हिंदी साहित्य का इतिहास

हिंदी साहित्य का इतिहास: रासो काव्य और प्रमुख ग्रंथ (भाग-4)

हिंदी साहित्य का इतिहास भाग 4 - रासो साहित्य और पृथ्वीराज रासो

हिंदी साहित्य का इतिहास (भाग-4): रासो साहित्य और प्रमुख ग्रंथ (पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो आदि)

हिंदी साहित्य के आदिकाल में रासो साहित्य (चारण साहित्य) का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इस काल में मुख्य रूप से राजाओं के शौर्य, युद्धों और उनके प्रेम प्रसंगों का सजीव वर्णन किया गया है। आइए रासो साहित्य, इसकी विशेषताओं और प्रमुख ग्रंथों का विस्तार से अध्ययन करें।

1. रासो साहित्य: सामान्य परिचय

  • अन्य नाम: चारण साहित्य।

  • मुख्य क्षेत्र: राजस्थान।

  • रासो छंद: इसमें मुख्य रूप से 29 मात्राओं वाले छंद का प्रयोग मिलता है।

‘रासो’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों के मत:

  • राससूय शब्द से: गार्सा-द-तासी

  • रसिक शब्द से: नरोत्तम दास स्वामी

  • रसायण शब्द से: आचार्य रामचंद्र शुक्ल

  • राजदेश शब्द से: ग्रियर्सन

  • रहस्य शब्द से: श्यामलीदास

  • रास शब्द से: बच्चन सिंह

  • ‘रासक’ शब्द से: हजारीप्रसाद द्विवेदी (यह सर्वमान्य मत है)

रासो काव्यों की प्रमुख विशेषताएँ

  • इतिहास एवं कल्पना का अद्भुत समन्वय

  • अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन

  • प्रामाणिक और अप्रामाणिक का संशय

  • सामंती समाज व संस्कृति का चित्रण

  • ऐतिहासिकता व राष्ट्रीयता का अभाव

  • युद्धों का जीवंत वर्णन और प्रकृति चित्रण

  • वीर एवं शृंगार रस का भव्य चित्रण

  • भाषा शैली: मुख्य रूप से डिंगल व पिंगल।

2. प्रमुख रासो ग्रंथ

1. खुमाण रासो

  • समय: 9वीं शताब्दी।

  • रचनाकार: दलपति विजय।

  • भाषा: राजस्थानी।

  • क्रम: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इसे क्रम में प्रथम स्थान दिया गया है, जबकि हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार इसे अंतिम माना गया है।

  • विशेषता: इसमें चित्तौड़ नरेश खुमाण द्वितीय (870-900) व अलमायूँ का वर्णन है। यह 5000 छंदों का विशाल काव्य ग्रंथ है, जिसकी हस्तलिखित प्रति पूना संग्रहालय में सुरक्षित है।

  • प्रसिद्ध पंक्ति:

    पिय चितौड़ न आबिऊ, सावन पहिली तीज।

    जोवे बाट विरहिणी खिन-खिन अणवै खीज।।

2. बीसलदेव रासो

  • समय: 1155 ई.।

  • रचनाकार: नरपति नाल्ह।

  • नायक व नायिका: बीसलदेव / विग्रहराज चतुर्थ और राजमती।

  • भाषा व शैली: राजस्थानी (यह एक गेय काव्य है) तथा शैली पिंगल है। यह हिंदी का प्रथम बारहमासा वर्णन वाला ग्रंथ है।

  • स्वरूप: इसमें 125 छंद हैं, श्रृंगार रस प्रधान है, और यह 4 खंडों में विभाजित है—

    1. विवाह (अजमेर राजा बीसलदेव का भोज पुत्री राजमती से विवाह)

    2. व्यंग्य (राजमती के व्यंग्य से रुष्ट होकर उड़ीसा जाना)

    3. विरह वर्णन (राजमती का विरह वर्णन, बीसलदेव का उड़ीसा से लौटना)

    4. राजमती का चित्तौड़ लाना

  • विशेष तथ्य: यह साहित्यिक हिंदी की प्रथम कृति, साहित्यिक ब्रज भाषा की प्रथम कृति, शुद्ध वियोग श्रृंगार की रचना और वीर गीत परंपरा का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। यह एकमात्र रचना है जिसमें वीर रस नहीं है। इसके बारे में प्रसिद्ध है— “बारह सो बहुतरा मझारि बुढवारि”

3. हम्मीर रासो

  • समय: 1375 ई. (14वीं सदी)।

  • रचनाकार: सारंगधर / जज्जल / जोधराज।

  • विशेष तथ्य: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, सारंगधर को कुंडलिया छंद का प्रथम प्रयोगकर्ता माना जाता है। प्राकृत पैंगलम में प्राप्त 8 छंदों को आधार बनाकर इसे अस्तित्व में लाया गया। इसमें राणा हम्मीर व अलाउद्दीन के युद्ध का वर्णन है। शुक्ल जी के अनुसार इस रचना से अपभ्रंश की परंपरा समाप्त समझनी चाहिए। (नोट: हम्मीर महाकाव्य – नयनचंद्र सूरी, हम्मीरविजय – जयचंद सूरी, हम्मीरहठ – जोधराज व ग्वाल कवि द्वारा रचित हैं).

4. परमाल रासो (आल्हाखंड)

  • समय: 13वीं शताब्दी।

  • रचनाकार: जगनिक (महोबा का राजा परमार्दिदेव का आश्रित कवि)।

  • क्षेत्र: उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड (इसे ‘आल्हाखंड’ भी कहते हैं)। यह आल्हा-वर्षा ऋतु में गाये जाते हैं।

  • विशेषता: यह एक गेय काव्य है, जिसमें आल्हा छंद (31 मात्राओं का छंद) का प्रयोग हुआ है। यह सर्वाधिक अप्रामाणिक रचना मानी जाती है, जो मौखिक रूप में चलती रही है।

  • प्रकाशन व संपादन: सन् 1865 ई. में चार्ल्स इलियाट ने ‘आल्हाखंड’ का प्रकाशन करवाया था, तथा डॉ. श्यामसुंदर दास ने ‘परमालरासो’ नाम से इसका संपादन किया।

  • लोकप्रिय पंक्ति:

    बारह बरस ली कूकर जीये अरु तेरह लो जीये सियार।

    बरस अठारह क्षत्रिय जीये आगे जीवन धिक्कार।।

5. पृथ्वीराज रासो

  • रचनाकार: चंद्रवरदाई (कविचंद / बलिमृष्ट / पृथ्वीभट्ट)।

  • जन्म: 1168 ई., लाहौर में। यह पृथ्वीराज के मित्र व राज्याश्रित कवि थे (जनश्रुति के अनुसार दोनों का जन्मकाल व मृत्युकाल एक है)।

  • महत्व: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे हिंदी का प्रथम महाकवि तथा प्रथम महाकाव्य माना है।

  • विद्वानों द्वारा दी गई उपाधियाँ:

    • छंद का राजा – प्रो. नामवर सिंह

    • छप्पय छंद का राजा – शिवसिंह सेंगर

  • स्वरूप: इसमें कुल 69 सर्ग (समय) और 68 प्रकार के छंदों (मुख्य छंद छप्पय) का प्रयोग हुआ है। भाषा-शैली राजस्थानी व ब्रज (अपभ्रंश) यानी पिंगल है। रस वीर और श्रृंगार हैं।

  • नायक व नायिका: अजमेर राजा पृथ्वीराज चौहान (धिरोदत्त नायक) और कन्नौज राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता (मुग्धा नायिका)।

  • रूपांतरण (नरोत्तम स्वामी अनुसार):

    1. पृथ्वीराज रासो का वृहद रूपांतरण – 16,306 छंद (सर्वाधिक अप्रामाणिक)

    2. पृथ्वीराज रासो का मध्यम रूपांतरण – 7,000 छंद (सर्वाधिक लोकप्रिय)

    3. पृथ्वीराज रासो का लघु रूपांतरण – 3,500 छंद

    4. पृथ्वीराज रासो का लघुतम रूपांतरण – 3,000 छंद (सर्वाधिक प्रामाणिक)

  • प्रमाणिकता को लेकर विद्वानों के मत:

    • पृथ्वीराज रासो को प्रामाणिक मानने वाले विद्वान: मिश्रबंधु, श्यामसुंदर दास, कर्नल जेम्स टॉड, मोहनलाल विष्णुलाल पाण्ड्या।

    • पृथ्वीराज रासो को अप्रामाणिक मानने वाले विद्वान: आचार्य रामचंद्र शुक्ल, कविराजा श्यामलदान, डॉ. बूलर, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, मुंशी देवीप्रसाद (सर्वप्रथम अप्रामाणिक बूलर ने स्थापित किया था, जबकि इसके उद्धारक कर्नल जेम्स टॉड हैं)।

    • पृथ्वीराज रासो को अर्धप्रामाणिक मानने वाले विद्वान: मुनि जिनविजय, डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी, हजारीप्रसाद द्विवेदी।

  • पूर्णता: पृथ्वीराज रासो को पूर्ण उनके पुत्र जल्हण ने किया था (प्रसिद्ध पंक्ति: पुस्तक जल्हण हत्थ दै, चलि गज्जन नृप काज)।

❓ पृथ्वीराज रासो की आलोचना और स्वरूप से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs):

Q1: पृथ्वीराज रासो को ‘घटनाकोष’ कहकर किसने पुकारा है?
उत्तर: पृथ्वीराज रासो को ‘घटनाकोष’ डॉ. नगेंद्र ने कहकर पुकारा है।

Q2: पृथ्वीराज रासो को ‘महाभारत की तरह विशाल काव्य’ किसने माना है?
उत्तर: पृथ्वीराज रासो को महाभारत की तरह विशाल काव्य डॉ. दशरथ शर्मा ने माना है।

Q3: पृथ्वीराज रासो को ‘महाकाव्यात्मक राजनीतिक त्रासदी’ किसने माना है?
उत्तर: पृथ्वीराज रासो को महाकाव्यात्मक राजनीतिक त्रासदी डॉ. बच्चन सिंह ने माना है।

Q4: पृथ्वीराज रासो को ‘विशाल वीरकाव्य’ की संज्ञा किसने दी है?
उत्तर: पृथ्वीराज रासो को विशाल वीरकाव्य श्यामसुंदर दास ने कहा है।

Q5: पृथ्वीराज रासो को ‘विकासशील काव्य’ की संज्ञा किसने दी है?
उत्तर: पृथ्वीराज रासो को विकासशील काव्य की संज्ञा शंभूनाथ सिंह ने दी है।

Q6: पृथ्वीराज रासो को ‘स्वाभाविक विकासशील महाकाव्य’ किसने माना है?
उत्तर: पृथ्वीराज रासो को स्वाभाविक विकासशील महाकाव्य आचार्य गुलाब राय ने माना है।

 

6. विजयपाल रासो

  • रचनाकार: नल्हसिंह।

  • समय: 16वीं शताब्दी।

  • विषय: इसमें विजयपाल सिंह के पंग राजा के साथ हुए युद्ध का वर्णन है।

निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य के आदिकाल की रीढ़ माने जाने वाला ‘रासो काव्य’ केवल युद्धों और वीरता की अतिश्योक्तिपूर्ण गाथाएँ नहीं है, बल्कि यह उस युग की राजनीतिक उथल-पुथल, सामंती संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता का सबसे जीवंत दस्तावेज है। ‘पृथ्वीराज रासो’ से लेकर ‘बीसलदेव रासो’ और ‘परमाल रासो’ जैसी कृतियों ने न केवल हिंदी काव्य परंपरा को समृद्ध किया, बल्कि वीर रस की उस अद्भुत धारा को जन्म दिया जो आगे चलकर राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा बनी। आज भी ये रासो ग्रंथ हमारे साहित्यिक इतिहास का एक गौरवशाली और अनिवार्य हिस्सा हैं।

❓ प्रमुख रासो काव्य और रचनाकार (FAQs):

Q1: ‘बीसलदेव रासो’ किसकी रचना है?
उत्तर: ‘बीसलदेव रासो’ के रचयिता नरपति नाल्ह हैं। यह एक प्रसिद्ध श्रृंगारपरक रासो ग्रंथ है।

Q2: हिंदी का सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ किसकी रचना है?
उत्तर: ‘पृथ्वीराज रासो’ महाकवि चंदबरदाई की प्रसिद्ध रचना है, जिसे हिंदी का प्रथम महाकाव्य भी माना जाता है।

Q3: ‘परमाल रासो’ (आल्हा खंड) के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: ‘परमाल रासो’ (जिसे आल्हा खंड भी कहा जाता है) के रचयिता जागनिक (ज्याग्निक) हैं।

Q4: ‘खुमाण रासो’ किसकी रचना है?
उत्तर: ‘खुमाण रासो’ के रचयिता दलपति विजय हैं।

Q5: ‘विजयपाल रासो’ के रचनाकार का क्या नाम है?
उत्तर: ‘विजयपाल रासो’ के रचयिता नल सिंह भाट हैं।

Q6: ‘हम्मीर रासो’ किसकी प्रसिद्ध रचना है?
उत्तर: ‘हम्मीर रासो’ के रचयिता सारंगधर हैं (इस नाम से शाङ्गधर का ग्रंथ भी विख्यात है)।

 

 

 

 

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