“ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी…” — कवि भूषण के इस प्रसिद्ध पद की व्याख्या और काव्य सौंदर्य
हिंदी साहित्य के रीतिकाल में जहाँ अधिकांश कवि शृंगार रस और दरबारों की विलासिता में डूबे थे, वहीं एकमात्र महाकवि भूूषण ने वीर रस और राष्ट्रीय वीरता का ओजस्वी गान किया। छत्रपति शिवाजी और बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल के शौर्य का वर्णन करने वाले कवि भूषण की यह प्रसिद्ध कविता— “ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी, ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहती हैं”—यमक अलंकार और अर्थ-चमत्कार का एक अनूठा उदाहरण है।
प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, कॉलेज लेक्चरर) और अकादमिक अध्ययन की दृष्टि से इस पद की व्याख्या अत्यंत महत्वपूर्ण है।
📖 पद्यांश (मूल पंक्तियाँ)
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी, ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहती हैं।
कंद मूल भोग करैं कंद मूल भोग करैं, तीन बेर खातीं ते वे तीन बेर खातीं हैं॥
भूषन सिथिल अंग भूखन सिथिल अंग, बिजनडुलातीं ते वे बिजनडुलातीं हैं।
भूषन भनत सिवराज बीर तेरे त्रास, नगर जड़ातीं ते वे ननगर जड़ातीं हैं॥
📝 संदर्भ और प्रसंग
रीतिकाल के वीर रस के एकमात्र प्रसिद्ध कवि भूषण द्वारा रचित ये पंक्तियाँ उनकी प्रामाणिक कृति ‘भूषण ग्रंथावली’ से गृहीत हैं। इस पद में कवि भूषण ने मुगलों और शत्रुओं के विरुद्ध छत्रपति शिवाजी महाराज के अद्भुत शौर्य और आतंक का बहुत ही प्रभावशाली वर्णन किया है। शिवाजी के भय से किस प्रकार शत्रु पक्ष की रानियों और महिलाओं का वैभव नष्ट हो गया है, इसका जीवंत चित्र इस पद में मिलता है।
🔍 विस्तृत व्याख्या (Detailed Explanation)
कवि भूषण कहते हैं कि हे वीर शिवाजी! आपके भयंकर आतंक और पराक्रम के कारण शत्रु पक्ष की महिलाओं की दशा अत्यंत दयनीय हो गई है:
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महलों से पहाड़ों की गुफाओं में: जो शत्रु-स्त्रियाँ पहले बड़े-बड़े और ऊँचे महलों में निवास करती थीं (ऊँचे घोर मंदर), वे अब शिवाजी के डर से ऊँचे पहाड़ों की भयानक और गहरी गुफाओं (घोर मंदर/गुफा) में रहने को विवश हैं।
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स्वादिष्ट भोजन से कंदमूल पर: जो रानियाँ पहले तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान और कंद मूल (मिठाइयाँ/पकवान) का उपभोग करती थीं, वे अब जंगलों में रहकर केवल जमीन के अंदर उगने वाले कंद-मूल (गाजर, शकरकंद आदि) खाकर अपना जीवन गुजार रही हैं।
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समय पर भोजन बनाम बेर खाना: जो महिलाएँ दिन में तीन बार छप्पन भोग और उत्तम भोजन करती थीं (तीन बेर), वे अब केवल जंगल में मिलने वाले तीन बेर (एक प्रकार का फल) खाकर ही पूरा दिन गुजार रही हैं।
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आभूषणों की शिथिलता बनाम भूख से कमजोरी: जिनके अंग कभी सोने-चांदी और हीरों के भारी आभूषणों के भार से शिथिल या सुस्त रहते थे, आज वे ही रानियाँ अन्न और भोजन की कमी के कारण भूख के मारे शारीरिक रूप से शिथिल और कमज़ोर हो रही हैं।
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पंखे की हवा बनाम निर्जन जंगल के पंखे: जो महलों में सेवकों द्वारा रेशमी और सुंदर पंखों से हवा झलवाती थीं (बिजन), वे अब जंगलों में भटकते हुए हवा के लिए पेड़-पौधों के पत्तों से पंखे झलवाने को मजबूर हैं या निर्जन वनों में मारी-मारी फिर रही हैं।
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जड़ाऊ वस्त्र और आभूषण बनाम ठंड से ठिठुरना: कवि भूषण अंत में कहते हैं कि हे वीर शिवाजी! आपके भय से जो शत्रु-स्त्रियाँ कभी अपने शरीर के अंगों पर कीमती आभूषण जड़वाती थीं, वे आज जंगलों में ठंड के मारे नंगे शरीर काँप रही हैं (नगर जड़ातीं यानी शरीर में ठंड लगना/ठिठुरना)।
🌟 विशेष / काव्य सौंदर्य (Critical Notes & Literary Devices)
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शिवाजी के आतंक का प्रभाव: इस पद में शिवाजी के प्रताप और शत्रु-पक्ष पर पड़ने वाले उसके भयानक मनोवैज्ञानिक एवं भौतिक प्रभाव का अत्यंत सजीव चित्रण हुआ है।
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भाषा और रस: इस पद की भाषा प्रवाहमयी और शुद्ध ब्रजभाषा है, जो वीर रस और रौद्र/करुण भाव के अनुकूल बैठी है। इसमें वीर रस और उसका स्थायी भाव उत्साह (तथा भय/करुणा का मिश्रण) मुख्य रूप से द्रष्टव्य है।
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यमक अलंकार का चमत्कार: इस पूरे पद की सबसे बड़ी विशेषता इसका यमक अलंकार है, जहाँ एक ही शब्द बार-बार आने पर अलग-अलग अर्थ देता है:
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ऊँचे घोर मंदर (पहला = ऊँचे महल, दूसरा = ऊँची गुफाएँ)
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कंद मूल भोग करैं (पहला = स्वादिष्ट पकवान, दूसरा = कंद-मूल फल)
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तीन बेर खातीं (पहला = दिन में तीन बार, दूसरा = तीन बेर फल)
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भूषन सिथिल अंग (पहला = आभूषण, दूसरा = भूख/कमजोरी)
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बिजनडुलातीं (पहला = पंखा झलवाना, दूसरा = निर्जन वन)
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नग जड़ातीं (पहला = रत्नों को जड़वाना, दूसरा = ठंड से काँपना/ठिठुरना)
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काव्य रूप: यह एक सुंदर मुक्तक काव्य का उदाहरण है, जिसमें कवित्त छंद का प्रयोग किया गया है।
📌 निष्कर्ष
संक्षेप में कहा जा सकता है कि कवि भूषण की यह कविता केवल शब्द-चमत्कार या अलंकार का प्रदर्शन मात्र नहीं है, बल्कि यह रीतिकाल में राष्ट्रीयता, शौर्य और यथार्थपरक दृश्यों को चित्रित करने वाली एक अनूठी रचना है। यमक अलंकार के माध्यम से वैभव और विपत्ति का जो विरोधाभास भूषण ने प्रस्तुत किया है, वह हिंदी साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है।
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