तिरस्कृत आत्मकथा सारांश – सूरजपाल चौहान
सूरजपाल चौहान की आत्मकथा ‘तिरस्कृत’ (2002) हिन्दी दलित-आत्मकथा-साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यह दलित जीवन की सच्चाइयों का वह आइना है, जिसमें समाज में व्याप्त जाति आधारित ऊँच-नीच, भेदभाव, शोषण, तिरस्कार, दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टि, सवर्ण जाति के लोगों द्वारा निम्न जाति की स्त्रियों के साथ वासना का खेल, दलितों में ब्राह्मणवाद की विष-बेल, दलित जीव की जटिलताओं, दलितों के प्रति हिंसा, घृणा, पूर्वाग्रहों इत्यादि के बहुरंगी चित्रों की तस्वीर नग्न यथार्थवादी धरातल पर उभरती है।
यह कृति दलित-मुक्ति का वह दस्तावेज है, जिसमें आत्मकथाकार सूरजपाल चौहान ने उच्च जाति के होने की ग्रंथि कथित सवर्ण समाज की मानवीयता को अंदर की अंदर खोखला होने, जाति-प्रथा व छुआछूत का जहर भारतीय समाज के खून में रमने की तस्वीर पेशकर दलितों की एकता को उनकी मुक्ति का द्वार बताया है और यह कहा है कि जातिगत चेतना से ऊपर उठकर वर्ग चेतना को अपनाये बिना दलितों में एकता कायम नहीं हो सकती है और न उनका उद्धार हो सकता है।
सूरजपाल चौहान ने ‘तिरस्कृत’ आत्मकथा में दलितों में एकता, वर्ग-चेतना, जाति विहीन समाज के निर्माण के लिए संघर्ष करने तथा सम्मान पाने का जहाँ महत् संदेश दिया है; वहीं उन्होंने दलितों के बीच पनपे ब्राह्मणवाद को दलित एकता में सबसे बड़ा अवरोधक मानते हुए इसे दलित-मुक्ति में सबसे बड़ी रुकावट बताया है। वस्तुतः, ‘तिरस्कृत’ दलित-मुक्ति का अभिमंत्रित दस्तावेज है।
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