शृंगार को रसराज क्यों कहा जाता है?
(1) शृंगार का आधार ‘काम’ रति है, जो पशु-पक्षी तक में समान भाव से पाया जाता है। अतः, व्यापकता के कारण शृंगार रसराज है।
(2) इसके संयोग और वियोग दो पक्ष होते हैं, जबकि अन्य रसों के नहीं।
(3) किसी भी साधना में परिणति शृंगार में होती है। कबीर जैसे निर्गुण फक्कड़ ने स्वयं को राम की बहुरिया कहा।
(4) अन्य रसों की तुलना में शृंगार रस अधिक चर्वणीय है।
(5) शृंगार रस में अन्य रसों को समाहित करने की क्षमता है।
(6) शृंगार के आलंबन नायक-नायिका हैं, जिनके साथ पाठक या श्रोता पूर्ण तादात्मय स्थापित कर सकता है, अन्य रसों में यह बात नहीं है।
(7) शृंगार रस को ‘रसराज’ आचार्य भोजराज ने कहा है।