दीपक अलंकार के उदाहरण, अर्थ एवं परिभाषा (Deepak Alankar)
हिंदी काव्यशास्त्र और व्याकरण में जहाँ प्रस्तुत (वर्ण्य, उपमेय) और अप्रस्तुत (अवर्ण्य, उपमान) दोनों का एक ही धर्म होता है, वहाँ ‘दीपक अलंकार’ माना जाता है। दीपक अलंकार का नामकरण ‘दीपक’ पदार्थ को ध्यान में रखकर किया गया है। जिस प्रकार एक ही स्थान पर रखा हुआ दीपक अपना प्रकाश चारों ओर फैलाकर सभी वस्तुओं को प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार दीपक अलंकार में भी एक ही साधारण धर्म प्रस्तुत और अप्रस्तुत से अन्वित होकर दोनों को प्रकाशित करता है। दोनों में गुणसाम्य देखकर ही इस अलंकार की परिकल्पना की गई है। प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से इसके उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
📌 दीपक अलंकार के महत्वपूर्ण उदाहरण (Deepak Alankar ke Udaharan)
1. ‘बुधजन सफल रसाल दोउ, नमत नम्रता लाय। दीपक के दीपत दोउ, सुखी करत सुख पाय।।’
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काव्य पंक्ति:
बुधजन सफल रसाल दोउ, नमत नम्रता लाय।
दीपक के दीपत दोउ, सुखी करत सुख पाय।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: विद्वान (बुधजन) और फल से लदा आम (रसाल) दोनों ही नम्रता आने पर सफल होते हैं। इसी प्रकार दीपक के जलने पर दोनों (दीप और प्रकाश) सुख प्रदान करते हैं।
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स्पष्टीकरण: उपर्युक्त दोहे में बुधजन (पंडित) तथा रसाल (फल लगा हुआ आम) जैसे प्रस्तुत (उपमेय) और अप्रस्तुत (उपमान) का एक ही साधारण धर्म अर्थात् ‘नमत नम्रता लाय’ कहा गया है, अतः यह दीपक अलंकार है।
2. ‘भूपति सोहत दान सों, फल फूलन उद्यान।’
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काव्य पंक्ति:
भूपति सोहत दान सों, फल फूलन उद्यान।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: राजा अपने दान से शोभा पाता है और उद्यान (बाग) अपने फल-फूलों से शोभा देता है।
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स्पष्टीकरण: उपर्युक्त पंक्ति में भूपति (राजा) और उद्यान का एक ही शोभाधर्म (‘सोहत’ यानी शोभा पाना) कहा गया है, अतः यहाँ दीपक अलंकार है।
3. ‘देखै तें मन नहीं भरै, तन की मिटै न भूख। बिन चाखै रस नहीं मिलै, आम कामिनी ऊँख।।’
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काव्य पंक्ति:
देखै तें मन नहीं भरै, तन की मिटै न भूख।
बिन चाखै रस नहीं मिलै, आम कामिनी ऊँख।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: देखने मात्र से मन नहीं भरता और तन की भूख (तृषा) नहीं मिटती। बिना चखे उसका रस नहीं मिलता, चाहे वह आम हो, कामिनी (स्त्री) हो या ऊँख (गन्ना) हो।
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स्पष्टीकरण: इस दोहे में ‘कामिनी’ प्रस्तुत (उपमेय) है और ‘आम’ तथा ‘ऊँख’ अप्रस्तुत (उपमान) हैं। इन तीनों का अर्थात् प्रस्तुत और अप्रस्तुतों का एक ही साधारण धर्म ‘बिन चाखै रस नहीं मिलै’ कहा गया है, अतः यह दीपक अलंकार का उदाहरण हुआ।
4. ‘संग तें जती, कुमंत्र तें राजा। मान तें ज्ञान, पान तें लाजा। प्रीति प्रणय बिनु, मद तें गुनी। नाशहिं बेगि, नीति अस सुनी।।’
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काव्य पंक्ति:
संग तें जती, कुमंत्र तें राजा। मान तें ज्ञान, पान तें लाजा।
प्रीति प्रणय बिनु, मद तें गुनी। नाशहिं बेगि, नीति अस सुनी।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: बुरी संगति से जति (संयमी), कुमंत्रणा से राजा, अहंकार से ज्ञान, पान खाने से लज्जा, बिना प्रेम के प्रीति और मद (नशा) से गुणी व्यक्ति शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, ऐसी नीति सुनी गई है।
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स्पष्टीकरण: उपर्युक्त पंक्तियों में सभी उपमेयोपमानों का एक ही साधारण धर्म ‘नाशहिं बेगि’ अर्थात् शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, कहा गया है, अतः इनमें दीपक अलंकार है।
5. ‘सरसिज से है सर की शोभा, नयनों से तेरे आनन की।’
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काव्य पंक्ति:
सरसिज से है सर की शोभा, नयनों से तेरे आनन की।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: कमल के फूलों से तालाब की शोभा है और तेरे सुंदर नयनों से तेरे मुख (आनन्) की शोभा है।
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स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में आनन (मुख) प्रस्तुत है तथा सर (तालाब) ‘अप्रस्तुत’ है। इन दोनों का एक ही साधारण धर्म ‘शोभा’ माना गया है, अतः यहाँ दीपक अलंकार है।
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