मुर्दहिया आत्मकथा सारांश
21वीं सदी के प्रथम दशक के अंतिम दौर की रचना ‘मुर्दहिया'(2010) हिन्दी दलितआत्मकथा-साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। आत्मकथाकार डॉ. तुलसीराम ने इस ख्यातिप्राप्त रचना में अपने शैक्षिक जीवन के संघर्षों, पीड़ाओं, बाधाओं एवं अन्य समस्याओं को अनुभव की आँख में पकाकर यथार्थवादी धरातल पर प्रकट किया है। इस आत्मकथात्मक कृति में दलित समाज की विविध समस्याएँ, दलितों में व्याप्त अशिक्षा, अन्धविश्वास, बेकारी, बेरोजगारी का भी वर्णन किया है। लेखक ने आत्मकथा के आरम्भ में ही कहा है कि- “मूर्खता मेरी जन्मजात विरासत थी।”
‘मुर्दहिया’ आत्मकथाकार के शब्दों में- “हमारे गाँव धरमपुर (आजमगढ़) की बहुउद्देशीय कर्मस्थली थी। चरवाही से लेकर हरवाही तक के सारे रास्ते वहाँ से गुजरते थे। हमारे गाँव की जिओ पॉलिक्िटस यानी भू-राजनीति में दलितों के लिए मुर्दहिया एक सामरिक केन्द्र जैसी थी। जीवन से लेकर मरण तक की सारी गतिविधियाँ मुर्दहिया अपने में समेट लेती थी। इस आत्मकथात्मक कृति में यह बयां किया गया है कि समानता के बिना पूरा देश मुर्दहिया है।