‘शिरीष के फूल’ (Shirish ke Phool) – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी | संपूर्ण सारांश, मूल पाठ और नोट्स
हिंदी गद्य साहित्य में ललित निबंधों के क्षेत्र में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। उनका निबंध ‘शिरीष के फूल’ कला और जीवन के गहरे सत्यों को उघाड़ने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण रचना है।
‘शिरीष के फूल’ निबंध का सारांश एवं परिचय
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संग्रह: यह प्रसिद्ध ललित निबंध आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध-संग्रह ‘कल्पलता’ (1951) से लिया गया है।
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केंद्रीय भाव: भयंकर गर्मी, लू और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शिरीष के फूल अपनी कोमलता और सुंदरता बनाए रखते हैं। लेखक ने इसके माध्यम से मनुष्य की अजय जिजीविषा (जीने की इच्छा) और अनासक्ति (धैर्य) को दर्शाया है।
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अवधूत रूप: शिरीष का पेड़ एक ‘अवधूत’ (संन्यासी) की तरह है, जो सुख-दुख और आंधी-तूफान में भी अपनी धुन में मस्त रहता है।
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कालिदास का संदर्भ: लेखक ने कालिदास का उदाहरण देते हुए बताया है कि शिरीष के फूल अत्यंत सुकुमार होते हैं, जिन्हें केवल भंवरों के पैरों का दबाव सहन होता है, पक्षियों का नहीं। कालिदास जैसे महान कवि ही ऐसी सुंदर चीजों का सही मूल्य समझ सकते थे।
शिरीष के फूल (मूल पाठ)
जहाँ बैठकर यह लिख रहा हूँ, उसके आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ शिरीष के अनेक पेड़ हैं। जेठ की जलती धूप में, जबकि धरती निर्धूम अग्निकुंड बनी हुई थी, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया था। कम फूल इस प्रकार की गर्मी में फूल सकने की हिम्मत करते हैं। कर्णिकार और आरग्वध (अमलतास) की बात मैं भूल नहीं रहा हूँ, वे भी आसपास बहुत हैं। लेकिन शिरीष के साथ आरग्वध की तुलना नहीं की जा सकती। वह पंद्रह-बीस दिन के लिए फूलता है, वसंत ऋतु के पलाश की भाँति। कबीरदास को इस तरह पंद्रह दिन के लिए लहक उठना पसंद नहीं था। यह भी क्या कि दस दिन फूले और फिर खंडहर-के-खंडहर— ‘दिन दस फूले फूलिके खंडहर भया पलाश’। ऐसे दुमदारों से तो लँगूरे भले हैं। फूल है शिरीष। वसंत के आगमन के साथ लहक उठता है, आषाढ़ तक तो निश्चित रूप से मस्त बना रहता है। मन रम गया तो उमस में भी निर्धात फूलता रहता है। जब उमस से प्राण उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है, एकमात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजयता का मंत्रप्रचार करता रहता है। यद्यपि कवियों की भाँति हर फूल-पत्ते को देखकर मुग्ध होने लायक हृदय विधाता ने नहीं दिया है, पर नितांत ठूँठ भी नहीं हूँ। शिरीष के पुष्प मेरे मानस में थोड़ा हिल्लोल ज़रूर पैदा करते हैं। शिरीष के वृक्ष बड़े और छायादार होते हैं। पुराने भारत का रईस?
जिन मंगलजनक वृक्षों को अपनी वृक्ष-वाटिका की चहारदीवारी के पास लगाया करता था, उनमें एक शिरीष भी है (बृहतसंहिता, 55.3)। अशोक, अरिष्ट, पुन्नाग और शिरीष के छायादार और धनमशूण हरीतिमा से परिवेष्टित वृक्ष-वाटिका ज़रूर बड़ी मनोहर दिखती है। वात्स्यायन ने ‘कामसूत्र’ में बताया है कि वाटिका के सघन छायादार वृक्षों की छाया में ही झूला (प्रेखा-दोला) लगाया जाना चाहिए। यदि पुराने कवि बकुल के पेड़ में ऐसी दोलाओं को लगा देखना चाहते थे, पर शिरीष भी क्या बुरा है। डाल इसकी अपेक्षाकृत कमज़ोर ज़रूर होती है, उसमें झूलनेवालों का वज़न भी बहुत ज़्यादा नहीं होता। कवियों की यही तो बुरी आदत है कि वज़न का एकदम ख़्याल नहीं करते। मैं तुंदिल नरपतियों की बात नहीं कर रहा हूँ, वे चाहें तो लोहे का पेड़ बनवा लें।
शिरीष का फूल संस्कृत-साहित्य में बहुत कोमल माना गया है। मेरा अनुमान है कि कालिदास ने यह बात शुरू-शुरू में प्रचार की होगी। इस पुष्प पर कुछ पक्षपात था (मेरा भी है)। कह गए हैं, शिरीष पुष्प केवल भौरों के पदों का कोमल दबाव सहन कर सकता है, पक्षियों का बिल्कुल नहीं— ‘पद समेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीष पुष्पं न पुनः पतत्रिणाम्।’ अब इतने बड़े कवि की बात का विरोध कैसे करूँ? सिर्फ विरोध करने की हिम्मत न होती तो भी कुछ कम बुरा नहीं था, यहाँ तो इच्छा ही नहीं है। हैं, खैर, मैं दूसरी बात कह रहा था। शिरीष के फूलों की कोमलता देखकर पर्वतीय कवियों ने समझा कि उसका सब-कुछ कोमल है—यह भूल है। इसके फूल इतने मज़बूत होते हैं कि नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ते। जब तक नए फल-पत्ते मिलकर धकियाकर उन्हें बाहर नहीं कर देते, तब तक वे डटे रहते हैं। वसंत के आगमन के समय जब सारी वनस्पति पुष्प-पत्र से मर्मरित होती रहती है, शिरीष के पुराने पत्ते बुरी तरह खड़खड़ाते रहते हैं। मुझे इनको देखकर उन नेताओं की बात याद आती है, जो किसी प्रकार ज़माने का रुख नहीं पहचानते और जब तक नए पौधे के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते, तब तक जमे रहते हैं।
मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार-लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? ज़रा और मृत्यु, ये दोनों ही जगत् के अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने अफ़सोस के साथ इनकी सच्चाई पर मुहर लगाई थी— ‘धरा को प्रमाण यही तुलसी जो करा सो, जो बरा सो बुताना।’ मैं शिरीष के फलों को देखकर कहता हूँ कि क्यों नहीं समझते बाबा कि झड़ना निश्चित है? सुनता कौन है? महाकाल-देवता सपासप कोड़े चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं, जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं। दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं वहीं देर बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा जाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-बुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हैं। जमे कि मरे।
एक-एक बार मुझे मालूम होता है कि यह शिरीष एक अद्भुत अवधूत है। दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं, तब भी वह हज़रत न जाने कहाँ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं। एक वनस्पतिशास्त्री ने मुझे बताया है कि यह उस श्रेणी का पेड़ है जो वायुमंडल से अपना रस खींचता है। ज़रूर खींचता होगा। नहीं तो भयंकर लू के समय इतने कोमल तंतुजाल और ऐसे सुकुमार केसर को कैसे उगा सकता है? अवधूतों के मुँह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएँ निकली हैं। कबीर बहुत कुछ इस शिरीष के समान ही थे, मस्त और वेपरवाह, पर सरस और मादक। कालिदास भी ज़रूर अनासक्त योगी रहे होंगे। शिरीष फ़क्कड़ाना मस्ती से ही उपक सकते हैं और ‘मेघदूत’ का काव्य उसी प्रकार के अनासक्त अनाविल उन्मुक्त हृदय में उमड़ सकता है। जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फ़क्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है? कहते हैं कर्नाटक राज की प्रज्ञा विज्जिका देवी ने गर्वपूर्वक कहा था कि एक कवि ब्रह्मा थे, दूसरे वाल्मीकि और तीसरे व्यास। एक ने वेदों को दिया, दूसरे ने रामायण को और तीसरे ने महाभारत को। इसके अतिरिक्त और कोई यदि कवि होने का दावा करे तो मैं कर्णाट राज की प्यारी रानी उनके सिर पर अपना बायाँ चरण रखती हूँ— ‘तेषां मूर्ध्नि ददामि वामचरणं कर्णाटराजप्रिया।’ मैं जानता हूँ कि इस उपालंभ से दुनिया का कोई कवि हारा नहीं है, पर इसका मतलब यह नहीं कि कोई लजाए नहीं तो उसे डाँटा भी न जाए। मैं कहता हूँ कि कवि बनना है मेरे दोस्तों, तो फ़क्कड़ बनो। शिरीष की मस्ती की ओर देखो। लेकिन अनुभव ने मुझे बताया है कि कोई किसी की सुनता नहीं। मरने दो।
कालिदास वज़न ठीक रख सकते थे, क्योंकि वे अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय पा चुके थे। कवि होने से क्या होता है? मैं भी छंद बना लेता हूँ, तुक जोड़ लेता हूँ और कालिदास भी छंद बना लेते थे—तुक जोड़ ही सकते होंगे—इसलिए हम दोनों एक श्रेणी के नहीं हो पाते। पुराने सहृदय ने किसी ऐसे ही दावेदार को फटकारते हुए कहा था— ‘वय्मपि कवयः कवयः कवयस्ते कालिदासाया।’ मैं तो मुग्ध और विस्मय-विमूढ़ होकर कालिदास के एक-एक श्लोक को देखकर हैरान हो जाता हूँ। अब इस शिरीष के फूल का ही एक उदाहरण लीजिए। शकुंतला बहुत सुंदर थी। सुंदर क्या होने से कोई हो जाता है? देखना चाहिए कि कितने सुंदर हृदय से वह सौंदर्य डुबकी लगाकर लगातार निकला था। शकुंतला के हृदय से निकली थी। विधाता की ओर से कोई कार्पण्य नहीं था, कवि की ओर से भी नहीं। राजा दुष्यंत भी अच्छे-भले प्रेमी थे। उन्होंने शकुंतला का एक चित्र बनाया था, लेकिन रह-रहकर उनका मन खीझ उठता था। उहूँ, कहीं-कहीं कुछ छूट गया है। बड़ी देर के बाद उन्हें समझ में आया कि शकुंतला के कानों में वे उस शिरीष पुष्प को देना भूल गए हैं, जिसके केसर गंडस्थल तक लटके हुए थे, और रह गया था शरच्छंद्र की किरणों के समान कोमल और शुभ्र मृणाल का हार।
कृतं न कर्णापिंतबन्धनं सखे शिरीषमागंधविलंबि केसरम्।
न वा शरच्छंद्रमरीचिकोमलं मृणालसूत्र रचितं स्तनानन्तरे॥
कालिदास ने यह श्लोक न लिख दिया होता तो मैं समझता कि वे भी बस और कवियों की भाँति कवि थे, सौंदर्य पर मुग्ध, दुःख से अभिभूत, सुख से गदगद। पर कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे। दुःख हो या सुख, वे अपना भाव-रस उस अनासक्त कृषीवल की भाँति खींच लेते थे जो निर्दलित इक्षुदंड से रस निकाल लेता था। कालिदास महान् थे, क्योंकि वे अनासक्त रह सके थे। कुछ इसी श्रेणी की अनासक्ति आधुनिक हिंदी कवि सुमित्रानंदन पंत में है। कविवर रवीन्द्रनाथ में यह अनासक्ति थी। एक जगह उन्होंने लिखा है— ‘राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही अप्रभेदी क्यों न हो, उसकी शिल्पकला कितनी ही सुंदर क्यों न हो, वह यह नहीं कहता कि हमें आकर ही सारा रास्ता समाप्त हो गया। असल गंतव्य स्थान उसे अतिक्रम करने के बाद ही है, यही बताना उसका कर्तव्य है।’ फूल हो या पेड़, वह अपने-आपमें समाप्त नहीं है। किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अंगुली है, वह इशारा है।
शिरीषतः सचमुच पक्के अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी तरंगें जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती हैं। इस चिलकती धूप में इतना सरस वह कैसे बना रहता है? क्या ये बाह्य परिवर्तन धूप, वर्षा, आँधी, लू—अपने आपमें सत्य नहीं हैं? हमारे देश के ऊपर से जो यह मार-काट, अग्निदाह, लूटपाट, खून-खच्चर का बवंडर बह गया है, उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है? शिरीष रह सका है। अपने देश का एक बूढ़ा रह सका है। क्यों मेरा मन पूछता है कि ऐसा क्यों संभव हुआ? क्योंकि शिरीष भी अवधूत है। शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। गांधी भी वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सके थे। मैं जब-जब शिरीष की ओर देखता हूँ, तब तक हूक उठती है—हाय, वह अवधूत आज कहाँ है?