काव्य लक्षण (Kavya Lakshana in Hindi): परिभाषा, विभिन्न आचार्यों के मत और संपूर्ण अध्ययन
प्रस्तावना: काव्य लक्षण क्या है?
हिंदी साहित्य और भारतीय काव्यशास्त्र में प्रवेश करते ही सबसे पहला बुनियादी सवाल सामने आता है— आखिर ‘काव्य’ या कविता किसे कहते हैं? इसके अलावा, क्या हर छंदबद्ध रचना कविता होती है? प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक, विभिन्न आचार्यों ने कविता की सीमा तय करने के लिए अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं। इन परिभाषाओं को ही ‘काव्य लक्षण’ कहा जाता है। चूँकि आप UGC NET, TGT, PGT या किसी अन्य प्रतियोगी हिंदी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, इसलिए इन सभी आचार्यों के मतों को विस्तार से जानना आपके लिए बेहद जरूरी है। आइए, इस लेख में हम एक-एक करके सभी आचार्यों की परिभाषाओं को समझते हैं।
1. संस्कृत आचार्यों के काव्य लक्षण
संस्कृत काव्यशास्त्र में आचार्यों ने अपने ग्रंथों में काव्य के स्वरूप को स्पष्ट करने का पूरा प्रयास किया है। परिणामस्वरूप, इसके कई ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण रूप देखने को मिलते हैं:
-
अग्निपुराण: अग्निपुराण में काव्य का लक्षण बताते हुए कहा गया है कि संक्षिप्त और स्पष्ट पदावली वाला, तथा स्फुटकलंकार, गुण और दोष से रहित रचना ही काव्य है।
-
आचार्य भामह (छठी शताब्दी): चूँकि भामह ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘काव्यालंकार’ में बहुत प्रसिद्ध परिभाषा दी है— “शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्”, यानी शब्द और अर्थ के ‘सहित भाव’ को काव्य कहते हैं। भामह शब्द और अर्थ दोनों के सामंजस्य पर बल देते हैं; उनके अनुसार न तो केवल चमत्कारिक शब्द कविता है और न ही केवल अर्थ का सौंदर्य।
-
आचार्य दण्डी (7वीं शताब्दी): इसी प्रकार, आचार्य दण्डी ने अपने ग्रंथ ‘काव्यादर्श’ में लिखा— “शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली”। यानी इष्ट अर्थ से युक्त पदावली केवल काव्य का शरीर मात्र है। दण्डी केवल शब्दार्थ को काव्य नहीं मानते, क्योंकि उनके अनुसार शब्दार्थ तो केवल शरीर है, उसकी आत्मा (अलंकार आदि) अलग है।
-
आचार्य वामन (8वीं शताब्दी): रीति संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य वामन ने अपने ग्रंथ ‘काव्यालंकार सूत्रवृत्ति’ में स्पष्ट किया कि गुण और अलंकार से युक्त शब्दार्थ ही काव्य नाम को प्राप्त होते हैं (“गुणलंकृतौ शब्दार्थौ काव्य शब्दे विद्ध्यते”)।
-
आचार्य मम्मट (12वीं शताब्दी): संस्कृत काव्यशास्त्र के सबसे प्रसिद्ध आचार्यों में एक मम्मट ने अपने ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ में लिखा— “तददोषौ शब्दार्थौ सगुणानलंकृती पुनः क्वासीपि”। इसका अर्थ है कि वह काव्य दोषों से रहित, गुणों से युक्त और कभी-कभी अलंकारों से रहित भी हो सकता है, बशर्ते उसमें शब्द और अर्थ का सुंदर मेल हो।
-
आचार्य विश्वनाथ (14वीं शताब्दी): हालाँकि साहित्यदर्पणकार आचार्य विश्वनाथ ने मम्मट के काव्य लक्षण का खंडन करते हुए अपना प्रसिद्ध लक्षण दिया— “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” (रस से परिपूर्ण वाक्य ही काव्य है)।
-
पंडितराज जगन्नाथ (17वीं शताब्दी): पंडितराज जगन्नाथ ने अपने ग्रंथ ‘रस गंगाधर’ में बहुत ही सुंदर परिभाषा दी— “रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्” यानी रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द ही काव्य है।
अन्य संस्कृत आचार्यों के महत्वपूर्ण मत
-
आनंदवर्धन: शब्दार्थ शरीरं तावत्काव्यम् / सहृदय हृदयलादि शब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्षणम् काव्यस्यात्मा ध्वनिः।।
-
क्षेमन्द: काव्यविशिष्टशब्दार्थ साहित्यसदलंकृतम्।
-
भोजराज: अदोपौ गुणवतकाव्यं अलंकारैरलंकृतम्। रसान्वितं कविः कुर्वन् कीर्ति प्रीतिं च विन्दति।।
-
कुंतक: शब्दार्थो सहितौ वक्र कविव्यापारशालिनी। बन्धे व्यवस्थितं काव्यं तद्विदाह्लादकारिणी।।
-
जयदेव: निर्दोषगुणलंकार लक्षणरीतिवृत्तं वाक्यं काव्यम्।।
-
हेमचंद्र: अदोपौ सगुणी सालंकारी च शब्दार्थौ काव्यम्।।
-
रुद्रद: ‘ननु शब्दार्थौ काव्यम्’
-
विद्याधर: शब्दार्थौ वपु्रस्य शब्दार्थवपुस्ताक्त काव्यम्।
काव्य हेतु परिभाषा, भेद और विभिन्न आचार्यों के मत
2. हिंदी आचार्यों के काव्य लक्षण और विचार
रीतिकाल से लेकर आधुनिक युग तक, हिंदी के महान कवियों और समीक्षकों ने भी काव्य के लक्षण अपने ढंग से गढ़े हैं:
-
आचार्य केशवदास: रीतिकाल के प्रसिद्ध आचार्य केशवदास ने अपने प्रसिद्ध श्लोक में लिखा— “जदपि सुजाति सुलच्छनी, सुबरन सरस सुवृत्त। भूषन बिनु न बिराजै कविता बनिता मित्त।।” यानी उन्होंने अलंकार के महत्व को रेखांकित किया।
-
चिन्तामणि: अतः उन्होंने लिखा— “सगुणालंकार सहित दोष रहित जो होई। शब्द अर्थ ताको कवित कहत बुध सब कोई।।”
-
देव (काव्य रसायन): “शब्द जीव तिहि अरथ मन, रसमत सुजस शरीर। चलत वहै जुग छंद गति, अलंकार गंभीर।।”
-
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: शुक्ल जी ने अपने निबंध संग्रह ‘चिन्तामणि भाग-1’ के निबंध ‘कविता क्या है’ में लिखा— “जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्त साधना के मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती है उसे कविता कहते हैं।” इसके अलावा, उन्होंने स्पष्ट किया कि कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-संबंधों से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है।
आधुनिक हिंदी समीक्षकों के मत
-
महावीर प्रसाद द्विवेदी: चूँकि उनका मानना था कि “अन्तःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है।” और “ज्ञान-राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।”
-
जयशंकर प्रसाद: “काव्य आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति है जिसका संबंध विश्लेषण या विज्ञान से नहीं है।”
-
सुमित्रानंदन पंत: “कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।”
-
महादेवी वर्मा: “कविता कवि विशेष की भावनाओं का चित्रण है और वह चित्रण इतना ठीक है कि उसके जैसी ही भावनाएं दूसरे के हृदय में आविर्भूत हो जाती हैं।”
-
हजारी प्रसाद द्विवेदी: “साहित्य मनुष्य के अन्तर का उच्छलित आनन्द है, जो उसके अन्तर में अटाए नहीं अट सका था।”
-
डॉ. नगेंद्र: “आत्माभिव्यक्ति ही वह मूल तत्त्व है, जिसके कारण कोई व्यक्ति साहित्यकार और उसका कृति साहित्य बन पाती है।”
-
रामविलास शर्मा: “साहित्य जनता की वाणी है। उसके जातीय चरित्र का दर्पण है।”
-
बालकृष्ण भट्ट: “साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है।”
-
प्रेमचंद: “साहित्य जीवन की आलोचना है।”
-
अज्ञेय: “कविता सबसे पहले शब्द है और अन्त में भी यही बात रह जाती है कि कविता शब्द है।”
-
धूमीलि: “कविता शब्दों की अदालत में अपराधियों के कटघरे में खड़े एक निर्दोष आदमी का हलफनामा है।”
3. पाश्चात्य समीक्षकों के काव्य लक्षण
पश्चात विद्वानों ने भी कविता और काव्य को अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित किया है:
-
ड्रायडन: कविता रागात्मक और छन्दोबद्ध भाषा के माध्यम से प्रकृति का अनुकरण है।
-
वर्ड्सवर्थ: चूँकि उनका मानना था कि “कविता हमारे प्रबल भावों का सहज उच्छलन है।” (उन्होंने यह भी कहा कि ‘शान्ति के क्षणों में स्मरण किये हुए प्रबल मनोवेगों का सहज उच्छलन कविता है।’)
-
जॉनसन: छन्दमयी वाणी कविता है।
-
मैथ्यू आर्नोल्ड: इसी प्रकार, “सत्य तथा काव्य सौंदर्य के सिद्धांतों द्वारा निर्धारित उपबंधों के अधीन जीवन की समीक्षा का नाम काव्य है।” (कविता मूल रूप से जीवन की आलोचना है।)
-
जान मिल्टन: सरल, प्रत्यक्ष तथा रागात्मक अभिव्यक्ति काव्य है।
-
एडगरे एलन: काव्य सौन्दर्य की लयपूर्ण सृष्टि है।
-
कालिरिज: सर्वात्तम व्यवस्था में सर्वोत्तम शब्द ही कविता है।
-
हडसन: कविता कल्पना और संवेग के द्वारा जीवन की व्याख्या है।
निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहें तो, काव्य लक्षण की यह लंबी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि साहित्य की कोई एक रूढ़ परिभाषा नहीं हो सकती। तथापि, संस्कृत के अलंकार और रसवादी आचार्यों से लेकर आधुनिक युग के समीक्षकों तक, हर दौर में काव्य का दायरा बदला है। यही कारण है कि यह विविधता हिंदी साहित्य को और अधिक समृद्ध और रोचक बनाती है।
शब्द शक्ति: परिभाषा, भेद और संपूर्ण उदाहरणों के साथ विस्तृत व्याख्या
रस निष्पत्ति का अर्थ, सिद्धांत, आचार्य और नियम
वक्रोक्ति सिद्धान्त : परिभाषा, स्वरूप, अवधारणा, महत्त्व , प्रवर्तक
साधारणीकरण से आप क्या समझते हैं ?