मणिकर्णिका आत्मकथा सारांश
मणिकर्णिका (2014) डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा का द्वितीय खंड है। पहला खंड ‘मुर्दहिया’ शीर्षक से प्रकाशित (2010) है। ‘मणिकर्णिका’ में आत्मकथाकार तुलसीराम ने ‘मुर्दहिया’ के आगे का जीवन यानी अपने बचपन के मुर्दहिया का साथ छोड़ बनारस का हाथ पकड़ने और उनके बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में 10 वर्षों के जीवन-संघर्षों को वाणी दी है। ‘मुर्दहिया’ में जहाँ दलित मान्यताओं के अन्ध-विश्वासों का वर्णन है वहीं मणिकर्णिका में ब्राह्मणवादी अंधविश्वासों की दुर्गन्ध।
दरअसल ‘मणिकर्णिका’ बनारस का वह घाट है, जहाँ मुर्दों को बाँधकर अंतिम संस्कार के लिए इस आस में लाया जाता है कि यहाँ से सीधे स्वर्ग में स्थान मिलेगा। वैसे बनारस के बारे में एक और धारणा यह भी है कि यहाँ कोई भूखा नहीं रहता, पर यहाँ आते ही तुलसीराम को नौ दिन भूखा रहने के कारण इस मान्यता को इन्होंने ध्वस्त होते पाया। गंगा-घाट में भूखों की लम्बी कतार देखकर उनके मन मे अचानक यह भाव आया कि- “गंगा पापी का पाप धो सकती है पर भूख नहीं।”
‘मणिकर्णिका’ आत्मकथा के कैनवास में बनारस के पंडों के पाखंड, कारोबार, भूत उतारने के बहाने स्त्रियों के शोषण आदि की कथा के साथ-साथ 70 के दशक की विभिन्न राजनीतिक धाराओं (यथा- मार्क्सवाद, समाजवाद, नस्लवाद), समकालीन इतिहास, लोहिया, जयप्रकाश, नारायण, राजनारायण, इंदिरा गाँधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं का छात्र राजनीति पर प्रभाव, तुलसीदास के अचेतन पर बुद्ध का प्रभाव, दलित छात्रावासों की बदतर स्थिति इत्यादि की कथाएँ वर्णित हैं।
‘मणिकर्णिका’ यद्यपि तुलसीदास की आत्मकथा है परन्तु इसमें प्रयुक्त ‘मैं’ एक व्यक्ति नहीं बल्कि हर पल बुद्ध के दर्शन से प्रभावित एक आंबेडकरवादी है, जिसके हर निर्णय और कार्य की पृष्ठभूमि इसी दर्शन से प्रभावित है। यह आत्मकथा अन्य आत्मकथाओं की भांति व्यक्तिगत पीड़ा मात्र नहीं बल्कि तद्युगीन दलित समाज का दस्तावेज है।