काव्य प्रयोजन (Kavya Prayojan in Hindi): अर्थ, विभिन्न आचार्यों के मत और संपूर्ण अध्ययन
प्रस्तावना: काव्य प्रयोजन क्या है?
हिंदी साहित्य और भारतीय काव्यशास्त्र में जब हम आगे बढ़ते हैं, तो ‘काव्य प्रयोजन’ एक बेहद महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। चूँकि काव्य प्रयोजन का शाब्दिक अर्थ ‘काव्य रचना का उद्देश्य’ या ‘हेतु’ होता है, इसलिए हर कवि के मन में यह सवाल जरूर रहता है कि वह कविता क्यों लिख रहा है। परिणामस्वरूप, प्राचीन संस्कृत आचार्यों से लेकर आधुनिक हिंदी और पाश्चात्य विचारकों तक, सभी ने अपने-अपने ढंग से यह स्पष्ट किया है कि काव्य रचना के पीछे यश, अर्थ, आनंद या लोक-कल्याण जैसी कौन-सी भावनाएँ छिपी होती हैं। आइए, इस लेख में हम विस्तार से समझते हैं कि विभिन्न आचार्यों ने काव्य प्रयोजन के संबंध में क्या विचार व्यक्त किए हैं।
1. संस्कृत आचार्यों के अनुसार काव्य-प्रयोजन
संस्कृत काव्यशास्त्र में आचार्यों ने नाटक और काव्य के उद्देश्यों पर बहुत गहराई से विचार किया है। चूँकि इनके मत अलग-अलग हैं, इसलिए इन्हें क्रमानुसार समझना आवश्यक है:
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भरत मुनि: ‘नाट्यशास्त्र’ के रचयिता भरत मुनि ने नाटक के प्रयोजनों पर विचार करते हुए लिखा है— “धर्म्यं यशस्यं आयुष्यं हितं बुद्धि विवर्धनम्। लोको उपदेश जननम् नाट्यमेतद् भविष्यति।।” अर्थात् इसके अनुसार धर्म, यश, आयु-साधक, हितकर, बुद्धि-वर्धन और लोक उपदेश इसके मुख्य उद्देश्य हैं। इसके अलावा, इन्होंने एक स्थान पर पीड़ित मनुष्य को विश्रांति (शांति) देना भी काव्य का एक प्रयोजन माना है।
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आचार्य भामह: आचार्य भामह ने काव्य प्रयोजनों की चर्चा करते हुए लिखा है— “धर्मार्थ काम मोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च। करोति कीर्ति प्रीतिश्च साधुकान्त्य निबंधन्म्।।” अतः इसका अर्थ है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति, कलाओं में निपुणता के साथ-साथ उत्तम काव्य से कीर्ति और प्रीति (आनंद) की प्राप्ति भी होती है।
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आचार्य वामन: वामन ने अपने सूत्र में कहा— “काव्यं सदृष्टा द्रष्टार्थ प्रीति-कीर्ति-हेतुत्वात्।” यानी काव्य के दो प्रमुख प्रयोजन हैं: प्रीति अथवा आनंद साधना, और कीर्ति अथवा यश प्राप्ति।
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आचार्य दण्डी: आचार्य दण्डी के अनुसार, काव्य का प्रमुख प्रयोजन अज्ञानांधकार को नष्ट करके ज्ञानज्योति का प्रसार करना है।
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आचार्य मम्मट: आचार्य मम्मट ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ में काव्य प्रयोजनों की बहुत विस्तृत चर्चा की है। चूँकि उन्होंने श्लोक दिया— “काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये। सद्यः परिनिर्वाणयै कान्तसम्मित तयोपदेशयुजे।।” परिणामस्वरूप, मम्मट ने मूलतः छः काव्य प्रयोजन बताए हैं:
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यश प्राप्ति
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अर्थ प्राप्ति
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लोक व्यवहार ज्ञान
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अनिष्ट का निवारण या लोकमंगल (शिवेतरक्षतय)
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आत्मशान्ति या आनन्दोपलब्धि (सद्यः परिनिर्वाणयै)
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कान्तासम्मित उपदेश।
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कान्तासम्मित उपदेश क्या है?
काव्य प्रियतमा (पत्नी) के समान मधुर उपदेश देने वाला होता है। चूँकि उपदेश तीन प्रकार के होते हैं:
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प्रभु संमित उपदेश: वेदशास्त्रों का उपदेश स्वामी के आदेश जैसा है, जो हितकर तो है पर रुचिकर नहीं होता।
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मित्र संमित उपदेश: पुराणों और इतिहास का उपदेश मित्र तुल्य उपदेश है, जिसकी अवहेलना भी की जा सकती है।
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कान्तासम्मित उपदेश: काव्य का उपदेश कांता सम्मित होता है, जो हितकर भी है, रुचिकर भी है और जिसकी अवहेलना नहीं की जा सकती।
अन्य संस्कृत आचार्यों के मत
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रुद्रद: पुरुषार्थ-चतुष्टय, अनर्थ का शमन, विपत्ति-नििवारण, रोग-मुक्ति और अभिमत वर की प्राप्ति।
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भोजराज: कीर्ति और प्रीति।
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कुंतक: पुरुषार्थ-चतुष्टय, व्यवहार ज्ञान व परमाह्लाद (अंतश्चमत्कार)।
2. हिंदी आचार्यों और कवियों द्वारा निर्दिष्ट काव्य प्रयोजन
रीतिकाल और भक्तिलिखित हिंदी साहित्य में कवियों ने अपने अनुभवों के आधार पर काव्य के उद्देश्य तय किए हैं:
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गोस्वामी तुलसीदास: रामचरित मानस में तुलसीदास ने दो काव्य प्रयोजन मुख्य बताए हैं— (I) स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा (II) कीरति भनिति भूति भल सोई। सुरसरि सम सब कहें हित होई।। चूँकि वे मानते थे कि कविता का मुख्य उद्देश्य ‘स्वांतः सुखाय’ (स्वयं के सुख के लिए) और ‘लोक मंगल’ (संसार का कल्याण) है।
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मैथिलीशरण गुप्त: उनके मत के अनुसार, केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, बल्कि उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल: शुक्ल जी ने बहुत सुंदर बात कही कि कविता का अंतिम लक्ष्य जगत में मार्मिक पक्षों का प्रत्यक्षीकरण करके उसके साथ मनुष्य हृदय का सामंजस्य स्थापन है।
काव्य हेतु परिभाषा, भेद और विभिन्न आचार्यों के मत
अन्य हिंदी विचारकों के मत
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डॉ. नगेंद्र: काव्य-प्रयोजन ‘आत्मभिव्यक्ति’ होता है।
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महादेवी वर्मा: ‘मानव हृदय में समाज के प्रति विश्वास उत्पन्न करना’ ही काव्य का उद्देश्य है।
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महावीरप्रसाद द्विवेदी: ‘ज्ञान का विस्तार’ और ‘आनंद की अनुभूति’ काव्य प्रयोजन हैं।
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नंददुलारे वाजपेयी: काव्य-प्रयोजन ‘आत्मानुभूति’ होता है।
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हरिऔध: काव्य-प्रयोजन ‘आनन्दानुभूति’ है।
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भारतेंदु हरिश्चंद्र: ‘आनंद की अनुभूति’ और ‘लोकहित की भावना’ को प्रमुख काव्य प्रयोजन माना है।
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हजारीप्रसाद द्विवेदी: काव्य-प्रयोजन ‘मानव-कल्याण’ होता है।
3. पाश्चात्य काव्यशास्त्र में काव्य-प्रयोजन
पश्चात समीक्षा में काव्य-प्रयोजन को लेकर विचारकों की मुख्य रूप से तीन श्रेणियाँ निर्धारित की जाती हैं:
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कला, कला के लिये (Art for Art’s sake): होमर, लोंजाइनस, शिलर, स्विनवर्ग, ऑस्कर वाइल्ड और डॉ. ब्रेडले इसके प्रमुख समर्थक रहे हैं। इनके अनुसार कला का उद्देश्य केवल सौंदर्य और कला है।
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कला, जीवन के लिये (Art for Life’s sake): प्लेटो, रस्किन, टालस्टाय आदि इसके समर्थक थे। चूँकि इन्हें ‘लोकमंगलवादी’ भी कहा जाता है, इसलिए ये समाज और जीवन के कल्याण को ही मुख्य प्रयोजन मानते थे।
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समन्वयवादी: जो विचारक यह मानते थे कि काव्य का प्रयोजन जीवन और आनंद दोनों होना चाहिए, वे इस श्रेणी में आते हैं। परिणामस्वरूप, अरुस्तू, होरेस, ड्रायडन, कॉलरिज, वर्ड्सवर्थ, मैथ्यू आर्नोल्ड और आई.ए. रिचर्ड्स इसके प्रमुख समर्थक रहे हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहें तो, काव्य प्रयोजन की यह पूरी यात्रा इस बात को साबित करती है कि कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं है। तथापि, प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक, हर आचार्य ने इसे ज्ञान, यश, लोक-कल्याण और आत्मिक शांति का सबसे बड़ा माध्यम माना है। यही कारण है कि काव्य प्रयोजन साहित्य को एक सार्थक और जीवंत रूप प्रदान करता है।
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