काव्यशास्त्र

दृष्टांत अलंकार के उदाहरण, अर्थ एवं स्पष्टीकरण | Drishtant Alankar ke Udaharan

दृष्टांत अलंकार के उदाहरण, अर्थ एवं परिभाषा (Drishtant Alankar ke Udaharan)

हिंदी काव्यशास्त्र और व्याकरण में ‘दृष्टांत अलंकार’ वहाँ होता है जहाँ उपमेय और उपमान वाक्यों में बिम्ब-प्रतिबिंब भाव विद्यमान हो। इस अलंकार के उपमेय वाक्य में जो बात कही जाती है, उसकी सत्यता प्रमाणित करने के लिए उसी से मिलता-जुलता अथवा उसी के ढंग का दूसरा उपमान वाक्य कहा जाता है, जो प्रथम वाक्य की सत्यता पर प्रामाणिकता की मुहर लगा देता है। दोनों वाक्यों में समानता का वाचक शब्द प्रयुक्त नहीं किया जाता क्योंकि वह ‘व्यंग्य’ होता है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT) की दृष्टि से इसके उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

📌 दृष्टांत अलंकार के महत्वपूर्ण उदाहरण (Drishtant Alankar Example)

1. ‘कन कन जोरै मन जुरै, खावत निबरै सोय। बूँद बूँद तें घट भरै, टपकत रीतो होय।।’

  • काव्य पंक्ति:

    कन कन जोरै मन जुरै, खावत निबरै सोय।

    बूँद बूँद तें घट भरै, टपकत रीतो होय।।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: थोड़ा-थोड़ा करके धन या अन्न जोड़ने से भंडार जुड़ता है और लगातार खाने से वह समाप्त हो जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे बूँद-बूँद से घड़ा भर जाता है और टपकते रहने से वह खाली हो जाता है।

  • स्पष्टीकरण: धन के संचय और व्यय के नियम को समझाने के लिए बूँद-बूँद से घड़ा भरने और खाली होने का प्राकृतिक दृष्टांत दिया गया है, अतः यहाँ दृष्टांत अलंकार है।

2. ‘दुसह दुराज प्रजान को, क्यों न बढ़ै दुख द्वन्द्व। अधिक अँधेरों जग करत, मिलि मावस रवि चंद।।’

  • काव्य पंक्ति:

    दुसह दुराज प्रजान को, क्यों न बढ़ै दुख द्वन्द्व।

    अधिक अँधेरों जग करत, मिलि मावस रवि चंद।।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: दोहरे शासन में प्रजा के दुख और द्वन्द्व क्यों न बढ़ें? ठीक वैसे ही जैसे अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा के एक ही राशि में मिल जाने से संसार में अधिक अँधेरा फैल जाता है।

  • स्पष्टीकरण: इस दोहे का पूर्वाद्ध उपमेय वाक्य है तथा उत्तराद्ध उपमान वाक्य है। प्रथम वाक्य में दुहरे शासन के कारण प्रजा के दुखों का बढ़ना बिम्ब रूप में है, जिसकी सत्यता प्रमाणित करने के लिए अमावस्या की रात्रि में सूर्य और चंद्रमा के एक राशि में आने पर फैलने वाले अंधकार का प्रतिबिंब रूप में प्रयोग किया गया है, अतः यह दृष्टांत अलंकार का उदाहरण है।

3. ‘भरतहि होइ न राजमद, विधि हरि हर पद पाय। कबहुँ कि काँजी सीकरनि, छौर सिन्धु विन्साय।।’

  • काव्य पंक्ति:

    भरतहि होइ न राजमद, विधि हरि हर पद पाय।

    कबहुँ कि काँजी सीकरनि, छौर सिन्धु विन्साय।।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: ब्रम्हा, विष्णु तथा महेश्वर का पद पाकर भी भरत को राजमद (राज्य का घमंड) नहीं हो सकता। इस कथन की पुष्टि के लिए दृष्टांत दिया गया है कि क्या खटाई की थोड़ी बूँदों से क्षीर समुद्र (क्षीरसागर) फट सकता है? अर्थात् नहीं फट सकता।

  • स्पष्टीकरण: उपर्युक्त दोहे के प्रथम चरण के उपमेय वाक्य में कहा गया है कि भरत को उच्च पद पाकर भी अहंकार नहीं हो सकता और इसकी सत्यता प्रमाणित करने के लिए द्वितीय चरण में उपमान वाक्य के रूप में खटाई की बूँदों से समुद्र के न फटने का उदाहरण (बिम्ब-प्रतिबिंब भाव) दिया गया है, अतः यहाँ दृष्टांत अलंकार है।

4. ‘मनुष्य जनम दुरलभ अहै, होय न दूजी बार। पक्का फल जो गिरि परा, बहुरी न लागै डार।।’

  • काव्य पंक्ति:

    मनुष्य जनम दुरलभ अहै, होय न दूजी बार।

    पक्का फल जो गिरि परा, बहुरी न लागै डार।।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: मनुष्य का जन्म अत्यंत दुर्लभ है और यह बार-बार नहीं मिलता। ठीक उसी प्रकार जैसे पेड़ से पक्का फल एक बार नीचे गिर जाए तो वह दोबारा डाल पर नहीं लगता।

  • स्पष्टीकरण: मानव जीवन की नश्वरता और दुर्लभता को समझाने के लिए पेड़ से गिरे हुए फल का उदाहरण (बिम्ब-प्रतिबिंब रूप में) दिया गया है, इसलिए यहाँ दृष्टांत अलंकार है।

5. ‘परी प्रेम नंदलाल के, हमहिं न भावत जोग। मधुप राजपद पाय के, भीख न मांगत लोग।।’

  • काव्य पंक्ति:

    परी प्रेम नंदलाल के, हमहिं न भावत जोग।

    मधुप राजपद पाय के, भीख न मांगत लोग।।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: नंदलाल (कृष्ण) के प्रेम में पड़ने के बाद हमें योग साधना अच्छी नहीं लगती। जैसे राजा का पद पा जाने पर लोग भीख नहीं माँगते हैं।

  • स्पष्टीकरण: प्रथम वाक्य में कृष्ण प्रेम के आगे योग के त्याग की बात कही गई है और द्वितीय वाक्य में राज्यपद मिलने पर भीख न माँगने का दृष्टांत देकर इसे प्रमाणित किया गया है, अतः यहाँ बिम्ब-प्रतिबिंब भाव होने के कारण दृष्टांत अलंकार है।

6. ‘रहिमन अँसुवा नयन ढरि, जिय दुख प्रकट करेइ। जाहि निकारो गेह तें, कस न भेद कहि देइ।।’

  • काव्य पंक्ति:

    रहिमन अँसुवा नयन ढरि, जिय दुख प्रकट करेइ।

    जाहि निकारो गेह तें, कस न भेद कहि देइ।।

  • काव्य पंक्ति का अर्थ: कवि रहीम जी कहते हैं कि नेत्रों से निकले हुए आँसू हृदय का दु:ख प्रकट कर देते हैं। ठीक उसी प्रकार, जिसे घर से बाहर निकाल दिया जाए, वह घर के सारे रहस्यों को दूसरों के सामने प्रकट कर ही देता है।

  • स्पष्टीकरण: इस दोहे में उपमेय वाक्य के रूप में आँखों से आँसू निकलने से मन का दुख प्रकट होने का कथन है। इसके प्रतिबिंब के रूप में यह तथ्य प्रस्तुत किया गया है कि घर से निकाले गए व्यक्ति की तरह भेद खुल जाता है (‘घर का भेदी लंका ढाहै’ की कहावत)। कुल मिलाकर यह दृष्टांत अलंकार का सुंदर उदाहरण है।

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