साहित्यशास्त्र और नाट्यशास्त्र में ‘वृत्ति’ का स्वरूप और प्रकार
भारतीय नाट्यशास्त्र और काव्यशास्त्र में ‘वृत्ति’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। ‘वृत्ति’ शब्द का मूल अर्थ व्यवहार, व्यापार या जीवन की सहायक जीविका से है। आचार्य भरतमुनि के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ के 22वें अध्याय में वृत्ति का सर्वप्रथम और विस्तृत वर्णन मिलता है।
‘वृत्ति’ शब्द की उत्पत्ति और अर्थ
‘वृत्ति’ शब्द की उत्पत्ति ‘वृत्’ धातु एवं ‘क्तिन्’ प्रत्यय के योग से हुई है। विभिन्न आचार्यों ने इसके अलग-अलग अर्थ बताए हैं:
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सामान्य अर्थ: जीवन की सहायक जीविका या व्यवहार।
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आनंदवर्धन के अनुसार: व्यवहार या व्यापार।
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अभिनवगुप्त के अनुसार: वृत्ति को ‘पुरुषार्थ साधक व्यापार’ कहा गया है।

वृत्ति के भेद
साहित्यशास्त्र और नाट्यशास्त्र के अंतर्गत वृत्तियों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है—काव्यवृत्ति और नाट्यवृत्ति।
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काव्यवृत्ति: इसके अंतर्गत उपनागरिका, परुषा एवं कोमला वृत्तियाँ आती हैं।
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नाट्यवृत्ति: नाट्यशास्त्र में वृत्तियों के चार प्रमुख प्रकार बताए गए हैं। आचार्य भरतमुनि ने नाट्यवृत्तियों को ‘काव्य की माता’ की संज्ञा दी है।
नाट्यवृत्तियों के चार प्रकार
नाट्यशास्त्र में वर्णित चारों वृत्तियों का स्वरूप और उनका प्रयोग निम्नलिखित रसों और संदर्भों में होता है:
1. भारती वृत्ति
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संबंधित रस: करुण एवं अद्भुत रस।
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विशेषता: यह वृत्ति केवल पुरुषों द्वारा ही प्रयुक्त होती है। इसमें संस्कृत वाणी का बाहुल्य होता है।
2. सात्त्वती वृत्ति
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संबंधित रस: वीर, अद्भुत एवं रौद्र रसों में इसकी प्रधानता होती है; साथ ही अल्पांश में करुण और शृंगार रस में भी इसका प्रयोग होता है।
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विशेषता: इसमें सत्त्वगुण की प्रधानता होती है। इसका प्रयोग सत्त्वशाली पुरुष करते हैं, इसलिए इसे ‘सात्त्वती’ कहा गया है। इसमें हर्ष का समावेश होता है।
3. कौशिकी वृत्ति
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संबंधित रस: शृंगार एवं हास्य रस।
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विशेषता: यह वृत्ति सुंदर नेपथ्य के विधान से चित्रित, सुंदर वेशभूषा युक्त, स्त्रियों से युक्त, नाच-गान की बहुलता से संपन्न और कामोपभोग के उपकरणों से परिपूर्ण होती है। इस वृत्ति का संबंध मुख्य रूप से केश से है।
4. आरभटी वृत्ति
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संबंधित रस: बीभत्स, भयानक एवं रौद्र रस।
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विशेषता: इसका उद्भव ‘अरभट’ शब्द से माना जाता है, जिसका अर्थ साहसी या उद्धत पुरुष से है। इसमें मायायुक्त इंद्रजाल का वर्णन, गिरना, कूदना, लाँघना इत्यादि क्रियाओं और योजनाओं का समावेश होता है।
निष्कर्ष
संक्षेप में कहा जाए तो ‘वृत्ति’ केवल शब्दों या अभिनय का ढाँचा नहीं है, बल्कि यह नाटक और काव्य के आंतरिक भावों, रसों और पात्रों के मनोभावों को जीवंत करने वाला एक आवश्यक नाट्यशास्त्रीय व्यापार है।
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