अपह्नुति अलंकार के उदाहरण, अर्थ एवं परिभाषा (Apahnuti Alankar ke Udaharan)
हिंदी काव्यशास्त्र और व्याकरण में ‘अपह्नुति’ का शाब्दिक अर्थ ‘छिपाना’ होता है। इस अलंकार में ‘नहीं’ या अन्य निषेधात्मक शब्दों का प्रयोग करके उपमेय (प्रस्तुत) का निषेध किया जाता है तथा उपमान (अप्रस्तुत) पर उसका आरोप किया जाता है। अर्थात, इस अलंकार में किसी वस्तु या तथ्य को छिपाकर उसके स्थान पर दूसरी वस्तु या कथन की स्थापना की जाती है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT) की दृष्टि से इसके उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
📌 अपह्नुति अलंकार के महत्वपूर्ण उदाहरण (Apahnuti Alankar Examples)
1. ‘अंग-अंग जारत अरि, तीखन ज्वाला जाल। सिंध उठी बड़वाग्नि यह, नहीं इंदु भव-भाल।।’
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काव्य पंक्ति:
अंग-अंग जारत अरि, तीखन ज्वाला जाल।
सिंध उठी बड़वाग्नि यह, नहीं इंदु भव-भाल।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: शत्रु के अंगों को जलाने वाला यह तीखा ज्वालाओं का जाल समुद्र की बड़वाग्नि (समुद्र की आग) है, भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित होने वाला चंद्रमा (इंदु) नहीं है।
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स्पष्टीकरण: यहाँ शिवजी के मस्तक पर स्थित चंद्रमा (उपमेय) का निषेध करके उस पर बड़वाग्नि या तेज अग्नि (उपमान) का आरोप किया गया है, अतः यहाँ शुद्धपह्नुति अलंकार है।
2. ‘आज देख घनश्याम छटा को मन में मग्न हुई। मिले कहाँ सखि ? श्याम? मेघ को मैंने बात कहिं।।’
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काव्य पंक्ति:
आज देख घनश्याम छटा को मन में मग्न हुई।
मिले कहाँ सखि ? श्याम? मेघ को मैंने बात कहिं।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: सखि कहती है कि आज घनश्याम (कृष्ण) की छटा देखकर मेरा मन मग्न हो गया, लेकिन हे सखि! वे श्याम मुझे कहाँ मिले? मैंने तो अपनी बात काले बादलों (मेघ) से कही थी।
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स्पष्टीकरण: यहाँ कृष्ण से मिलने की बात का निषेध कर उसे बादलों (मेघ) तक सीमित करने और छिपाने का भाव होने के कारण अपह्नुति अलंकार है।
3. ‘ओस बिंदु के मिस रजनी भी दुख के आंसू गिरा रही।’
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काव्य पंक्ति:
ओस बिंदु के मिस रजनी भी दुख के आंसू गिरा रही।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: सुबह पत्तों पर दिखने वाली ओस की बूंदें वास्तव में ओस नहीं हैं, बल्कि उनके बहाने रात्रि (रजनी) स्वयं अपने दुख के आँसू गिरा रही है।
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स्पष्टीकरण: यहाँ ‘मिस’ (ब्याज/छल) शब्द का प्रयोग करके ओस की बूंदों के वास्तविक रूप को छिपाकर उन पर दुख के आँसुओं का आरोप किया गया है।
4. ‘गरजता चरणप्रांत पर सिंह, वह नहीं सिंधु।’
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काव्य पंक्ति:
गरजता चरणप्रांत पर सिंह, वह नहीं सिंधु।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: चरणों के समीप गरजने वाला वह कोई साधारण सिंह नहीं है, बल्कि वह तो साक्षात समुद्र (सिंधु) है।
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स्पष्टीकरण: यहाँ गरजने वाले प्राणी को सिंह मानने के स्थान पर ‘नहीं’ शब्द के प्रयोग से उसका निषेध करके ‘सिंधु’ (समुद्र) का आरोप किया गया है।
5. ‘जाहिर बाटन से अति तेज, क्या सखि साजन? नहीं अंग्रेज।’
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काव्य पंक्ति:
जाहिर बाटन से अति तेज, क्या सखि साजन? नहीं अंग्रेज।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: बातचीत करने और प्रहार करने में जो अत्यधिक तेज है, क्या वह कोई सजन (प्रेमी या अपना आदमी) है? नहीं, वह तो कोई अंग्रेज है।
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स्पष्टीकरण: यहाँ अपने प्रिय या सजन होने की संभावना का निषेध करके उस पर ‘अंग्रेज’ होने का आरोप किया गया है, अतः यहाँ अपह्नुति अलंकार है।
6. ‘मुख नहीं चन्द्र है।’
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काव्य पंक्ति:
मुख नहीं चन्द्र है।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: यह चेहरा या मुख नहीं है, बल्कि साक्षात चंद्रमा है।
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स्पष्टीकरण: यहाँ मुख (उपमेय) का निषेध करके चंद्र (उपमान) की स्थापना की गई है, जो अपह्नुति का सरलतम रूप है।
7. ‘बंधु न होय मोर यह काला।’
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काव्य पंक्ति:
बंधु न होय मोर यह काला।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: यह मेरा कोई साधारण भाई (बंधु) नहीं है, बल्कि यह तो साक्षात काल है।
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स्पष्टीकरण: उपर्युक्त पंक्ति में ‘बंधु’ उपमेय का निषेध कर उसमें ‘काल’ उपमान का आरोप किया गया है, अतः यह शुद्धपह्नुति अलंकार का उदाहरण है।
8. ‘यह भयद भुजंगिनी, न होय करवाल। प्राण-पवन भखि अरिन के, होत नितांत निहाल।’
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काव्य पंक्ति:
यह भयद भुजंगिनी, न होय करवाल।
प्राण-पवन भखि अरिन के, होत नितांत निहाल।।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: यह कोई डरावनी सर्पिणी (भुजंगिनी) नहीं है, बल्कि तलवार (करवाल) है, जो शत्रुओं के प्राण रूपी पवन को खाकर अत्यंत प्रसन्न होती है।
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स्पष्टीकरण: प्रथम इसमें करवाल (तलवार) का निषेध कर उसमें भयद भुजंगिनी (सर्पिणी) का आरोप किया गया है और साथ ही यह हेतु (कारण) भी दिया गया है कि जिस प्रकार सर्पिणी पवन-भक्षण करती है, वैसे ही यह तलवार भी प्राण हरती है। अतः यह हेतुपह्नुति अलंकार का सुंदर उदाहरण है।
9. ‘पहले आँखों में थे, मानस में कूद मग्न प्रिय अब थे। छींटे वहीं उड़े थे, बड़े-बड़े अश्रु वे कब पड़े थे?’
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काव्य पंक्ति:
पहले आँखों में थे, मानस में कूद मग्न प्रिय अब थे।
छींटे वहीं उड़े थे, बड़े-बड़े अश्रु वे कब पड़े थे?
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काव्य पंक्ति का अर्थ: वे प्रियतम पहले आँखों में थे और अब मन (मानस) में मग्न हो गए हैं। ये तो वहीं से उड़े हुए पानी के छींटे हैं, इन्हें बड़े-बड़े आँसू कब कहा जा सकता है?
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स्पष्टीकरण: उपर्युक्त छंद में प्रथम तो उपमेय (आँसुओं) का निषेध करके उनके स्थान पर मानस से उछले हुए पानी के छींटों को उपमान रूप में आरोपित किया गया है। तदुपरांत इसके हेतु की कल्पना की गई है कि प्रियतम मानस में कूद पड़े हैं, जिसके कारण छींटे आँखों पर झलक रहे हैं। अतः यह हेतुपह्नुति अलंकार है।
10. ‘है न सुधा यह, है सुधा संगति साधु समाज।’
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काव्य पंक्ति:
है न सुधा यह, है सुधा संगति साधु समाज।
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काव्य पंक्ति का अर्थ: यह साधारण अमृत (सुधा) नहीं है, बल्कि साधु-संतों के समाज की संगति ही वास्तविक अमृत है।
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स्पष्टीकरण: उपर्युक्त पंक्ति में ‘सुधा’ (अमृत) में सुधात्व (अमृतत्व का गुण) न मानकर, अर्थात् उसमें उसका निषेध कर ‘साधु संगति’ में उसका आरोप किया गया है, जो वस्तु का पर्येस्त (अन्य स्थान पर आक्षिप्त) रूप है। अतः यहाँ पर्येस्तापह्नुति अलंकार हुआ।
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