विद्यापति के प्रसिद्ध पद: व्याख्या, अर्थ और काव्यगत सौंदर्य
हिंदी साहित्य के आदिकाल एवं भक्तिकाल के संधि-युग के महान कवि और ‘मैथिल कोकिल’ के रूप में प्रसिद्ध महाकवि विद्यापति (Vidyapati) की पदावलियाँ हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। विद्यापति भक्त कवि भी हैं और शृंगारिक कवि भी। आपकी पाठ्य सामग्री में दी गई विद्यापति की दो अत्यंत प्रसिद्ध पंक्तियों (पदों) की सप्रसंग व्याख्या, अर्थ और काव्यगत सौंदर्य नीचे प्रस्तुत किया गया है। आप इन्हें अपनी वेबसाइट पर अलग-अलग या एक साथ उपयोग कर सकते हैं।
📌 विद्यापति का भक्ति-प्रधान पद (व्याख्या और अर्थ)
मूल पद:
1. विद्यापति का भक्ति-प्रधान पद
तातल सैकत वारि-बिन्दु सम सुत-मित रमिति समाज।
तोहे बिसारि मन ताहे समरपिअ अब मज्जु हब कोने साज।।
तुहूँ जगतरण दीन-दयामय अबए तोअर बिसबासा।
आध जनम हम नींद गमायनु जरा सिसुकत दिन गेला।
निघुबन-रमनि-रमण-रंग मातनु तोहे भजब कोन बेला।।
कत चतुरानन मरि-मरि जाओब न तुहूँ आदि अवसाना।
तोहे जनमि पुनि तोहे समाओत सागर लहरी समाना।।
भनइ विद्यापति सोच समन भय तुहूँ बिनु गति नहिं आरा।
आदि-अनादि नाथ कहा ओसि अब तारन भार तोहारा।।
प्रसंग:
यह पद ‘विद्यापति-पदावली’ से गृहीत है। इस पद में कवि विद्यापति ने अपनी हीन और असहाय अवस्था का वर्णन करते हुए स्वयं को भवसागर से उद्धार करने का निवेदन ईश्वर से किया है।
सप्रसंग व्याख्या:
कवि विद्यापति कहते हैं कि— हे प्रभु! इस जगत् में पुत्र, मित्र, स्त्री आदि के सामाजिक सम्बन्ध उसी प्रकार अस्थायी और क्षणभंगुर हैं, जैसे तपती हुई बालू (रेत) पर जल की एक बूँद तुरंत सूख जाती है। मैंने आपको भूलकर ऐसे क्षणभंगुर समाज को ही अपने मन को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। अब इन पुत्र, स्त्री, मित्र आदि का क्षणिक मोह छूट गया है; किंतु अब मेरा आगे का कार्य कैसे पूरा होगा? अब मेरा क्या होगा? क्योंकि अब तक मैं व्यर्थ के निष्फल कार्यों में ही लिप्त रहा हूँ।
हे माधव! अब मुझे कुछ भी फल मिलने वाला नहीं है। अब मैं परिणाम की ओर से पूर्णतः निराश हूँ। मैंने अपना आधा जीवन तो सोकर गँवा दिया है और बुढ़ापा तथा बाल्यावस्था के भी दिन वैसे ही चले गए क्योंकि शैशव तो अज्ञान में ही कट गया और वृद्धपण में शरीर असमर्थ-सा हो गया है। इससे पहले यौवन के दिन मैंने युवतियों के साथ राग-रंग में मदमस्त होकर व्यतीत कर दिए। आपका भजन कब, किस समय करता?
हे प्रभु, आप अनादि हैं। अनेक सृष्टियों की उत्पत्ति और उनका जन्म और नाश होता रहता है परंतु आपका न तो जन्म होता है और न ही अंत। ये सारी सृष्टियाँ आप ही से उत्पन्न होती हैं और आप ही में तिरोहित हो जाती हैं; ठीक उसी प्रकार, जैसे सागर में उत्पन्न होने वाली लहरें सागर में ही विलीन हो जाती हैं। विद्यापति कहते हैं कि काल के भय से छुटकारा दिलाने वाले हे प्रभु! आपके बगैर मेरी अन्यत्र कहीं गति नहीं है। आप ही मेरे एकमात्र उद्धारक हैं। आप ही प्रभु सृष्टि के आदि कारण हैं, आप ही अनादि अनंत हैं। मुझे भवसागर से पार करने का उत्तरदायित्व आप पर ही है, अतः आप मेरा उद्धार करें।
विशेष / काव्यगत सौंदर्य:
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वृद्धावस्था का चित्रण: कवि ने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपनी लाचारी और आत्मग्लानि का सुंदर चित्रण किया है।
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क्षणभंगुरता का बोध: संसार के संबंधों को ‘तातल सैकत वारि-बिन्दु सम’ (तपती रेत पर जल की बूँद) के समान क्षणभंगुर बताया गया है।
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ईश्वर के प्रति समर्पण: जीव का अहंकार मिटने के बाद उसका संपूर्ण समर्पण ईश्वर के प्रति हो जाता है, यही इस पद का मूल भाव है।
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अलंकार: उपमा, पुनरुक्तिप्रकाश एवं दृष्टांत अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है।
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रस एवं स्थायी भाव: इस पद में शांत रस की प्रधानता है और इसका स्थायी भाव ‘निर्वेद’ है।
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भाषा: पदावली की भाषा मैथिली है।
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