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आवारा मसीहा (विष्णु प्रभाकर): सारांश, प्रकाशन वर्ष, तीन पर्व, प्रश्न उत्तर | UGC NET

आवारा मसीहा: विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखित शरतचंद्र की जीवनी

अंतिम संशोधित (Last Updated): October 13, 2026

आवारा मसीहा: विष्णु प्रभाकर की जीवनी का सार, तथ्य, पुरस्कार और परीक्षा-नोट्स (UGC NET, TGT, PGT, RPSC)

आवारा मसीहा हिंदी जीवनी साहित्य की सबसे चर्चित कृति मानी जाती है। इसे लिखने में लेखक को चौदह वर्ष लगे। हिंदी के एक लेखक ने बांग्ला के महान कथाकार की जीवनी लिखी, और इलाचंद्र जोशी ने इसके प्रकाशन को “हिंदी साहित्य की एक घटना” कहा। इस लेख में विष्णु प्रभाकर की आवारा मसीहा जीवनी, उसके तीन पर्व, शरतचंद्र का जीवन, विष्णु प्रभाकर का साहित्यिक परिचय और पुरस्कार एक साथ दिए गए हैं। यह सामग्री UGC NET हिंदी, TGT, PGT और RPSC की तैयारी के लिए उपयोगी है।

📌आवारा मसीहा जीवनी का संक्षिप्त परिचय (Quick Overview)

बिंदु विवरण
रचना आवारा मसीहा
लेखक विष्णु प्रभाकर
विधा जीवनी (गद्य की विधा)
नायक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (बांग्ला कथाकार)
लेखन-अवधि 1959 से 1973 (कुल 14 वर्ष)
प्रकाशन वर्ष 1974
विभाजन तीन पर्व: दिशाहारा, दिशा की खोज, दिशांत
संदर्भ-परिश्रम लगभग 60 लोगों से साक्षात्कार, 17 से पत्र-व्यवहार, 42 से भेंट

🎯 आवारा मसीहा क्या है? (Direct Answer)

संक्षिप्त उत्तर: ‘आवारा मसीहा’ विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखित बांग्ला के सुप्रसिद्ध साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की जीवनी है। इसे लिखने में लेखक को 1959 से 1973 तक कुल चौदह वर्ष लगे और यह 1974 ई. में प्रकाशित हुई। यह कृति तीन पर्वों में बँटी है: ‘दिशाहारा’, ‘दिशा की खोज’ और ‘दिशांत’।


👤 लेखक विष्णु प्रभाकर का जीवन परिचय

विष्णु प्रभाकर का जन्म और परिवार

विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून 1912 ई. को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर गाँव में एक वैश्य परिवार में हुआ। पिता श्री दुर्गाप्रसाद और माता महादेवी थीं। धार्मिक प्रवृत्ति के पिता ने चारों बेटों के नाम देवताओं के नाम पर रखे: ब्रह्मा, विष्णु, महेश और प्रह्लाद। बचपन में उन्हें प्यार से ‘विष्णुदयाल’ कहा जाता था, और प्राइमरी विद्यालय में भी उनका यही नाम लिखा गया था।

शिक्षा और विवाह

  • प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई। उच्च शिक्षा के लिए 1924 ई. में वे मामा के घर पंजाब चले गए।
  • सोलह वर्ष की आयु में चंद लाल एंग्लो-वैदिक स्कूल से मैट्रिक उत्तीर्ण किया। आर्थिक स्थिति खराब होने से आगे नहीं पढ़ सके।
  • मैट्रिक के बाद गवर्नमेंट केटल फार्म के कार्यालय में नौकरी की, जहाँ पहले अठारह रुपये प्रतिमास मिलते थे। 1929 से 1944 तक (लगभग 15 वर्ष) की इस नौकरी में वेतन 14 से 40 रुपये तक पहुँचा।
  • नौकरी के साथ उन्होंने ‘हिंदी भूषण’, ‘हिंदी प्रभाकर’ और ‘प्राज्ञ’ की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। ‘हिंदी प्रभाकर’ के बाद ही वे ‘विष्णु प्रभाकर’ हो गए।
  • 1938 ई. में हरिद्वार की सुशीला से विवाह हुआ। उनसे चार संतानें हुईं: अनीता, अतुल, अमित और अर्चना।

नौकरी, संघर्ष और साहित्य-सेवा

1942 में महात्मा गाँधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। वे कई वर्षों तक मानसिक रोग से ग्रस्त रहे और ससुराल कनखल (पंजाब) में रहे। स्वस्थ होने के बाद 6 अप्रैल 1944 को वे अजमेरी गेट, दिल्ली आए। वहाँ उन्होंने ‘आयुर्वेद महामंडल’ में नौकरी की, पर साहित्य-सेवा के लिए उसे भी छोड़ दिया।

उनका सर्वप्रथम रेडियो कार्यक्रम जून 1948 में हुआ, जिसका संचालन डॉ. नगेंद्र ने किया। बाद में आकाशवाणी में महानिदेशक पद का प्रस्ताव मिला, पर यह नौकरी भी अल्प समय ही चली और उन्होंने 1 अप्रैल 1956 को इस्तीफा दे दिया। आर्य समाज से प्रभावित होकर वे खद्दर पहनने लगे, अछूतों को अपना समझने लगे और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए कटिबद्ध रहे। 11 अप्रैल 2009 को दिल्ली में उनका निधन हुआ।

Direct Answer: विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून 1912 को मीरापुर (मुजफ्फरनगर) में हुआ और निधन 11 अप्रैल 2009 को दिल्ली में हुआ।


📚 विष्णु प्रभाकर की प्रमुख रचनाएँ

उनकी रचनाओं का मूल स्वर मानव का भावात्मक विकास एवं कल्याण है, जिसमें मानव के प्रति करुणा और स्नेह व्याप्त है। उन्होंने स्वयं कहा था कि उनकी अधिकतर कहानियाँ मनुष्य और मानवता की हैं। उन्होंने लगभग सौ कहानियाँ लिखीं।

विधा प्रमुख रचनाएँ
कहानी-संग्रह आदि और अंत (1945), रहमान का बेटा (1947), धरती अब भी घूम रही है (1956), संघर्ष के बाद (1953), खिलौने (1981)
उपन्यास ढलती रात (1951), निशिकांत (1955), तट के बंधन (1955), स्वप्नमयी (1968), अर्द्धनारीश्वर
नाटक डॉक्टर (1961), नव प्रभात (1973), सत्ता के आर-पार (1981), टूटते परिवेश (1974)
एकांकी इंसान और अन्य एकांकी (1947), बारह एकांकी (1958), ये रेखाएँ ये दायरे (1963)
जीवनी आवारा मसीहा (1974), अमर शहीद भगत सिंह (1974), सरदार वल्लभभाई पटेल (1976)
संस्मरण कुछ शब्द कुछ रेखाएँ (1965), यादों की तीर्थयात्रा (1981), हमसफर मिलते रहे (1996)
यात्रावृत्त जमना गंगा के नैहर में (1964), हँसते निर्झर बहकती भट्टी (1966), ज्योतिपुंज हिमालय (1982)
आत्मकथा क्षमादान, पंछी उड़ गया, पंखहीन, मुक्त गगन में (सभी 2004)

📖 आवारा मसीहा की रचना-प्रक्रिया और संरचना

  • लेखन में चौदह वर्ष लगे: 1959 से 1973 तक।
  • प्रकाशन: 1974 ई.
  • प्रस्ताव किसका? पुस्तक के अनुसार जीवनी लिखने का आग्रह यशपाल जैन का था, और यशपाल जैन को यह प्रस्ताव श्री नाथूराम प्रेमी ने दिया था।
  • शोध-श्रम: प्रभाकर जी ने शरतचंद्र के बारे में जानकारी पाने के लिए करीब 60 लोगों से साक्षात्कार लिया, करीब 17 लोगों से पत्र-व्यवहार किया और 42 ऐसे व्यक्तियों से भेंट की जिनका शरतचंद्र से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध था।
  • अध्ययन: उन्होंने करीब 18 बांग्ला, 19 हिंदी और 9 अंग्रेजी पुस्तकों का अध्ययन किया।
  • चित्र: इस कृति में शरतचंद्र के जीवन और साहित्य से जुड़े करीब 45 चित्र भी हैं।

आवारा मसीहा के तीन पर्व

लेखक ने जीवनी को खंडों या सर्गों में न बाँटकर तीन पर्वों में बाँटा है:

पर्व विषय
1. दिशाहारा शरतचंद्र के बाल्यकाल की पृष्ठभूमि और पारिवारिक चित्रण
2. दिशा की खोज आजीविका की खोज में देश-विदेश भटकना और साहित्यिक जीवन का वर्णन
3. दिशांत साहित्यिक उपलब्धियाँ (खासकर उपन्यास), सामाजिक कार्य और देहावसान तक का वर्णन

Direct Answer: ‘आवारा मसीहा’ तीन पर्वों में बँटी है: दिशाहारा, दिशा की खोज और दिशांत।

⚡ Quick Revision : आवारा मसीहा

  • रचना और लेखक: ‘आवारा मसीहा’ विष्णु प्रभाकर की लिखी बांग्ला कथाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की जीवनी है।
  • समय: इसे लिखने में 1959 से 1973 तक चौदह वर्ष लगे और यह 1974 में प्रकाशित हुई।
  • शोध: लेखक ने करीब 60 लोगों से साक्षात्कार, 17 से पत्र-व्यवहार और 42 लोगों से भेंट की।
  • संरचना: इसमें खंड या सर्ग नहीं हैं। इसे तीन ‘पर्वों’ में बाँटा गया है।
  • पहला पर्व ‘दिशाहारा’: शरत का बाल्यकाल, परिवार और माता-पिता की मृत्यु का वर्णन।
  • दूसरा पर्व ‘दिशा की खोज’: आजीविका की खोज में रंगून तक भटकना और साहित्यिक जीवन की शुरुआत।
  • तीसरा पर्व ‘दिशांत’: साहित्यिक उपलब्धियाँ, सामाजिक कार्य और 16 जनवरी 1938 को देहावसान।
  • शरत के माता-पिता: मोतीलाल चट्टोपाध्याय और भुवनमोहिनी।
  • प्रमुख प्रसंग: बचपन की साथी धीरू को देवदास की पार्वती का आधार माना जाता है।
  • रंगून का जीवन: कुन्तलीन पुरस्कार (पच्चीस रुपये) मिला। प्लेग में पत्नी और पुत्र की मृत्यु हुई। पत्नी शांति देवी के निधन के बाद मोक्षदा (‘हिरण्मयी देवी’) से विवाह किया।
  • प्रमुख रचनाएँ: ‘चरित्रहीन’ ने बंगाल में खलबली मचाई। ‘पथेर दाबी’ अंग्रेजों द्वारा जब्त हुई।
  • नामकरण: शरत के कथन “आवारा लड़के की तरह जिंदगी शुरू की” पर विष्णु जी ने कहा कि अंत मसीहा के रूप में किया।
  • शिल्प: संस्मरण, डायरी, रेखाचित्र, कहानी, नाटक और यात्रावृत्त जैसी लगभग सभी गद्य-विधाओं का समन्वय।
  • विष्णु प्रभाकर: जन्म 21 जून 1912 (मीरापुर, मुजफ्फरनगर); निधन 11 अप्रैल 2009 (दिल्ली); पद्मभूषण 2004; साहित्य अकादमी 1993 (‘अर्द्धनारीश्वर’)।
  • विद्वानों की राय: इलाचंद्र जोशी ने इसे ‘हिंदी साहित्य की एक घटना’ कहा; विजयेंद्र स्नातक ने इसे जीवनी साहित्य का स्तंभ बताया।

आषाढ़ का एक दिन – सारांश, पात्र, उद्देश्य और प्रश्न

🧒 आवारा मसीहा में शरतचंद्र का जीवन: मुख्य तथ्य

बचपन और परिवार

  • पुस्तक के अनुसार शरतचंद्र का जन्म सितंबर 1876 ई. में हुआ। पिता मोतीलाल चट्टोपाध्याय और माता भुवनमोहिनी थीं।
  • बचपन देवानंदपुर में बीता और पाँच वर्ष की आयु में विद्यालय जाना शुरू किया। वे बचपन से ही नटखट, निर्भीक, साहसी और परोपकारी थे।
  • बचपन में धीरू नाम की एक लड़की उनके साथ पढ़ती थी। माना जाता है कि वही देवदास की नायिका पार्वती का आधार है।
  • पिता भागलपुर में रहते थे, जहाँ राजू नाम के लड़के से शरत की गहरी दोस्ती हुई।
  • माँ के असामयिक निधन से वे इतने आहत हुए कि पढ़ाई-लिखाई छूट गई। उन्होंने जितना पढ़ा, उसका श्रेय अपनी माँ को दिया।

रंगून का जीवन

  • पिता की मृत्यु के बाद तीन छोटे भाई और एक छोटी बहन (सुशीला) का दायित्व शरत पर आ गया।
  • वे बर्मा (रंगून) गए। वहाँ मित्र मणींद्रनाथ की सहायता से एक्जीक्यूटिव इंजीनियर कार्यालय में अस्थायी नौकरी मिली। बाद में एग्जामिनर पब्लिक वर्क्स एकाउंट्स में सौ रुपये की स्थायी नौकरी मिल गई।
  • रंगून से ही मित्रों के आग्रह पर उन्होंने ‘कुन्तलीन पुरस्कार’ के लिए कहानी भेजी, जो प्रथम पुरस्कार (पच्चीस रुपये) के रूप में मिला। कहानी उन्होंने मामा के नाम से भेजी थी।
  • रंगून में उन्होंने जिस लड़की से विवाह किया, उससे एक पुत्र हुआ। प्लेग बीमारी के कारण पत्नी और बच्चा दो साल में मर गए।

विवाह और ‘हिरण्मयी देवी’

पहली पत्नी शांति देवी की मृत्यु के बाद शरत ने कृष्णदास अधिकारी की पुत्री मोक्षदा से विवाह किया। यद्यपि इस विवाह को समाज की मान्यता नहीं मिली, पर शरत उन्हें ‘हिरण्मयी देवी’ कहा करते थे।

“आज से तुम हिरण्मयी देवी हुई। तुम खरे सोने के समान हो। इस पर कभी भी किसी प्रकार का मैल नहीं जम सकता।”

साहित्य और अंतिम समय

  • शरत की कहानियाँ ‘यमुना’ पत्रिका में छपती थीं। वे बांग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार बन चुके थे।
  • ‘चरित्रहीन’ उपन्यास ने बंगाल में खलबली मचा दी। इसके जितने समर्थक थे, उससे कहीं ज्यादा विरोधी थे।
  • प्रमुख रचनाएँ: श्रीकांत (प्रथम और द्वितीय पर्व), देवदास, निष्कृति, चरित्रहीन, काशीनाथ, एकादश वैरागी, गृहदाह, स्वामी, दत्ता।
  • उनका उपन्यास ‘पथेर दाबी’ क्रांतिकारी विचारधारा से ओतप्रोत होने के कारण अंग्रेजों द्वारा जब्त कर लिया गया था।
  • पुस्तक के अनुसार ढाका विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि दी। कवींद्र रवींद्रनाथ टैगोर को भी कहना पड़ा था कि जोड़ का दूसरा कोई नहीं है।
  • 12 मार्च 1912 ई. को रंगून से प्रमथनाथ को लिखा उनका पत्र पुस्तकालय और ‘चरित्रहीन’ की पांडुलिपि जल जाने की घटना बताता है।
  • 16 जनवरी 1938 ई. को उनका देहावसान हो गया।

🏷️ ‘आवारा मसीहा’ नाम क्यों पड़ा?

रचना का नाम शरतचंद्र के एक कथन के आधार पर रखा गया। मृत्यु-शैया पर शरत ने कहा था कि उन्होंने आवारा लड़के की तरह जिंदगी शुरू की थी, अंत कहाँ किया, यह सब जानें। विष्णु प्रभाकर ने तुरंत कहा कि अंत मसीहा के रूप में किया।

“मैंने आवारा लड़के की तरह जिंदगी शुरू की थी, अंत कहाँ किया यह आप जाने।”

पुस्तक के अनुसार शरत के चरित्र की सहृदयता, स्वच्छंदता और निस्स्वार्थता उन्हें आवारगी से उठाकर मसीहा बनाती है। उनका जड़ मान्यताओं और परंपराओं के प्रति विद्रोही तेवर भी इसी मसीहापन का हिस्सा है।

Direct Answer: ‘आवारा मसीहा’ नाम शरतचंद्र के अपने कथन से लिया गया है, जिसमें ‘आवारा’ उनके जीवन की शुरुआत और ‘मसीहा’ उनके अंत का प्रतीक है।


✨ आवारा मसीहा की विशेषताएँ

  • सभी गद्य-विधाओं का समन्वय: इसमें संस्मरण, जीवनी, डायरी, रेखाचित्र, कहानी, नाटक और यात्रावृत्त जैसी लगभग सभी विधाओं का चरमोत्कर्ष दिखता है।
  • शरत का मानवतावाद: वे वेश्याओं के प्रति सहानुभूति रखते थे और हिंदू धर्म की झूठी तथा आडंबरपूर्ण मर्यादाओं का खुलकर विरोध करते थे।
  • नारी-संवेदना: शरत मानते थे कि समाज ने स्त्रियों को वेश्या बनने के लिए विवश किया है।
  • प्रामाणिकता: चौदह वर्ष के शोध, साक्षात्कारों और पत्राचार पर आधारित जीवनी होने से इसे तथ्यपरक माना जाता है।
  • अहिंदी लेखक को श्रद्धांजलि: वीरेंद्र त्रिपाठी के मंतव्य के अनुसार किसी हिंदी लेखक द्वारा अहिंदी लेखक को दी गई यह इतनी बड़ी श्रद्धांजलि है कि वह विष्णु जी को हिंदी साहित्य में अमर करने के लिए पर्याप्त है।

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🏆 विष्णु प्रभाकर के पुरस्कार और सम्मान

वर्ष सम्मान
1974 ‘आवारा मसीहा’ के लिए इंडियन राइटर्स एसोसिएशन का पाब्लो नेरूदा सम्मान
1975 इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट अवार्ड
1975–76 ‘आवारा मसीहा’ के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का तुलसी पुरस्कार
1976 ‘आवारा मसीहा’ के लिए सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार
1986 हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार
1993 ‘अर्द्धनारीश्वर’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार
2004 भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण

इनके अलावा ‘संघर्ष के बाद’ कहानी-संग्रह पर उत्तर प्रदेश सरकार का पुरस्कार और 1995 में शरत समिति, कलकत्ता का सम्मान भी उन्हें मिला।


🗣️ आवारा मसीहा पर विद्वानों की राय

  • विजयेंद्र स्नातक: आवारा मसीहा हिंदी के जीवनी साहित्य का स्तंभ है और विष्णु जी की अक्षय कीर्ति का आधार है।
  • महीप सिंह: विष्णु प्रभाकर का संपूर्ण जीवन लेखकीय अस्मिता की पहचान का जीवन है।
  • राहुल सांकृत्यायन (जीवनी के प्रति): जीवनी-लेखक का कर्तव्य है कि वह नायक को जैसा देखा, वैसा ही पाठकों के सामने रखे।
  • डॉ. रणधीर: शरतचंद्र सचमुच प्रतिभाशाली लेखक थे, जिन्होंने अपनी लेखनी से समाज की बड़ी सेवा की।
  • इलाचंद्र जोशी: ‘आवारा मसीहा’ का प्रकाशन हिंदी साहित्य की एक घटना है।
  • रवींद्रनाथ टैगोर (शरतचंद्र के बारे में): बंकिमचंद्र भागीरथ के समान जिस नए साहित्य को लेकर आए, उसने बांग्लादेश के सर्वसाधारण के अंतर को छुआ।

💬 शरतचंद्र के महत्वपूर्ण कथन (पुस्तक से)

“इस संसार में जिसको हम दुःख कहते हैं; वह तो वास्तविक दुःख नहीं है। वह तो उसकी दीक्षा है।”

“मानव को मानव समझने में ही समाज का भला है।”

“सारा मनुष्यत्व सतीत्व से कहीं बड़ा है।”

“कमल कीचड़ में खिलता है और देखने वालों का मन मोह लेता है।”


💡 परीक्षार्थियों के लिए विशेष टिप्स (UGC NET / TGT / PGT / RPSC)

🎯 याद रखने योग्य बिंदु

  • 📌 आवारा मसीहा: लेखन 1959–1973, प्रकाशन 1974, यानी चौदह वर्ष।
  • 📌 तीन पर्व: दिशाहारा → दिशा की खोज → दिशांत।
  • 📌 नायक: शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (बांग्ला कथाकार)। पत्नी: शांति देवी और मोक्षदा (‘हिरण्मयी देवी’)।
  • 📌 नामकरण: शरत के मृत्यु-शैया वाले कथन से।
  • 📌 लेखक का जन्म: 21 जून 1912, मीरापुर (मुजफ्फरनगर)। निधन: 11 अप्रैल 2009।
  • 📌 इलाचंद्र जोशी: इसे ‘हिंदी साहित्य की एक घटना’ कहा।
  • 📌 पद्मभूषण: 2004। साहित्य अकादमी: 1993 (‘अर्द्धनारीश्वर’)।

💡 याद करने की ट्रिक

  • तीन पर्वों की ट्रिक: दि-दि-दि (दिशाहारा, दिशा की खोज, दिशांत)। हर पर्व का नाम ‘दिशा’ से शुरू होता है।
  • लेखक के चार भाइयों की ट्रिक: ब-वि-म-प्र (ब्रह्मा, विष्णु, महेश, प्रह्लाद)।
  • जीवनी की संख्या की ट्रिक: 60-17-42 (साक्षात्कार, पत्र-व्यवहार, भेंट)।

📝 संभावित प्रश्न

  • ‘आवारा मसीहा’ किस साहित्यकार की जीवनी है?
  • ‘आवारा मसीहा’ के तीन पर्व कौन-से हैं?
  • विष्णु प्रभाकर को ‘आवारा मसीहा’ पर कौन-से पुरस्कार मिले?

🏁 निष्कर्ष

आवारा मसीहा केवल शरतचंद्र की जीवनी नहीं, हिंदी-बांग्ला साहित्य के आपसी रिश्ते का प्रमाण भी है। चौदह वर्ष की साधना, सैकड़ों लोगों से संवाद और तीन पर्वों की संरचना ने इसे जीवनी साहित्य का मानदंड बना दिया। विष्णु प्रभाकर के जीवन-संघर्ष से लेकर उनके पुरस्कारों तक, यह कृति मानवता और संवेदना के उनके मूल स्वर को सामने रखती है। UGC NET, TGT, PGT और RPSC के विद्यार्थियों के लिए इसके तथ्य, तिथियाँ और विद्वानों के मत अनिवार्य अध्ययन-सामग्री हैं।


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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

आवारा मसीहा किसकी रचना है और यह किस विधा की है?
‘आवारा मसीहा’ विष्णु प्रभाकर की रचना है। यह जीवनी विधा की कृति है और बांग्ला के सुप्रसिद्ध साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन पर आधारित है।

आवारा मसीहा कब प्रकाशित हुई और इसे लिखने में कितना समय लगा?
यह 1974 ई. में प्रकाशित हुई। इसे लिखने में विष्णु प्रभाकर को 1959 से 1973 तक कुल चौदह वर्ष लगे।

आवारा मसीहा के कितने पर्व हैं और उनके नाम क्या हैं?
इसके तीन पर्व हैं: (1) दिशाहारा, जिसमें शरतचंद्र के बाल्यकाल की पृष्ठभूमि और पारिवारिक चित्रण है; (2) दिशा की खोज, जिसमें आजीविका की खोज में देश-विदेश भटकने और साहित्यिक जीवन का वर्णन है; और (3) दिशांत, जिसमें साहित्यिक उपलब्धियों, सामाजिक कार्यों और देहावसान तक की घटनाएँ हैं।

'आवारा मसीहा' नाम क्यों रखा गया?
यह नाम शरतचंद्र के एक कथन से लिया गया है। मृत्यु-शैया पर शरत ने कहा था कि उन्होंने आवारा लड़के की तरह जिंदगी शुरू की थी, अंत कहाँ किया यह आप जानें। विष्णु प्रभाकर ने तुरंत कहा कि अंत मसीहा के रूप में किया।

विष्णु प्रभाकर का जन्म कब और कहाँ हुआ?
विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून 1912 ई. को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर गाँव में हुआ। उनके पिता दुर्गाप्रसाद और माता महादेवी थीं। उनका निधन 11 अप्रैल 2009 को दिल्ली में हुआ।

आवारा मसीहा पर विष्णु प्रभाकर को कौन-से पुरस्कार मिले?
पुस्तक के अनुसार उन्हें 1974 में पाब्लो नेरूदा सम्मान, 1975–76 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का तुलसी पुरस्कार और 1976 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला। इसके अलावा साहित्य अकादमी पुरस्कार (1993, ‘अर्द्धनारीश्वर’ पर) और पद्मभूषण (2004) भी उनके प्रमुख सम्मान हैं।

आवारा मसीहा के लिए विष्णु प्रभाकर ने कितना शोध किया था?
उन्होंने करीब 60 लोगों से साक्षात्कार लिया, करीब 17 लोगों से पत्र-व्यवहार किया और 42 ऐसे व्यक्तियों से भेंट की जिनका शरतचंद्र से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध था। उन्होंने बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी की कई पुस्तकों का अध्ययन भी किया।

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