अंतिम संशोधित (Last Updated): September 15, 2026
हिंदी साहित्य में प्रगतिवाद (लगभग 1936 से 1943 ई.) मार्क्सवादी दर्शन, सामाजिक यथार्थ और जन-चेतना का वह स्वर्ण युग है जिसने कविता को महलों और कल्पनाओं के आसमान से निकालकर सीधे सड़क और खेत-खलिहानों तक ला खड़ा किया। प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UGC NET, TGT, PGT, RPSC और अन्य राज्य स्तरीय हिंदी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए प्रगतिवाद की विशेषताएँ और इसका वैचारिक ढांचा समझना अत्यंत आवश्यक है। यदि आप प्रगतिवादी साहित्य के प्रमुख बिंदुओं, शोषितों के प्रति सहानुभूति, ईश्वर-धर्म के विरोध और इसकी काव्यगत प्रवृत्तियों का प्रामाणिक अध्ययन करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए एक बेहतरीन मार्गदर्शिका है। इसमें प्रगतिवाद की सभी प्रमुख विशेषताओं को परीक्षोपयोगी और सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
प्रगतिवाद किसे कहते हैं – Pragativad Kise Kahte Hai
छायावादी और स्वछंदतावादी काव्यधारा की अतिशय काल्पनिकता और वैयक्तिकता के विरोध में ‘सामाजिक यथार्थवाद’ के नाम पर चलाया गया साहित्यिक आंदोलन ‘प्रगतिवाद’ कहलाया। प्रगतिवाद की समय सीमा 1936 से 1943 ईस्वी मानी जाती है।
प्रगतिवाद का मूल उद्देश्य जनजीवन की समस्याओं तथा नित्यप्रति के संघर्षरत जीवन का चित्रण करना था। अंतर्मुखी, पलायन, निराशा, पराजय इत्यादि के स्थान पर उत्साह और जूझने की प्रेरणा लेकर प्रगतिशील चेतना उद्भूत हुई थी। इसे प्रगतिशील-आंदोलन भी कहा जाता है।
लंदन में 1935 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई और 1936 ई. में प्रेमचंद ने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की अध्यक्षता की। आगे चलकर इस चेतना में मार्क्सवादी विचारधारा का समावेश हो गया और इसने प्रगतिवादी आंदोलन का रूप धारण कर लिया।
प्रगतिवादी विचारधारा का आधार कार्लमार्क्स का द्वन्द्वात्मक तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद है।
प्रगतिवाद के कवि और उनकी रचनाएँ
हिंदी में प्रगतिवाद का पहला कवि वही सुमित्रानंदन पंत हैं, जो छायावाद के एक प्रमुख आधार स्तंभ थे। उनकी रचना ‘युगवाणी’ प्रथम प्रगतिवादी रचना है।
प्रगतिवादी कवियों में मुख्य कवि एवं उनकी रचनायें निम्नांकित हैं –
| कवि | रचनाएँ |
| दिनकर | संस्कृति के 4 अध्याय, रेणुका, हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी (महाकाव्य) |
| नागार्जुन | युगधारा, सतरंगी पंखों वाली, प्रेत का बयान, भस्मांकुर |
| केदारनाथ अग्रवाल | युग की गंगा, नींद के बादल, फूल नहीं रंग बोलते हैं |
| शिवमंगलसिंह सुमन | जीवन के गान, विंध्य हिमालय |
| रांगेय राघव | अजेय खंडहर, पिघलते पत्थर |
| मुक्तिबोध | चाँद का मुँह टेढ़ा है |
प्रगतिवाद की विशेषताएं
हिंदी साहित्य के प्रगतिवादी युग (लगभग 1936 से 1943 ई.) में मार्क्सवादी दर्शन और सामाजिक यथार्थ का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। इस काल की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति
प्रगतिवादी साहित्य की सबसे मुख्य विशेषता सामाजिक यथार्थ का यथार्थवादी चित्रण है। यह साहित्य को कोरी कल्पना से निकालकर सीधे जनता के जीवन से जोड़ता है। प्रगतिवादी साहित्यकार जनता का, जनता के लिए और जनता की भाषा में चित्रण करते हैं।
“यह तो मानव लोक नहीं है,
यह है नरक अपरिचित।”
2. समसामयिक समस्याएँ और मार्क्सवादी प्रभाव
प्रगतिवादी कवियों ने एक ओर जहाँ देश की समसामयिक समस्याओं (जैसे—भारत-विभाजन, कश्मीर-समस्या, बंगाल का अकाल, महँगाई, बेकारी और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध) का यथार्थ चित्रण किया, वहीं दूसरी ओर मार्क्सवाद और रूसी शासन की खुलकर प्रशंसा की।
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मार्क्सवाद और श्रमिक वर्ग की चेतना:
“लाल रूस है ढाल साथियों,
सब मजदूर किसानों की।”
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कार्ल मार्क्स के प्रति सम्मान और कृतज्ञता:
“धन्य मार्क्स चिर-तामाच्छन्न पृथ्वी के उदय शिखर पर।
तुम त्रिनेत्र के ज्ञान चक्षु से प्रकट हुए प्रलयंकर।”
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आर्थिक विषमता, विवशता और मानवीय त्रासदी (केदारनाथ अग्रवाल):
“बाप बेटा बेचता है,
भूख से बेहाल होकर,
धर्म धीरज प्राण खोकर,
हो रही अनीति बर्बर।
राष्ट्र सारा देखता है,
बाप बेटा बेचता है।” — (केदारनाथ अग्रवाल)
3. शोषकों के प्रति रोष और शोषितों के प्रति सहानूभूति
प्रगतिवाद ने समाज के शोषकों और पूँजीपति वर्ग के प्रति घृणा, रोष तथा विरोध का भाव व्यक्त किया है, वहीं दूसरी ओर समाज के दलित और शोषित वर्ग का करुण गान गाया है।
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वर्ग-भेद और विसंगति पर कटाक्ष:
“श्वानों को मिलता वस्त्र-दूध,
भूखे बालक चिल्लाते हैं।”
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व्यापारी और जमींदार वर्ग की क्रूरता (रामधारी सिंह ‘दिनकर’):
“ये व्यापारी जमींदार जो हैं लक्ष्मी के परम भक्त,
वे निपट निरामिष सूदखोर,
पीते मनुष्य का उष्ण रक्त।” — (रामधारी सिंह ‘दिनकर’)
शब्द शक्ति: परिभाषा, भेद और संपूर्ण उदाहरणों के साथ विस्तृत व्याख्या
4. ईश्वर, धर्म और रूढ़ियों का विरोध
प्रगतिवाद ने ईश्वर, धर्म, परलोक और भाग्यवादी विचारों का पुरजोर विरोध किया। आत्मा, परमात्मा, सृष्टि और जन्मांतर (पुनर्जन्म) जैसी अवधारणाओं में अविश्वास प्रकट करते हुए उसने समाजवाद और मानव-सत्ता का महत्व प्रतिपादित किया तथा एक नई शोषणमुक्त व्यवस्था का आह्वान किया।
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(i) “द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र।” — (सुमित्रानंदन पंत)
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(ii) “हो यह समाज चिथड़े-चिथड़े, शोषण पर जिसकी नींव पड़ी।”
5. बौद्धिकता एवं व्यंग्यात्मकता
बौद्धिकता और तीखा व्यंग्य प्रगतिवादी कविता की एक अन्य मुख्य विशेषता रही है। विशेषकर नागार्जुन की व्यंग्य शैली बेजोड़ है, जो सामाजिक विसंगतियों पर सीधा प्रहार करती है।
“घुन खाए शहतीरों पर की बारहखड़ी विधाता बाँचे,
फटी भित्त है, छत है चूती… आदम के सांचे।” — (नागार्जुन)
6. गद्य और पद्य दोनों में विस्तार
प्रगतिशील चेतना का प्रभाव न केवल पद्य (काव्य) तक सीमित रहा, बल्कि गद्य साहित्य में भी इसका व्यापक विस्तार हुआ। मुंशी प्रेमचंद के पश्चात किसानों और शोषितों की जिंदगी को केंद्र में रखकर प्रगतिशील लेखकों ने कई उत्कृष्ट उपन्यास लिखे। इसके अतिरिक्त, आलोचना के क्षेत्र में मार्क्सवादी समीक्षा पद्धति को प्रमुख स्थान मिला।
7. सहज भाषा और लोकगीतों का प्रयोग
प्रगतिवाद की भाषा अत्यंत सुस्पष्ट, संयत, सरल एवं सामान्य बोलचाल की प्रचलित भाषा है। इसकी शैली प्रायः उपदेशात्मक और जन-सुलभ रही है। प्रगतिवादी कवियों ने अपनी कविताओं में लोकगीतों की कई धुनों और लेयों को पुनर्जीवित किया, जिससे काव्य आम जनमानस के अधिक निकट आ गया।
“माँझी न बजाओ वंशी,
मेरा मन डोलता है,
मेरा तन घूमता है।” — (केदारनाथ अग्रवाल)
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