इस आर्टिकल में हिंदी साहित्य इतिहास(Hindi Sahitya itihas) के अंतर्गत आचार्य शुक्ल के महत्वपूर्ण कथन(ramchandra shukla ke kathan) दिए गए है। इस टॉपिक से संबंधित प्रश्न हर एग्जाम में पूछे जाते है ।
आचार्य शुक्ल के महत्वपूर्ण कथन
आदिकाल
• आधुनिककाल में गद्य का आविर्भाव सबसे प्रधान साहित्यिक घटना है।
• एक ही काल और एक ही कोटि की रचना के भीतर जहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की परंपराएँ चली हुई पाई गई हैं, वहाँ अलग-अलग शाखाएँ करके सामग्री का विभाग किया गया है। जैसे भक्तिकाल के भीतर पहले तो दो काव्यधाराएँ निर्गुण धारा और सगुण धारा निर्दिष्ट की गई हैं। फिर प्रत्येक धारा की दो-दो शाखाएँ स्पष्ट रूप से लक्षित हुई हैं- निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी शाखा और प्रेममार्गी (सूफी) शाखा तथा सगुण धारा की रामभक्ति शाखा और कृष्णभक्ति शाखा।
• कवियों के परिचयात्मक विवरण मैंने प्रायः ‘मिश्रबंधु विनोद’ से ही लिये हैं।
• जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही ‘साहित्य का इतिहास’ कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है।
• दूसरी विशेषता विद्यापति के अपभ्रंश की यह है कि प्रायः देशभाषा कुछ अधिक लिये हुए है और उसमें तत्सम, संस्कृत शब्दों का वैसा बहिष्कार नहीं है।
• ये ही दो बातें दिखाने के लिए इस इतिहास में सिद्धों और योगियों का विवरण दिया गया है। उनकी रचनाओं का जीवन की स्वाभाविक सरणियों, अनुभूतियों और दशाओं से कोई संबंध नहीं। वे सांप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, अतः शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आ सकती। उन रचनाओं की परंपरा को हम काव्य या साहित्य की कोई धारा नहीं कह सकते।
• गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिद्धों का लीला क्षेत्र भारत का पूरबी भाग था। गोरख ने अपने ग्रंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों में राजपूताने और पंजाब में किया।
• वज्रयान में आकर ‘महासुखवाद’ का प्रवर्तन हुआ। प्रज्ञा और उपाय के योग से इस महासुख दशा की प्राप्ति मानी गई। इसे आनंदस्वरूप ईश्वरत्व ही समझिए। निर्वाण के तीन अवयव ठहराए गए शून्य, विज्ञान और महासुख।
• गोरखनाथ की हठयोग साधना ईश्वरवाद को लेकर चली थी, अतः उसमें मुसलमानों के लिए भी आकर्षण था। ईश्वर से मिलानेवाले योग हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए एक सामान्य साधना के रूप में आगे रखा जा सकता है।
रासो साहित्य :
• ये वीरगाथाएँ दो रूपों में मिलती हैं- प्रबंधकाव्य के साहित्यिक रूप में और वीरगीतों (बैलाड्स) के रूप में। साहित्यिक प्रबंध के रूप में जो प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध है, वह है ‘पृथ्वीराजरासो’। वीरगीत के रूप में हमें सबसे पुरानी पुस्तक ‘बीसलदेवरासो’ मिलती है।
बीसलदेवरासो
• भाषा की परीक्षा करके देखते हैं तो वह साहित्यिक नहीं है, राजस्थानी है।
• ‘बीसलदेवरासो’ में काव्य के अर्थ में ‘रसायण’ शब्द बार-बार आया है। अतः हमारी समझ में इसी ‘रसायण’ शब्द से होते-होते ‘रासो’ हो गया है।
• इस ग्रंथ में श्रृंगार की ही प्रधानता है, वीररस किंचित् आभास मात्र है।
• यह (बीसलदेवरासो) घटनात्मक काव्य नहीं है, वर्णनात्मक है।
• अतः छोटी सी पुस्तक को बीसलदेव ऐसे वीर का ‘रासो’ कहना खटकता है। पर जब हम देखते हैं कि यह कोई काव्य ग्रंथ नहीं है, केवल गाने के लिए इसे रचा गया था, तो बहुत कुछ समाधान हो जाता है।
पृथ्वीराजरासो
• इस संबंध में इसके अतिरिक्त और कुछ कहने की जगह नहीं कि यह पूरा ग्रंथ वास्तव में जाली है।
• भाषा की कसौटी पर यदि ग्रंथ को कसते हैं, तो और भी निराश होना पड़ता है क्योंकि यह बिल्कुल बेठिकाने है उसमें व्याकरण आदि की कोई व्यवस्था नहीं है।
• ये हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराजरासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य है।
• इस दशा में भाटों के इस वाग्जाल के बीच कहाँ पर कितना अंश असली है, इसका निर्णय असंभव होने के कारण यह ग्रंथ न तो भाषा के इतिहास के और न साहित्य के इतिहास के जिज्ञासुओं के काम का है।
• प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा रासो में वर्णित घटनाओं तथा संवतों को बिल्कुल भाटों की कल्पना मानते हैं।
• बात संवत् की ही नहीं है। इतिहासविरूद्ध कल्पित घटनाएँ, जो भरी पड़ी हैं उनके लिए क्या कहा जा सकता है? माना कि रासो इतिहास नहीं है, काव्यग्रंथ है। पर काव्यग्रंथों में सत्य घटनाओं में बिना किसी प्रयोजन कोई उलट-फेर नहीं किया जाता।
परमालरासो
• इसमें पंडितों और विद्वानों के हाथ इसकी रक्षा की ओर नहीं बढ़े, जनता ही के बीच इसकी गूँज बनी रही-पर यह गूँज मात्र है, मूल शब्द नहीं। आल्हा का प्रचार यों तो सारे उत्तर भारत में है, पर बैसवाड़ा इसका केंद्र माना जाता है, वहाँ इसे गानेवाले बहुत अधिक मिलते हैं। बुंदेलखंड में-विशेषतः महोबा के आसपास भी इसका चलन बहुत है।
• वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था, जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमशः सारे उत्तरी भारत में विशेषतः उन सब प्रदेशों में जो कन्नौज साम्राज्य के अंतर्गत थे हो गया।
प्रकरण-4 (फुटकल रचनाएँ)
• जैसे पुराना चावल ही बड़े आदमियों के खाने योग्य समझा जाता है वैसे ही अपने समय से कुछ पुरानी पड़ी हुई परंपरा के गौरव से युक्त भाषा ही पुस्तक रचनेवालों के व्यवहार योग्य समझी जाती थी।
अमीर खुसरो
• अतः यह धारणा होती है कि खुसरो के समय बोलचाल की स्वाभाविक भाषा घिसकर बहुत कुछ उसी रूप में आ गई थी, जिस रूप में खुसरो में मिलती है। कबीर की अपेक्षा खुसरो का ध्यान बोलचाल की भाषा की ओर अधिक था। खुसरो का लक्ष्य जनता का मनोरंजन था पर कबीर धर्मोपदेशक थे।
• ये बड़े ही विनोदी, मिलनसार और सहृदय थे, इसी से जनता की सब बातों में पूरा योग देना चाहते थे। इनकी पहेलियाँ और मुकरियाँ प्रसिद्ध हैं। इनमें उक्तिवैचित्र्य की प्रधानता थी, यद्यपि कुछ रसीले गीत और दोहे भी इन्होंने कहे हैं।
विद्यापति
• हिंदी साहित्य के इतिहास की एक विशेषता यह भी रही कि एक विशिष्ट काल में किसी रूप की जो काव्यसरिता वेग से प्रवाहित हुई, वह यद्यपि आगे चलकर मंद गति से बहने लगी, पर 900 वर्षों के हिंदी साहित्य के इतिहास में हम उसे कभी सर्वथा सूखी हुई नहीं पाते।
• आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ‘गीतगोविंद’ के पदों को आध्यात्मिक संकेत बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी।
• जिस प्रकार हिंदी साहित्य ‘बीसलदेवरासो’ पर अपना अधिकार रखता है उसी प्रकार विद्यापति की पदावली पर भी। विद्यापति के पद अधिकतर श्रृंगार के ही हैं, जिनमें नायिका और नायक राधा-कृष्ण हैं। इन पदों की रचना जयदेव के गीतकाव्य के अनुकरण पर ही शायद की गई हो। इनका माधुर्य अद्भुत है। विद्यापति शैव थे। उन्होंने इन पदों की रचना श्रृंगार काव्य की दृष्टि से की है, भक्त के रूप में नहीं। विद्यापति को कृष्णभक्तों की परंपरा में न समझना चाहिए।
निष्कर्ष :
इस आर्टिकल में आचार्य शुक्ल के महत्वपूर्ण कथन जो कि शुक्ल जी की मूल पुस्तक से संग्रहित किए गए है आप इन्हें अच्छे से याद कर लेंवे।
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