“कबीर ग्रंथावली (संपादक: श्यामसुंदर दास) पर आधारित इस विशेष लेख में कबीरदास जी का दर्शन, हठयोग, उलटबासियाँ, प्रतीक, अलंकार, छंद और 50+ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर पढ़ें। TGT, PGT, UGC NET, Assistant Professor एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हिन्दी साहित्य नोट्स।”
कबीर ग्रंथावली-श्यामसुंदर दास(MCQ)
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कबीरदास जी के अनुसार निकटतम सम्बन्धी कौन है?
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सद्गुरु
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कबीर ग्रन्थावली को अप्रामाणिक माना हैं ?
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डाॅ. रामकुमार वर्मा
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कबीर की भाषा को सधुक्कङी भाषा कहा है ?
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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
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कबीरदास के अनुसार ‘अनमनी’ शब्द से आशय है-
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हठयोग की एक क्रिया
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कबीर के साहित्य को प्रकाश में लाने का श्रेय किसको है ?
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एच.एच. विल्सन
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कबीरदास जी ने गुरु के उपदेश को बताया है-
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बाण के समान
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किसने कहा कि कबीर वाणी के डिक्टेटर थे ?
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हजारी प्रसाद द्विवेदी
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कबीर साहित्य का सर्वप्रथम संकलन किसने किया ?
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धर्मदास
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कबीर ने आत्मा को माना है ?
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पत्नी
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कबीरदास ने सुपात्र व कुपात्र शिष्य को उपमान दिया है-
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वंशीवत्
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’दुलहनि गबहूँ मंगलाचार’ कबीर ने यहाँ दुलहनि शब्द का प्रयोग किसके लिए किया है ?
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स्त्रियों के लिए
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’चरन कंवल चित् लाइये राँम नाँम गाइ रे’
रेखांकित पद में कौनसा समास है ?
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कर्मधारय
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संसार रूपी मायाजाल को कैसे काटा सकता है-
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गुरु की उपदेश से
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कबीर का दर्शन है –
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अद्वैतवाद
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आपहिं आप बंधाइया, द्वै लोचन मरहिं पियास रे।।
यहाँ ’आपहिं आप बँधाइया’ का अभिप्राय है –
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व्यक्ति स्वतः इस संसार में जकङता है।
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कबीरदास जी ने सद्गुरु की तुलना किससे की है-
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लुहार
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कहैं कबीर हम ब्याहि चले, पुरिष एक अविनासी।
यहाँ अविनाशी पुरुष किसे कहा गया है ?
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परमात्मा
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समंदर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई।
देखि कबीरा जागि, मंछी रुषाँ चढ़ि गई।।
इस पद में कौनसा छंद है –
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सोरठा
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‘गुरु गोविन्द तौ एक हैं, दूधा यहू आकार
आपा मेट जीवत मरै, तौ पावै करतार।।’
उक्त पंक्तियों में आए ‘जीवत मरै व करतार’ शब्दों से आशय है-
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जीवनमुक्त, सृष्टि कत्र्ता ईश्वर
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हँसि हँसि कन्त न पाइये, जिनि पाया तिनि रोइ।
जो हाँसेही हरि मिलै, तौ नहीं दुहागिनि कोइ।।
कबीर ने परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग को बताया है –
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कठिन और वेदनापूर्ण
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चोट सतांणी विरह की, सब तन जर जर होई।
मारणहारा जाँणि है, के जिहिं लागी सोइ।। यहाँ कबीर ने मारणहारा शब्द किसके के लिये प्रयुक्त किया है –
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परम ब्रह्म
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‘पंच संगी पिव पिव करैं’। रेखांकित पदों से क्या आशय है ?
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पंच ज्ञानेन्द्रियाँ
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चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति।
जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले न राति।।
कबीर ने चकवी किसे कहा है –
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आत्मा
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कबीर प्रेम न चषिया, चेषि न लीया साब।
सूनै घर का पाहुणां ज्यूँ आया त्यूं जाव।।
रेखांकित शब्द का अभिप्राय है –
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अतिथि
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‘गुण गायैं गुण नाम कटै।’ उक्त पंक्तियों में रेखांकित पद से क्या आशय है-
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सत्व, रज, तम
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कबीर सूता क्या करै, उठि न रोवै दुक्ख।
जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख।।
यहाँ कबीर ने संसार को किस रूप में माना है –
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कब्र
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सतगुर हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग।
बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग।।
कबीर ने प्रेम का बादल किसे कहा है –
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गुरु द्वारा ज्ञान प्रबोध को
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‘कबीर पीर पिरावनी’। ‘पिरावनी’ शब्द से आशय है-
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पीड़ा देने वाली
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कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उबरंत।।
यहाँ उबरंत शब्द का अभिप्राय है –
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उबरना
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‘रैणां दूर विछोहिया, रहु रे संषन झुरि।
देबलि देबलि धाहड़ी, देसी ऊगे सूरि।।’
उक्त पंक्तियों में संषम (शंख) शब्द प्रतीक रूप में प्रयुक्त हुआ है-
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जीव
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कबीर ने स्वयं अनुभव किये हुये उपदेशों को कहा है –
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साखी
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‘कबीर तेज अनंत का, मानौ ऊगी सूरज सेणि।
पति संगि जागी सुन्दरि, कोतिग रीठा तोणि।’
उक्त पंक्तियाँ ली गई हैं-
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परचा अंग से
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गुरु गोविन्द तौ एक है, दूजा यहू आकार।
आपा मेट जीवत मरै, तौ पावै करतार।।
कबीर ने इस पद में आपा शब्द किसके लिये प्रयोग में लिया है ?
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अहंकार
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कबीर गुर गरबा मिल्या, रलि गया आटैं लूंण।
जाति-पाँति कुल सब मिटे, नाँव धरौगे कूण।।
इस साखी में निम्न में से किसके साहात्म्य को स्वीकारा गया है –
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गुरु
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कबीर की रचनाओं में हठयोग साधना निम्न में से किस प्रभाव का परिणाम है ?
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नाथ साहित्य
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माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं पङंत।
कबीर ने संसार को किसके समान बताया है ?
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दीपक के समान जलाने वाला।
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सतगुर सवाँन को सगा, सोधी सईं न दाति।
हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति।।
कबीर ने किस जाति को श्रेष्ठ बताया है –
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भगवत् भक्त
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सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिषही मांहै चूक।
भावै त्यूँ प्रबोधि ले ज्यूँ बंसि बजाई फूँक।।
कबीर के इस पद का भाव है –
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शिष्य की पात्रता
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पूरे सूँ परचा भया, सब दुख मेल्या दूरि।
निर्मल कीन्हीं आत्मां, ताथैं सदा हजूरि।।
यहाँ पूरे सूँ से क्या अभिप्राय है –
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परमात्मा
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कबीर का जन्म किस वर्ष हुआ था –
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सन् 1398
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रात्यूँ रूँनी बिरहनीं ज्यूँ बंचै कूँ कुँज।
कबीर अन्तर प्रजल्या प्रगटया बिरहा पुंज।।
कबीर ने यहाँ विरहिणी किसे कहा है –
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आत्मा
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बिरहिन ऊभी पथ सिरि, पंथी बूझे धाई।
एक सबद कहि पीव का कबर मिलौगे आइ।।
यहाँ कबीर ने किस भाव को व्यंजित किया है ?
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विरह की तीव्रता को
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बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जीवै, जिवै तो बौरा होई।।
कबीर के इस पद में कौनसा अलंकार है –
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रूपक
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मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।
मुकताहल मुकता चुगैं, अब उङि अनत न जाहिं।।
कबीर दर्शन में यहाँ हंसा किसे कहा गया है –
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जीवात्मा
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षट दल कंवल निवासिया, चहु कौं फेरि मिलाइ रे।।
दहुँ कै बीचि समाधियाँ, तहाँ काल न पासै आइ रे।।
कबीर दर्शन में कंवल शब्द निम्न में से किस अभिप्राय को प्रकट करता है ?
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चक्र
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गुरु प्रसाद सूई कै नांकै, हस्तो आवै जांही।।
कबीर ने इस पद में निम्न में से किस अभिप्राय को स्थापित किया है –
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गुरु की कृपा से असंभव कार्य भी संभव है।
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’पहुप बिना एक तरवर फलियाँ, बिन कर तूर बजाया।’
इस पंक्ति में कौनसा अलंकार है ?
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विभावना
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‘चरननि लागि करौ बरिआई।’ यहाँ रेखांकित पद का अर्थ है-
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सेवा
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’सायर जले सकल बन दाजे, मंछ अहेरा खेलै’।
इस पंक्ति में कौनसा अलंकार है –
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असंगति
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कबीर के साहित्य में उलटबासियाँ कहाँ से ग्रहण की गई है ?
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सिद्ध साहित्य
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कबीर का हठयोग किस मत पर आधारित है ?
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नाथ साहित्य
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कबीर के गुरु थे ?
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रामानन्द
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रामचन्द्र शुक्ल ने निर्गुण मार्ग का निर्दिष्ट प्रवर्तक किसे माना है ?
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कबीर
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कबीर ने किससे प्रभावित होकर परमात्मा को प्रियतम माना ?
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वैष्णवों से
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कबीर के काव्य में प्रधानता है ?
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बुद्धि तत्त्व की।
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