3. ‘अचल हो उठते चंचल चपल, बन जाते अविचल, पिछड़ पड़ते पाहन दल, कुलिस भी हो जाता कोमल।’
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काव्य पंक्ति:
अचल हो उठते चंचल चपल, बन जाते अविचल, पिछड़ पड़ते पाहन दल, कुलिस भी हो जाता कोमल।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: चंचल और अस्थिर वस्तुएँ भी अचल और स्थिर बन जाती हैं, पत्थरों के दल पीछे छूट जाते हैं और वज्र (कुलिस) जैसी कठोर वस्तु भी कोमल हो जाती है।
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स्पष्टीकरण: चंचल का ‘अचल’ होना और कठोर वज्र का ‘कोमल’ हो जाना स्वभाव के विरुद्ध प्रतीत होता है, अतः यहाँ विरोध का सुंदर आभास कराया गया है।
4. ‘नल की अरु नल नीर की गति एकै करि जाइ। जै तौ नीचै हवै चलै, तौ ऊँचों होइ।।’
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काव्य पंक्ति:
नल की अरु नल नीर की गति एकै करि जाइ।
जै तौ नीचै हवै चलै, तौ ऊँचों होइ।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: चतुर व्यक्ति (नल) और नल के पानी की गति एक जैसी होती है कि जो जितना नीचे होकर (विनम्रतापूर्वक) चलता है, वह उतना ही अधिक ऊँचा उठता है।
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स्पष्टीकरण: भौतिक रूप से नीचे चलने पर ऊँचा होना असंभव प्रतीत होता है (यहाँ विनम्रता और श्रेष्ठता का भाव है), जिससे यहाँ कार्य-कारण में विरोध का आभास होता है।
5. ‘जब-जब वै सुधि कीजैय, तब-तब सुधि जांहि आँखिनु आँखि लगी रहै, आँखें लागति नाहीं।।’
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काव्य पंक्ति:
जब-जब वै सुधि कीजैय, तब-तब सुधि जांहि।
आँखिनु आँखि लगी रहै, आँखें लागति नाहीं।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: जब-जब उनकी सुधि (याद) की जाती है, तब-तब सुधि (चेतना) ही खो जाती है। आँखों से आँखें तो लगातार जुड़ी रहती हैं, किंतु आँखों में नींद नहीं लगती।
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स्पष्टीकरण: आँखों का लगातार लगे रहना और साथ ही “आँखें न लगना” (नींद न आना) दोनों स्थितियाँ एक-दूसरे के विपरीत प्रतीत होती हैं, अतः यहाँ विरोधाभास अलंकार है।
6. ‘शीतल ज्वाला जलती है ईंधन होता दृग-जल का यह व्यर्थ श्वास चल-चल कर करता काम अनिल का।’
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काव्य पंक्ति:
शीतल ज्वाला जलती है ईंधन होता दृग-जल का।
यह व्यर्थ श्वास चल-चल कर करता काम अनिल का।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: विरह की ऐसी स्थिति है जहाँ ज्वाला शीतल (ठंडी) जल रही है और आँखों का जल (आँसू) उसका ईंधन बन रहा है।
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स्पष्टीकरण: आग या ज्वाला हमेशा गर्म होती है, किंतु यहाँ उसे ‘शीतल ज्वाला’ कहा गया है। आग का शीतल होना वास्तविक विरोध है, जो केवल आभास मात्र है।
7. ‘आग हूँ जिससे ढूलकते बिंदु हिमजल के शून्य हूँ जिसमें बिछे हैं पावले पलके।’
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काव्य पंक्ति:
आग हूँ जिससे ढूलकते बिंदु हिमजल के।
शून्य हूँ जिसमें बिछे हैं पावले पलके।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: कवि कहता है कि मैं स्वयं आग के समान हूँ, किंतु फिर भी मुझसे बर्फ के ठंडे पानी (हिमजल) के बिंदु टपक रहे हैं।
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स्पष्टीकरण: ‘आग’ (उष्णता) और ‘हिमजल’ (शीतलता) का एक ही व्यक्ति या स्थिति में एक साथ होना परस्पर विरोधी प्रतीत होता है, इसलिए यहाँ विरोधाभास अलंकार है।
8. ‘तुम मांस हीन तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेष तुम अस्थिहीन।’
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काव्य पंक्ति:
तुम मांस हीन तुम रक्त हीन,
हे अस्थिशेष तुम अस्थिहीन।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: हे शरीर! तुम न तो मांसयुक्त हो और न ही रक्तयुक्त हो। तुम्हारी स्थिति ऐसी है कि केवल हड्डियाँ ही शेष बची हैं, फिर भी तुम्हें ‘अस्थिहीन’ कहा जा रहा है।
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स्पष्टीकरण: एक ही समय में ‘अस्थिशेष’ (हड्डियों का बचना) और ‘अस्थिहीन’ (हड्डियों का न होना) कहना विरोधाभासी है, जो मार्मिक चमत्कार उत्पन्न करता है।
9. ‘तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल हे चिर पुरान हे चिर नवीन।’
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काव्य पंक्ति:
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल हे चिर पुरान हे चिर नवीन।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: हे परमात्मा/आत्मा! तुम केवल शुद्ध और बुद्ध हो और साथ ही तुम सदा से पुराने (सनातन) और सदा से नए (नित्य नूतन) हो।
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स्पष्टीकरण: किसी एक ही सत्ता को एक साथ ‘चिर पुरातन’ (सबसे पुराना) और ‘चिर नवीन’ (सबसे नया) बताना तार्किक रूप से विरोधी प्रतीत होता है, अतः यहाँ विरोधाभास अलंकार है।
10. ‘मै सन्नाटा हूँ फिर भी बोल रहा हूँ। मैं शांत हूँ, फिर भी डोल रहा हूँ।’
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काव्य पंक्ति:
मै सन्नाटा हूँ फिर भी बोल रहा हूँ।
मैं शांत हूँ, फिर भी डोल रहा हूँ।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: चारों तरफ पूर्ण सन्नाटा होने के बावजूद एक आवाज गूँज रही है और शांत होने पर भी शरीर में गति (डोलना) बनी हुई है।
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स्पष्टीकरण: सन्नाटे में ‘बोलना’ और शांत होने पर ‘डोलना’ स्वभाव के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होता है, जिससे यहाँ स्पष्ट रूप से विरोध का आभास होता है।
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