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सिक्का बदल गया (कृष्णा सोबती): कहानी का सारांश, समीक्षा, पात्र एवं महत्वपूर्ण प्रश्न

सिक्का बदल गया कहानी का सारांश और समीक्षा - कृष्णा सोबती

सिक्का बदल गया कहानी का सारांश और समीक्षा – कृष्णा सोबती

हिंदी कथा-साहित्य की प्रख्यात लेखिका कृष्णा सोबती की देश-विभाजन की त्रासदी पर आधारित अत्यंत मर्मस्पर्शी और यथार्थवादी कहानी ‘सिक्का बदल गया’ मानवीय संवेदनाओं का एक अनूठा दस्तावेज है। यह कहानी न केवल विभाजन के समय उत्पन्न सांप्रदायिक हिंसा और शरणार्थी विस्थापन को दर्शाती है, बल्कि इंसानी रिश्तों और मूल्यों के विघटन का भी सजीव चित्रण करती है। यदि आप UGC NET, TGT, PGT, RPSC, KVS, NVS या अन्य हिंदी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए अत्यंत उपयोगी है। इस आर्टिकल में हम ‘सिक्का बदल गया’ कहानी का विस्तृत सारांश, मुख्य पात्रों का परिचय, कथा-समीक्षा, महत्वपूर्ण उद्धरण (कथन) और परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा करने वाले हैं।

संक्षिप्त परिचय(Quick Overview):

  • कहानी का नाम: सिक्का बदल गया

  • रचयिता/लेखिका: कृष्णा सोबती

  • प्रकाशन वर्ष/पत्रिका: वर्ष 1948 में ‘प्रतीक’ पत्रिका में प्रकाशित

  • प्रमुख कहानी संग्रह: बादलों के घेरे (1988 ई.), मित्रो मरजानी (1966 ई.)

  • मुख्य पात्र: शाहनी, शाहजी, शेरा, हसैना, दाऊद खाँ

  • केंद्रीय विषय: भारत-पाक देश-विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक हिंसा, मानवीय मूल्यों का विघटन और शरणार्थी विस्थापन

  • परीक्षा उपयोगी क्षेत्र: UGC NET, TGT, PGT, RPSC, KVS, NVS तथा अन्य हिंदी प्रतियोगी परीक्षाएँ

1. परिचय: कृष्णा सोबती का कथा-संसार और ‘सिक्का बदल गया’ का साहित्यिक महत्व

हिंदी कथा-साहित्य की आधुनिक रचनाकारों में शिल्पगत नवीनता, शैलीगत विशिष्टता और मध्यगत विभिन्नता के लिए जिन रचनाकारों के नाम साहित्य मनीषियों के सम्मुख आदर के साथ आते हैं, उनमें महिला लेखकों के संदर्भ में कृष्णा सोबती का नाम अत्यंत उल्लेखनीय है। उनका जन्म सन 1925 ई. में भारत के अविभाजित पंजाब के गुजरात जनपद (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। इनकी रचनाओं में नारी की मानसिकता से जुड़ी सच्चाइयों को बहुत ही स्पष्टता के साथ उभारने का प्रयास किया गया है। उन्होंने हिंदी साहित्यिक कथा विधा के अंतर्गत कहानी और उपन्यास दोनों क्षेत्रों में अनूठा योगदान दिया है।

कृष्णा सोबती के प्रसिद्ध कहानी संग्रहों में ‘मित्रो मरजानी’ (1966 ई.) और ‘बादलों के घेरे’ (1988 ई.) तथा उपन्यास ‘ऐ लड़की’ (1990 ई.) विशेष रूप से चर्चित हैं।

उनके कहानी संग्रह ‘बादलों के घेरे’ में कुल 24 कहानियाँ संकलित हैं, जिन्हें मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है—

(1) देश-विभाजन से जुड़ी कहानियाँ

(2) ग्रामीण जीवन से संबंधित कहानियाँ

(3) स्त्री-पुरुष संबंधों से जुड़ी कहानियाँ।

देश-विभाजन से संबंधित कृष्णा सोबती की कहानियों में सबसे चर्चित एवं प्रसिद्ध कहानी ‘सिक्का बदल गया’ है। इसका प्रकाशन अज्ञेय जी के संपादन में निकलने वाली प्रसिद्ध पत्रिका ‘प्रतीक’ में 1948 ई. में हुआ था। जब अज्ञेय जी इस पत्रिका के संपादक थे, तब कृष्णा सोबती ने विभाजन के दौरान आए हुए अनुभवों को सुनकर ही अपनी कहानी ‘सिक्का बदल गया’ लिखी थी। ‘सिक्का बदल गया’ की नायिका ‘शाहनी’ किसी और का नहीं, बल्कि उनकी नानी का ही किरदार निभा रही है, जो उन्होंने भारत-पाकिस्तान विभाजन के वक्त स्वयं सहा था। कृष्णा सोबती ने अपनी नानी पर यह कहानी लिखी, जो आज विभाजन पर लिखे साहित्य में सर्वोच्च मानी जाती है। इसमें विभाजन से उत्पन्न दारुण परिस्थितियों के मर्मिक चित्रण के साथ मानवीय संबंधों और मूल्यों में आये विघटन का भी काफी वर्णन हुआ है।

📌 विशेष परीक्षा टिप्स (Exam Tips):

  • कृष्णा सोबती की यह कहानी देश-विभाजन की विभीषिका और मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर एक मील का पत्थर मानी जाती है।

  • यह कहानी अज्ञेय द्वारा संपादित ‘प्रतीक’ पत्रिका में 1948 ईस्वी में छपी थी।

2. कहानी के प्रमुख पात्र

इस कहानी के सभी पात्र तत्कालीन ग्रामीण समाज और विभाजन के माहौल की वास्तविक तस्वीर पेश करते हैं:

  • शाहनी: यह कहानी की मुख्य नायिका पात्र है। वह विधवा तथा बड़ी हवेली की मालकिन है। वह अत्यंत उदार, ममतामयी और पूरे गाँव में आदरणीय स्त्री है।

  • शाहजी: यह शाहनी का पति है तथा अमीर हवेली का मालिक भी था, लेकिन अब उसका देहांत हो चुका है।

  • शेरा: यह शाहजी का सेवक था। उसकी माँ की मृत्यु के पश्चात शाहनी ने ही उसे पाल-पोश कर बड़ा किया तथा वही अंत में शाहनी को मारने की योजना बनाता है, हालाँकि बाद में उसकी निष्ठा और भावुकता भी सामने आती है।

  • हसैना: यह शेरा की पत्नी है, जिसे शाहनी बहुत प्रेम करती है।

  • दाऊद खाँ: यह गाँव का थानेदार है तथा शाहजी का वफादार रह चुका है। वही शाहनी को हवेली विभाजन के दौरान खाली करने को कहता है।

  • अन्य पात्र: कुलूवाल के जाट, बेगू पटवारी, मुल्ला इस्माइल, फिरोज आदि।

3. ‘सिक्का बदल गया’ कहानी की विस्तृत समीक्षा एवं कथा-सार

  • ‘सिक्का बदल गया’ कहानी देश विभाजन की त्रासदी की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है। कहानी शाहनी के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। शाहनी लंबी अवधि से चुनाव में प्रातःकाल स्नान करती आ रही है। लेकिन आज परिस्थितियाँ परिवर्तित हो गई हैं। उसकी अपनी जमीन पर उसे बेगानापन महसूस हो रहा है। वह सोचती है कि एक दिन इस दरिया के किनारे वह दुल्हन बनकर उतरी थी और आज… शाहनी इस दुनिया में अब बिल्कुल अकेली रह गई है क्योंकि न तो उसके पति (शाहजी) ही रहे और न ही उसका बेटा। यद्यपि उसके पास अपार सम्पत्ति है— गाँवों तक फैली जमीनें, जमीनों में कुएँ सब उसके अपने हैं। वह स्नान करने के उपरांत शेरा को पुकारती हुई आती है। देश-विभाजन के समय उभरी सांप्रदायिक हिंसा में शेरा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह तीस-चालीस कत्ल कर चुका है।
  • शेरा के अंदर शाहजी के द्वारा किये गये शोषण के प्रति आक्रोश है। एक क्षण के लिये उसके मन में शाहनी के प्रति प्रतिहिंसा का भाव जागृत हो जाता है लेकिन शाहनी के वात्सल्य और उदारता को स्मरण कर वह विचलित हो उठता है तथा महसूस करता है कि शाहनी ने हमारा क्या बिगड़ा है। लेकिन सांप्रदायिक विद्वेष की ज्वाला भड़की हुई है। इसका परिणाम शाहनी को भुगतना पड़ता है। शाहनी अपने ही घर में अपनी ही गाँव वालों के बीच अकेली रह गई है। हालांकि गाँव के सभी लोग किसी न किसी रूप में शाहनी से उपकृत हैं। उसने लोगों की भरपूर सहायता की थी। उसने मस्जिद बनाने तक के लिये चंदा दिया है।
  • कभी किसी का बुरा नहीं सोचा है लेकिन अब वही गाँव छोड़ने के लिए मजबूर हो रही है। दरोगा दाऊद खाँ उससे कुछ सोना-चाँदी साथ ले जाने के लिए कहता है लेकिन शाहनी सोना-चाँदी साथ ले जाने से साफ इंकार कर देती है और कहती है कि मेरा सोना तो एक-एक जमीन में बिछा है।
  • शाहनी नकद रुपया ले जाने से भी मना कर देती है और कहती है कि मुझे नकदी प्यारी नहीं। यहाँ की नकदी यही रहेगी। उसने लड़खड़ाते कदमों को संभालकर दुपट्टे से आँखें पोंछते हुए अपनी हवेली की ड्योढ़ी पार की। पूरा गाँव उसको विदाई देने के लिए खड़ा है। पूरा जनसमूह रो रहा है अथवा उनके गले रूंधे हुए हैं। शाहनी सबको आशीर्वाद देते हुए विदा होती है। यह विडम्बना ही है कि पूरा जनसमूह सांप्रदायिकता की दानवी प्रकृति के सामने लाचार है और शाहनी को अपनी मातृभूमि छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है।
  • कृष्णा सोबती की कहानी ‘सिक्का बदल गया’ में देश विभाजन के समय उत्पन्न सांप्रदायिकता के फलस्वरूप लोगों को अपना घर-द्वार छोड़ देना पड़ा। सब कुछ होते हुए भी लोगों को शरणार्थी बनना पड़ा। इस विभाजन ने लोगों को एक दर्दनाक पीड़ा दी। प्रस्तुत कहानी में एक विधवा नारी की पराधीनता का मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। मालिक के जीवित रहते उसको सलाम करने वाले उसकी मृत्यु पर मालकिन को लूटने का मार्ग सोचते हैं। स्वार्थी व्यक्ति मन से कभी सच्चा नहीं हो सकता। शाहनी समझ गयी है कि ‘सिक्का बदल गया है’। शाहजी भी नहीं हैं। कोई उसके लिए सोचने वाला नहीं है। वह किसी भी बात का विरोध नहीं करती और चुपचाप हवेली की ड्योढ़ी पार कर ट्रक में बैठ जाती है। घर से निकाले जाने पर भी शाहनी उन सबको खुले दिल से आशीर्वाद देती है। यहाँ शाहनी की ऊँची मनोवृत्ति का सबल चित्रण कृष्णाजी ने किया है।
  • शाहनी रूंधे हुए गले से कही— ‘रख तुम्हें सलामत रखे बच्चा, खुशिया बक्शे….’ शाहजी की मृत्यु के बाद शाहनी अकेली रह गई। उसके घर का नौकर शेरा पिछले दिनों कई कत्ल कर चुका था। शेरा के साथियों ने शाहनी को मार डालने का सुझाव दिया था ताकि उसके बाद हवेली का सारा माल बराबर-बराबर बाँट लिया जाए। इस स्थिति में भी शाहनी आज भी शेरे पर विश्वास करती है, उसकी सलामती की दुआ माँगती है। शेरा सोच रहा है— ‘हमारे ही भाई-बन्धुओं से सूद ले देकर सहानी सोने की बोरियाँ तौला करते थे।’ प्रतिहिंसा की आग शेरे की आँखों में उतर आई।
  • प्रस्तुत उद्धरण में सोबती जी हिन्दू-मुसलमानों की आर्थिक असमानता को स्पष्ट कर रही है। मुसलमानों के मन में हिन्दुओं के प्रति जो चिढ़ थी, उसके लिये बहुत बड़ा कारण आर्थिक असमानता थी। इसी कारण अत्याचार अधिक हुये ऐसी मार्क्सवादियों की सोच है। सोबती जी ने इस तथ्य की ओर हल्का-सा संकेत किया है। दूसरी स्थिति मानवीय सम्बन्धों की है। शेरे के मन में अमीर हिन्दुओं के प्रति चिढ़ है। इधर कुछ दिनों में उसने 30-40 हत्यायें भी की थीं। परन्तु शाहनी की हत्या करने का साहस उसमें नहीं है। धर्म और अर्थ के परे भी ये मानवीय सम्बन्ध होते हैं।
  • शाहनी ने शेरे को माँ का प्यार दिया है। इसी कारण वह सोचता है कि नहीं, वह इतना नीच नहीं कि शाहनी की भी हत्या कर दे। शाहनी के स्वभाव के कारण गाँव के लोगों ने यह निर्णय लिया है कि वे शाहनी को शरणार्थी शिविर में सुरक्षित पहुँचायेंगे और बाद में उसका घर लूटेंगे और इस प्रकार की सूचना शाहनी को दी गई। अपने पारंपरिक घर से जहाँ पर उसने जिन्दगी के पचास काटे हैं, हमेशा के लिये छोड़कर निकलते समय उसकी जो मनःस्थिति हुई उसका बड़ा जीवंत चित्रण सोबती जी ने किया है। लोगों को ऐसी शंका थी कि निकलते समय वह सोना, रुपये आदि बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर निकलेगी। परन्तु शाहनी घर से कुछ भी नहीं लेती। बस यूँ ही निकलने लगती है।
  • सारा गाँव उसे विदा करने के लिये खड़ा है। गाँव के सब लोग शाहनी के इस आश्चर्यजनक व्यवहार से स्तब्ध हो जाते हैं। शेरे उसके पाँव छूता है और कहता है, ‘शाहनी कोई कुछ नहीं कर सकता राज बदल गया।’ दाऊद खाँ भी यही कहता है – ‘वक्त ही ऐसा है। राज पलट गया है, सिक्का बदल गया है।’ और अपनी लाखों की जायदाद, सोना-चाँदी, नकदी सब कुछ सहज रूप से छोड़कर शाहनी अंत में शरणार्थी शिविर में चली जाती है।
  • विभाजन के समय मानवीय सम्बन्धों में जो आश्चर्यजनक परिवर्तन हो रहा था, उसे इस कहानी में रेखांकित किया गया है। केवल राज ही पलट नहीं रहे थे, मानवीय सम्बन्धों के सिक्के भी बदल रहे थे। शाहनी को इस बात का दुःख है कि मानवीय सम्बन्ध निरर्थक होते जा रहे हैं। इस कहानी में अंतर्द्वन्द्व करुणा, प्रेम व्यंग्य का मार्मिक संयोजन है।
  • ‘सिक्का बदल गया’ को कृष्णा सोबती ने इस तरह से गढ़ा है कि विभाजित देश का वातावरण जीवंत हो उठता है। कहानी को हृदयस्पर्शी बनाने में इसके शिल्प की भी भूमिका है। इस कहानी में विभाजन की पीड़ा को अत्यंत सशक्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह प्रस्तुतीकरण इतना सशक्त है कि शाहनी और उसके गाँव के लोग हमारी स्मृति पर छा जाते हैं और हमें विभाजन के सम्बन्ध में सोचने को मजबूर कर देते हैं।
  • कहानी में वर्णन विचार एवं भावों का अनूठा संगम है। इसके परिणामस्वरुप पाठक को विभाजन के समय के वातावरण का अहसास हो जाता है। इसके साथ-साथ ही विभाजन की पीड़ा झेल रहे लोगों की मनोस्थिति का अंकन भी होता है। लेखिका ने पात्रों के हाव-भावों के माध्यम से बहुत सी बातों को कह दिया है अथवा स्थिति से अवगत करा दिया है। विस्मय, विद्रोह, व्यंग्य और पीड़ा को बहुत कम शब्दों रूप में प्रस्तुत करने में सफल रही है।

4. कहानी के महत्वपूर्ण उद्धरण एवं कथन

“लेकिन दूर-दूर तक बिछी रेत आज न जाने क्यों खामोश लगती थी। शाहनी ने कपड़े पहने, इधर-उधर देखा, कहीं किसी की परछाई तक न थी। पर नीचे रेत में अनगिनत पाँवों के निशान थे। कुछ सहम-सी उठी। आज इस प्रभात की मीठी नीरवता में न जाने क्यों कुछ भयावह-सा लग रहा है। वह पिछले पचास वर्षों से यहाँ नहाती आ रही है। कितना लंबा अरसा है! शाहनी सोचती है, एक दिन इसी दुनिया के किनारे वह दुलहिन बनकर उतरी थी और आज…”

“क्या कह रही है शाहनी आज। आज शाहनी… कोई भी कुछ नहीं कर सकता। यह होकर रहेगा—क्यों न हो? हमारे ही बंदों से सूद लेकर शाहनी सोने की बोरियाँ तौला करती थी। प्रतिहिंसा की आग शेरे की आँखों में उतर आई। गॉडासे की व्याद हो आई, शाहनी की ओर देखा—नहीं-नहीं, शेरे इन पिछले दिनों में तीस-चालीस कत्ल कर चुका है… पर वह ऐसा नीच नहीं… सामने बैठी शाहनी नहीं, शाहनी के हाथ उसकी आँखों में तैर गए। वह सर्दियों की रातें—कभी-कभी शाहजी की डाँट खाकर वह हवेली में पड़ा रहता था और फिर लालटेन की रोशनी में वह देखता है, शाहनी के ममता-भरे हाथ दूध का कटोरा थामे हुए—’शेरे, शेरे, उठा, पी ले।'”

“शेरा लौट गया। उसे कुछ पता नहीं, दुर्बल-सी देह और अकेली, बिना किसी सहारे के न जाने कब तक वहीं पड़ी रही शाहनी। दोपहर आई और चली गई। हवेली खुली पड़ी है। आज शाहनी नहीं उठ पा रही है। जैसे उसका अधिकार आज स्वयं ही उससे छूट रहा है। शाहजी के घर की मालकिन… लेकिन नहीं, आज मोह नहीं हट रहा है, मानो पत्थर हो गई हो। पड़े-पड़े शाम हो गई, पर उठने की बात फिर भी नहीं सोच पा रही है।”

“कौन नहीं है आज वहाँ? सारा गाँव है, जो उसके इशारे पर नाचता था कभी। उसकी आसामियाँ हैं जिन्हें उसने अपने नाते-रिश्तों से कभी कम नहीं समझा। लेकिन नहीं, आज उसका कोई नहीं, आज वह अकेली है? यह भीड़ की भीड़, उनमें कुल्लूवाल का जाट। क्या वह सुबह ही न समझ गई थी?”

“शाहनी अस्फुट स्वर से बोली—’सोना-चाँदी!’ जरा ठहरकर सादगी से कहा—’सोना-चाँदी! बच्चा, वह सब तुम लोगों के लिए है। मेरा सोना तो एक-एक जमीन में बिछा है।”

“रात को शाहनी जब कैंप में पहुँचकर जमीन पर पड़ी, तो लेटे-लेटे आहत मन से सोचा—राज पलट गया है… सिक्का क्या बदलेगा? वह तो मैं वहीं छोड़ आई… और शाहजी की शाहनी की आँखें और भी गीली हो गईं। आसपास के हरे-हर खेतों से घिरे गाँवों में रात खून बरसा रही थी। शायद राज पलटा भी खा रहा था और सिक्का बदल रहा था…”

निष्कर्ष (Conclusion):

यह कहा जा सकता है कि कृष्णा सोबती की ‘सिक्का बदल गया’ केवल एक विधवा नायिका ‘शाहनी’ के उजड़ने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस संपूर्ण कालखंड की विभीषिका का जीवंत चित्रण है जब राजनीतिक सत्ता के साथ-साथ मानवीय संबंधों और विश्वास के ‘सिक्के’ भी हमेशा के लिए बदल गए थे। लेखिका ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि सीमाएँ और राजसत्ता भले ही बदल जाएँ, परंतु मिट्टी और ममता का जो सच्चा रिश्ता इंसानों के बीच होता है, उसे नफरत की आँधी आसानी से मिटा नहीं सकती। साहित्यिक और प्रतियोगी परीक्षाओं दोनों ही दृष्टियों से यह कहानी पाठकों और विद्यार्थियों के हृदय पर एक गहरी छाप छोड़ जाती है।

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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. 'सिक्का बदल गया' कहानी की रचनाकार कौन हैं और यह किस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी?
उत्तर: ‘सिक्का बदल गया’ कहानी की प्रसिद्ध लेखिका कृष्णा सोबती हैं। यह कहानी वर्ष 1948 में अज्ञेय जी के संपादन में निकलने वाली प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘प्रतीक’ में प्रकाशित हुई थी।

Q2. 'सिक्का बदल गया' कहानी का मुख्य कथ्य या केंद्रीय विषय क्या है?
उत्तर: इस कहानी का मुख्य केंद्रीय विषय भारत-पाकिस्तान देश-विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक हिंसा, शरणार्थी विस्थापन, मानवीय संबंधों और मूल्यों में आया विघटन तथा मानवीय संवेदनाओं का टूटना है।

Q3. कहानी की मुख्य पात्र 'शाहनी' कौन है और उसकी क्या विशेषता है?
उत्तर: ‘शाहनी’ कहानी की केंद्रीय और मुख्य नायिका है, जो एक उदार, ममतामयी, विधवा और बड़ी हवेली की मालकिन है। वह पूरे गाँव में आदरणीय है और उसने सभी की भलाई की है, परंतु विभाजन के समय उसे अपनी मातृभूमि और हवेली छोड़कर शरणार्थी कैंप जाना पड़ता है।

Q4. कहानी में 'शेरा' कौन है और उसका शाहनी के प्रति क्या संबंध रहता है?
उत्तर: शेरा शाहजी का पुराना सेवक था, जिसे शाहनी ने अपने बच्चे की तरह पाल-पोश कर बड़ा किया था। यद्यपि विभाजन के बाद बदले माहौल में वह हिंसा में शामिल हो जाता है, परंतु शाहनी के प्रति उसका पुराना वात्सल्य और ममता उसे शाहनी की हत्या करने से रोक देता है।

Q5. कहानी के अंत में शाहनी अपने सोने-चाँदी और संपत्ति के बारे में क्या कहती है?
उत्तर: जब दरोगा दाऊद खाँ और अन्य लोग शाहनी से सोना-चाँदी साथ ले जाने को कहते हैं, तो शाहनी सादगी से उत्तर देती है— “सोना-चाँदी! बच्चा, वह सब तुम लोगों के लिए है। मेरा सोना तो एक-एक जमीन में बिछा है।” वह अपनी संपत्ति वहीं छोड़कर खाली हाथ विदा होती है।

Q6. 'सिक्का बदल गया' शीर्षक का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
उत्तर: इस शीर्षक का प्रतीकात्मक अर्थ केवल राजनीतिक सत्ता या राज का बदलना नहीं है, बल्कि इसके साथ ही इंसानी रिश्तों, आपसी भाईचारे और मानवीय मूल्यों के ‘सिक्के’ का हमेशा के लिए बदल जाना और नष्ट हो जाना है।

Q7. कृष्णा सोबती के अन्य प्रमुख कहानी संग्रह और उपन्यास कौन-से हैं?
उत्तर: कृष्णा सोबती के प्रमुख कहानी संग्रह ‘बादलों के घेरे’ (1988 ई.) और ‘मित्रो मरजानी’ (1966 ई.) हैं, तथा उनका चर्चित उपन्यास ‘ऐ लड़की’ (1990 ई.) है।

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