संधि (Sandhi in Hindi Grammar): परिभाषा, भेद, नियम और उदाहरण [Complete Guide]
हिंदी व्याकरण (Hindi Grammar) में शब्दों के शुद्ध उच्चारण, निर्माण और वर्तनी के लिए ‘संधि’ (Sandhi) और ‘संधि विच्छेद’ (Sandhi Viched) का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। REET, CTET, UPTET, Rajasthan LDC, UPSC, State PSC और बोर्ड परीक्षाओं में संधि से जुड़े प्रश्न प्रमुखता से पूछे जाते हैं।
इस लेख में हम संधि की परिभाषा, इसके मुख्य प्रकार (स्वर, व्यंजन, विसर्ग संधि), उनके नियम, संस्कृत सूत्र और परीक्षा में पूछे जाने वाले 100+ महत्वपूर्ण उदाहरणों को विस्तार से समझेंगे।
📌 1. संधि किसे कहते हैं? (Definition of Sandhi)
संधि (सम् + धि) शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है — ‘मेल’ या ‘जोड़’।
दो निकटवर्ती वर्णों के परस्पर मेल से जो विकार (बदलाव या परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे संधि कहते हैं। संधि में प्रथम शब्द का अंतिम वर्ण और द्वितीय शब्द का प्रथम वर्ण मिलकर एक नया वर्ण बनाते हैं।
-
उदा: विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
-
उदा: सम् + तोष = संतोष
🔹 संधि विच्छेद किसे कहते हैं? (Sandhi Vichchhed)
संधि द्वारा बने शब्दों को पुनः उनके मूल रूप में अलग-अलग करने की प्रक्रिया को संधि विच्छेद कहा जाता है।
-
उदा: हिमालय = हिम + आलय
-
उदा: सदानंद = सत् + आनंद
📌 2. संधि के मुख्य भेद (Types of Sandhi)
हिंदी व्याकरण में संधि को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया है:
-
स्वर संधि (Swar Sandhi)
-
व्यंजन संधि (Vyanjan Sandhi)
-
विसर्ग संधि (Visarga Sandhi)
1️⃣ स्वर संधि (Swar Sandhi)
दो स्वरों के परस्पर मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। हिंदी में 11 स्वर होते हैं, जब दो स्वर आपस में मिलते हैं तो स्वर संधि बनती है।
🔹 स्वर संधि के 5 भेद:
(क) दीर्घ संधि (सूत्र: अकः सवर्णे दीर्घः)
जब ह्रस्व या दीर्घ स्वर (अ, इ, उ) के बाद समान ह्रस्व या दीर्घ स्वर आए, तो दोनों मिलकर दीर्घ (आ, ई, ऊ) हो जाते हैं।
| नियम | संधि विच्छेद | संधि पद |
| अ + अ = आ |
राम + अनुचर
चरण + अमृत
स्वर्ण + अवसर
परम + अर्थ |
रामानुचर
चरणामृत
स्वर्णावसर
परमार्थ |
| अ + आ = आ |
हिम + आलय
नित्य + आनन्द
देव + आलय
रत्न + आकर |
हिमालय
नित्यानन्द
देवालय
रत्नाकर |
| आ + अ = आ |
करुणा + अवतार
तथा + अपि
युवा + अवस्था
विद्या + अर्थी |
करुणावतार
तथापि
युवावस्था
विद्यार्थी |
| आ + आ = आ |
विद्या + आलय
महा + आशय
विद्या + आनन्द
विद्या + आरम्भ |
विद्यालय
महाशय
विद्यानन्द
विद्यारम्भ |
| इ + इ = ई |
रवि + इन्द्र
कवि + इन्द्र
गिरि + इन्द्र
अभि + इष्ट |
रवीन्द्र
कवीन्द्र
गिरीन्द्र
अभीष्ट |
| इ + ई = ई |
कपि + ईश
गिरि + ईश
मुनि + ईश्वर
बुद्धि + ईश |
कपीश
गिरीश
मुनीश्वर
बुद्धीश |
| ई + इ = ई |
मही + इन्द्र
लक्ष्मी + इच्छा |
महीन्द्र
लक्ष्मीच्छा |
| ई + ई = ई |
भारती + ईश्वर
रजनी + ईश
जानकी + ईश |
भारतीश्वर
रजनीश
जानकीश |
| उ + उ = ऊ |
भानु + उदय
सिन्धु + ऊर्मि
कटु + उक्ति
रघु + उत्तम |
भानूदय
सिन्धूर्मि
कटूक्ति
रघूत्तम |
| उ + ऊ = ऊ |
मंजु + उषा
गुरु + उपदेश |
मंजूषा
गुरूपदेश |
| ऊ + उ / ऊ = ऊ |
भू + उपरि
वधू + उल्लास
भू + ऊर्ध्व |
भूपरि
वधूल्लास
भूर्ध्व |
(ख) गुण संधि (सूत्र: आद्गुणः)
यदि अ, आ के बाद इ, ई आए तो ‘ए’; उ, ऊ आए तो ‘ओ’; और ‘ऋ’ आए तो ‘अर्’ हो जाता है।
-
अ/आ + इ/ई = ए:
-
भारत + इन्दु = भारतेन्दु | मृग + इन्द्र = मृगेन्द्र | नर + इन्द्र = नरेन्द्र
-
देव + इन्द्र = देवेन्द्र | प्र + इत = प्रेत | सुर + इन्द्र = सुरेन्द्र
-
महा + इन्द्र = महेन्द्र | नर + ईश = नरेश | गण + ईश = गणेश
-
देव + ईश = देवेश | रमा + ईश = रमेश | महा + ईश्वर = महेश्वर | महा + ईश = महेश
-
-
अ/आ + उ/ऊ = ओ:
-
चन्द्र + उदय = चन्द्रोदय | पर + उपकार = परोपकार | परम + उत्सव = परमोत्सव
-
लोक + उपयोग = लोकोपयोग | महा + उत्सव = महोत्सव | महा + उपदेश = महोपदेश
-
दीर्घ + उपल = दीर्घोपल | नव + ऊढा = नवोढा | गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि | महा + ऊर्जस्वी = महोजस्वी
-
-
अ/आ + ऋ = अर्:
-
सप्त + ऋषि = सप्तर्षि | देव + ऋषि = देवर्षि | महा + ऋषि = महर्षि | राजा + ऋषि = राजर्षि
-
(ग) वृद्धि संधि (सूत्र: वृद्धिरेचि)
यदि अ, आ के बाद ए, ऐ आए तो ‘ऐ’; और ओ, औ आए तो ‘औ’ हो जाता है।
-
अ/आ + ए/ऐ = ऐ:
-
एक + एक = एकैक | सदा + एव = सदैव | तथा + एव = तथैव
-
महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य | देव + ऐश्वर्य = देवेश्वर्य | धर्म + ऐक्य = धर्मैक्य | विश्व + ऐक्य = विश्वैक्य
-
-
अ/आ + ओ/औ = औ:
-
परम + औषधि = परमौषधि | परम + औदार्य = परमौदार्य | महा + ओज = महौज
-
जल + ओघ = जलौघ | जल + ओक = जलौक | महा + औदार्य = महौदार्य | महा + औषधि = महौषधि
-
(घ) यण संधि (सूत्र: इकोऽयणचि)
यदि इ, ई के स्थान पर ‘य्’; उ, ऊ के स्थान पर ‘व्’; और ऋ के स्थान पर ‘र्’ हो जाता है जब कोई भिन्न स्वर आए।
-
इ/ई + भिन्न स्वर = य:
-
यदि + अपि = यद्यपि | इति + अर्थ = इत्यर्थ | अति + अधिक = अत्यधिक | रीति + अनुसार = रीत्यानुसार
-
नदी + अर्पण = नद्यर्पण | देवी + अर्पण = देव्यर्पण | इति + आदि = इत्यादि | अति + आचार = अत्याचार
-
देवी + आलय = देवालय | सखी + आगम = सख्यागम | सरस्वती + आराधना = सरस्वत्याराधना
-
प्रति + उपकार = प्रत्युपकार | उपरि + उक्त = उपर्युक्त | प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर | नि + ऊन = न्यून | वि + ऊह = व्यूह
-
-
उ/ऊ + भिन्न स्वर = व:
-
मधु + अरि = मध्वरि | ऋतु + अन्त = ऋत्वन्त | वधू + अर्थ = वध्वर्थ | भानु + आगमन = भान्वागमन
-
सु + आगत = स्वागत | वधू + आगमन = वध्वागमन | अनु + इष्ट = अन्विष्ट | धातु + इक = धात्विक | अनु + ईक्षण = अन्वीक्षण
-
-
ऋ + भिन्न स्वर = र:
-
पातृ + अंश = पात्रंश | मातृ + अर्थ = मात्रर्थ | पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा | मातृ + आनन्द = मात्रानन्द | भ्रातृ + आनन्द = भ्रात्रानन्द
-
(ङ) अयादि संधि (सूत्र: एचोऽयवायावः)
यदि ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई असमान स्वर आए तो क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् हो जाता है।
-
ए + अ = अय: शे + अन = शयन | ने + अन = नयन
-
ऐ + अ = आय: नै + अक = नायक | सै + अक = सायक | गै + अक = गायक | गै + अन = गायन
-
ओ + अ = अव: भो + अन = भवन | पो + अन = पवन
-
औ + अ = आव: पौ + अक = पावक | स्त्रौ + अ = स्राव | नौ + अ = नाव
2️⃣ व्यंजन संधि (Vyanjan Sandhi)
व्यंजन का व्यंजन से अथवा स्वर से मेल होने पर जो परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं।
🔹 व्यंजन संधि के मुख्य नियम व उदाहरण:
-
वर्ग के प्रथम वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन (क्, च्, ट्, त्, प् ➔ ग्, ज्, ड्, द्, ब्):
-
दिक् + अन्तर = दिगन्तर | दिक् + अम्बर = दिगम्बर | वाक् + ईश्वर = वागीश्वर
-
अच् + अन्तः = अजन्तः | षट् + आनन = षाडानन | सत् + आशय = सदाशय
-
सत् + आनन्द = सदानन्द | जगत् + ईश = जगदीश | उत् + अय = उदय | सुप + अन्त = सुबन्त
-
-
वर्ग के प्रथम वर्ण के सामने 3रा, 4था वर्ण या य, र, व आने पर तीसरा वर्ण होना:
-
वाक् + दत्त = वाग्दत्त | वाक् + जाल = वाग्जाल | भगवत् + भक्ति = भगवद्भक्ति
-
दिक् + गज = दिग्गज | उत् + गम = उद्गम | उत् + योग = उद्योग | सत् + वंश = सद्वंश
-
-
अनुस्वार संबंधी नियम:
-
सम् + आचार = समाचार | एवम् + अस्तु = एवमस्तु | स्वयं + एव = स्वयमेव | सं + हर = संहारा | सं + योग = संयोग
-
-
प्रथम वर्ण का पंचम वर्ण में परिवर्तन (क्, त्, ट् ➔ ङ्, न्, ण्, म्):
-
वाक् + मय = वाङ्ग्मय | जगत् + नाथ = जगन्नाथ | उत् + मत्त = उन्मत्त | षट् + मास = षण्मास | अप + मय = अम्मय
-
-
‘छ’ संबंधी नियम (च का आगम):
-
परि + छेद = परिच्छेद | आ + छादन = आच्छादन | वि + छेद = विच्छेद | स्व + छन्द = स्वच्छन्द | वृक्ष + छाया = वृक्षच्छाया
-
-
म् संबंधी नियम (पंचम वर्ण / अनुस्वार):
-
सम् + गति = संगति | सम् + ताप = सन्ताप | सम् + यम = संयम | सम् + सार = संसार | सम् + पूर्ण = सम्पूर्ण
-
-
‘त’ संबंधी विशेष नियम (च, ज, ट, ड, ल में बदलना):
-
शरत् + चन्द्र = शरच्चन्द्र | सत् + छात्र = सच्छात्र | सत् + जन = सज्जन | उत् + चारण = उच्चारण
-
उत् + ज्वल = उज्ज्वल | उत् + डयन = उड्डयन | तत् + टीका = तट्टीका | उत् + उल्लंघन = उल्लंधन | उत् + लास = उल्लास
-
-
‘त्’ + ‘ह’ ➔ ‘द्’ + ‘ध’:
-
उत् + हार = उद्धार | उत् + हरण = उद्धरण | प्राक् + हरण = प्राग्रहरण | वाक् + हरि = वाग्हरि
-
-
‘त्’ + ‘श’ ➔ ‘च्’ + ‘छ’:
-
उत् + श्वास = उच्छ्वास | सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र | उत् + शृंखल = उच्छृंखल | उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट
-
-
स्रष्ट/ष संबंधी नियम:
-
आकृष्ट + त = आकृष्ट | उत्कृष्ट + त = उत्कृष्ट | षष् + थ = षष्ठ | इष + त = इष्ट
-
परिणामादि: राम + अयन = रामायण | भू + षन = भूषण | भर + अन = भरण | प्र + मान = प्रमाण
-
-
अतिरिक्त व्यंजन संधि उदाहरण:
-
शरद् + मुख = शरन्मुख | श्रीमत् + नाम = श्रीमन्नाम | हनुमत् + नाटक = हनुमाननाटक | क्षुद् + पिपासा = क्षुत्पिपासा | सृष् + ति = सृष्टि
-
3️⃣ विसर्ग संधि (Visarga Sandhi)
विसर्ग ( : ) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं।
🔹 विसर्ग संधि के नियम व उदाहरण:
-
अ + विसर्ग + अ ➔ ‘ओ’ (और बाद वाले अ का लोप):
-
मनः + अनुकूल = मनोनुकूल | तेजः + असि = तेजोसि | प्रथमः + अध्याय = प्रथमोध्याय
-
-
विसर्ग का ‘ओ’ होना (वर्ग का 3रा, 4था वर्ण या य, र, ल, व, ह आने पर):
-
यशः + गान = यशोगान | अधः + गति = अधोगति | यशः + घोष = यशोधोष | मनः + बल = मनोबल
-
मनः + भाव = मनोभाव | मनः + योग = मनोयोग | वयः + वृद्ध = वयोवृद्ध | मनः + हर = मनोहर
-
तमः + गुण = तमोगुण | सरः + रुह = सरोरुह | मनः + राज्य = मनोराज्य | पयः + द = पयोद
-
सरः + ज = सरोज | तेजः + मय = तेजोमय | तपः + धन = तपोधन | मनः + मन = मनोमन
-
-
विसर्ग का ‘श, ष, स’ होना:
-
पुनः + च = पुनश्च | मनः + ताप = मनस्ताप | धनुः + टंकार = धनुष्टंकार
-
निः + चल = निश्चल | निः + चय = निश्चय | निः + छल = निश्छल | निः + तेज = निस्तेज | दुः + तर = दुस्तर
-
-
विसर्ग का ‘र’ होना (इ, उ के बाद विसर्ग):
-
निः + जर = निर्जन | निः + झार = निर्झर | निः + गुण = निर्गुण | दुः + गुण = दुर्गुण
-
दुः + जन = दुर्जन | निः + भय = निर्भय | बहिः + मुख = बहिर्मुख | निः + आशा = निराशा
-
दुः + उपयोग = दुरुपयोग | दुः + भाग्य = दुर्भाग्य | शिरः + रुह = शिरोरुह | ज्योतिः + लोक = ज्योतिर्लोक
-
-
विसर्ग यथावत रहना (क, ख, प, फ आने पर):
-
अन्तः + करण = अन्तःकरण | प्रातः + काल = प्रातःकाल | रजः + कण = रजःकण | दुःख = दुःख
(अपवाद: नमः + कार = नमस्कार, पुरः + कार = पुरस्कार)
-
-
विसर्ग का लोप व दीर्घ स्वर (र आने पर):
-
अतः + एव = अतएव | निः + रव = नीरव | निः + रोग = नीरोग | निः + रस = नीरस
-
-
विसर्ग का ‘ष’ होना (इ, उ + क, ट, प, फ):
-
दुः + काल = दुष्काल | निः + कपट = निष्कपट | निः + कलंक = निष्कलक | निः + पाप = निष्पाप | चतुः + पथ = चतुष्पथ
-
💡 विशेष — हिंदी की अपनी निजी संधियां (Hindi Language Own Sandhi)
संस्कृत नियमों के अतिरिक्त हिंदी भाषा में बोलचाल और संक्षेपण के लिए कुछ स्वतंत्र नियम विकसित हुए हैं:
-
ह्रस्वीकरण (छोटा स्वर होना):
-
हाथ + हाथ = हाथोंहाथ | पानी + घाट = पनघट | घोड़ा + सवार = घुड़सवार | घोड़ा + दौड़ = घुड़दौड़
-
काठ + पुतली = कठपुतली | दो + गुना = दुगुना | लड़का + पन = लड़कपन
-
-
वर्ण का लोप या आगम:
-
बहन + ओई = बहनोई | साँप + एरा = सपेरा | कुछ + एक = कुछेक | हर + एक = हरेक
-
यहाँ + ही = यहीं | वहाँ + ही = वहीं | कहाँ + ही = कहीं | कब + ही = कभी
-
जब + ही = जभी | तब + ही = तभी | अब + ही = अभी
-
-
प्रत्यय आधारित संधि:
-
सुर + ईला = सुरीला | चमक + ईला = चमकीला | बूढ़ा + इया = बुढ़िया | खाट + इया = खटिया
-
एक + तीस = इकतीस | एक + एला = अकेला | जो + ऐसा = जैसा | किस + ही = किसी
-
दीन + नाथ = दीनानाथ | रात + रात = रातोंरात | दिन + दिन = दिनोंदिन | मार + मार = मारामार
-
डाक + घर = डाकघर (बोलने में डाघर) | पात + झड़ = पतझड़
-
🎯 परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण संधि विच्छेद
| शब्द | संधि विच्छेद | संधि का नाम |
| व्यथाक्रांत | व्यथा + आक्रांत | दीर्घ स्वर संधि |
| महैन्द्रजालिक | महा + ऐन्द्रजालिक | वृद्धि स्वर संधि |
| व्यावर्तन | वि + आवर्तन | यण स्वर संधि |
| पर्याकुल | परि + आकुल | यण स्वर संधि |
| शरण्मुख | शरद् + मुख | व्यंजन संधि |
| सृष्टि | सृष् + ति | व्यंजन संधि |
| शिरोरुह | शिरः + रुह | विसर्ग संधि |
| ज्योतिर्लोक | ज्योतिः + लोक | विसर्ग संधि |
| वक्त्रिच्छा | वक्तृ + इच्छा | यण स्वर संधि |
| शुद्धोदन | शुद्ध + ओदन | वृद्धि स्वर संधि |
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. संधि और समास में क्या अंतर है?
-
उत्तर: संधि दो वर्णों/ध्वनियों का मेल है, जबकि समास दो शब्दों/पदों का मेल होता है।
Q2. स्वर संधि के कितने भेद होते हैं?
-
उत्तर: स्वर संधि के 5 भेद होते हैं — दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण और अयादि संधि।
Q3. ‘इत्यादि’ शब्द का संधि विच्छेद क्या होगा?
-
उत्तर: ‘इत्यादि’ का सही संधि विच्छेद इति + आदि होगा और इसमें यण स्वर संधि है।