काव्यशास्त्र

स्थायी भाव क्या है? परिभाषा, संख्या, प्रकार और मुख्य उदाहरण

स्थायी भाव की परिभाषा और प्रकार - भारतीय काव्यशास्त्र

स्थायी भाव क्या है: परिभाषा, मुख्य विशेषताएँ, प्रकार और उदाहरण (What is Sthai Bhav: Definition, Key Features, Types, and Examples)

हिंदी साहित्य और भारतीय काव्यशास्त्र के इतिहास में ‘रस’ को काव्य की आत्मा तथा उसका सर्वोपरि प्राणतत्व माना गया है। आचार्य भरतमुनि के प्रसिद्ध नाट्यशास्त्रीय सूत्र— “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगारसनिष्पत्तिः” के अनुसार रस की निष्पत्ति का सबसे मूल, केंद्रीय और अनिवार्य आधार ‘स्थायी भाव’ ही है। बिना स्थायी भाव (Sthai Bhav) के किसी भी रस की कल्पना तक नहीं की जा सकती। यदि आप UGC NET, TGT, PGT, RPSC या अन्य किसी भी हिंदी साहित्य प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो ‘स्थायी भाव की परिभाषा’, ‘स्थायी भाव की संख्या’, और ‘स्थायी भाव के प्रकार’ से जुड़े प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इस विस्तृत लेख में हम स्थायी भाव का अर्थ, आचार्यों के मत, कुल ग्यारह स्थायी भावों और उनके प्रामाणिक उदाहरणों का गहन अध्ययन करेंगे।

📌 Quick Overview Box (मुख्य बिंदु):

  • मुख्य विषय: स्थायी भाव का स्वरूप, परिभाषाएँ, प्रकार और उदाहरण

  • प्रारंभिक संख्या: नौ स्थायी भाव और नौ रस (भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में आठ रस माने गए थे)

  • वर्तमान कुल संख्या: ग्यारह स्थायी भाव और ग्यारह रस (वात्सल्य और भक्ति रस जुड़ने के बाद)

  • स्थायी भाव और संचारी भाव में अंतर
  • उपयोगी परीक्षाएँ: UGC NET, TGT, PGT, RPSC और अन्य हिंदी साहित्य परीक्षाएँ।

स्थायी भाव का शाब्दिक अर्थ और मूल अवधारणा

साधारण शब्दों में, जो भाव हमारे हृदय में हमेशा (स्थायी रूप से) विद्यमान रहता है तथा जिसे कोई दूसरा विरोधी भाव दबा नहीं सकता, और जो अन्य सभी संचारी भावों को अपने में समेट लेता है, उसे स्थायी भाव कहते हैं। मनुष्य का मन कभी भी भावों से खाली नहीं होता। उसके भीतर जन्मजात रूप से संस्कार या वासना के रूप में कुछ मूल वृत्तियाँ छिपी होती हैं। यही मूल वृत्तियाँ जब उचित कारणों (विभाव) और शारीरिक चेष्टाओं (अनुभाव) से मिलती हैं, तो परिपक्व होकर ‘रस’ बन जाती हैं।

स्थायी भाव की महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

काव्यशास्त्र के विकास में आचार्यों ने स्थायी भाव को परिभाषित किया है। यहाँ तीन सबसे महत्वपूर्ण और प्रामाणिक परिभाषाएँ दी जा रही हैं:

  1. आचार्य भरतमुनि (‘नाट्यशास्त्र’ के रचयिता):

    • परिभाषा: भरतमुनि के अनुसार, जिस प्रकार कई नौकरों और सेवकों से घिरे होने पर भी राजा ही मुख्य होता है, उसी प्रकार विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के साथ रहने पर भी ‘स्थायी भाव’ ही मुख्य होने के कारण रस का पद पाता है।

    • मूल संस्कृत श्लोक:

      ‘नानाभावपहिता अपि स्थायिनो भावा रसत्वमाप्नुवन्ति……विभावानुभावव्यभिचारिवृता स्थायीभावे रसरताम् लभते नरेन्द्रवत्’

  2. आचार्य मम्मट (‘काव्यप्रकाश’ के रचयिता):

    • परिभाषा: मम्मट के अनुसार, जो भाव विभाव, अनुभाव और संचारी भावों द्वारा प्रकट होकर पाठक या श्रोता के हृदय में रस के रूप में आस्वादित होता है, वही स्थायी भाव कहलाता है।

    • मूल संस्कृत श्लोक:

      ‘विभावा अनुभावास्तत् कथ्यन्ते व्यभिचारिणः।

      व्यक्तः स तैर्विभावैः स्थायी भावो रसस्मृतः।’

  3. आचार्य धनंजय (‘दशरूपक’ के रचयिता):

    • परिभाषा: धनंजय कहते हैं कि जो भाव विरोधी भावों से कभी अलग नहीं होता, बल्कि विपरीत भावों को भी अपने में तुरंत मिला लेता है, उसका नाम स्थायी है। इसकी स्थिति समुद्र जैसी है, जो अपने अंदर गिरने वाली सभी नदियों के पानी को खारा बना लेता है।

    • मूल संस्कृत श्लोक:

      ‘विरुद्धैरविरुद्धैर्वा भावै विच्छिद्यते न यः।

      आत्मानं नयत्यन्यान् स स्थायी लवणाकारः।’

स्थायी भाव की मुख्य विशेषताएँ (Key Features of Sthai Bhav)

काव्यशास्त्र के अध्ययन से स्थायी भाव की निम्नलिखित सरल और महत्वपूर्ण विशेषताएँ सामने आती हैं:

  • रस का मुख्य आधार: यह रस का मूल रूप है, जिसमें आनंद देने का विशेष गुण होता है।

  • गहरा प्रभाव: स्थायी भाव में मनुष्य के मन पर गहरा और लंबे समय तक टिकने वाला प्रभाव डालने की क्षमता होती है।

  • सबके मन में मौजूदगी: यह दुनिया के हर इंसान के अंदर जन्मजात रूप से मौजूद होते हैं। कोई भी मनुष्य इन आंतरिक भावनाओं से रहित नहीं होता।

  • जीवनोपयोगी: ये भाव मनुष्य को जीवन में सही प्रेरणा देने वाले होते हैं।

  • चित्त में स्थिरता: दूसरे भावों की तरह ये पल भर में खत्म नहीं होते, बल्कि मन में आरंभ से अंत तक स्थिर रहते हैं।

स्थायी भावों और रसों की संख्या का क्रमिक विकास

  • भरतमुनि का मत: अपने ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में भरतमुनि ने मूल रूप से आठ रस और उनके आठ स्थायी भाव ही माने थे, क्योंकि उन्होंने ‘शांत रस’ को नाटक के मंचन के लिए उपयुक्त नहीं माना था।

  • नवरस की मान्यता: बाद के आचार्यों (जैसे मम्मट और अभिनवगुप्त) ने ‘शांत रस’ और उसके स्थायी भाव ‘निर्वेद’ को मान्यता दी, जिससे इनकी संख्या नौ (नवरस) हो गई।

  • कुल संख्या: आगे चलकर रूपगोस्वामी और पंडित विश्वनाथ ने ‘भक्ति रस’ और ‘वात्सल्य रस’ को भी जोड़ दिया। इस प्रकार वर्तमान समय में स्थायी भावों और रसों की कुल संख्या ग्यारह हो गई है।

संचारी भाव क्या होते है?

स्थायी भाव के प्रकार (Sthai Bhav ke Parkar)

यहाँ सभी ग्यारह स्थायी भावों को उनके संबंधित रसों और प्रामाणिक उदाहरणों सहित समझाया गया है:

1. शृंगार रस (Shringar Ras)

  • परिभाषा: यह भाव पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका के बीच पाया जाता है, इसके दो रूप संयोग और वियोग हैं, वहाँ शृंगार रस होता है.

  • स्थायी भाव: रति (प्रेम)

  • देवता: विष्णु

  • उदाहरण (Examples):

    • शृंगार रस का संयोग पक्ष का उदाहरण:

      ‘बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।

      सौह करे, भौहें हंसे, दैन कहै, नटि जाय।’

      (बिहारी)

    • शृंगार रस का वियोग पक्ष का उदाहरण:

      ‘निसिदिन बरसात नयन हमारे, सदा रहति पावस ऋतु हम पै जब तें तें स्याम सिधारे।’

      (सूरदास)

2. वीर रस (Veer Ras)

  • परिभाषा: जहाँ आलंबन वीर पुरुष होता है और उसकी वीरतापूर्ण क्रियाएँ उद्दीपन होती हैं, वहाँ वीर रस होता है।

  • स्थायी भाव: उत्साह

  • देवता: इंद्र (महेंद्र)

  • उदाहरण (Example):

    • वीर रस का उदाहरण:

      ‘वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।

      सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो।

      तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं।’

      (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

3. करुण रस (Karun Ras)

  • परिभाषा: जब कोई प्रिय व्यक्ति या वस्तु हमसे हमेशा के लिए दूर हो जाती है, तब उसके अभाव में यह भाव उत्पन्न होता है, वहाँ करुण रस होता है.

  • स्थायी भाव: शोक

  • देवता: यम – वरुण

  • उदाहरण (Example):

    • करुण रस का उदाहरण:

      ‘देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करि कै करुणानिधि रोये।

      पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनान के जल सो पग धोये।’

4. अद्भुत रस (Adbhut Ras)

  • परिभाषा: किसी अलौकिक या आश्चर्यजनक वस्तु या घटना को देखकर मन में यह भाव जागृत होता है, वहाँ अद्भुत रस होता है.

  • स्थायी भाव: विस्मय / आश्चर्य

  • देवता: गंधर्व, ब्रह्मा

  • उदाहरण (Example):

    • अद्भुत रस का उदाहरण:

      ‘अखिल भुवन चर अचर सब हरि मुख में लखि मातु।

      चकित भई गदगद वचन हर्षित दृग पुलकातु।’

5. हास्य रस (Hasy Ras)

  • परिभाषा: किसी की अजीब वेशभूषा या विकृत आकार को देखकर मन में हँसी का भाव आता है, वहाँ हास्य रस होता है.

  • स्थायी भाव: हास

  • देवता: प्रमथ

  • उदाहरण (Example):

    • हास्य रस का उदाहरण:

      ‘हँसि हँसि मजे देखि दूलह दिगंबर को पाहुनि जै आए हिमाचल के उछाह में…’

6. रौद्र रस (Raudra Ras)

  • परिभाषा: किसी अपमान या अपकार को देखकर शत्रु के प्रति यह भाव उत्पन्न होता है, वहाँ रौद्र रस होता है.

  • स्थायी भाव: क्रोध

  • देवता: रुद्र

  • उदाहरण (Example):

    • रौद्र रस का उदाहरण:

      ‘श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे।

      सब शोक अपना भूलकर करतल-युगल मलने लगे।’

7. वीभत्स रस (Vibhats Ras)

  • परिभाषा: अत्यंत गंदी, अपवित्र या भयानक वस्तुओं को देखकर मन में घृणा का भाव पैदा होता है, वहाँ वीभत्स रस होता है।

  • स्थायी भाव: जुगुप्सा (घृणा)

  • देवता: महाकाल

  • उदाहरण (Example):

    • वीभत्स रस का उदाहरण:

      ‘सिर पै बैठ्यो काग्, आँखि दोउ खात निकारत।

      खींचत जीभहि स्यार, अतिहि आनन्द उर धारत।’

8. भयानक रस (Bhayanak Ras)

  • परिभाषा: किसी भयानक जीव, हिंसक पशु या खतरनाक स्थिति को देखकर भय उत्पन्न होता है, वहाँ भयानक रस होता है.

  • स्थायी भाव: भय

  • देवता: कालदेव (भूतपिशाच)

  • उदाहरण (Example):

    • भयानक रस का उदाहरण:

      ‘एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय।

      विकल बटोहि बीच हवे, परयो मूर्च्छा खाय।’

9. शांत रस (Shant Ras)

  • परिभाषा: संसार की नश्वरता और वैराग्य की भावना से इस रस की प्राप्ति होती है, वहाँ शांत रस होता है.

  • स्थायी भाव: निर्वेद / शम

  • देवता: पूषा

  • उदाहरण (Example):

    • शांत रस का उदाहरण:

      ‘मन रे तन कागजबुतला।

      लागै बूँद बिनसि जाय दिन में,

      गरब करै क्या कितना।’

10. वात्सल्य रस (Vatsaly Ras)

  • परिभाषा: माता-पिता का संतान के प्रति अगाध प्रेम होता है, वहाँ वात्सल्य रस होता है।

  • स्थायी भाव: वत्सल / स्नेह (पुत्र विषयक रति)

  • देवता: वासुदेव

  • उदाहरण (Example):

    • वात्सल्य रस का उदाहरण:

      ‘हरि अपने रंग में कुछ गावत।

      तनक-तनक चरननसों नाचवत, मनहिं-मनहिं रिझावत।’

11. भक्ति रस (Bhakti Ras)

  • परिभाषा: भगवान के प्रति अनन्य प्रेम और अनुराग से भक्ति रस की निष्पत्ति होती है, वहाँ भक्ति रस होता है.

  • स्थायी भाव: ईश्वर विषयक रति

  • देवता: अनिदिष्ट

  • उदाहरण (Example):

    • भक्ति रस का उदाहरण:

      ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।

      जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।’

स्थायी भाव के भेद

क्र.सं. स्थायी भाव संबंधित रस वर्ण (रंग) आधिपत्य देवता
1. रति (प्रेम) शृंगार रस

श्याम

विष्णु

2. हास (हँसी) हास्य रस

श्वेत

प्रमथ

3. क्रोध (गुस्सा) रौद्र रस

रक्त (लाल)

रुद्र

4. शोक (दुःख) करुण रस

कपोत (कबूतर जैसा)

यम – वरुण

5. जुगुप्सा (घृणा) वीभत्स रस

नील

महाकाल

6. भय (डर) भयानक रस

कृष्ण (काला)

कालदेव (भूतपिशाच)

7. उत्साह (ऊर्जा) वीर रस

स्वर्ण, गौर

इंद्र (महेंद्र)

8. विस्मय (आश्चर्य) अद्भुत रस

पीत (पीला)

गंधर्व, ब्रह्मा

9. निर्वेद / शम शांत रस

अरुण

पूषा

10. रति (शिशु विषयक) वात्सल्य रस

ईषदरुणाम

वासुदेव

11. ईश्वर विषयक रति भक्ति रस – –

रसों के परस्पर विरोधी और मित्र रस

काव्य रचना करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कौन सा रस किसका विरोधी है और कौन सा मित्र है:

मुख्य रस परस्पर विरोधी रस (जो एक साथ परिपक्व नहीं हो सकते) मित्र / सहयोगी रस (जो एक-दूसरे के अनुकूल हैं)
1. शृंगार रस

करुण, बीभत्स, रौद्र, वीर, भयानक और शांत रस

अद्भुत रस

2. हास्य रस

भयानक, करुण रस

शृंगार, अद्भुत रस
3. करुण रस

हास्य, शृंगार रस

भयानक, बीभत्स रस
4. रौद्र रस

हास्य, शृंगार, भयानक रस

वीर, अद्भुत रस

5. भयानक रस

हास्य, शृंगार, वीर, रौद्र, शांत रस

बीभत्स, करुण रस
6. शांत रस

रौद्र, शृंगार, हास्य, भयानक, वीर रस

करुण, अद्भुत रस
7. वीभत्स रस

शृंगार रस

भयानक रस

📌 विशेष परीक्षा टिप्स (Exam Tips for Students):

  • महत्वपूर्ण बिंदु: परीक्षा में यह जरूर याद रखें कि आचार्य भरतमुनि ने मूल रूप से केवल आठ रस ही माने थे, क्योंकि वे शांत रस को नाटक के मंचन के योग्य नहीं मानते थे। बाद में इसे नौवाँ रस माना गया।

  • स्मार्ट ट्रिक: संचारी भाव पानी के बुलबुले की तरह क्षणिक होते हैं (संख्या तैंतीस), जबकि स्थायी भाव समुद्र की तरह गहरे और स्थिर रहते हैं।

स्थायी भाव और संचारी भाव में अंतर (Difference between Sthai Bhav and Sanchari Bhav)

क्र.सं. आधार (Basis) स्थायी भाव (Sthai Bhav) संचारी भाव (Sanchari Bhav)
1. स्थिति (Presence) ये मनुष्य के हृदय में जन्मजात रूप से हमेशा (स्थायी रूप से) विद्यमान रहते हैं। ये मन में पानी के बुलबुले की तरह क्षणिक रूप से उठते और विलीन होते हैं।
2. संख्या (Total Count) इनकी कुल संख्या निश्चित रूप से ग्यारह (11) मानी गई है। इनकी संख्या निश्चित रूप से तैंतीस (33) मानी गई है।
3. प्रधानता (Dominance) यह रस की पूरी प्रक्रिया में राजा के समान प्रधान और मुख्य होते हैं। ये मुख्य स्थायी भाव को पुष्ट करने वाले सेवक या सहायक के रूप में कार्य करते हैं।
4. स्थिरता (Stability) ये काव्य के आरंभ से अंत तक (आद्योपांत) अचल और स्थिर बने रहते हैं। ये बहुत कम समय के लिए आते हैं और तुरंत बदल जाते हैं (अस्थिर होते हैं)।
5. रस संबंध (Relation with Rasa) यही भाव आगे चलकर परिपक्व होकर ‘रस’ की अवस्था को प्राप्त होते हैं। ये अकेले रस नहीं बना सकते, बल्कि स्थायी भाव को रस तक पहुँचाने में मदद करते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि ‘स्थायी भाव’ भारतीय काव्यशास्त्र का वह केंद्र बिंदु है जो हमारी साधारण भावनाओं को परिष्कृत करके आस्वादनीय रस में बदल देता है। यही भाव साहित्य को सजीव और आनंददायी बनाते हैं।

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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

स्थायी भाव किसे कहते हैं? स्थायी भाव की परिभाषा क्या है?
साधारण शब्दों में, जो भाव हमारे हृदय में हमेशा स्थायी रूप से विद्यमान रहता है तथा जिसे कोई दूसरा विरोधी भाव दबा नहीं सकता, और जो अन्य सभी संचारी भावों को अपने में लीन कर लेता है, उसे ‘स्थायी भाव’ कहते हैं। मनुष्य के मन में जन्मजात रूप से कुछ मूल वृत्तियाँ छिपी रहती हैं, जो उचित कारणों से मिलकर ‘रस’ का रूप लेती हैं।

कुल स्थायी भाव कितने होते हैं? (sthai bhav ki sankhya)
संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रारंभिक काल में स्थायी भावों (और रसों की) संख्या नौ मानी गई थी। परंतु बाद के आचार्यों ने ‘वात्सल्य रस’ और ‘भक्ति रस’ को भी स्वतंत्र मान्यता दी, जिसके बाद वर्तमान समय में कुल स्थायी भावों और रसों की संख्या ग्यारह हो गई है।

स्थायी भाव की परिभाषा उदाहरण सहित समझाइए?
मनुष्य के हृदय में छिपे हुए वे मूल भाव जो आरंभ से अंत तक स्थिर रहते हैं, स्थायी भाव कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, जब नायक-नायिका के बीच ‘रति’ (प्रेम) का स्थायी भाव जागृत होता है, तो वह ‘शृंगार रस’ का रूप ले लेता है। इसी प्रकार शोक से करुण रस की उत्पत्ति होती है।

भरतमुनि ने कितने स्थायी भाव और रस माने हैं?
आचार्य भरतमुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में मूल रूप से आठ स्थायी भाव और आठ ही रस स्वीकार किए थे। उन्होंने ‘शांत रस’ को शामिल नहीं किया था, जिसे बाद के आचार्यों ने जोड़कर संख्या नौ कर दी।

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