कफ़न मुंशी प्रेमचंद की सबसे चर्चित और सबसे बहस वाली कहानी है। यह उनके जीवन के अंतिम वर्ष 1936 में हिंदी में छपी। इसमें घीसू और माधव नाम के बाप-बेटे की कथा है, जो बुधिया की मौत के बाद कफ़न के लिए माँगे गए पैसों से शराब और पूड़ियाँ खा जाते हैं। ऊपर से यह कहानी दो निकम्मे लोगों की लगती है, पर भीतर से यह उस समाज पर चोट है, जो मेहनत करने वाले को इंसान नहीं रहने देता।
UGC NET/JRF, TGT, PGT, RPSC, KVS और विश्वविद्यालय परीक्षाओं में कफ़न से प्रश्न लगातार आते हैं। इस लेख में कफ़न कहानी का सारांश, पात्र, चरित्र-चित्रण, महत्वपूर्ण कथनों की व्याख्या, उद्देश्य, शीर्षक की सार्थकता, आलोचकों के मत, 16 MCQ और FAQ एक ही जगह दिए गए हैं।
कफ़न — लेखक: मुंशी प्रेमचंद | पहला प्रकाशन: उर्दू में दिसंबर 1935 (जामिया का ‘रिसाला’), हिंदी में 1936 (‘चाँद’ पत्रिका) | पात्र: घीसू, माधव, बुधिया | मुख्य विषय: गरीबी, शोषण और संवेदनहीनता | विशेषता: तीखा यथार्थवाद और व्यंग्य, बिना आदर्शवादी अंत।
📖 इस लेख में क्या है
- कफ़न कहानी : एक नज़र में
- प्रेमचंद और कफ़न की रचना-पृष्ठभूमि
- कफ़न कहानी का सारांश
- कफ़न कहानी के पात्र
- मुख्य पात्रों का चरित्र-चित्रण
- महत्वपूर्ण कथन और व्याख्या
- मूल संवेदना और उद्देश्य
- शीर्षक की सार्थकता
- कहानी की प्रमुख समस्याएँ
- भाषा-शैली और शिल्प
- आलोचकों की दृष्टि में कफ़न
- प्रासंगिकता और रूपांतरण
- परीक्षा के लिए याद रखने योग्य तथ्य
- कफ़न कहानी के 16 MCQ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कफ़न कहानी : एक नज़र में
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कहानी | कफ़न (कफन) |
| लेखक | मुंशी प्रेमचंद (मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव) |
| मूल भाषा | उर्दू (बाद में हिंदी) |
| पहला प्रकाशन | दिसंबर 1935, जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पत्रिका ‘रिसाला’ (उर्दू) |
| हिंदी प्रकाशन | 1936, ‘चाँद’ पत्रिका |
| मुख्य पात्र | घीसू (पिता), माधव (पुत्र), बुधिया (माधव की पत्नी) |
| गौण पात्र | जमींदार, गाँव के बनिये-महाजन, मधुशाला का भिखारी |
| परिवेश | एक गाँव, जाड़े की रात, फिर बाज़ार और मधुशाला |
| मुख्य विषय | गरीबी, श्रम का शोषण, अमानवीयकरण, धार्मिक रीति-रिवाज़ों पर व्यंग्य |
| रचना-दृष्टि | प्रेमचंद के अंतिम दौर का यथार्थवाद |
🎯 याद रखें
प्रेमचंद और कफ़न की रचना-पृष्ठभूमि
प्रेमचंद (1880–1936) ने तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं, जो ‘मानसरोवर’ के आठ भागों में संकलित हैं। उनकी शुरुआती कहानियों में आदर्श और सुधार का स्वर अधिक है। इसे आलोचक ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ कहते हैं। जीवन के अंतिम वर्षों में यह आदर्श पीछे छूट गया और उनका यथार्थ बहुत कठोर हो गया। ‘गोदान’ (1936), ‘पूस की रात’ और ‘कफ़न’ इसी दौर की रचनाएँ हैं।
कफ़न में न कोई सुधार है, न कोई उपदेश, न कोई नायक। लेखक पाठक को सीधे उस गरीबी के सामने खड़ा कर देता है, जहाँ भूख ने इंसानियत को खा लिया है। इसी कारण इसे हिंदी कहानी में यथार्थवाद का शिखर माना जाता है।
इसी दौर का उपन्यास समझने के लिए गोदान उपन्यास का सारांश और समीक्षा भी पढ़ें।

कफ़न कहानी का सारांश
1. जाड़े की रात और प्रसव-पीड़ा
कहानी जाड़े की एक अँधेरी रात से शुरू होती है। झोपड़ी के दरवाज़े पर घीसू और उसका बेटा माधव बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हैं। अंदर माधव की जवान पत्नी बुधिया प्रसव-वेदना से तड़प रही है। उसकी चीखें सुनकर भी दोनों में से कोई उसके पास नहीं जाता। माधव झुँझलाकर कहता है कि मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती।
2. घीसू और माधव का स्वभाव
दोनों बाप-बेटे गाँव भर में कामचोरी के लिए बदनाम हैं। घीसू एक दिन काम करता है तो तीन दिन आराम करता है। माधव आधा घंटा काम करता है तो घंटे भर चिलम पीता है। इसलिए उन्हें कोई काम पर नहीं रखता। घर में दो-चार मिट्टी के बर्तनों के सिवा कुछ नहीं है। फिर भी वे कर्ज़ लेकर, माँगकर या चोरी करके किसी तरह जी लेते हैं। लेखक कहता है कि जिस समाज में दिन-रात मेहनत करने वालों की हालत भी इनसे बहुत अच्छी न हो, वहाँ ऐसी मनोवृत्ति पैदा होना आश्चर्य की बात नहीं।
3. भुने आलू और ठाकुर की बारात की याद
उस रात दोनों किसी के खेत से उखाड़कर लाए आलू भूनकर खा रहे हैं। माधव अंदर नहीं जाता, क्योंकि उसे डर है कि उसके जाते ही घीसू सारे आलू खा जाएगा। घीसू भी यही सोचता है। गरम आलू जल्दी-जल्दी निगलते हुए घीसू को बीस साल पहले की ठाकुर की बारात याद आती है, जिसमें उसने भरपेट पूड़ियाँ, चटनी, रायता और मिठाइयाँ खाई थीं। दोनों उस दावत की कल्पना में डूब जाते हैं और आलू खाकर पानी पीकर वहीं अलाव के पास सो जाते हैं।
4. बुधिया की मृत्यु
बुधिया पिछले साल ही ब्याहकर आई थी। उसके आने के बाद उसी ने मेहनत-मज़दूरी करके घर में व्यवस्था की नींव डाली थी, और ये दोनों और भी आलसी हो गए थे। सुबह माधव अंदर जाकर देखता है तो बुधिया मर चुकी है और उसके चेहरे पर मक्खियाँ भिनक रही हैं। अब दोनों छाती पीट-पीटकर रोने लगते हैं। पड़ोसी आकर सांत्वना देते हैं।
5. कफ़न के लिए चंदा
घर में कफ़न और लकड़ी के लिए एक पैसा भी नहीं है। दोनों जमींदार के पास जाते हैं। जमींदार उनसे घृणा करता है, फिर भी ‘बला टालने’ के लिए दो रुपये फेंक देता है। जब जमींदार ने दे दिया, तो गाँव के बनिये-महाजन भी कुछ न कुछ देते हैं। घंटे भर में घीसू के पास पाँच रुपये जमा हो जाते हैं। कहीं से अनाज और लकड़ी भी मिल जाती है।
6. बाज़ार में कफ़न की तलाश
दोनों कफ़न खरीदने बाज़ार जाते हैं। रास्ते में बात होती है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिला, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए। वे कभी इस बजाज़ की दुकान पर, कभी उस दुकान पर कपड़ा देखते हैं, पर कुछ तय नहीं करते। शाम हो जाती है और वे जैसे किसी तय योजना से एक मधुशाला के सामने पहुँच जाते हैं।
7. मधुशाला का दृश्य और अंत
मधुशाला में वे बोतल मँगाते हैं, फिर पूड़ियाँ, चटनी, अचार और कलेजियाँ खरीदते हैं। कफ़न के पैसे से जीवन में पहली बार भरपेट खाते हैं। घीसू तर्क देता है कि कफ़न तो जल ही जाता, बहू के साथ थोड़े जाता। बची हुई पूड़ियाँ एक भिखारी को दे देते हैं और सोचते हैं कि इसका पुण्य बुधिया को मिलेगा, वह बैकुंठ जाएगी। माधव कुछ देर रोता है, पर नशे में दोनों खड़े होकर कबीर का पद ‘ठगिनी क्यों नैना झमकावै’ गाते और नाचते हैं, और अंत में नशे में चूर होकर वहीं गिर पड़ते हैं।
📚 हिंदी कहानी की पूरी तैयारी
कफ़न जैसी पाठ्यक्रम की सभी कहानियों के सारांश, पात्र, कथन और प्रश्न एक ही नोट्स में।
कफ़न कहानी के पात्र
| पात्र | परिचय |
|---|---|
| घीसू | माधव का पिता; बूढ़ा, अनुभवी, चालाक और तर्क गढ़ने में माहिर |
| माधव | घीसू का बेटा, बुधिया का पति; आलसी और पिता का अनुयायी |
| बुधिया | माधव की पत्नी; मेहनती, जिसकी प्रसव-पीड़ा में मृत्यु हो जाती है |
| जमींदार | घीसू-माधव से घृणा करता है, फिर भी दो रुपये देता है |
| बनिये-महाजन | जमींदार के देखा-देखी चंदा देते हैं |
| भिखारी | मधुशाला के बाहर, जिसे बची पूड़ियाँ दी जाती हैं |
मुख्य पात्रों का चरित्र-चित्रण
घीसू : अनुभव से बना संवेदनहीन
घीसू बूढ़ा और अनुभवी आदमी है। वह जानता है कि मेहनत करने वाले किसान भी उससे बहुत बेहतर हालत में नहीं हैं, इसलिए उसने मेहनत छोड़ दी है। वह चालाक है, बहाने गढ़ता है और हर स्थिति के लिए तर्क ढूँढ़ लेता है। कफ़न के पैसे से शराब पीने को भी वह यह कहकर सही ठहराता है कि कफ़न तो जल ही जाता। वह बेटे का गुरु है और उसका हर व्यवहार माधव को आगे की राह दिखाता है।
माधव : पिता की छाया
माधव जवान है, पर अपने पिता की तरह ही आलसी और संवेदनहीन है। पत्नी तड़प रही है, फिर भी वह आलू के लालच में अंदर नहीं जाता। फिर भी उसमें घीसू से थोड़ी अधिक भावुकता बची है। मधुशाला में वह कुछ देर के लिए रोता है और पूछता है कि बुधिया बैकुंठ जाएगी या नहीं। लेखक संकेत देता है कि आगे चलकर वह भी घीसू जैसा ही बन जाएगा।
बुधिया : मौन रहकर सबसे मुखर
बुधिया पूरी कहानी में एक शब्द नहीं बोलती। उसकी उपस्थिति केवल चीखों और मौत के रूप में है। वही इस घर की अकेली मेहनती सदस्य थी, जिसने घर में व्यवस्था की नींव डाली। उसकी मृत्यु और कफ़न तक न मिल पाना गरीब स्त्री की दोहरी त्रासदी है: गरीबी और पुरुषों की उपेक्षा।
जमींदार और महाजन : व्यवस्था का चेहरा
जमींदार इन्हें तुच्छ समझता है, पर ‘दया’ के नाम पर दो रुपये फेंककर अपना सामाजिक धर्म पूरा कर लेता है। बनिये उसकी देखा-देखी पैसे देते हैं। यह दिखाता है कि समाज जीते जी गरीब की कोई सुध नहीं लेता, पर मरने पर रस्म निभाने में आगे रहता है।
कफ़न के महत्वपूर्ण कथन और उनकी व्याख्या
नीचे दिए कथनों का आशय कहानी के अनुसार है। परीक्षा में इन्हीं के आधार पर ‘वक्ता कौन’ और ‘आशय क्या’ जैसे प्रश्न आते हैं।
🔎 भावार्थ (लेखक की टिप्पणी)
कफ़न कहानी की मूल संवेदना और उद्देश्य
- गरीबी का अमानवीयकरण: लगातार भूख इंसान से संवेदना, रिश्ते और नैतिकता छीन लेती है।
- श्रम का अवमूल्यन: जब मेहनत करने वाले भी भूखे हैं, तो मेहनत से मोहभंग होना स्वाभाविक दिखाया गया है।
- सामाजिक पाखंड पर व्यंग्य: जीवित की उपेक्षा और मृत के लिए रस्म।
- शोषक व्यवस्था की आलोचना: जमींदार-महाजन की ‘दया’ भी अपमान के साथ आती है।
- स्त्री की त्रासदी: सबसे मेहनती पात्र बुधिया सबसे उपेक्षित है।
कफ़न शीर्षक की सार्थकता
पूरी कहानी कफ़न के इर्द-गिर्द घूमती है। बुधिया की मौत के बाद कफ़न के लिए ही चंदा होता है, उसी के लिए बाज़ार जाना होता है और उसी के पैसे से शराब पी जाती है। कफ़न यहाँ केवल कपड़ा नहीं, बल्कि प्रतीक है। यह उस समाज का कफ़न है, जिसकी मानवता मर चुकी है, और उन रस्मों का भी, जो जीवित इंसान से ज़्यादा मुर्दे की परवाह करती हैं। इसलिए शीर्षक संक्षिप्त, प्रतीकात्मक और पूरी तरह सार्थक है।
कफ़न कहानी की प्रमुख समस्याएँ
भूख और गरीबी
पूरी कथा भोजन की लालसा पर टिकी है: आलू, बारात की दावत, पूड़ियाँ।
जमींदारी शोषण
गरीब को काम नहीं, पर रस्म के लिए ‘दया’।
संवेदनहीनता
पत्नी की पीड़ा पर भी उदासीनता।
धार्मिक आडंबर
कफ़न, बैकुंठ और पुण्य की धारणाओं पर व्यंग्य।
स्त्री की स्थिति
मेहनती बुधिया की उपेक्षित मौत।
श्रम का अपमान
मेहनत का उचित मूल्य न मिलने से काम से विमुखता।
कफ़न की भाषा-शैली और शिल्प
- सहज हिंदुस्तानी भाषा: बोलचाल के शब्द, उर्दू-हिंदी का मेल और छोटे-छोटे वाक्य।
- संवाद-प्रधानता: कहानी का बड़ा हिस्सा घीसू-माधव के संवादों में आगे बढ़ता है, जिनसे उनका मनोविज्ञान खुलता है।
- व्यंग्य: करुण स्थिति पर ठंडा व्यंग्य, जो पाठक को झकझोरता है।
- वातावरण-चित्रण: जाड़े की रात, बुझा अलाव, सन्नाटा और मधुशाला का शोर।
- प्रतीकात्मकता: कफ़न, आलू और ठाकुर की दावत सब प्रतीक हैं।
- खुला और विडंबनापूर्ण अंत: नशे में गिरते बाप-बेटे पर कहानी समाप्त होती है, कोई उपदेश नहीं।
🎓 UGC NET/JRF हिंदी की संपूर्ण तैयारी
सभी 10 इकाइयों के नोट्स एक साथ, जिनमें कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध के पाठ शामिल हैं।
आलोचकों की दृष्टि में कफ़न
अधिकांश प्रगतिशील और मार्क्सवादी आलोचक कफ़न को प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में गिनते हैं। उनके अनुसार यह कहानी दिखाती है कि आर्थिक शोषण इंसान को किस हद तक पतित कर देता है, और दोष घीसू-माधव का कम, व्यवस्था का अधिक है।
दूसरी ओर दलित विमर्श से जुड़े आलोचकों ने इस कहानी की तीखी आलोचना की है। डॉ. धर्मवीर ने अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद : सामंत का मुंशी’ में आरोप लगाया कि कहानी दलित पात्रों को कामचोर, संवेदनहीन और नशेड़ी के रूप में दिखाती है और इससे जाति के पूर्वाग्रह पुष्ट होते हैं। इसके उत्तर में कई आलोचक कहते हैं कि प्रेमचंद का निशाना पात्रों की जाति नहीं, बल्कि वह शोषक व्यवस्था है जो उन्हें इस हालत तक पहुँचाती है।
📝 परीक्षा के लिए
कफ़न कहानी की प्रासंगिकता और रूपांतरण
आज भी गरीबी, बेरोज़गारी, मज़दूरी के अपमान और दिखावटी रीति-रिवाज़ों की समस्या बनी हुई है। इसलिए कफ़न लगभग नब्बे वर्ष बाद भी उतनी ही प्रासंगिक है।
प्रसिद्ध फ़िल्मकार मृणाल सेन ने इस कहानी पर आधारित तेलुगु फ़िल्म ‘ओका ऊरी कथा’ (1977) बनाई। कहानी के अनेक भाषाओं में अनुवाद और नाट्य-मंचन भी हुए हैं।
परीक्षा के लिए याद रखने योग्य तथ्य
- कफ़न पहले उर्दू में दिसंबर 1935 में जामिया की पत्रिका ‘रिसाला’ में छपी।
- हिंदी में 1936 में ‘चाँद’ पत्रिका में प्रकाशित।
- मुख्य पात्र: घीसू, माधव और बुधिया; उर्दू पाठ में ‘माधो’।
- बुधिया की मृत्यु प्रसव-पीड़ा में होती है।
- बाप-बेटा भुने आलू खा रहे थे; घीसू को बीस साल पहले की ठाकुर की बारात याद आती है।
- जमींदार ने दो रुपये दिए; कुल पाँच रुपये जमा हुए।
- कफ़न के पैसे से शराब, पूड़ियाँ, चटनी, अचार और कलेजियाँ खरीदीं।
- बची पूड़ियाँ भिखारी को दीं; अंत में कबीर का पद ‘ठगिनी क्यों नैना झमकावै’ गाया।
- मृणाल सेन की तेलुगु फ़िल्म ‘ओका ऊरी कथा’ (1977) इसी कहानी पर आधारित है।
- डॉ. धर्मवीर की पुस्तक ‘प्रेमचंद : सामंत का मुंशी’ में कहानी की दलित दृष्टि से आलोचना है।
कफ़न कहानी के 16 महत्वपूर्ण MCQ
पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक करें।
1कफ़न कहानी हिंदी में पहली बार किस पत्रिका में प्रकाशित हुई?
(A) हंस
(B) चाँद
(C) माधुरी
(D) सरस्वती
👉 उत्तर देखें
कफ़न हिंदी में 1936 में ‘चाँद’ पत्रिका में छपी। उर्दू में यह दिसंबर 1935 में ‘रिसाला’ में आई थी।
2कफ़न का उर्दू रूप सबसे पहले कहाँ छपा?
(A) ज़माना, कानपुर
(B) जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पत्रिका ‘रिसाला’
(C) कहकशाँ
(D) अदीब
👉 उत्तर देखें
दिसंबर 1935 के अंक में।
3बुधिया किसकी पत्नी है?
(A) घीसू
(B) माधव
(C) जमींदार
(D) बनिये
👉 उत्तर देखें
बुधिया माधव की पत्नी और घीसू की बहू है।
4जमींदार ने कफ़न के लिए कितने रुपये दिए?
(A) एक रुपया
(B) दो रुपये
(C) पाँच रुपये
(D) दस रुपये
👉 उत्तर देखें
जमींदार ने घृणा के बावजूद दो रुपये दिए; बाद में कुल पाँच रुपये जमा हुए।
5कफ़न के लिए कुल कितने रुपये इकट्ठे हुए?
(A) तीन
(B) चार
(C) पाँच
(D) सात
👉 उत्तर देखें
घंटे भर में घीसू के पास पाँच रुपये की रकम जमा हो गई।
6कहानी के अंत में घीसू-माधव कौन-सा पद गाते हैं?
(A) मन लागो मेरो यार फकीरी में
(B) ठगिनी क्यों नैना झमकावै
(C) मोको कहाँ ढूँढ़े बंदे
(D) झीनी झीनी बीनी चदरिया
👉 उत्तर देखें
यह कबीर का पद है, जिसे गाते-नाचते दोनों नशे में गिर पड़ते हैं।
7कफ़न कहानी के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
(A) कहानी जाड़े की रात से शुरू होती है।
(B) बाप-बेटा भुने आलू खा रहे थे।
(C) माधव बार-बार बुधिया को देखने अंदर जाता है।
(D) घीसू को ठाकुर की बारात की दावत याद आती है।
(1) केवल A और B
(2) केवल A, B और D
(3) केवल B, C और D
(4) A, B, C और D सभी
👉 उत्तर देखें
C गलत है। माधव अंदर नहीं जाता, क्योंकि उसे डर है कि घीसू सारे आलू खा जाएगा।
8सूची I (पात्र) को सूची II (विशेषता) से सुमेलित कीजिए:
| सूची I | सूची II |
|---|---|
| A. घीसू | I. प्रसव-पीड़ा में मृत्यु |
| B. माधव | II. एक दिन काम, तीन दिन आराम |
| C. बुधिया | III. दो रुपये फेंककर दिए |
| D. जमींदार | IV. आधा घंटा काम, घंटे भर चिलम |
(1) A-II, B-IV, C-I, D-III
(2) A-IV, B-II, C-I, D-III
(3) A-II, B-IV, C-III, D-I
(4) A-I, B-II, C-IV, D-III
👉 उत्तर देखें
घीसू तीन दिन आराम करता है, माधव चिलम पीता है, बुधिया की प्रसव में मौत होती है और जमींदार दो रुपये देता है।
9कहानी की घटनाओं को सही क्रम में लगाइए:
(A) कफ़न के लिए चंदा इकट्ठा करना
(B) मधुशाला में खाना-पीना
(C) बुधिया की मृत्यु
(D) भिखारी को पूड़ियाँ देना
(1) C-A-B-D
(2) A-C-B-D
(3) C-B-A-D
(4) C-A-D-B
👉 उत्तर देखें
पहले बुधिया की मौत, फिर चंदा, फिर मधुशाला, और अंत में बची पूड़ियाँ भिखारी को।
10अभिकथन (A): घीसू और माधव कफ़न के पैसों से शराब और भोजन खरीद लेते हैं।
कारण (R): लंबी भूख और शोषण ने उनकी मानवीय संवेदना को कुंद कर दिया है।
(1) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
(2) A और R दोनों सही हैं, पर R, A की सही व्याख्या नहीं है
(3) A सही है, R गलत है
(4) A गलत है, R सही है
👉 उत्तर देखें
कहानी में लेखक स्वयं कहता है कि ऐसे समाज में ऐसी मनोवृत्ति पैदा होना आश्चर्य नहीं; यही R की व्याख्या है।
11कथन I: कफ़न के उर्दू पाठ में बेटे का नाम ‘माधो’ है।
कथन II: हिंदी पाठ में वही पात्र ‘माधव’ नाम से आता है।
(1) दोनों कथन सही हैं
(2) कथन I सही, कथन II गलत
(3) कथन I गलत, कथन II सही
(4) दोनों गलत
👉 उत्तर देखें
उर्दू से हिंदी में आते समय पात्र का नाम माधो से माधव हुआ।
12“जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए” — इस कथन में मुख्य रूप से किस पर व्यंग्य है?
(A) बुधिया के स्वभाव पर
(B) दिखावटी सामाजिक रीति-रिवाज़ पर
(C) शराब की बुराई पर
(D) गाँव की पंचायत पर
👉 उत्तर देखें
जीवित गरीब की उपेक्षा और मृत के लिए रस्म, यही विडंबना इस कथन में है।
13घीसू को कितने वर्ष पहले की ठाकुर की बारात याद आती है?
(A) दस
(B) पंद्रह
(C) बीस
(D) तीस
👉 उत्तर देखें
घीसू बीस साल पहले की ठाकुर की बारात की दावत को याद करता है।
14मृणाल सेन की कौन-सी फ़िल्म कफ़न कहानी पर आधारित है?
(A) भुवन शोम
(B) ओका ऊरी कथा
(C) खंडहर
(D) एक दिन प्रतिदिन
👉 उत्तर देखें
यह 1977 की तेलुगु फ़िल्म है।
15‘प्रेमचंद : सामंत का मुंशी’ पुस्तक किसकी है?
(A) रामविलास शर्मा
(B) नामवर सिंह
(C) डॉ. धर्मवीर
(D) ओमप्रकाश वाल्मीकि
👉 उत्तर देखें
इस पुस्तक में दलित दृष्टि से प्रेमचंद और कफ़न की आलोचना है।
16कफ़न कहानी के बारे में कौन-से कथन सही हैं?
(A) यह प्रेमचंद के अंतिम दौर के यथार्थवाद की कहानी है।
(B) कहानी का अंत आदर्शवादी सुधार के साथ होता है।
(C) कहानी में व्यंग्य प्रमुख शैली है।
(D) कहानी 1936 में हिंदी में प्रकाशित हुई।
(1) केवल A, B और C
(2) केवल A, C और D
(3) केवल B और D
(4) A, B, C और D सभी
👉 उत्तर देखें
B गलत है। कहानी का अंत किसी सुधार के बिना, नशे में गिरते बाप-बेटे पर होता है।
कफ़न कहानी पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
❓ कफ़न कहानी के लेखक कौन हैं?
कफ़न के लेखक मुंशी प्रेमचंद (धनपत राय श्रीवास्तव) हैं।
❓ कफ़न कहानी कब प्रकाशित हुई?
यह पहले उर्दू में दिसंबर 1935 में जामिया की पत्रिका ‘रिसाला’ में और हिंदी में 1936 में ‘चाँद’ पत्रिका में प्रकाशित हुई।
❓ कफ़न कहानी के मुख्य पात्र कौन हैं?
घीसू (पिता), माधव (पुत्र) और बुधिया (माधव की पत्नी) मुख्य पात्र हैं।
❓ कफ़न कहानी का उद्देश्य क्या है?
यह दिखाना कि लगातार गरीबी और शोषण इंसान की संवेदना को कैसे मार देते हैं, और समाज के दिखावटी रीति-रिवाज़ों पर व्यंग्य करना।
❓ कफ़न के पैसों का घीसू-माधव ने क्या किया?
उन्होंने कफ़न खरीदने के बजाय मधुशाला में शराब, पूड़ियाँ, चटनी, अचार और कलेजियाँ खरीद लीं।
❓ कफ़न कहानी का शीर्षक क्यों सार्थक है?
पूरी कथा कफ़न के इर्द-गिर्द घूमती है और कफ़न मरी हुई मानवता तथा खोखली रस्मों का प्रतीक बन जाता है।
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परीक्षा की तैयारी के लिए अगला कदम
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एम.ए., बी.एड. (नेट हिंदी), कॉलेज व्याख्याता, श्रीगंगानगर (राजस्थान); हिंदी साहित्य चैनल के संचालक
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