अपने-अपने पिंजरे : आत्मकथा सारांश
मोहनदास नैमिशराय की लब्ध-प्रतिष्ठ आत्मकथात्मक कृति ‘अपने-अपने पिंजरे’ (प्रथम भाग-1995, द्वितीय भाग-2000 ई.) दलित आत्मकथा-साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। इस बहुचर्चित कृति को कतिपय लोगों ने हिन्दी की प्रथम दलित आत्मकथात्मक कृति होने का श्रेय प्रदान किया है। मोहनदास नैमिशराय ने इस मशहूर आत्मकथा में अपने अनुभवों के माध्यम से भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था तले दबे दलितों के आर्थिक, सामाजिक शोषण के साथ-साथ दलितों की महत्त्वाकांक्षाओं, समस्याओं और उनके संघर्षों को वाणी दी है।
इस आत्मकथा में दलितों की गरीबी, अशिक्षा, दलित स्त्रियों के साथ यौन-शोषण, बलात्कार, अस्पृश्यता, पूँजीवादी शोषण प्रवृत्ति, जातियों-उपजातियों में बँटे दलित-समाज, दलित-आन्दोलन, दलितों के संघर्ष इत्यादि प्रमुखता से उभरकर सामने आते हैं। दलित जीवन के अंतर्विरोध, दलित-मुक्ति-संघर्ष, दलित आन्दोलन की कमजोरियों व संभावनाओं की पड़ताल इस आत्मकथात्मक कृति में अनुभव के धरातल पर सृजित हुई है।
मोहनदास नैमिशराय की अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाएँ निम्नलिखित है –
आत्मकथा
• अपने-अपने पिंजरे (भाग-1: 1995, भाग-2: 2000)
• रंग कितने संग मेरे (भाग-3)
उपन्यास
• मुक्तिपर्व
• आज बाज़ार बंद है
• ज़रा ज़मीन अपनी
• जाकौ राखै साइयाँ