रामविलास शर्मा का जीवन परिचय, मार्क्सवादी आलोचना और संपूर्ण साहित्यिक योगदान
हिंदी आलोचना जगत के पुरोधा, महान मार्क्सवादी समीक्षक, भाषाविद् और सांस्कृतिक विचारक के रूप में प्रतिष्ठित रामविलास शर्मा का जीवन परिचय (Ramvilas Sharma ka Jivan Parichay in Hindi) आधुनिक हिंदी साहित्य और प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UGC NET, TGT, PGT, RPSC, असिस्टेंट प्रोफेसर) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस लेख में उनकी मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि, प्रमुख ग्रंथों और परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्यों को विस्तार से शामिल किया गया है।
📌 एक नजर में (Quick Overview): इस लेख में आगे क्या पढ़ेंगे?
इस विस्तृत लेख में रामविलास शर्मा के जीवन और साहित्य से जुड़े निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं को शामिल किया गया है:
-
रामविलास शर्मा का संक्षिप्त जीवन परिचय और जन्म-स्थान
-
मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि, यथार्थवाद और लोकजागरण की अवधारणा
-
प्रेमचंद, निराला, आचार्य शुक्ल और भारतेंदु हरिश्चंद्र पर उनके मौलिक आलोचनात्मक ग्रंथ
-
हिंदी जाति, भाषा और इतिहास बोध से जुड़े महत्वपूर्ण वैचारिक तथ्य
-
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विशेष परीक्षा उपयोगी टिप्स और महत्वपूर्ण फैक्ट्स
-
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
रामविलास शर्मा का संक्षिप्त परिचय (Quick Facts)
-
पूरा नाम: डॉ. रामविलास शर्मा
-
जन्म: 10 अक्टूबर 1912 ई. (ग्राम ऊँचगाँव सानी, उन्नाव, उत्तर प्रदेश)
-
निधन: 30 मई 2000 ई.
-
प्रसिद्धि: प्रमुख मार्क्सवादी आलोचक, निबंधकार, विचारक और भाषाविद्
-
मुख्य योगदान: हिंदी आलोचना को वैज्ञानिक और सुसंगत मार्क्सवादी वैचारिक आधार प्रदान करना
रामविलास शर्मा का जीवन परिचय और साहित्यिक यात्रा (Detailed Biography)
हिंदी आलोचना के क्षेत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद यदि किसी आलोचक ने हिंदी आलोचना को सबसे अधिक गहराई, वैज्ञानिकता और वैचारिक दृढ़ता प्रदान की, तो वे डॉ. रामविलास शर्मा थे। रामविलास शर्मा का जन्म 10 अक्टूबर 1912 ई. को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के अचलगंज के पास स्थित ऊँचगाँव सानी नामक ग्राम में हुआ था।
उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टिकोण के आधार पर साहित्य की व्याख्या की और सामंतवाद, पूंजीवाद, व्यापारिक पूंजीवाद, औद्योगिक पूंजीवाद, महाजनी पूंजीवाद तथा सर्वहारा वर्ग को स्पष्ट किया। आचार्य शुक्ल की आलोचना पद्धति की कुछ त्रुटियों का परिष्कार करते हुए उन्होंने मार्क्सवाद को अपनी आलोचना का आधार बनाया। वे प्रगतिशील लेखक संघ से गहराई से जुड़े रहे और हिंदी आलोचना को एक नई दिशा दी।
रामविलास शर्मा की मार्क्सवादी आलोचना और यथार्थवाद की अवधारणा
डॉ. रामविलास शर्मा ने साहित्य में यथार्थवाद और युगबोध के अंतर्संबंधों को बहुत ही स्पष्ट रूप से व्याख्यायित किया। उनके अनुसार, कलाकार को जनता के जीवन के विभिन्न पक्षों में निहित संबंधों को देखना चाहिए, और उसका चित्रण फोटोग्राफिक या अवास्तविक नहीं होना चाहिए।
-
उन्होंने मध्यकालीन भक्त कवियों (जैसे जायसी, सूर और तुलसी) की प्रगतिशीलता, लोकधर्मिता और कलात्मकता का जोरदार समर्थन किया।
-
उन्होंने भक्तिकाल को ‘लोकजागरण’ तथा आधुनिक काल को ‘नवजागरण’ माना, जिसकी शुरुआत 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से मानी जाती है।
-
आदिकालीन साहित्य को उन्होंने ‘रीतिवाद का प्रथम उत्थान’ तथा रीतिकाल को ‘द्वितीय उत्थान’ माना है।
प्रमुख आलोचनात्मक ग्रंथ और कृतियाँ
रामविलास शर्मा ने प्रेमचंद, निराला, भारतेंदु और आचार्य शुक्ल पर महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखकर हिंदी आलोचना को समृद्ध किया:
1. प्रेमचंद पर केंद्रित कृतियाँ
-
“प्रेमचंद” (1941 ई.): इस पुस्तक में उन्होंने प्रेमचंद की रचनाओं में शोषक वर्ग, सामाजिक पृष्ठभूमि और उनकी प्रगतिशीलता का सूक्ष्म विश्लेषण किया है।
-
“प्रेमचंद और उनका युग” (1952 ई.): इसमें प्रेमचंद का रचनाकार व्यक्तित्व, उनका संपादकीय व्यक्तित्व और युगीन परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन है। ‘गोदान’ के माध्यम से उन्होंने पूंजीवादी शोषण चक्र और महाजनी सभ्यता की क्रूर सच्चाइयों का उद्घाटन किया है।
2. निराला और अन्य रचनाएँ
-
“निराला” (1946 ई.) तथा “निराला की साहित्य साधना” (द्वितीय खंड – 1972 ई.): इन पुस्तकों में उन्होंने निराला के गद्य और पद्य दोनों साहित्यों का प्रामाणिक मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘तुलसीदास’ कविताओं का तुलनात्मक विश्लेषण उनकी आलोचना की बानगी है।
-
“भारतेन्दु हरिश्चंद्र” (1953 ई.) और “भारतेन्दु युग और हिन्दी भाषा की विकास परम्परा” (1975 ई.): इसमें उन्होंने 19वीं सदी के उत्तरार्ध के बौद्धिक-सांस्कृतिक परिवेश और भारतेंदु की राजभक्ति व देशभक्ति के अंतर्विरोधों को रेखांकित किया है।
-
“आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना” (1955 ई.): इस ग्रंथ में उन्होंने शुक्ल जी की आलोचना दृष्टि और लोकहृदय से उनकी आत्मीयता को रेखांकित किया है।
🎯 परीक्षा स्पेशल: रामविलास शर्मा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य और शॉर्टकट टिप्स
-
त्रिमूर्ति संकल्पना: अपने एक निबंध में डॉ. शर्मा ने लिखा कि बीसवीं सदी में हिंदी भाषी जनता ने तीन महान साहित्यिक विभूतियों को जन्म दिया—कथा साहित्य में प्रेमचंद, आलोचना में रामचंद्र शुक्ल और कविता में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला; ये तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
-
साहित्य अकादमी पुरस्कार: उनकेीय ऐतिहासिक कृति ‘निराला की साहित्य साधना’ के लिए उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
-
हिन्दी जाति और भाषा: ‘हिन्दी जाति’ और ‘हिन्दी भाषा’ के निर्माण में उन्होंने बाजार और व्यापार को विशेष महत्व दिया है।
निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहें तो, रामविलास शर्मा का जीवन परिचय केवल एक समीक्षक का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज, भाषा और साहित्य के पुनरावलोकन का एक जीवंत दस्तावेज है। उनकी मार्क्सवादी और वैज्ञानिक आलोचनात्मक दृष्टियों ने पाठकों को साहित्य को समाज बदलने के माध्यम के रूप में देखना सिखाया। प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से उनकी कृतियाँ और वैचारिक स्थापनाएँ हर हिंदी विद्यार्थी के लिए अनिवार्य हैं।
ये आर्टिकल भी अभी पढ़ें
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)