काव्यशास्त्र

साधारणीकरण से आप क्या समझते हैं ?

अंतिम संशोधित (Last Updated): August 17, 2026

साधारणीकरण से आप क्या समझते हैं (Sadharanikaran Se Aap Kya Samajhte Hain): आज के आर्टिकल में हम हिंदी साहित्य के अन्तर्गत साधारणीकरण के बारे में जानकारी शेयर करेंगे।

साधारणीकरण से आप क्या समझते हैं ?

साधारणीकरण का अर्थ है – असाधारण का साधारण या विशेष का निर्विशेष हो जाना। साधारणीकरण का सर्वप्रथम प्रयोग भट्टनायक ने रसनिष्पत्ति संबंधी भरत के रससूत्र (विभावानुभावव्यभिचारीसंयोगा द्रसनिष्पत्ति:’) के अंतर्गत किया था।

भट्टनायक के अनुसार – जब पाठक अथवा दर्शक काव्य या नाटक के अभिधार्थ को ग्रहण कर लेता है, तब उसके हृदय में भावकत्व शक्ति के द्वारा सत्त्व की प्रधानता होती है; तब उसके हृदय में ‘मैं’ और ‘पर’ का द्वैध दूर हो जाता है। वह भोजकत्व शक्ति के द्वारा उद्बुद्ध भावों का रसास्वादन करता है। यह स्थिति-विशेष जिस व्यापार से संभव होती है उसे साधारणीकरण कहते हैं। वस्तुतः, काव्य या नाटक पढ़ते अथवा देखते वक्त पाठक और श्रोता उसके अनुरूप आचरण करने लगता है, उसमें ‘मैं’ और ‘पर’ का भेद समाप्त हो जाता है, उसे ही साधारणीकरण कहते हैं।

नंददुलारे वाजपेयी ने ‘समस्त काव्य व्यापार का साधारणीकरण’ माना है तो डॉ. नगेन्द्र ने कवि की अनुभूति का साधारणीकरण माना है और केशव प्रसाद मिश्र ने सहृदय की चेतना का।

वस्तुतः साधारणीकरण कवि की अनुभूति का ही होता है। कवि की अनुभूतियाँ सहृदयों की अनुभूतियाँ बन जाती हैं। संपूर्ण मानवता एक चेतना से चैतन्य होने के कारण ऐसा होता है।

  • अभिनवगुप्त ने भट्टनायक के भावकव्य एवं भोजकत्व शक्ति को अस्वीकार कर वासना को स्वीकृति दी और स्थायी भाव का साधारणीकरण माना।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल – साधारणीकरण आलंबनत्व धर्म का होता है।
  • जगन्नाथ ने साधारणीकरण के स्थान पर दोषदर्शन की चर्चा की।

साधारणीकरण क्या होता है?

असाधारण का साधारण और विशेष से सामान्य हो जाना। कवि और पाठक की चित्तवृत्तियों का एकलय हो जाना। इस सिद्धान्त के अनुसार साहित्य के पठन, श्रवण अथवा दर्शन द्वारा सामाजिक (सहृदय) रससिक्त होकर साहित्य-भूमि में लीन हो जाता है, वह अपनी भौतिक स्थिति से शून्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह रंगमंच पर स्थित नायिका या किसी पात्र को देखकर कथा के अनुरूप भावों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। रंगमंच पर हो रहे उद्योग उसे सहज और सामान्य लगने लग जाते हैं — बालकृष्ण की चेष्टाओं में उसे अपनी संतान की क्रीड़ाएँ नज़र आने लगती हैं। ऐसी स्थिति में रंगमंच पर स्थित पात्रों का विशेषत्व समाप्त होकर वे सामान्य के धरातल पर आ पहुँचते हैं, यही साधारणीकरण है।

काव्यशास्त्र में ‘साधारणीकरण’ शब्द का प्रयोग ‘रसनिष्पत्ति’ के सन्दर्भ में हुआ है। इसका सर्वप्रथम प्रयोग भट्टनायक (10वीं शती ई.) ने रस-निष्पत्ति सम्बन्धी भरतमुनि के रस-सूत्र की व्याख्या के अन्तर्गत किया है। (भट्टनायक के भुक्तिवाद का रस-निष्पत्ति का सिद्धान्त)

विभिन्न आचार्यों एवं विद्वानों के अनुसार साधारणीकरण

साधारणीकरण में हमें यह समझना है कि साधारणीकरण होता किसका है। इस संबंध में कुछ विद्वानों के मत नीचे दिए जा रहे हैं:

1. भट्टनायक के अनुसार:

“भावकत्वम् साधारणीकरणम्, तेन हि व्यापारेण विभावादयः स्थायी च साधारणीक्रियन्ते।”

अर्थात्: भावकत्व ही साधारणीकरण है। इस व्यापार से विभावादि और स्थायी भावों का साधारणीकरण होता है। इस प्रकार भट्टनायक ने ‘भावकत्व’ नामक व्यापार के माध्यम से साधारणीकरण का उल्लेख किया है।

  • विशेष: भट्टनायक ने काव्य के तीन व्यापार बताए हैं — अभिधा, भावकत्व और भोजकत्व।

2. डॉ. नगेंद्र के अनुसार:

“साधारणीकरण का अर्थ है काव्य के पठन द्वारा पाठक या श्रोता का भाव सामान्य भूमि पर पहुँच जाना।”

3. अभिनवगुप्त के अनुसार:

“साधारणीकरण दो स्तरों पर सम्पन्न होता है। पहले स्तर पर विभावादि देश-काल के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं; दूसरे स्तर पर प्रमाता स्व-पर (अपने और पराए) की चेतना से मुक्त हो जाता है।”

  • इनके अनुसार विभावादि के स्थायी भाव के साथ-साथ सामाजिक की अनुभूति का साधारणीकरण होता है।

4. आचार्य विश्वनाथ के अनुसार:

“साधारणीकरण द्वारा ही प्रमाता और विभावादि में पूर्ण तादात्म्य की स्थिति सम्भव होती है।”

5. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार:

रामचंद्र शुक्ल ने साधारणीकरण पर विस्तृत विचार किया है।

  • उनकी पहली स्थापना यह है कि “साधारणीकरण आलम्बनत्व धर्म का होता है।”

  • दूसरा यह कि “जब तक भाव का कोई विषय इस रूप में नहीं लाया जाता कि वह सामान्यतः सबके उसी भाव का आलम्बन हो सके, तब तक उसमें रसोद्बोधन की पूर्ण शक्ति नहीं आती। विषय का इसी रूप में लाया जाना हमारे यहाँ साधारणीकरण कहलाता है।”

शुक्ल जी ने आलम्बन-धर्म का साधारणीकरण माना है। इस प्रकार रामचंद्र शुक्ल के अनुसार साधारणीकरण का भाव है:

  1. वर्णित अथवा प्रदर्शित आलम्बन का सबके भाव का आलम्बन बनना।

  2. आश्रय के समान आलम्बन के प्रति पाठक अथवा दर्शक का भाव हो जाना।

  • आलोचना: शुक्ल जी के मत की कई विचारकों ने आलोचना की है। रामदहिन मिश्र ने विभावादि के साधारणीकरण को केवल आलम्बनत्व धर्म में सीमित किए जाने पर आपत्ति की है। उन्होंने रस-कोटियों के विभाजन को रस की प्रकृति के विपरीत कहा है और साधारणीकरण तथा तादात्म्य का एक ही अर्थ में प्रयोग भ्रामक माना है।

6. बाबू गुलाबराय के अनुसार:

बाबू गुलाबराय ने कवि, पाठक और भाव तीनों के साधारणीकरण पर विचार किया है (नाटकीय प्रपंच, नाटककार, प्रेक्षक का साधारणीकरण)। उनके मतानुसार साधारणीकरण की स्थिति में:

  1. कवि अपने व्यक्तित्व से ऊँचा उठकर साधारणीकृत हो जाता है। अतः वह लोक-प्रतिनिधि होकर भावाभिव्यक्ति करता है।

  2. पाठक का साधारणीकरण इस अर्थ में होता है कि वह अपने व्यक्तित्व के बन्धनों को तोड़कर लोक-सामान्य की भाव-भूमि में आता है।

  3. भावों का साधारणीकरण इस अर्थ में होता है कि इनमें भी ‘अयं निजः परो वेति’ (यह मेरा है या पराया है) की भावना जाती रहती है।

7. अन्य प्रमुख आचार्यों के मत:

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