हिंदी साहित्य का इतिहास

हिंदी साहित्य का इतिहास: सिद्ध साहित्य और प्रमुख कवि (भाग-2)

हिंदी साहित्य का इतिहास भाग 2 - सिद्ध साहित्य और प्रमुख कवि

हिंदी साहित्य का इतिहास (भाग-2): सिद्ध साहित्य और प्रमुख कवि

हिंदी साहित्य के आदिकाल के अंतर्गत सिद्ध साहित्य का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। वज्रयान और सहजयान शाखा से उपजे इस साहित्य ने हिंदी काव्य की नींव को मजबूत करने में बड़ा योगदान दिया। आइए सिद्ध साहित्य और इसके प्रमुख कवियों का विस्तार से अध्ययन करें।

1. सिद्ध साहित्य: सामान्य परिचय एवं विशेषताएँ

  • समय: 8वीं से 13वीं शताब्दी।

  • भाषा: अवहट्ठ (इनका साहित्य अर्धमागधी अपभ्रंश में लिखा गया है)।

  • प्रमुख केंद्र / स्थान: पूर्वोत्तर भारत (असम, नेपाल, बिहार) और श्रीशैल पर्वत (उड़ीसा)।

  • प्रमुख ग्रंथ: मंजुश्री मूलकल्प

  • संख्या: सिद्धों की कुल संख्या 84 मानी गई है (इनमें लुइपा, लीलापा, विरुपा, डोम्भिपा, शबरपा, सरहपा आदि प्रमुख हैं, और अंतिम भलिपा हैं)।

बौद्ध धर्म का विभाजन और सिद्धों का उदय

  • बौद्ध धर्म विकृत होकर दो शाखाओं में बंटा: (1) हीनयान (2) महायान

  • आगे चलकर महायान दो शाखाओं में बंटा: (1) सहजयान (2) वज्रयान। (यही वज्रयान ही ‘सिद्ध’ कहलाए)।

  • इनमें महासुखवाद का प्रवर्तन हुआ।

  • सिद्ध साहित्य का आरंभ सरहपा से माना जाता है।

  • ये अपने नाम के अंत में ‘पा’ आदरसूचक शब्द लगाते थे (जैसे- सरहपा, लुइपा)।

  • प्रमुख दार्शनिक व सामाजिक मान्यताएँ:

    • ‘नाद’ और ‘बिंदु’ के योग से जगत् की उत्पत्ति।

    • शास्त्रवाद का पूर्ण विरोध और लोकवाद का समर्थन।

    • यह वैचारिक रूप से सैद्धांतिक नहीं थे।

    • राग में विराग, प्रवृत्ति-निवृत्ति, और शांत रस व श्रृंगार रस का समन्वय।

    • गृहजीवन से विरोध था, लेकिन नारी से नहीं (ये नीच स्त्री को भैरवी या डोमिनी कहते थे, तथा साधना में पंचमकार – मद्य, मास, मत्स्य, मैथुन, मुद्रा का प्रयोग करते थे)।

    • इनकी भाषा को ‘संध्या भाषा’ कहा गया है और इनके सांकेतिक पदों को ‘दृष्टकूट पद (चर्यापद)’ कहा जाता है।

2. सिद्ध साहित्य के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ

1. सरहपा (हिंदी के प्रथम कवि)

  • समय: 769 ई. (राहुल सांकृत्यायन के अनुसार)।

  • अन्य नाम: सरहपाद, राहुलभद्र, सरोजवज्र।

  • जाति: ब्राह्मण (नालंदा विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया)।

  • महत्वपूर्ण तथ्य:

    • इन्हें हिंदी का प्रथम कवि माना जाता है।

    • ये सहजयान के प्रवर्तक कवि तथा सिद्धों में सबसे पुराने हैं।

    • आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काल-विभाजन में इनका स्थान छठा (6वें नंबर पर) माना गया है।

    • ये अपने साथ शबर कन्या महामुद्रा को रखते थे।

    • आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी इन्हें ‘आक्रोश की भाषा का प्रथम प्रयोगकर्ता’ मानते हैं।

  • प्रमुख रचना: दोहाकोश (इनके ग्रंथों की संख्या 32 मानी जाती है, जिनकी भाषा अपभ्रंश प्रभावित हिंदी है)।

  • प्रसिद्ध पंक्तियाँ:

    जाहि मन पवन संचरई, नवससि नाह पदेस।

    पण्डित सलल सत बखानई, देहि बुद्ध बसन्त न जानई।

    नाद न बिन्दु न रवि न ससि मंडल,

2. शबरपा

  • जन्म: 780 ई. (क्षत्रिय कुल में)।

  • गुरु: सरहपा।

  • प्रमुख रचना: चर्यापद

3. लुइपा

  • जन्म: 830 ई. के लगभग (कायस्थ परिवार से संबंध)।

  • गुरु: शबरपा।

  • विशेषताएँ:

    • 84 सिद्धों में इनका सबसे उच्च स्थान माना जाता है।

    • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें सिद्धों में प्रथम माना है।

    • ये अत्यधिक रहस्यवादी और दार्शनिक थे। उड़ीसा के राजा दरकिपा भी इनके शिष्य बने थे।

  • प्रमुख पंक्तियाँ:

    काआ तरुवर पंच -बिडाल। चंचल चीए पइठो काल।

    दित करिअ महासुह परिमाण। लूहई भनई गुरु पुंछइअ जाण।।

4. डोम्भिपा

  • जन्म: 840 ई. (क्षत्रिय कुल)।

  • गुरु: विरुपा से दीक्षा ली।

  • रचनाएँ: डोम्भिगीतिका, योगचर्या, अक्षराद्विकोपदेश (इनके द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 21 है)।

5. कण्णपा (कण्णपा-बिहार)

  • गुरु: जालन्धर।

  • विशेषताएँ:

    • सिद्धों में सर्वश्रेष्‍ठ विद्वान और सबसे बड़े कवि माने जाते हैं।

    • इन्होंने सर्वाधिक साहित्य (74 ग्रंथ) लिखा।

    • राहुल सांकृत्यायन के अनुसार— “कण्णपा पांडित्य और कवित्व में बेजोड़ थे।”

6. जोइन्दु

  • समय: 6वीं शताब्दी माना जाता है।

  • प्रमुख रचनाएँ: परमात्मप्रकाश, योगसार

  • विशेषता: अपभ्रंश में दोहा-चोपड़ाई की विधिवत शुरुआत इन्हीं से हुई थी।

7. रामसिंह

  • समय: 11वीं शताब्दी।

  • प्रमुख रचना: पाहुड़ दोहा (यह एक दार्शनिक काव्य है)।

अन्य जैन/रास ग्रंथ

  • रेवंतगिरि्रास – समय: 1231 ई. (इसमें नेमीनाथ की प्रतिमा व रेवंतगिरि तीर्थ का वर्णन है)।

  • स्थूलिभद्र्रास (जिनधर्मसूरि) – समय: 1209 ई. (इसमें स्थूलिभद्र व कोशा नामक वेश्या की घटना है)।

  • सुमति गणिनेमीनाथ रास (1213 ई.) – इसमें 58 छंदों में नेमीनाथ का चरित्र चित्रण है, भाषा अपभ्रंश राजस्थानी है।

  • उद्योतन सूरीकुवलयमाला

  • रामसिंहपाहुुुड़ दोहा

  • मुनि कनकमरकरकण्डचरिउ

यह भी पढ़ें :

हिंदी साहित्य का इतिहास: लेखन पद्धतियाँ और काल-विभाजन (भाग-1)

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *